सोमवार, 10 अप्रैल 2017

धरा हमारी कुछ कहती है, दर्द सभी का सहती है / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

22 अप्रैल विश्व धरा दिवस पर विशेष...

धरा हमारी कुछ कहती है, दर्द सभी का सहती है

० गर्म धरा को आवरण देना जरूरी

हमारे जीवन को आधार प्रदान करने वाली धरती अथवा पृथ्वी हमें हमारी जरूरत के अनुसार जहां मौसम प्रदान करती है, वहीं इस धरती पर रहने वाले सभी जीवों को धारण भी करती है। हम यह भी कह सकते हैं कि हमें जन्म देने धरती मां को कोख से जन्में सभी जीव अपना जीवन यापन अपने तरीके से करते आ रहे हैं, जहां तक मेरी जानकारी है हम इस 22 अप्रैल को अपनी पृथ्वी को 47वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं। इसका मतलब यह नहीं कि पृथ्वी को अस्तित्व में आये महज 47 वर्ष हुए है, बल्कि हमारी पृथ्वी की चिंता करते हुए हमने पृथ्वी दिवस मनाने की शुरूआत आज से 46 वर्ष पूर्व की थी। हम अपनी धरती के अहसान को कभी भूल नहीं सकते हैं। हम जो अन्न खा रहे हैं, वह भी हमें हमारी धरती मां ने अपने सीने पर हल चलवाते हुए प्रदान किया है। कपड़ों से लेकर धरती के अंदर छिपे हुए बहुमूल्य रत्न और धातु का उपयोग करते हुए ही हमने विकास की इबारत अब लिखी है। हमारे लिए इतना कुछ करने वाली हमारी धरती मां हमें समय-समय पर सावधान भी करती रही है। बढ़ती गर्मी और रूह कंपाने वाली ठंड के रूप में धरती हमें यह चेतावनी देती आ रही है कि उसके साथ छेड़छाड़ न की जाये, अन्यथा परिणाम गंभीर हो सकते हैं। बावजूद इसके हम अपनी पृथ्वी को गर्म होने से नहीं बचा पा रहे हैं।

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प्रकृति के साथ खिलवाड़ का खामियाजा है बढ़ता तापक्रम

हमने अपनी प्रकृति के साथ जो मनमाना खिलवाड़ किया है, अब उसका दुष्परिणाम दिखाई पड़ने लगा है। वैश्विक स्तर पर आ रहे मौसम के बदलाव ने बड़े बड़े मौसम विज्ञानियों को झकझोर कर रख दिया है। तापमान जो कभी 40 से 42 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं हुआ करता था, वह अब 48 और 50 डिग्री तक जा पहुंचा है। इतना ही नहीं शीत कालीन मौसम में शून्य डिग्री तक जाने वाला पारा अब शून्य से भी नीचे जाकर मानवीय काया को बर्फ में तब्दील कर जानलेवा बन चुका है। प्राकृतिक आपदाओं की अपनी अलग कहानी है। कहीं भूस्खलन से पूरा कस्बा भी गायब हो रहा है, तो कहीं तूफानी हवा पूरे शहर को ही उड़ा ले जा रही है। हमने यह सोचने की शायद जरूरत ही नहीं समझी कि आखिर इस तरह प्रकृति हम पर कुपित क्यों हो रही है? विकास की अंधी दौड़ ने हमारी आंखों पर पर्दा डाल रखा है। यही कारण है कि कोई ठोस और व्यवहारिक पहल वैश्विक स्तर से लेकर हमारी राष्ट्रीय नीति में दिखाई नहीं पड़ रहा है। हम पर्यावरण परिवर्तन पर बड़ी-बड़ी बैठकें और सम्मेलन आयोजित कर बहस ही कर रहे है। हम दुनिया भर के इतिहास को इस संदर्भ में उठाकर देखे तो एक डरावना दृश्य हमारे सामने आता है। अनेकानेक चेतावनियों के बावजूद पर्यावरण सहित पृथ्वी पर बढ़ते तापमान को कम करने हेतु किसी प्रकार के संरक्षण को प्राथमिकता में शामिल न करना हमारी बड़ी भूल रही है। मौसम विज्ञानियों की माने तो गर्मी का कहर इस वर्ष अपने चरम को पार कर सकता है। वैसे भी मार्च के अंतिम सप्ताह से लगातार बढ़ रहे तापमान ने अपने उग्र से उग्र रूप की ओर बढ़ने के संकेत हमें दे दिये हैं।

सोच न बदली तो, धरती नहीं, हम मिट जाएंगें

धरती पर रहने वाला मनुष्य सभी प्राणियों में सबसे बड़ा स्वार्थी माना जा सकता है, जहां अपने हक की बात आये या हमें थोड़ा भी लाभ नजर आये हम प्रकृति पर या पृथ्वी को चोट पहुंचाने से पीछे नहीं रहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि इस पृथ्वी से विदा हमें ही होना है, पृथ्वी को नहीं! बावजूद इसके स्वार्थ को नहीं छोड़ पा रहे हैं। यह धरती जिस पर हम अपने परिवार के साथ जीवन यापन कर रहे हैं, यह तो साढ़े 4 करोड़ वर्ष से अपने अस्तित्व में है। न जाने हमारी कितनी पुश्तैनी आबादी आयी और चली गयी, किंतु पृथ्वी वहीं की वहीं है। स्थिति बिगड़ जाने के बाद सोचना या इलाज करना समझदारी नहीं कही जा सकती है। महज 22 अप्रैल विश्व धरा दिवस के रूप में चिंतन करना या बड़े बड़े लेखों से समाचार पत्रों को भर देना ही हमारा कर्तव्य नहीं होना चाहिए। धरती का कोई एक दिन भला कैसे हो सकता है? होना यह चाहिए कि पूरे 364 दिन हम अपनी धरती मां के विषय में कुछ पल को सोचे। वह दिन और वह जमाना बीत गया, जब हम सोचा करते थे कि जंगलों, पेड़ों, नदियों, वन्य प्राणियों, पशु-पक्षियों का संरक्षण मानवीय जीवन के लिए जरूरी है। अब हमारी सोच यहां आकर रूक जाती है कि जंगल और वन्य प्राणियों को पर्यावरण के लिए बचाये रखना जरूरी है। हमारी यही संकीर्ण सोच यदि समय रहते न बदली तो यह निश्चित है कि धरती से मानव जाति का अस्तित्व मिट जाएगा। धरती तो पहले भी थी और तब भी रहेगी। हम जो स्वार्थी जीवन जी रहे हैं, वह कालीदास की भांति उसी डाल के काटने जैसा है जिस पर बैठकर उसे ही काटा जा रहा हो। यह अकाट्य सत्य है कि यह धरती ही हमारी संपोषक है और यही हमें भोजन से लेकर पानी और औषधि प्रदान करती है। धरती के संबंध में अपनी सोच बदलने के लिए हमें रहीम जी का पंक्तियों पर विचार करना होगा, जो कुछ इस तरह है-

तरूवर फल नहीं खात है, सरवर पयहि न पान।

कहि रहीम पर काज हित, संपति संचहि सुजान।।

अर्थात वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं, सरोवर भी अपना पानी स्वयं नहीं पीता है। इसी तरह सज्जन व्यक्ति वह है जो संपत्ति को दूसरों के लिए संचित करते हैं।

यह अग्निवर्षा नहीं तो और क्या है?

धरती पर सूर्य की तेज किरणें उसे झुलसाने में कोई कमी नहीं छोड़ रही है। इसे हम अग्निवर्षा नहीं तो और क्या कह सकते हैं? इसी अग्नि वर्षा की ताप से पिघलकर धरती खौलते लावों का दरिया बनती जा रही है। पेड़ पौधों का अभाव स्पष्टतः धरती पर आबाद समूची सृष्टि की प्रलय का कारण बन सकता है। धरती पर विनाश का यह तांडव कभी अपना असली रूप न दिखाये पाये, इसी सोच के साथ प्राचीन भारत के वनों में आश्रम और तपों वनों, सुरक्षित अरण्यों की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता रहा। तब पेड़ पौधे रोपना और उन्हें सहेजना भी सांस्कृतिक कार्य माना जाता था। प्राचीन भारत की सोच के विपरीत आज हम कांक्रीट के जंगल उगाने यानी बस्तियां बसाने, उद्योग धंधे लगाने के लिए पेड़ पौधों को तथा आरक्षित वनों को अंधाधुंध काट रहे हैं। कहा जा सकता है कि लापरवाही और नासमझी के कारण हम खुद की कुल्हाड़ी से अपने ही हाथ-पैर काटने की दिशा में अपने आप को लूला लंगड़ा बना देने की राह पर बढ़ रहे हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारी धरती हरी भरी रहे, नदियां अमृत जल धारा बहाती रहे, और सबसे बढ़कर मानवता की रक्षा संभव हो सके, तो हमें पेड़ पौधे लगाने से लेकर उन्हें पालने तक सचेत होना होगा। सिवाय इसके बढ़ते तापमान से बचने का कोई साधन अब हमारे पास उपलब्ध नहीं रहा है।

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(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी राजनांदगांव

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