संदेश

May, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

-------------------

(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष ) तम्बाकू का जहर / यशवंत कोठारी

चित्र
31-5-17(विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष )तम्बाकू  का जहरयशवंत कोठारीतम्बाकू `निकोटियाना” नामक पौधे की सुखी पत्तियों के रूप में पाया जाता है. इस पौधे की लगभग 60 किस्में होती है जिनमें से केवल 2 निकोटीयाना टबेकुम और निकोटी याना रसटीका बहुतायत से उगाई जाती है. भारत में निकोटी याना टबेकम का उपयोग सिगरेट ,सिगार,चुरुट ,बीड़ी ,हुक्का और सुन्गनी के लिए किया जाता है. यह पूरे देश में उगाई जाती हैं. लेकिन निकोटीयाना रसटिका के लिए ठंडी जलवायु चाहिए ,  अतः:यह पंजाब,हिमाचल बिहार आसाम में होती है. भारत में हजारों करोड़ की तम्बाकू हर साल पैदा होती हैं. काफी भाग निर्यात किया जाता है. तम्बाकू की पैदावार का मूल्य व् लाभ काफी अधिक है. इस आय को मूर्खों का सोना कहा जाता है. क्योंकि इस आय के कारण कई प्रकार के नुकसान होते हैं. दवा, बीमारी , कैंसर  , असामयिक मृत्यु आदि के कारण केवल अमेरिका में ही सौ करोड़ डालर का नुकसान हर साल होता है. भारत में यह नुकसान और भी ज्यादा है. [ads-post]इस फसल के कारण अधिक आय के लोभ के कारण किसान अनाज , फल सब्जी की खेती कम कर देता है. नाइजीरिया में यही हालत हो गयी है. तंबाकू से क…

समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / तीसरी और अंतिम कड़ी / शेषनाथ प्रसाद

चित्र
3अगहन माह से जाड़े का आरंभ और पूस माह तक इसका प्रसार माना जाता है – “अगहन पूस हेमंत ही जान.” अगहन में हल्की ठंढक पड़ने लगती है. छाँह में बैठने पर देह में कँपकँपी-सी लगने लगती है. लोग घरों से निकलकर धूप लोर्हने लगते हैं. औरतें गलियों में खाट खींच धूप-छाहीं में बैठ जाती हैं और स्वेटर आदि बुनने लगती हैं. कवयित्री ने अगहन के ऐसे ही एक क्षण का बहुत सुंदर चित्रण किया है-भुइले बहुत मगन हैं। ....गलियों में खाट खींचकरऔरतें धूप मुनने लगी हैंपूरी यह धरतीउनकी ही काढ़ी हुई चादर—ये देखो कैसे महीन बेल-बूटे.                (अगहन)[ads-post]घरों के पास के पेड़ों की झाँझर पत्तियों से छन कर धरती पर आते घूप के टुकड़े किसी चादर पर काढ़े गए बेल-बूटों की तरह दमक रहे है. इन औरतों के लिए एक साझा चूल्हा है. अगहन. ये एक साथ बैठी हैं, चूल्हे पर चढ़ी हुई है केतली, कुल्हड़ में चाय चल रही है. प्रत्येक का जीवन मानो सोंधा-सा कुल्हड़ हो गया है.‘पूस‘ शीर्षक में लोगों को इस माह की ठिठुराती ठिठुरन कवयित्री की अपनी अनुभूत नहीं है, यह ठिठुरन प्रेमचंद “पूस की रात” कहानी के किसान की अनुभ…

पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह - कोई रोता है मेरे भीतर

चित्र
पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह - कोई रोता है मेरे भीतर कवि - आलोक वर्मा प्रकाशक - बोधि प्रकाशन मूल्य - 100/" आलोक की आलोकित रचनायें "अगर आप अच्छा साहित्य ढूंढ़ ढूंढ कर पढ़ते है, कविताएं आपका शौक है, आप भावुक है, बेहतर की तलाश है तो तलाशिए आलोक की कविताएं, बस एक कविता उनकी आपके हाथ लग गई तो फिर इस कवि को ढूंढ ढूंढ कर पढ़ना ही आपका मिशन हो जायेगा | आलोक बहुत ज़्यादा नहीं लिखते, बेवजह नहीं लिखते, और यह तय है कि " जिनका लेखन कम होता है - उनके लिखने में दम होता है " |कवि आलोक वर्मा का काव्य संग्रह "कोई रोता है मेरे भीतर "मेरे हाथ में है, शीर्षक में कितनी पीड़ा है, कितनी संवेदना है, कवि भीतर कितने गहरे तक आहत हुआ है इसका मुकम्मल बयान है शीर्षक |[ads-post]संग्रह में  इकसठ रचनायें शामिल है, सभी रचनायें अपने समय की मांग है, संग्रह की सभी रचनायें एक ही समय में नहीं लिखी गई है इसलिये ये सब एक ही मूड की रचनायें नहीं है लेकिन सभी का ग्राफ़ व्यापक है  | बड़ी बड़ी बात कहती छोटी छोटी कविताओं का संग्रह है यह | कही कही तो आलोक इतने कम शब्द इस्तेमाल करते है कि लगता है ये शब्दो…

शब्द संधान / वक्त का तोता / डा. सुरेन्द्र वर्मा

चित्र
वक्त के क्या कहने, यह भी एक अजीब शय है। वक्त आता है,चला जाता है। लौटता नहीं, दोबारा वापस नहीं आता। वक्त मुरव्वत नहीं करता, बख्शता नहीं। वक्त बदलता है, गुज़र जाता है। वक्त अवसर है, मोहलत है: फुरसत है, फरागत है।समय या काल के लिए ‘वक्त’ अरबी भाषा का एक शब्द है जिसे हिन्दुस्तानी ज़बान में पूरी तरह से अपना लिया गया है। वक्त के बारे में हम सब बखूबी जानते हैं कि यह क्या है। इसका खूब इस्तेमाल भी करते हैं, लेकिन समय या काल की ही तरह इसे परिभाषित का पाना करीब करीब नामुमकिन ही है।[ads-post]वक्त ज़माना है। क्या ज़माना आ गया है, क्या वक्त आ गया है – बात एक ही है। बीता हुआ वक्त हमेशा बेहतर रहा है (“गुड ओल्ड डेज़”), लेकिन अब वक्त खराब आ गया है। आज के वक्त को हम कोसते नहीं थकते। इंसान की फितरत है।वक्त फुर्सत और फरागत है। हम अक्सर दूसरों को दिलासा दिलाते हैं वक्त मिलेगा तो आपका काम ज़रूर कर दूँगा। यह बहानेबाज़ी है। फुरसत का वक्त कभी आता ही नहीं। हम बिना किसी काम के ही व्यस्त रहते हैं (“बिजी विदाउट बिजनेस”)।जब वक्त ‘आता’ है, सब काम बड़े आसानी से निबट जाते हैं। हमारी चाहतें पूरी हो जाती हैं। लेकिन कभी हज़ार कोश…

साहित्यिक गीतकार ’साहिर’ लुधियानवी / डॉ. आसिफ़ सईद

चित्र
अब्दुलहयी ’साहिर’ लुधियानवी का जीवन उनके इस शेर की तस्वीर है-दुनिया ने तजुरबाते-हवादिस की शक्ल में,जो कुछ मुझे दिया है लौटा रहा हूँ मैं।
’साहिर’ लुधियाना के ज़मींदार परिवार के चश्मों-चिराग़ थे। उर्दू के अहम प्रगतिशील शायरों में इनका नाम बड़े ही सम्मान और आदर के साथ लिया जाता है। साहिर ने फ़िल्मी तथा ग़ैर फ़िल्मी दोनों ही क्षेत्रों में अपनी शायरी की अमिट छाप छोड़ी, इनका प्रगतिशील काव्य-संग्रह तल्ख़ियाँ (1945) था, जो लाहौर में बड़ी ही मुसीबतों और परेशानियों के बाद प्रकाश में आया, इन्हें अपने पहले ही काव्य संग्रह से बड़ा यश और सम्मान प्राप्त हुआ।अपनी शायरी और मधुर गीतों में समोंए अपने भावों और जीवन सम्बन्धी दृष्टिकोणों के साथ ’साहिर’ अपने नाम की तरह अपने चाहने वालों के मनोमस्तिष्क पर ऐसे छा गये थे जैसे कोई जादूगर अपने जादू से अपने आसपास के वातावरण और लोगों को सम्मोहित कर रहा हो, उनकी शायरी एक नाकाम आशिक की शायरी थी, जो अपनी मेहबूबा से रातों के अन्धेरों में भी सवाल करती है -’’मेरे ख्वाबों के झरोकों को सजाने वाली, तेरे ख्वाबों में कहीं मेरा गुज़र है कि नहीं।पूछ कर अपनी निगाहों से बता दे मुझ…

कबीर और नज़ीर अकबराबादी के काव्य में विचारात्मक समानताएँ / डॉ. शमाँ

हिन्दी साहित्य-इतिहास के मध्यकाल में कबीर और नज़ीर अकबराबादी का अपना-अपना पृथक् स्थान है। यद्यपि कबीर और नज़ीर अकबराबादी के समय में काफी अंतराल है तथापि दोनों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में पर्याप्त समानताएँ दृष्टिगोचर होती हैं। कबीर के व्यक्तित्व में सरलता, सहजता, निस्पृहता, स्वाभिमान, धार्मिक सहिष्णुता, मानवीयता, एवं आस्था इत्यादि का जो समावेश देखने को मिलता है, वही नज़ीर अकबराबादी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व में हमें देखने को मिलता है। [ads-post]    कबीर ने अपने समय में समाज को एक आदर्शात्मक रूप देने का प्रयास किया। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, विसंगतियों, बाह्याचारों, अनाचारों का पुरजोर विरोध किया। समाज में जो वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था व्याप्त थी उसका भी डटकर विरोध किया उन्होंने जन्मगत जाति भेद, कुल, मर्यादा का भी विरोध किया। कबीर की दृष्टि में सभी मनुष्य एक समान हैं, उनमें कोई अंतर नहीं है। सभी जन्मजात एक जैसे हैं, न कोई छोटा है न कोई बड़ा, न कोई ब्राह्मण है और न ही कोई शूद्र है। उनका मानना है कि सब एक ही ईश्वर के बंदे हैं सबको उसी ने पैदा किया है।  कबीर की ही भाँति नज़ीर अकबराबादी ने …

व्यंग्य की जुगलबंदी-35 'बिना शीर्षक’ / अनूप शुक्ल

चित्र
व्यंग्य की जुगलबंदी-35 'बिना शीर्षक’
-------------------------------------------व्यंग्य की 35 वीं जुगलबंदी का विषय था -बिना शीर्षक। मतलब जो मन आये लिखा जाये। मतलब एक तरह का ’ओपन मन इम्तहान’। खुल्ला खेल फ़रक्खाबादी। कुल 16 लोगों ने 17 लेख लिखे। सबसे पहला लेख आया आलोक खरे का। उन्होंने तो ’इधर विषय आया उधर लेख सटाया।’ कल को हम पर आरोप लगाये कि हमने ले-देकर आलोक को पहले से पर्चा आउट कर दिया तो हमको जमानत न मिले।बहरहाल, ALok Khareने जुगलबंदी को भगीरथ प्रयास बताया और अनूप शुक्ल से मजे लेते हुये नमन किया। मने फ़ुल मौज। 90 और 10 वाला सम्पुट भी दोहरा दिया। हाल यह हुआ कि हिम्मत इतनी बढी कि अपनी श्रीमती जी को भी बिजी की जगह इजी रहने की सलाह दे डाली। फ़िर किसिम किसिम के किस का किस-किस बहाने वर्णन किया वह आप खुद ही देख लीजिये उनकी पोस्ट में। हम कुछ बतायेंगे तो आपका मन भरेगा नहीं। एक और बात जो सिर्फ़ आपको बता रहे हैं। किसी को बताइयेगा नहीं- इसमें एक ठो रॉयल किस का किस्सा भी है। बांचिये फ़टाक देना। लिंक यह रहा:https://www.facebook.com/alok.khare3/posts/10210728465302710आलोक खरे के फ़ौरन बाद हमारेAnshum…

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : लघुकथाएँ

चित्र
बड़ा कौन? अतुल मोहन प्रसाद‘मां! अब मैं बच्चा नहीं रहा. तुमने मुझे सृजित किया. आज मैं बड़ा हो गया हूं. मेरी अब अपनी पहचान बन गयी है. अब कोई यह नहीं कहता है कि मैं अमुक का बेटा हूं।’ संसद ने गर्व से सीना तान कर कहा.‘बेटा! मैंने तुम्हारा सृजन नहीं किया. सृजन करने वाला तो कोई और रहा है. हां, मैंने तुम्हें जन्म दिया है. तुम्हें योग्य बनाया. अब तुम्हारी पहचान बन गयी है. इस पहचान को बनाए रखने के लिए अपनी अस्मिता के साथ खिलवाड़ मत करो. मां, मां होती है और बेटा, बेटा. मां की दृष्टि में बेटा कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए बेटा ही रहता है, मां नहीं हो सकता.’ जनता मां ने दो टूक शब्दों में जवाब दिया.---------सुहाग की निशानीअतुल मोहन प्रसाद‘माँ! मैं बैंक की परीक्षा में पास हो गई हूं.’ ‘बहुत खुशी की बात है बेटे! तुम्हारी पढ़ाई पर किया गया खर्च सार्थक हो गया. गांव में कॉलेज रहने का यही तो लाभ है. लड़कियां बी.ए. तक पढ़ जाती हैं.’ मां खुशी का इजहार करती हुई बोली.‘इंटरव्यू लगभग तीन माह बाद होगा. बैंक की शर्त के अनुसार कम्प्यूटर कोर्स करना आवश्यक है.’‘तो कर लो.’‘शहर जाकर करना होगा. उसमें पांच हजार के करीब …

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : कविताएँ

चित्र
सर्वजीत कुमार सिंह की कविता
डेली की भागदौड़ थी,
बस का सफर था.
मौसम सुहाना था,
बस अफसोस था कि खिड़की वाली सीट
किसी और के पास थी.
फोन में गाना था,
दिल को रिझाना था,
बगल वाले से छिपाना था,
मौसम सुहाना था. [ads-post]

मेरे बगल में बैठे
बीती उम्र के एक आदमी ने बोलना शुरू किया,
‘‘भीड़ बढ़ती ही जा रही है,
जाने क्या होगा देश का आने वाले सालों में.’’
मैंने आज के फेमस शब्द का इस्तेमाल किया,
और ‘हम्म’ में जवाब दिया.
फिर सिलसिला कुछ यूँ शुरू हुआ,
‘‘तुम यूथ हो इस देश का, तुम्हें कुछ तो करना होगा.
बदल कर कुछ नीतियों को,
लोकतंत्र को साबित करना होगा.’’
‘‘कैसे?’’
‘‘मैं राजनीति नहीं जानता.’’
‘‘पर आपको भी तो साथ चलना होगा,
वरना हम क्या कर पाएंगे..’’
‘‘नहीं, मैं भी तो देखूं आखिर,
कब तक देश संभालता है.’’
‘‘ये देखो सड़कों पर कितने कचरे दिखाई देते हैं,
स्वच्छ भारत के अधिकारी जाने कहाँ पर रहते हैं.
एक बार की बात है,
मैं कचरे के आगे से गुजरने वाला था.
सोचा आज मैं कुछ करके रहूँगा.
वहां पर रोजाना ऐसा होता था.
लेकिन फिर दिल न किया
और कल पर छोड़ कर आगे बढ़ गया.
‘‘आपने कुछ किया क्यों…

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : समीक्षा / ‘सब मिले हुये हैं’ एक खुरपेंचिया दोस्त की नजर में / अनूप शुक्ल

चित्र
ये साल संतोष त्रिवेदी का पहला व्यंग्य संग्रह ‘सब मिले हुये हैं’ आया था. पुस्तक मेले के अवसर पर. छपते ही लेखक को मिलने वाली प्रतियों में से एक मास्टर जी ने भेजी थी. उसके बाद पुस्तक मेले में और किताबों के अलावा सुशील सिद्धार्थ जी की ‘मालिश महापुराण’ भी खरीदी थी. कुछ दिनों दोनों किताबें मेज पर, यात्रा में, बैग में साथ-साथ रहीं- जैसे उन दिनों दोनों गुरु-चेला (मित्र-मित्र पढ़ें अगर गुरु चेले पर एतराज हो). एक बार जबलपुर से वाया दिल्ली कलकत्ता जाते हुये दोनों किताबें बाकायदे पेंसिल से निशान लगाते हुये पढ़ीं भी गयीं. सोचा था इनके बारे में विस्तार से लिखेंगे. लेकिन लिख न पाये. मालिश महापुराण पर इसलिये कि उसके बारे में छपी समीक्षाओं का ‘गिनीज बुक रिकार्ड’ टाइप बन गया होगा. हमको संकोच हुआ कि सूरज को क्या 20 वाट का बल्ब दिखायें.[ads-post]संतोष त्रिवेदी के ‘सब मिले हुये हैं’ के बारे में लिखने की बात भी आई-गई हो गयी. पूरी किताब एक बार पढ़कर भी लिखना न हो पाया. बाद में स्थगित होते-होते एकदम टल गया. दोनों किताबें भी दोनों मित्रों की तरह की बदली स्थितियों के अनुसार अलग-अलग कमरों में अलग-अलग अलमारियों…

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : समीक्षा बुन्देलखण्ड के ग्रामीण पाल समाज का विमर्श है ‘बाड़ा’ / राजेन्द्र कुमार

चित्र
यूँ तो लखनलाल पाल की कहानियाँ सुपरिचित पत्र-पत्रिकाओं में दिखाई देती रही हैं, लेकिन अब हाल ही में उनका पहला उपन्यास ‘बाड़ा’ प्रकाशित हुआ है, जिसकी पृष्ठभूमि भी उनकी कहानियों की तरह ग्रामीण ही है. बुन्देलखण्ड के एक पिछड़े गाँव सिटैलिया की भीतरी कहानी है, जहाँ आज भी पाल समाज में लड़के का रिश्ता तय करना एक टेढ़ी खीर है. तमाम आशंकाओं व दुविधाओं में पड़ा पाल समाज परम्पराओं और रूढ़ियों में इस तरह जकड़ा है कि उनसे उबरना नहीं चाहता, बल्कि जरा से मनमुटाव के कारण गुटबाजी करके आपस में एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिये पैंतरेबाजी में अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहा है. थोड़ी सी असन्तुष्टि या अनादर पर बिरादरी से बाहर कर देने का षड्यन्त्र मुखिया के माध्यम से चलता रहता है.{ads-post]समाज का मुखिया भदोले दाऊ है, जो पुरानी परम्पराओं का पोषक तो है ही और वाक्पटु भी है. दूर-दूर तक बिरादरी की पंचायतें निबटाता है. उसके बिना समाज में पत्ता नहीं हिल सकता. बिरादरी से बन्द किये जाने का अधिकार उसके पास है, जिसे वह एक अस्त्र की तरह प्रयोग करता है. सामाजिक बहिष्कार को लोग घोर मानहानि के रूप में लेते हैं और डरते हैं. इसी दम प…

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : आलेख / आजादी के आन्दोलन में भी सक्रिय रहीं कस्तूरबा गाँधी / आकांक्षा यादव

चित्र
हते हैं हर पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है. एक तरफ वह घर की जिम्मेदारियां उठाकर पुरुष को छोटी-छोटी बातों से मुक्त रखती है, वहीं वह एक निष्पक्ष सलाहकार के साथ-साथ हर गतिविधि को संबल देती है. महात्मा गाँधी के नाम से भला कौन अपरिचित होगा. पर जिस महिला ने उन्हें जीवन भर संबल दिया और यहाँ तक पहुँचाने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, वह गाँधी जी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गाँधी बा थीं.गुजरात में 11 अप्रैल, 1869 को जन्मीं कस्तूरबा बा का 14 साल की आयु में ही मोहनदास करमचंद गाँधी जी के साथ बाल विवाह हो गया था. वे आयु में गांधी जी से 6 मास बड़ी थीं. वास्तव में 7 साल की अवस्था में 6 साल के मोहनदास के साथ उनकी सगाई कर दी गई और 13 साल की आयु में उन दोनों का विवाह हो गया. जिस उम्र में बच्चे शरारतें करते और दूसरों पर निर्भर रहते हैं, उस उम्र में कस्तूरबा बा ने पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन आरंभ कर दिया. वह गाँधी जी के धार्मिक एवं देशसेवा के महाव्रतों में सदैव उनके साथ रहीं. यही उनके सारे जीवन का सार है. गाँधी जी के अनेक उपवासों में बा प्रायः उनके साथ रहीं और उनकी जिम्मेदारियों का नि…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.