बुधवार, 31 मई 2017

(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष ) तम्बाकू का जहर / यशवंत कोठारी

31-5-17(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष ) तम्बाकू  का जहर यशवंत कोठारी तम्बाकू `निकोटियाना” नामक पौधे की सुखी पत्तियों के रूप में पाया जात...

मंगलवार, 30 मई 2017

समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / तीसरी और अंतिम कड़ी / शेषनाथ प्रसाद

                                       3 अगहन माह से जाड़े का आरंभ और पूस माह तक इसका प्रसार माना जाता है – “अगहन पूस हेमंत ही जान.” अगहन मे...

पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह - कोई रोता है मेरे भीतर

पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह - कोई रोता है मेरे भीतर कवि - आलोक वर्मा प्रकाशक - बोधि प्रकाशन मूल्य - 100/ " आलोक की आलोकित रचनायें "...

शब्द संधान / वक्त का तोता / डा. सुरेन्द्र वर्मा

वक्त के क्या कहने, यह भी एक अजीब शय है। वक्त आता है,चला जाता है। लौटता नहीं, दोबारा वापस नहीं आता। वक्त मुरव्वत नहीं करता, बख्शता नहीं। वक्त...

साहित्यिक गीतकार ’साहिर’ लुधियानवी / डॉ. आसिफ़ सईद

अब्दुलहयी ’साहिर’ लुधियानवी का जीवन उनके इस शेर की तस्वीर है- दुनिया ने तजुरबाते-हवादिस की शक्ल में , जो कुछ मुझे दिया है लौटा रहा हूँ मैं। ...

कबीर और नज़ीर अकबराबादी के काव्य में विचारात्मक समानताएँ / डॉ. शमाँ

हिन्दी साहित्य-इतिहास के मध्यकाल में कबीर और नज़ीर अकबराबादी का अपना-अपना पृथक् स्थान है। यद्यपि कबीर और नज़ीर अकबराबादी के समय में काफी अंत...

सोमवार, 29 मई 2017

व्यंग्य की जुगलबंदी-35 'बिना शीर्षक’ / अनूप शुक्ल

व्यंग्य की जुगलबंदी-35 'बिना शीर्षक’ ------------------------------------------- व्यंग्य की 35 वीं जुगलबंदी का विषय था -बिना शीर्षक। मतल...

रविवार, 28 मई 2017

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : लघुकथाएँ

बड़ा कौन ? अतुल मोहन प्रसाद ‘मां! अब मैं बच्चा नहीं रहा. तुमने मुझे सृजित किया. आज मैं बड़ा हो गया हूं. मेरी अब अपनी पहचान बन गयी है. अब कोई...

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : कविताएँ

सर्वजीत कुमार सिंह की कविता डेली की भागदौड़ थी, बस का सफर था. मौसम सुहाना था, बस अफसोस था कि खिड़की वाली सीट किसी और के पास थी. फोन म...

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : समीक्षा / ‘सब मिले हुये हैं’ एक खुरपेंचिया दोस्त की नजर में / अनूप शुक्ल

ग ये साल संतोष त्रिवेदी का पहला व्यंग्य संग्रह ‘सब मिले हुये हैं’ आया था. पुस्तक मेले के अवसर पर. छपते ही लेखक को मिलने वाली प्रतियों में से...

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : समीक्षा बुन्देलखण्ड के ग्रामीण पाल समाज का विमर्श है ‘बाड़ा’ / राजेन्द्र कुमार

यूँ तो लखनलाल पाल की कहानियाँ सुपरिचित पत्र-पत्रिकाओं में दिखाई देती रही हैं, लेकिन अब हाल ही में उनका पहला उपन्यास ‘बाड़ा’ प्रकाशित हुआ है...

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : आलेख / आजादी के आन्दोलन में भी सक्रिय रहीं कस्तूरबा गाँधी / आकांक्षा यादव

क हते हैं हर पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है. एक तरफ वह घर की जिम्मेदारियां उठाकर पुरुष को छोटी-छोटी बातों से मुक्त रखती है, व...

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