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स्वामी श्रद्धानंद का हत्यारा, गांधीजी को प्यारा / रमेशराज

 

(बलिदान दिवस 23 दिसम्बर )

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इस बात से कोई भी इन्कार नहीं कर सकता कि सबसे अधिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आर्य समाज के राष्ट्रवादी चिन्तन की तप्त विचारधारा से तपकर सोने की भाँति चमके। रानी लक्ष्मीबाई, तिलक, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, अजित सिंह, भगवती चरण वोरा , सुखदेव, राजगुरु, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे अनेक आत्म बलिदानियों के साथ-साथ स्वराज, स्वदेशी, विदेशी वस्तुओं के वहिष्कार, स्त्री शिक्षा, दलितोद्धार और गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के प्रबल समर्थक तथा अंग्रेजों के छक्के छुड़ा देने वाले स्वामी श्रद्धानंद का स्वतन्त्रता संग्राम का जज्बा भी उस आत्म बलिदान की गाथा है जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

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लेकिन इतिहासकार डॉ. मंगाराम की पुस्तक ‘क्या गांधी महात्मा थे?’ के तथ्यों के प्रकाश में देखें तो गांधीजी को आर्य समाजियों से बेहद चिढ़ थी। डाक्टर साहब के अनुसार -‘‘गांधीजी ने आर्य समाज, सत्यार्थ प्रकाश, महर्षि दयानंद और स्वामी श्रद्धानंद की विभिन्न प्रकार से आलोचना की। गांधीजी ने कहा-‘‘स्वामी श्रद्धानंद पर भी लोग विश्वास नहीं करते हैं। मैं जानता हूँ कि उनकी तकरीरें ऐसी होती हैं जिनसे कई बार बहुतों को गुस्सा आता है। दयानंद सरस्वती को मैं बड़े आदर की दृष्टि से देखता हूँ, पर उन्होंने अपने हिन्दू-धर्म को संकुचित और तंग बना दिया है। आर्य समाज की बाइबिल ‘सत्यार्थ प्रकाश’ को मैंने दो बार पढ़ा है। यह निराशा और मायूसी प्रदान करने वाली किताब है।’’

डॉ. मंगा राम ने पुस्तक में आगे लिखा है-‘‘स्वामी श्रद्धानंद को 23 दिसम्बर 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक युवक ने उस समय गोली से मार दिया, जब वे रुग्ण शैया पर पड़े हुए थे। गांधीजी ने स्वामीजी के हत्यारे को ‘प्यारे भाई रशीद’ कहकर सम्बोधित किया। उसके द्वारा की गयी जघन्य हत्या की निन्दा करने के स्थान पर उस हत्यारे के प्रति बरती गयी उदारता क्या गांधी जी की नैतिकता गिरावट को प्रकट नहीं करती? भले ही ब्रिटिश सरकार ने अब्दुल रशीद को फाँसी पर लटका दिया किन्तु उसको बचाने का प्रत्यत्न करने वाले वकील आसफअली गांधीजी के भक्त और कांग्रेस के नेता थे।

स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के समय गांधीजी कांग्रेस के 1926 के गोहाटी अधिवेशन में भाग ले रहे थे। जब उन्हें स्वामीजी की हत्या का समाचार मिला तो गांधीजी ने कहा-‘‘ऐसा तो होना ही था। अब आप शायद समझ गये होंगे कि किस कारण मैंने अब्दुल रशीद को भाई कहा है और मैं पुनः उसे भाई कहता हूँ। मैं तो उसे स्वामीजी का हत्या का दोषी नहीं मानता। वास्तव में दोषी तो वे हैं जिन्होंने एक-दूसरे के विरुद्ध घृणा फैलायी।’’

स्वामी श्रद्धानंद के अतिरिक्त प्रख्यात आर्य उपदेशक पं. लेखराम, दिल्ली के प्रसिद्ध आर्य समाजी नेता लाल नानक चंद, महाशय राजपाल, सिन्ध के आर्य नेता नाथूरमल शर्मा आदि भी कट्टरपंथियों द्वारा मारे गये किन्तु गांधीजी ने इन आर्य विद्वानों और नेताओं की हत्या की निंदा में कभी भी कोई शब्द व्यक्त नहीं किया। जिस प्रकार स्वामी श्रद्धानंद जैसे मूर्धन्य नेता की हत्या किये जाने पर गांधीजी ने उनके हत्यारे अब्दुल रशीद की आलोचना नहीं की, उसी प्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या किये जाने पर भी उन्होंने हत्यारों की निंदा नहीं की।

कुल मिलाकर डॉ. मंगा राम अपनी पुस्तक ‘क्या गांधी महात्मा थे?’ के माध्यम से अंहिसा के पुजारी महात्मा गांधी की हिंसा को बल प्रदान करने वाली इस सोच के पीछे यह तर्क देते हैं कि-‘‘गांधीजी समझते थे कि मुस्लिम हत्यारों की निंदा करने पर उनकी वांछित हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्भव नहीं हो पायेगी तथा उन्हें साम्प्रदायिक कहकर बदनाम किया जायेगा।

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सम्पर्क- 15/109 ईसानगर, निकट थाना सासनी गेट, अलीगढ़

मो. 9634551630

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