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कहानी / एक थी निशा / अविनाश कुमार झा

माधुरी जैन की कलाकृति

शक्लो- सूरत से समीर कोई खास नहीं था परंतु लगातार क्लास में फर्स्ट आने और मानिटर बनने से इमेज तो अच्छी बन ही गई थी उसकी खासकर लड़कियों में।"पढ़ाकू मंडली" में भी लड़कियों के अफेयर के किस्से कानाफूसियों में और टिफिन या छुट्टी के समय तो होता ही रहता था।लेकिन " लफारी टोली" और बंक मारकर भागने वालो के बीच तो हमेशा यही टापिक ही होता था।पढ़ाकू होने के कारण लड़कियाँ उससे बातें करना चाहती थी ।इसी में एक लड़की थी निशा जिसे लफारी टोली"स्टील बाडी" के नाम से कोडिंग कर बुलाया करते थे। थी तो वह झक्क सफेद और  सुंदर !पर उतनी ही लड़कों के सर्कल में बदनाम भी थी।गासिप का केंद्र बिंदु वह हुआ करती थी।

" अमुक के साथ वो फिल्में देखने जाती है तो परसों अपने शो रुम के मैनेजर के साथ शो रुम के गैराज में पकड़ी गई। " महेश उवाच!

  नीरज चटखारे लेकर उसमें जोड़ता" अरे!उसके मैनेजर को उसके भाइयों ने काफी मारा पीटा है और नौकरी से निकाल दिया है।"

सिंटू तो दो कदम आगे बढ़ जाता" अरे! जानकी हास्पीटल का कंपांऊडर बता रहा था कि पिछले सप्ताह भर्ती भी हुई थी। आगे नहीं बताऊंगा क्या हुआ?

सिंटू हमेशा उसके चक्कर में रहता था लेकिन शायद अंगूर खट्टे थे इसलिए भड़ास निकालता रहता था। उसके पापा स्वयं इस स्कूल में मास्टर थे पर सिंटू का मन कभी भी पढ़ाई में नहीं लगा।वह इस लफारी टोली का लीडर था।

तो निशा सेक्शन बी में थी और समीर सेक्शन ए में। आठवें क्लास से दोनों को कभी साथ बैठने का मौका नहीं मिला था क्योंकि सेक्शन ए के साथ डी बैठता था और सेक्शन बी के साथ सी,पर निशा उन दिनों भी  बिना बात के भी कभी कापी किताब मांगने या कभी कुछ पूछने उसके पास चली आती।

समीर बड़ा इमेज कांशस था, वह उसको आते देखकर ही घबरा जाता और उससे कन्नी काटने की कोशिश करता। जल्द से जल्द उसका काम कर छुटकारा पाता था।सेक्शन ए की लड़कियां मोस्टली शरीफ और पढ़ाकू थी और वो समीर के चाल चरित्र को जान भी गये थे कि इस बंदे का तो इस फील्ड में कुछ होने से रहा। ये सिर्फ किताबी कीड़ा बनकर रह जाएगा। पर ऐसा नहीं था कि समीर का दिल नहीं धड़कता, उसको सरसराहट महसूस नहीं होती।उसकी भी ख्वाहिश आम हम उम्र लड़कों के समान थी पर उसने आपने लिए एक इमेज क्रियेट करने के चक्कर में अपने चारों ओर एक वृत (सर्किल) बना लिया था जिसमें वह किसी को नहीं घुसने देना चाहता था ताकि उसकी प्राईवेसी और आत्म संकेंद्रण कोई भंग न कर सके। लेकिन वो वृत की दीवार धीरे धीरे इतनी मजबूत बन गई कि वह स्वयं चाहकर भी उसे तोड़ नहीं पाया।

इसी वृत में फंसे समीर तक " स्टील बाडी" बार बार पहुंचने का असफल प्रयास करती थी और समीर उस घेरे को और मजबूत कर लेता।जैसे अज्ञात भय से कछुआ अपने आपको अपने खोल में समेट लेता है, समीर का भी वही हाल था।

टेंथ में हेडमास्टर हरमन डिसूजा ने अचानक निर्णय लिया कि अब सेक्शन ए और बी साथ एक रुम में बैठेंगे और सी और डी एक साथ।वास्तव हरेक क्लास में चार सेक्शन होता था जिसमें ज्यादातर ब्रिलियेंट बच्चे सेक्शन ए में और सेक्शन बी में होते थे। उन्हें मिक्स कर पढ़ाने का उद्देश्य यह होता था कि अच्छे बच्चों के साथ खराब और कमजोर बच्चे भी पढ़ जायेंगे। लेकिन शायद टेंथ में आकर सेक्शन ए और बी को साथ लाने का उद्देश्य यह रहा होगा कि सभी अच्छे बच्चों को एक साथ अच्छी पढ़ाई करायें, उनपर फोकस करें ताकि स्कूल का बोर्ड में रिजल्ट अच्छा हो और स्कूल का नाम रौशन हो।

हरमन साहब की सोच अच्छी थी पर नियति को कुछ और मंजूर था।अब निशा उसी क्लास रुम में लड़कियों वाली बेंच पर बैठती और समीर लड़कों वाली आगे वाली बेंच पर। वो लड़की न जाने क्या सोचकर हमेशा मुड़ मुड़ कर समीर को देखती रहती। समीर में कौन आकर्षण था न जाने, जबकि वो सांवला सा, दुबला पतला लड़का था और ज्यादा पैसे वाले परिवार से न होने के कारण ज्यादा जिट जाट में भी नहीं रहता था। हालात तो ऐसे थे कि वह हाईस्कूल में भी हाफपैंट पहनकर पहले पहल आया था। वो तो भला हो इंदुशेखर सिंह मास्साब का ,जो बोले" शर्म नहीं आती! ये मोटी मोटी जांघों पर हाफ पैंट पहन कर आते हो। छौड़ी सबको दिखाने आते हो क्या?

वो दिन था जब आखिरी बार उसने हाफपैंट पहना। घर जाकर मां के सामने धरना दे दिया कि फुलपैंट दो तो स्कूल जाऊंगा। नहीं तो नहीं जाऊंगा। अगले दिन से पाजामा और बुशर्ट पहनकर स्कूल जाने लगा।

निशा के क्लास में भी हमेशा समीर को देखते रहने से समीर तो डिस्टर्ब हो ही रहा था, क्लास के लफारी लौंडों के सीने पर भी सांप लोट रहे थे, आरियां चल रही थी। समीर ने अपने खास दोस्तों राजेश ,शशि, और आलोक से अपनी परेशानी बतायी।समीर ने इंदू शेखर मास्साहब से भी यह बात घुमा फिरा कर कहा कि सेक्शन ए और बी के साथ आने से समस्या बढ़ रही है।

एक दिन जब वह स्कूल पहुंचा तो शशि ने कहा " आज तुम आगे के बेंच पर नहीं बैठना।

" क्यों"?

बस कुछ मत पूछो । जो मैं कहता हूं करो। आज बवाल होगा।

शशि उसी गांव का लड़का था शायद उसे कुछ घटना घटने वाली है,इसका अंदाजा था।

उधर जब क्लास की ओर वो जा रहा था तो कुछ लफारी लौंडे पीछे लग गये

" समीर भाई आज आपके साथ बैठूंगा। 

" क्यों?

अरे! वो स्टील बाडी हमेशा आपको देखती रहती है तो इसी बहाने हम पर नजर पड़ जायेगी।

समीर किसी तरह पीछा छुड़ाकर उस दिन शशि के पीछे बैठ गया, शायद पहली बार।ठाकुर जी मास्टर साहब ने अटेंडेंस लिया, जब मैं सबसे पीछे से बोला सारा क्लास चौंक गया था कि आज इसको क्या हो गया?

" समीर आज पीछे क्यों बैठे हो?

" कुछ नहीं मास्साब ,वैसे ही मन किया तो बैठ गया।"

मास्टर साहब पढ़ाना शुरू ही किए थे कि अचानक सभी लड़कियाँ रोते हुए उठ खड़ी हुई।

मास्टर साहब ने पूछा तो बताया" किसी ने हमारे ऊपर लौंग इलायची फेंकी है।

हंगामा होने पर हरमन साहब तीन चार टीचरों के साथ एक मोटी छड़ी लिए क्लास में आ गये।

" बताओ" किसने बदतमीजी और ऐसा करने की हिमाकत की है? मैं उसका खाल उधेड़ दूंगा।"

कोई कुछ नहीं बोला तो पहली बेंच से सटासट मारना शुरू कर दिया।

समीर डर से कंपकंपा रहा था और मन ही मन शशि को धन्यवाद भी दे रहा था क्योंकि सब दिन की भांति वह आगे वाले बेंच पर होता तो मार खा रहा होता। चार पांच लड़कों के मार खा जाने के बाद विष्णु  ने उनको कुछ कहा। 

वो रुक गये। फिर चले गये।

पीछे से चपरासी आया 

" समीर !आपको ठाकुर जी , सिंह साहब और हेडमास्टर साहब बुला रहे हैं।

समीर का तो हलक सूख गया।लगा आज दुनिया पलट जाती,उसे भय से चक्कर आने लगा था पर शशि ने संभाला।

"जो सब हुआ है ,क्लीयर कट बता देना। कुछ नहीं होगा।"

समीर उठा और ऑफिस की ओर धीरे धीरे चला। उस पर जैसे सौ मन पानी पड़ गया हो! गेट पर ही ठाकुर जी और सिद्द्की साहब खड़े थे।

बड़े प्यार से पूछा" क्या निशा के साथ तुम्हारा कोई चक्कर है?

समीर बेतहाशा बोलने लगा" न मास्टर साहब।हम तो कुछ भी नहीं किये हैं। हम तो उसको देखते भी नहीं। वो ही कब से हमारे पीछे पड़ी है। क्लास में जबसे आई है, घूर घूर कर हमको देखती रहती है।हम तो उससे दूर भागते रहते हैं। वो है ही बदनाम लड़की। कुछ लड़के जबर दस्ती उसके साथ मुझे भी बदनाम करना चाहते हैं। "एक ही सांस में वो सबकुछ बोल गया। 

बोले" जाओ"! 

उसके बाद टीचरों की ऑफिस में मंत्रणा प्रारंभ हो गई।समीर अपने गिने चुने दोस्तों के साथ फील्ड में बैठ गया धरने पर। सेक्शन ए और बी को पहले की तरह अलग करो। इसमें सेक्शन डी भी शामिल हो गया क्योंकि तीन साल साथ पढ़ते पढ़ते अपनापन हो गया था।

सेक्शन ए की लड़कियाँ भी चाहती थी कि "बी" साथ न रहे। बी में लड़कियाँ ज्यादा थी जिससे सेक्शन ए वालियों को अपने वजूद पर खतरा महसूस हो रहा था। " स्टील बाडी" ने तो उन्हें हिला ही दिया था और सारे लड़कों का अटेंशन अपनी ओर कर लिया था। दो दिन धरना चला। समीर और साथी सेक्शन ए और डी के बच्चे क्लास में अटेंडेंस बनाकर वापस मैदान में आकर बैठ जाते।

अंत में पढ़ाई और बच्चों के हित में हरमन साहब ने अपना फैसला बदला और सेक्शन बी को अलगकर "सी" के साथ फिर से कर दिया गया।

निशा को उस दिन के बाद समीर ने या किसी ने नहीं देखा। उसे शायद स्कूल से निकाल दिया गया या उसके गार्जियन को बता दिया कि उसके स्कूल आने की जरूरत नहीं है, वह सिर्फ परीक्षा दे।समीर काफी दिनों तक उसके इसतरह बदनाम होकर स्कूल से बाहर हो जाने के लिए खुद को जिम्मेदार ठहरा कर गिल्ट फील करता रहा।

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