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व्यंग्य / बाबूलाल का जीव /वीरेन्द्र ‘सरल‘

मरने के बाद बाबूलाल का जीव अपना पाप-पुण्य का हिसाब कराने ज्यों ही चित्रगुप्त के आफिस में घुसने लगा त्यों ही दरबान ने रास्ता रोकते हुए कड़ककर कहा-‘‘ये मिस्टर! कहाँ घुसे जा रहे हो? पहले अपना आधार कार्ड और मत्यु प्रमाण-पत्र दिखाओ तब अन्दर घुसना, समझे? पहले तो बाबूलाल का जीव हड़बड़ा गया। फिर बौखलाते हुए बोला-‘‘अंधे हो क्या? देखते नहीं मैं मर गया हूँ, मरे हुए को मृत्यु प्रमाण-पत्र की क्या आवश्यकता? यहाँ मैं अपना पाप-पुण्य हिसाब कराने जा रहा हूँ, कोई ‘शासकीय योजना का लाभ उठाने के लिए आवेदन करने नहीं जो आपको आधारकार्ड दिखलाऊँ।‘‘ दरबान बोला-‘‘ये सब हम नहीं जानते। केवल आपके कहने से ही हम नहीं मान सकते कि आप मर गये है। हम आँखन देखी पर नहीं बल्कि कागद की लेखी पर विश्वास करते हैं मतलब बिना मृत्यु प्रमाण-पत्र के हम मान ही नहीं सकते कि आप मर गये हैं। हम तो गरीबी रेखा का कार्ड देखकर लखपति को भी गरीब मानते हैं और चिकित्सा प्रमाण-पत्र देखकर स्वस्थ्य आदमी को बीमार। इतना ही नहीं, चरित्र प्रमाण-पत्र देखकर डाकू को भी समझते हैं और भ्रष्ट, दागी, अपराधी को भी जनसेवक, समझ गये?

दूसरी बात हमें जो आदेश मिला है हम वही कर रहे हैं। हमसे कहा गया है कि बिना परिचय-पत्र के किसी को भी अन्दर प्रवेश करने नहीं दिया जाय। आपको कोई न कोई अपना परिचय-पत्र तो दिखाना ही पड़ेगा। चाहे वह ड्राइविंग लाइसेन्स हो, पेनकार्ड हो, मतदाता परिचय-पत्र हो या आधारकार्ड इनमें से जब तक कोई दो चीजें आप हमें नहीं दिखाते तब तक हम आपको अन्दर जाने नहीं दे सकते। बाकी आपकी मर्जी।‘‘

बाबूलाल का जीव मन ही मन बड़बड़ा रहा था, अपने यहाँ होता तो डाइरेक्ट भैया जी से इसकी बात करा देता, इसकी सारी हेकड़ी घुसड़ जाती। काश, भैया जी भी साथ में मरे होते तो मरने के बाद ऐसी मुसीबतों का सामना करना नहीं पड़ता। वह दिमाग लगा रहा था। आखिर इस मुसीबत से कैसे निपटा जाय? आखिर में वह झगड़ा नीति का सफल प्रयोग करते हुए जोर-जोर से चीखते हुए दरबान के साथ बहस करने लगा। ‘शोर-शराबा सुनकर कार्यालय से एक कर्मचारी निकल आया और हालात का जायजा लेने लगा। बात समझ में आते ही उन्होंने दरबान से कहा-‘‘भाई बस, बहुत हो गया। मुत्यु सूची में इसका नाम है, इसलिए इसे अंदर आने दो। यहाँ आने वाले जीव को पहले परिचय-पत्र दिखाने के लिए बाध्य करो। यदि वह किसी भी प्रकार के परिचय पत्र दिखाने में असमर्थ है तो भी मुत्यु सूची में उसका नाम देखकर उसे अंदर प्रवेश करने दो। यही प्रवेश आयोग का नियम है।

बाबूलाल का जीव दरबान को व्यंग्य दृष्टि से देखकर मन ही मन बड़बड़ाया-साला! बड़ा आया था परिचय-पत्र माँगने वाला। और वह कार्यालय के उस कर्मचारी के साथ आराम से अन्दर घुस गया।

बाबूलाल के जीव को चित्रगुप्त के सामने पेश किया गया। चित्रगुप्त ने उसे नीचे से ऊपर तक घूरकर देखा और तौल प्रभारी से कहा-‘‘इस महाशय के पाप-पुण्य को धरमतुला के बजाय इलेक्ट्रानिक धरम काँटा से तौला जाय, ‘शक्ल से यह कोई वजनदार आदमी लग रहा है।‘‘

आदेश मिलते ही तौल प्रभारी बाबूलाल के जीव को धरम-काँटा के पास ले जाकर उसका पाप-पुण्य तौला। तौल पर्ची चित्रगुप्त के हाथों में थमाया और बाबूलाल के जीव को उसके सामने बिठा दिया।

तौल पर्ची देखकर चित्रगुप्त की आँखें सिकुड़ गई। उसने बाबूलाल के जीव से कहा-‘‘तुम्हारा पाप का पलड़ा बहुत भारी है महोदय, अपनी सफाई में कुछ कहना हो तो कह सकते हैं। वरना, आपके लिए नरक में स्थान निर्धारित किया गया है।‘‘

नरक का नाम सुनते ही बाबूलाल का जीव भड़क गया। उसने कहा-‘‘आप होश में तो हैं चित्रगुप्त जी। आपको पता है मैं कौन हूँ और आपकी इस तरह उल्टी-सुलटी बातों का क्या अंजाम होगा। आपका ये धरम काँटा है कि इलेक्ट्रानिक वोंटिग मशीन? जिन्दगी भर मैंने भगवदभक्ति की है। सुबह-शाम दो-दो घंटे पूजा-पाठ में बिताया है। पहले आप अपने धरम-काँटा को ठीक-ठाक सेट कीजिए। सेटिंग पूर्ण पारदर्शिता के साथ हो। इसमें किसी भी प्रकार की धांधली मुझसे बर्दाश्त नहीं होगी।‘‘

चित्रगुप्त ने कहा-‘‘तमीज से बात कीजिए बाबूलाल जी! ये आपका मृत्यु लोक नहीं है। यहाँ आपकी धमकी से हम घबराने वाले नहीं हैं। आपकी कोई भी ऊँची पहुँच यहाँ काम आने वाली नहीं है। हमारे कार्यों में किसी भी प्रकार की गफलत नहीं होती। हम जो भी करते हैं। उसे ईश्वरीय विधान के तहत पूर्ण पारदर्शिता के साथ करते है। आपको यकीन नहीं है तो थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए, अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा।‘‘

चित्रगुप्त ने अपने एक कर्मचारी को आदेश दिया, तुरन्त लाई डिटेक्टर लाओ। बाबू लाल के जीव का ध्यान कहीं और था। वह चित्रगुप्त की बात ठीक से सुन नहीं पाया और समझा कि मुझसे कुछ कहा गया। वह हड़बड़ाते हुए बोला-‘‘वह तो मैं घर पर छोड़ आया हूँ।‘‘ चित्रगुप्त ने कहा-‘‘मैंने आपसे नहीं बल्कि अपने कर्मचारी से कुछ कहा है पर आप क्या छोड़ आये हैं। बाबूलाल के जीव ने झेंपते हुए जवाब दिया-‘‘वही मलाई डिटेक्टर जिसकी आप बात कर रहे थे।‘‘ चित्रगुप्त ने माथा पीटते हुए कहा-भाई ये मलाई डिटेक्टर कौन सी मशीन है? मैं तो लाई डिटेक्टर मतलब झूठ पकड़ने वाली मशीन की बात कर रहा हूँ।‘‘

झूठ पकड़ने वाली मशीन का नाम सुनकर बाबूलाल के जीव का चेहरा सफेद पड़ गया। भेद खुलने के डर से वह थर-थर काँपने लगा और बोला-‘‘इसकी कोई आवश्यकता नहीं है चित्रगुप्त जी। आप जो सजा देना चाहें दें। मुझे कोई आपत्ति नहीं है। आपका आदेश शिरोधार्य है प्रभु पर कृपा करके लाई डिटेक्टर मत मंगवाइये। मुझे नरक के जिस कमरे में भेजना चाहें तुरन्त भेज दीजिए मैं जाने के लिए तैयार हूँ। आप केवल कमरे का नम्बर बता दीजिए, मैं स्वयं चला जाऊँगा। किसी को मेरे साथ जाने के लिए कष्ट भी उठाना नहीं पड़ेगा।‘‘

बाबूलाल के जीव की घबराहट देखकर चित्रगुप्त का शक गहरा हो गया और उनकी जिज्ञासा बढ़ गई। आखिर यह बाबूलाल किस रहस्य से पर्दा उठने नहीं देना चाहता? ‘शेर की तरह दहाड़ने वाला यह जीव, लाई डिटेक्टर का नाम सुनकर भीगी बिल्ली बनकर आत्मसमर्पण करने के लिए कैसे तैयार हो गया? जरूर दाल में कोई काला है? कोई बड़ा-घपला घोटाला है? अब तो केवल लाई डिटेक्टर से जाँच नहीं बल्कि इसका तो नार्को टेस्ट कराना पडेगा।

चित्रगुप्त ने जाँच अधिकारी को बाबूलाल के जीव का नार्को टेस्ट कर दो दिन में रिपोर्ट देने के लिए आदेशित किया। बाबूलाल का जीवन ना-नुकुर करता रहा पर उसकी एक नहीं सुनी गई। जाँच टीम उसे अपने साथ लेकर चली गई।

जाँच दल के द्वारा निर्धारित समय में जाँच रिपोर्ट पेश किया गया जिसमें बाबूलाल के जीवन के काले-चिट्ठे का विस्तृत विवरण था। जाँच रिपोर्ट देखकर चित्रगुप्त के माथे पर बल पड़ गया। वह सोचने लगा, बाप रे बाप! कथनी और करनी में जमीन और आसमान का अन्तर?

रिपोर्ट में लिखा गया था कि यह बाबूलाल नामक आदमी अपने जीवन काल सरकारी महकमें में एक उच्चाधिकारी के पद पर कार्य करता था। साथ ही साथ लेखन के अखाड़े में भी दाँव आजमाता था। मंचों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ झन्नाटेदार भाषण झाड़ता था। पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में लम्बे-चौडे लेख लिखता था। और कार्यालयीन जीवन में भ्रष्टाचार करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ता था। चमचागिरी में एक्सपर्ट तो था ही साथ में रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी और हेरा-फेरी में इसे महारत हासिल थी। इन्होंने एक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और अखबारों में अपना साक्षात्कार देते समय लेखन का उद्देश्य लोगों की सोयी हुई संवेदना जगाना बताया। जीवन भर दूसरों की संवेदना जगाने के मुहिम में इस कदर जुटे रहे कि बेचारे को अंतिम साँस तक खुद की संवेदना जगाने का वक्त ही नहीं मिला। इन्होंने न किसी प्यासे को पानी पिलाया और न ही किसी भूखे को रोटी खिलाई। न किसी गरीब आदमी की आर्थिक सहायता की और न ही किसी मरीज की सेवा। लेखन के क्षेत्र में तो इन्होंने कबीर के दोहे के का आधुनिकीकरण करके आत्मसात किया। किसी जमाने में कबीर ने कहा था कि बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलया कोय। जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोया। पर बाबूलाल जी ने कहा ‘बड़ा जो देखन में चला, बड़ा न मिलया कोय। जो मन खोजा आपना, मुझसे बड़ा न कोय। अपने इसी बड़प्पन के मद में इन्होंने अपनी मर्जी के बिना किसी को कोई बड़ा सरकारी पुरस्कार तो दूर की बात प्रसाद तक नहीं मिलने दिया। किसी भी बड़े पुरस्कार की बात आते ही चयन समिति के सामने नरसिंह की तरह प्रकट हो जाते और अंगद कि तरह पाँव जमाकर कहते ‘मैं हूँ न‘ अभी तक जो कुछ भी लिखा केवल मैं ही अच्छा लिखा बाकी सब तो कागज खराब करने वाले ही है। अपनी ऊँची पहुँच का लाभ उठाते हुए पुरस्कार झटकने में तो इनका कोई जवाब नहीं था। जीवन भर ‘शराब बंदी आन्दोलन का आगवानी करते रहे और अपने व्यवसायिक परिसर को ‘शराब दुकान वालों को किराये पर देते रहे। बाबूलाल जी ने अपने जीवन काल में जो भी किया पूर्ण ईमानदारी के साथ किया यहाँ तक की बेईमानी भी की तो पूरी ईमानदारी के साथ। किसी का गला दबोचा, जेब काटी तो भी ईमानदारी के साथ। यह जीव जब से होश संभाला था तब से अपने साथ मलाई डिटेक्टर रखे हुए था। उसी से पता लगाता था, मलाई कहाँ रखी है और कैसे निकाली जा सकती है। यदि सीधी ऊँगली से मलाई नहीं मिलती तो टेढ़ी ऊँगली से मिलाई निकालना इसे खूब आता था। इसलिए मरने के बाद भी इन्हें मलाई डिटेक्टर की याद आ रही है। इनकी कथनी और करनी में घोर असमानता के शिकार लोग तो इनकी हरकत देखकर बेकाबू लाल हो जाया करते थे। पर इनके पावर के डर से उन्हें कुछ नहीं कर सकने का मलाल ही हाथ लगता था। इनके लिए जो नरक की सजा मुकर्रर की गई है वह एकदम उचित है। पर साथ ही साथ यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि किसी भी हालत में इनके हाथों में मलाइ्र डिटेक्टर न आने पाये, नहीं तो यह जीव यमदूतों के वेतन का पैसा खाने से भी बाज नहीं आयेगा।

जाँच रिपोर्ट पढ़कर चित्रगुप्त का मुँह खुला का खुला रह गया। दिमाग सुन्न हो गया और आँखों आँसू आ गये। उनका जी फूट-फूटकर रोने को चाह रहा था। चित्रगुप्त ने किसी सपने में भी कल्पना नहीं की थी कि संवेदनशील होने का तमगा लगाकर इठलाने वाले लोगों हृदय भी संवेदना से शून्य होता है।

वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)

मो-07828243377

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