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मनोज कुमार सामरिया “ मनु ” की नई कविताएँ

सारिका कुमारी की कला

1.  परिंदे.      
 
हम परिंदें हैं गगन के ,
जो मिल गया आसरा
किसी दरख्त की शाख का ,
तो उसे ही अपना समझकर
ठहर जाते हैं घड़ी दो घड़ी ।
मिल जाए गर ओट पत्तों की
तो बुन लेते हैं आशियाना ,
चुनकर अरमानों के तिनके ।
बेदर्द हवा को ज़रा भी
अहसास नहीं हमारे दर्द का
वक्त बेवक्त उजाड़ देती है घरौंदे ....
मगर बसाने का सबक वो क्या जाने
जो बस कर ना रही कभी .....
पहले तो चहक उठते थे हम भी
हर जरा सी बात पर ....
अब तो  शाखें बदलती रहती है अक्सर
जी लगता ही नहीं अब किसी शाख पर ....
आ जाता है कभी पुराना संगदिल कोई
तो परत हट जाती है यादों की तस्वीर से....
धुँधलके में भी साफ पढ़ पाते हैं
अक्षर दर अक्षर हम तहरीर से.......
    
 
 
        2.    तेरी तस्वीर 
बनाता हूँ हर बार ख्वाबों में तस्वीर तेरी
पानी में कोई लकीर बनती है जैसे
क्षणिक छलावा ..
पल भर का बनना ,पलभर में मिटना,
उसूल हो जैसे उसका.....
देता है सुकून मुझे यह बनना और मिटना,
तेरा नजरों से दूर जाना लगता है
जैसे मुद्दत हुई तुझसे मिले.....
तेरा साथ होना ही ताकत है मेरी,
अब तो लत सी लग गई है साथ रहने की....
सुना करता था मैं ये बात लैला-मजनूं की
कहानी में और हँसता था इन पर ....
आज  खुद को उसी कहानी का पात्र बना पाता हूँ ,
देख रहा हूँ उनको हँसता हुआ खुद पर ...
समझ रहा हूँ मुहब्बत के जज्बात औ जुनून को ,
जो हिलोरें ले रहा है दिले समन्दर में,
जिसकी वजह है यह तेरी तस्वीर.....
तेरे जाते ही याद आई मुझे इसकी ,
जो गर्द की ओढ़े चादर शिद्दत से
मुझे मुस्कुराते हुए निहार रही है.
अब मेरे खामोश,तन्हा लम्हों को
काटने का नायाब नुस्खा है यह तेरी तस्वीर....
जब मैंने इसे छुआ तो आनन्द से
भर उठा " मनु " भीतर तक ,
इस पर जमी रेत को हटाया
आनन फानन में तो सारी रेत लिपट
गई मेरी कठोर किन्तु मजबूत उँगलियों से,
चादर हटते ही रेत की मुझे अहसास हुआ
कि तुम कितनी खूबसूरत हो .....
जब तक तुम नहीं आ जाती लौटकर
तब तक मेरे साथ है यह तेरी तस्वीर.....
           
 
 
3.  यादों की चादर
तेरी यादों की ले चादर
कि सोया रहूँ मैं रात भर .
चाहता हूँ मैं बस इतना
कि ना नींद आए ना कोई ख्वाब
मेरे हाथों में रहे बस तेरा हाथ भर .... 
                       कि सोया रहूँ मैं रात भर.....
लड़ जाऊंगा मैं फिर
जमाने की सब ताकतों से ,
बस मेरे टूटते हौसलों को
मिल जाए तेरा साथ भर...
            कि सोया रहूँ मैं रात भर.....
यकीं करती है तू मुझ पर
यही दौलत है 'मनु' मेरी,
सुकूँ पहुंचाते हैं मुझको
तेरे ये जज्बात भर....
          कि सोया रहूँ मैं रात भर.....
कि खोया है तूने भी
अपना चैन मेरी खातिर ,
मायने बहुत रखती है
मेरे लिए ये बात भर....
     कि सोया रहूँ मैं रात भर......
   
4.    वक्त की गर्दिशें   
वक्त की गर्दिशें मिटा देती है अल्फ़ाज सारे ,
कौन याद रखता है पुराने पन्नों को
नई किताब मिलने पर..
सपने अधूरे ही रह जाते हैं आँखों में
चन्द नये ख्वाब दिखने पर ..
इन्सान की फितरत है
मौसम की मानिंद खुद को बदलने की
भूला देता है पुरानी डगर
अक्सर नयी राह मिलने पर ..
कौन याद रखता है उस उँगली को
जिसने चलना सिखाया ,चलना सीखने पर...
लड़ता रहा था अंधकार से
अकेला रात भर
नजरअंदाज कर देते है उस चिराग को
पूनम का चाँद दिखने पर ...
इतिहास का भी अपना वज़ूद है
दोहरा देता है अक्सर खुद को
संभल कर चलना आज की डगर पर ..
मोहरें हैं हम तो परवरदिगार के ,
क्या खबर खेल कब उठ जाए
शतरंज की बिसात पर ..
चलना सोचकर चाल
संयम रखना गुस्से और जज्बात पर ..
मैं तो खुद मजबूर हूँ
वश चलता कहाँ है ख्यालात पर ..
हर बार चोट खाकर
बस पछताता हूँ अपने हालात पर..। ।
             अपने हालात पर ..।
                                       
 
5.  सुबह सुबह तुम्हें सोचना
 
सुबह सुबह तुम्हें सोचना
ताजगी से भर देता है ....
तुम्हारा  भोला चेहरा
दिन मंगलमय कर देता है....
तुम्हारे साथ गुजरे लम्हे
इनायत है मेरी....
बस भीगता रहूँ रिसता रहूँ
  यादों में तुम्हारी...
नमीं इसकी भीतर तलक
तर कर देती है कभी मुझे ...
और कभी बहने लगती हो आँखों से ,
रोक नहीं पाता तुम्हें .....
इन आँखों को लत लग गई
शायद तुम्हारी ....
हर चेहरे में तुम्हारा ही
अक्स देख लेती है...
अब तो तुम्हें पहचानने
लगा हूँ दूर से ही ,
अहसास होने लगता है तेरा ....
सोचता हूँ कभी कभी
क्या है बिन तेरे वज़ूद मेरा...
एक बार जब हम मिले थे
तो तुमने थोड़ी सी
मिट्टी मिला दी थी अपनी मुझमें ,
तब से नहीं झाड़ा है मैंने खुद को
इस डर से कहीं तुम गिर न जाओ ....
तुम्हें खोने के डर से भी
डरता हूँ मैं ....
नहीं जानता तुमसे
कितना इश्क करता हूँ मैं.....
बस एक जिद लिए बैठा है
दिल -ए - “मनु” कि ना हटे
ये बदली चाहत की ....
यूँ ही बरसती रहे
बूँदें सावन सी राहत की ....
तुम्हारा पहला स्पर्श
आज भी याद करता हूँ तो
रोम रोम मेरा उठकर समर्थन
करता है सारा.....
पलकें मूँदकर महसूस
कर लेता हूँ कम्पन तुम्हारा.....
रात के सन्नाटे में भी
तुम्हारी पायल की
खनखन सुनाई देती है....
उसी संगीत के साथ
सोया रहता हूँ जब नींद
अपने आगोश में ले लेती है...
रात ये सोचकर गुजर जाती है
कि जैसे तुम मेरे पहलू में सोयी हो ...
वही नशीली बांहें फैलाए
मदहोशी में खोयी हो ...
फिर .....
सुबह सुबह तुम्हें सोचना
मुझे ताजगी से भर देता है ....
तुम्हारा भोला चेहरा
दिन मंगलमय कर देता है....
                          
 
 
 
 
 
6.       तब से अब तक
तब से अब तक तन्हा और बेचैन हूँ
जब आखिरी बार लगाया था
तुमने मुझे अपने गले .....
तुम्हारा इस कदर मुझे बाहुपाश  में कसना ,
एक अनजान डर से सुबकना ...
आँसुओं की कुछ बूँदों का नयनों से
निकलकर जबरन मेरे कंधे पर लुढ़कना ....
फिर भी हौले हौले मुस्काना ,अपने को खुश जताना ।
अचानक से तुम्हारा इस तरह आना ,
मैं कुछ समझ नहीं पाया  ,मन थोड़ा भरमाया ।
कैसे स्वागत करूँ तुम्हारा ...
सेज सजाउँ ,फूल बिछाउँ या खुद बिछ जाउँ ।
वक्त जैसे हैरान होकर ठहर गया था ,थम गया था
क्यों चाँद उस रात मेरी छत पर डेरा ड़ाले  सो गया था ।
मद्धिम मद्धिम हवा बह रही थी सब सितारे पहरा दे रहे थे ।
पर आज गुजरे हुए उन क्षणों का एक कठोर सच
हमारे सामने अटल सा खड़ा है ।
जिसे हम दोनों ने कभी नहीं स्वीकारा ....
कि वक्त उस रात हमें सोया हुआ छोड़कर
चुपके से चला गया , गुजर गया  ।
उसके कदमों के निशां अभी तक जमे हुए हैं
ज्यों के त्यों मेरी सूनी छत पर ....
तब से अब तक तन्हा और बेचैन हूँ ....
चाँद तो अब भी आता है
पर छत पर उतरना भूल जाता है ,
सीधा आकाश मार्ग से ही चला जाता है
शायद चाँद वह गलती फिर नहीं करना चाहता ।
मेरी छत पर आने की ....
तब से अब तक तन्हा और बेचैन हूँ ......
          
 
7.  परछाई
मेरी परछाई ही हो तुम ,यूँ मुझसे दूर ना जाओ ।
निगाहें बज्म की तुम पर ,मेरी बांहों में आ जाओ ।
          मेरी परछाई ही हो तुम............
कोई खुद से भला कब तक अकेला दूर पाया ...
छुपाया दर्द को दिल में तो आँखों से छलक आया ।
तुम्हीं मैं हूँ मैं ही तुम हो तो खुद से यूँ ना शरमाओ ....
               मेरी परछाई ही हो तुम.........
हमारी एक है मंजिल हमारी नेक है राहें ...
सहारा एक दूसरे का हम भरेंगे हम नहीं आहें....
आँधियाँ चलने दो रूत की हवाओं से ना घबराओ...
     मेरी परछाई ही हो तुम यूँ मुझसे दूर ना जाओ....
तुम्हें चाहूँगा जी भर मैं कि साँसों में समा जाओ ..
धड़कने एक कर लें हम कि इतने पास आ जाओ ..
तोड़ के सारे बंधन तुम मुझे अपना बना जाओ...
मेरी परछाई ही हो तुम यूँ मुझसे दूर ना जाओ..
निगाहें बज्म की तुम पर ‘मनु’ बाँहों में आ जाओ..
मेरी परछाई ही हो तुम.........
             


8.   यादों के दिव्य झरोखे से
यादों के दिव्य झरोखे से
जब  क्षणिक याद तेरी आई  ।
तत्क्षण प्रिय मेरे अन्तस में
मद्धिम सी सिहरन लहराई ।
हुआ मुझे अहसास यूँ तेरा ,ज्यों सावन में बूंदें छितराई .....
यादों के दिव्य झरोखे से जब क्षणिक याद तेरी आई ।।
तब से हूँ में बहका बहका
फूलों जैसा महका महका ।
स्मरण है मुझे तेरे रूप का
जब लक्ष्मी बनकर आई ।
बजना मृदुसंगीत का जैसे ,तुमने  पायल छनकाई .....
यादों के के दिव्य झरोखे से जब क्षणिक याद तेरी आई ।।
पल भर की छुअन मात्र
अब रोम रोम स्पंदित है ,
पर फैलाए मन पंछी अब
चहक बहक आनन्दित है ।
महसूस हुई मेरे अन्तर्मन में  , अनुपम प्रीत  की गहराई ....
यादों के के दिव्य झरोखे से जब क्षणिक याद तेरी आई ।।
चिरपरिचित वह नेह का बन्धन
मदविह्ल  वह मधुर आलिंगन ।
खंजन नयन वह बाँकी चितवन
राधासम छवि  पावन मनभावन ।
महसूस हुआ मुझको कम्पन ,“मनु”जब तुम हौले  से मुस्काई ....
यादों के दिव्य झरोखे से जब क्षणिक याद तेरी आई ।।
                    


9.     ओ पिता मेरे पिता 
पिता ..हमेशा आदर्श के
मुलम्मे में बंधा शख्स...
कभी - कभी दिखाई दे देती है
चिन्ता की लकीरें ,
संतोष की जगह पर कुछ क्षण
बाद आ जाती है
चेहरे पर स्थाई गंभीरता
के साथ   कठोरता .
उतावलापन तो उन्हें
छू तक नहीं गया ,
उनकी चाल में एक 
अद्भुत धैर्य औ शान्ति
छलकती है ।


जब भी मैंने देखा
उन्हें सागर की भाँति अनन्त
मगर सीमाओं में बँधा हुआ ,
उस सागर के गर्भ में कितनी
हलचल समेटे हुए है कोई नहीं समझता ।
वो हँसी को भी जैसे भीतर से
खींचकर ओठों पर सजाते हों ,
कभी - कभी मुस्कुरा देते है
माँ को देखकर क्षण भर ।
हमेशा हमारी ख्वाहिशों का
पुलिंदा बाँधे घर लौटते है  ,....
हम सबकी खिलखिलाहट ही
“ मनु ” उन्हें सुकून देती है।
उन्हें कभी शिकायत करते भी
नहीं सुना मैंने ,


परन्तु वो अक्सर अपने
अनजान ईश्वर से घण्टों बातें करते
रहते हैं हम सबको सुलाकर देर रात ....
हमारे साथ खेलते - खेलते खो जाते थे
बचपन में और बताने लग जाते थे
अपने छुटपन में ....
अफसोस करते रहते हैं सोच -सोच कर
गुजरे लम्हों को ...
सच कहूँ तो आज वो कुछ -कुछ
मुझमें  उतर आये ..क्योंकि उनके
जाने के बाद अक्सर माँ कहती रहती है
तू “उन" पर गया है ,तो सोचता हूँ माँ के
“उनके" बारे में कि वो भी मेरी ही तरह
दिखते होंगे कुछ -कुछ या पूरी तरह
कहना मुश्किल है......
 
पर ये तय है हर सूरत - ए - हाल
मैं उनके नक्शे कदम पर चलने की
हर संभव कोशिश करूँगा ।
यही मेरे जीवन का आधार है नहीं
मकसद कहो तो बेहतर होगा ..
जीवन उनके बनाए उसूलों पे
चलते हुए काट पाउँ ...
मुझे मालूम है ये बहुत मुश्किल है
मगर नामुमकिन नहीं .....
अंत में प्रणाम उस वज़ूद को
जिसने मेरे रूप को साकार
किया ...मुझे आकार दिया ।
पुनः कोटि -कोटि वन्दन
उस दिवंगत आत्मा को .....
          


10. सखी मैं तेरे मन की जानूँ
सखी मैं तेरे मन की जानूँ
मन के भीतर जो टूटा है ,
सिसकियों से ,उहापोह से,
बंधा हुआ रूदन फूटा है .... सखी मैं तेरे मन की जानूँ
कहने की क्या जरूरत है पगली !
कहने दो भीतर जो सोता फूटा है ।
जितना भी  अन्तस में सूनापन ,
जितने आँसू सूख चुके हैं
जानो इसको हमसे पहले जितने ऐसे ,
पुष्प बाग में सूख चुके हैं ।
मुरझायी से पाँखें झूठी ,
सपनों की अम्बार है झूठा ...
नयन  कोर तक आते आते
अश्रु कण तो टूटा ही टूटा है  .... सखी मैं तेरे मन की जानूँ
तेरे दर्द को तब समझा मैंने
जब मेरा अपना मुझसे रूठा है ।
क्यों कोमल तन ने तेरे ,
गरम  रेत की सेज चुनी है ,
क्यों तेरे मनसागर भीतर
क्रन्दन की प्रवाह फूटा है ....
जानो गया हूँ सखी मैं सब कुछ
“मनु” मन के भीतर जो टूटा है ।।
              मनोज कुमार सामरिया “मनु”
 
 
11.   ए नन्ही नन्ही पाँखों वाले
ए नन्ही नन्ही पाँखों वाले
मुझको तू उड़ना सिखला दे ...
नील गगन की अनन्तता को
पल पल झुठलाना बतला दे ..
चहक चहक कर सुबह सवेरे
  खुशियाँ  से आँगन महकाना बतला दे  ,
खोज खोज कर तिनका तिनका
  स्वप्न सेज सजाना बतला दे ...
नन्हे से तिनके के बल पर
निज  नीड़ बनाना ,
मुझ  मानुष को भी बतला दे ...ए नन्ही नन्ही पाँखों वाले
क्या नहीं रोकता तुम्हें क्षितिज ,
क्या नहीं टोकता तुम्हें गगन ,
उड़ा लेता  है दूर दिशा में
होकर अपने मन में मगन ।
विस्तृत नभ के कोने -कोने
फैले बादल से टकराना बतला दे ....ए नन्ही नन्ही पाँखों वाले
चूँ चूँ चूँ चूँ की भाषा में
भाव सभी बतलाना सिखला दे ,
पँख हिलाकर खुशी जताना
मुझ मानुष को भी समझा दे ....ए नन्ही नन्ही पाँखों वाले

image
        मनोज कुमार सामरिया “ मनु ”

--

जीवन परिचय

नाम - मनोज कुमार सामरिया “मनु”

जन्म = 20 -11- 1985

जन्म स्थान - लिसाड़िया( सीकर )

पता = प्लाट नं. A-27 लक्ष्मी नगर 4th ,

२००फिट बायपास के पास ,वार्ड नं. २

मुरलीपुरा जयपुर ।. पिन नं. 302039

व्हाटअप नं. 8058936129

शिक्षा - बी . एड़ , स्नातकोत्तर (हिन्दी साहित्य )

NET हिन्दी साहित्य

गत सात वर्ष से हिन्दी साहित्य शिक्षक के रूप में कार्यरत

अनेक बार मंच संचालक के रूप में

सराहनीय कार्य किया ।

लगातार कविता लेखन ,

सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेख ,वीर रस एंव श्रृंगार रस प्रधान

रचनाओं का लेखन ।

वर्तमान में रचनाकार डॉट कॉम पर रचनाएँ प्रकाशित ।

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