बुधवार, 17 मई 2017

कहानी / तोता-मैना / डॉ0 आसिफ़ सईद

तोता-मैना

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(कहानी)

डॉ0 आसिफ़ सईद

शहर से दूर ज्योति वन नाम का एक बड़ा ही सुन्दर और घना जंगल था, यहाँ के जानवरों में बड़ा ही सौहार्द और प्रेम था, ख़ासतौर पर पक्षियों में। वह जंगल में आने वाले शिकारियों से जानवरों को पहले ही सावधान कर देते थे, शिकारी भी बड़े परेशान होते थे कि इतना बड़ा और घना जंगल है पर फिर भी जानवरों का नामों निशान नहीं पूरे दिन खोजने पर भी उन्हें केवल निराशा ही हाथ लगती थी। सोनू तोता और मीनू मैना इस वन की जान थे, जंगल में यह जोड़ा सभी के लिए चर्चा का विषय था। सभी जानवर उनकी प्रशंसा करते और दोनों के प्रेम को देख हर्ष भी, सचमुच दोनों में अपार प्रेम था, अधिक समय तक दोनों अलग भी नहीं रहते थे, कोई कहीं भी जाता, तो एक दूसरे को बता कर जाता और रात होने से पहले ही अपने स्थान पर लौट आता।

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एक दिन जब रात होने पर भी सोनू तोता वापस नहीं आया तो मीनू मैना को चिन्ता होने लगी, कि अब तक तो सोनू रोज़ वापस आ जाता है, पता नहीं क्या बात है शायद आज लम्बा निकल गया, तभी अचानक दूर से आठ-दस पक्षी उड़ते हुए आते हैं और उसके पास आकर पेड़ पर बैठ जाते हैं। उनको एक साथ आया देख मीनू मैना परेशान हो जाती है और पूछती है क्या बात है तुम सब एक साथ कैसे आए हो ? उनमें से पीलू क़बूतर बड़ी हिम्मत करते हुए कहता है कि एक बुरी ख़बर है सोनू हम सब को बचाते हुए अहेरी के हाथों पकड़ा गया।

शाम को जंगल के बाहर एक जगह हमने कुछ दाना और दूसरी खानें की चीज़ें पड़ी देखीं, तो सोनू ने कहा कि पहले मैं खाकर चैक करूँगा, सब ठीक है तब तुम सब खाना। उसके बाद जैसे ही सोनू ने कुछ खाया वह तुरन्त बेहोश हो गया, वहीं झाड़ियों में अहेरी छुपा था, वह झट से उसको पिंजरे में डालकर ले गया। इतना सुनते ही मीनू मैना की आँखों से मोटे-मोटे आँसू निकलने लगते हैं, सब समझाते हैं ''संयम से काम लो जो हुआ भगवान की इच्छा थी, हो सकता है कि हमारा सोनू छूट कर वापस आ जाए'' पर मीनू रोती रहती है सब उसको समझाते हुए अपने-अपने स्थान पर चले जाते हैं, रात भर वह रोती रहती है। सुबह होने पर मीनू मैना अपने सोनू की तलाश में निकल जाती है और पूरे दिन वह भूखी प्यासी शहर में लोगों के मकानों में झाँक-झाँक कर देखती है कि कहीं उसका सोनू नज़र आ जाए लेकिन थक हार कर रात को वह घर वापस लौट आती है, दूसरे दिन भी वह पागलों की भाँति सोनू को तलाश करती है, पर निराशा ही उसके हाथ लगती है, रात को वह अपने स्थान पर आकर बहुत रोती है, और रोते-रोते गाती है।

व्याकुल हैं मेरे नैना,

न आए मुझको चैना।

डसे है कारी रैना,

रोवत है तेरी मैना।

आजा, आजा, आ भी जा।।

उसकी इस हालत को देख जंगल के दूसरे जानवर भी बहुत परेशान होते हैं दूसरे पक्षी उसके पास आकर कहते हैं, तुम ख़ुद को अकेला मत समझना मीनू हम सब तुम्हारे साथ हैं, हम भी सोनू को तलाश कर रहे हैं, जैसे ही उसका कुछ पता- चलेगा, हम तुम्हें बताएँगे। सोनू को तलाश करते हुए चार दिन बीत जाते हैं लेकिन उसका कुछ पता नहीं चलता, उसके ग़म में मीनू का बुरा हाल हो जाता है। रात को पीलू क़बूतर आता है और मीनू से कहता है कि कल शुक्रवार है शहर में एक स्थान पर पक्षियों को बेचा और ख़रीदा जाता है कल सुबह हम तुम वहाँ चलते हैं, हो सकता है अहेरी उसको बेचने वहाँ आए ?

पीलू की बात सुन मीनू को उम्मीद जागती है और वह उसकी बात से सहमत हो सुबह के लिए हाँ कर देती है, और रात भर सुबह होने की प्रतीक्षा करती है। दिन निकलते ही वह पीलू के ठिकाने पर पहुँच उसे जगा देती है। पीलू कहता है दस बजे के बाद बाज़ार लगता है और लोग आते हैं, अभी तो सूरज भी नहीं निकला अभी जाने से कोई फ़ायदा नहीं है, तुम जाओ मैं थोड़ी देर बाद ख़ुद तुम्हारे पास आता हूँ। लेकिन मीनू की बेचैनी का पीलू को अन्दाज़ा नहीं था, मीनू जाकर अपने स्थान पर बैठ जाती है और पीलू की राह तकने लगती है।

नौ बजे के बाद मीनू फिर पीलू के स्थान पर पहुँच जाती है, और कहती है एक घण्टा पहुँचने में भी तो लगेगा, चलो पीलू । पीलू उसकी बेचैनी को समझ जाता है, और साथ चल देता है। पन्द्रह मिनट में ही दोनों उस बाज़ार में पहुँच जाते हैं जहाँ पक्षियों को बेचा और ख़रीदा जाता है लेकिन अभी वहाँ कोई नहीं आया था, दोनों दूर एक सुरक्षित स्थान पर बैठ जाते हैं जहाँ से उनको सब नज़र आए, पर उन्हें कोई न देख सके। कुछ देर बाद लोग आना शुरू हो जाते हैं, तरह-तरह के रंग-बिरंगे पक्षी उनके पिंजरे में होते हैं। दोनों बड़ी बेचैनी से देखने लगते हैं, कि उनका सोनू कहीं नज़र आए।

प्रतीक्षा करते-करते बारह बज जाते हैं, पर सोनू का कुछ अता-पता नहीं था। मीनू पीलू से कहती है, कहीं सोनू को अहेरी ने पहले ही तो किसी को नहीं बैच दिया और वह यहाँ न आए? पीलू के पास उसकी बात का कोई जवाब नहीं था। तभी दूर एक पिंजरे में सोनू को आता देख दोनों ख़ुशी में पर फड़फड़ाने लगते हैं, अहेरी बीड़ी मुंह में लगाए हँसता हुआ पिंजरे में सोनू को लिए एक तरफ़ आकर खड़ा हो जाता है, दूसरे पक्षियों की भाँति उसकी भी बोली लगती रहती है कोई सौ कोई डेढ़ सौ देने को कहता है पर अहेरी सोनू के दो सौ रू0 माँगता है। मीनू की भाँति सोनू भी उसके वियोग में आधा रह गया था, तभी एक छोटा बच्चा अपने पिता के साथ बाइक पर आता है और सोनू को देख पिता के पीछे पड़ जाता है कि मैं तो इसी तोते को लूँगा और आख़िर पिता सोनू को दो सौ रू0 में ख़रीद लेता हैं, फिर दोनों बाइक पर बैठ वापस जाने लगते हैं तो मीनू और पीलू भी उनके पीछे उड़ान भर देते हैं, थोड़ी देर बाद वह शहर की एक पाश कॉलोनी में पहुँच कोठी में घुस जाते हैं। मीनू और पीलू घर के बाहर सामने एक पेड़ पर बैठ जाते हैं दोनों प्रतीक्षा करते हैं कि कब मालिक सोनू को लेकर बॉलकनी में आएगा, रात हो जाती हैं लेकिन सोनू का कुछ पता नहीं चलता, उसे घर के अन्दर ही रखा जाता है। पीलू मीनू से कहता है कि अब ज़्यादा परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, आज नहीं तो कल हम सोनू को छुड़ा ही लेंगे, अब वापस अपने स्थान पर चलते हैं कल फिर आएँगे चलो।

मीनू पीलू से कहती है अच्छा तुम जाओ मैं यहीं बैठ कर सुबह होने की प्रतीक्षा करूँगी, तुम जंगल में दूसरे जानवरों को भी बता देना कि सोनू का पता चल गया है। पीलू चला जाता है और रात भर मीनू वहीं घर के सामने वाले पेड़ पर बैठी मकान को ताकती रहती है, सुबह दस बजे के आसपास पीलू वापस आ जाता है और पूछता है सोनू की कुछ ख़बर, मीनू मना कर देती है। लगभग एक घण्टे बाद एक महिला सोनू को पिंजरे में लिए छत की बॉलकनी नुमा बरामदे में आती है। और पिंजरे को एक स्थान पर लटका देती है मीनू और पीलू के चेहरों पर ख़ुशी दौड़ जाती है। पीलू कहता है मीनू तुम्हारी चोंच मुझसे लम्बी है, जब कोई न हो तो मौका देख कर तुरन्त खिड़की खोल देना। मीनू कहती है ठीक है यह औरत तो हटे। थोड़ी देर बाद वह महिला अन्दर चली जाती है। वह दोनों ख़ुशी-ख़ुशी बॉलकनी में पहुँचते हैं, सोनू दोनों को देख चीखता है नहीं-नहीं वापस जाओ।

इससे पहले कि वह दोनों कुछ समझ पाते एक मोटा तगड़ा बिल्ला पीलू के ऊपर छलाँग लगा देता है, पीलू झट से ऊपर हो जाता है अगर सोनू ने सावधान न किया होता तो आज पीलू का राम नाम सत्य हो गया होता। दोनों डरे हुए वापस पेड़ पर आकर बैठ जाते हैं, और सोचते है कि यह आफ़त कहाँ से आ गई। पता नहीं यह खतरनाक बिल्ला कब हटेगा, दोनों प्रतीक्षा करने लगते हैं जैसे ही यह हटे वह अपना काम करें। दो दिन हो जाते हैं लेकिन वह बिल्ला वहाँ से नहीं हटता, उसका स्थान वही छत नुमा बरामदा था जिस पर कि सोनू बँधा था। पीलू कहता है ऐसे तो सोनू को आज़ाद कराना मुश्किल है अब तो कुछ प्लानिंग करनी ही पड़ेगी। दोनों सोच में पड़ जाते हैं काफी सोचने के बाद पीलू कहता है कि एक तरक़ीब आई हैं कान इधर लाओ। मीनू बात सुनकर कहती है बहुत अच्छे, पर तुम अपना ख़्याल रखना, यह बिल्ला बहुत ख़तरनाक लगता है।

और फिर मीनू उड़ जाती है और थोड़ी दूरी पर पहुँचती है जहाँ चार कुत्ते एक साथ बैठे थे, वह एक कुत्ते में चोंच मारकर उनके ऊपर मंडराने लगती है सभी कुत्ते गुस्से में उसके पीछे हो लेते हैं, मीनू धीरे-धीरे उन्हें मकान के नीचे ले आती है और कुत्तों से थोड़े ऊपर एक मुंडेर पर बैठ जाती है चारों कुत्ते उसको तकने लगते हैं। तभी पीलू अपनी जगह से उड़ता है और मकान के बराबर वाली खिड़की के ऊपर जा बैठता है, पीलू को देख बिल्ले के मुँह में पानी आने लगता है, और वह दबे पाँव धीरे-धीरे खिड़की की तरफ़ आता है और एक दम खिड़की की तरफ़ छलाँग लगा देता है। पीलू पहले से सावधान था उसे सब पता था, छलाँग लगाते ही पीलू झट से ऊपर उड़ जाता है, बिल्ले के संभलने के लिए खिड़की मे कोई चीज़ न थी और उसका संतुलन बिगड़ जाता है, वह धम्म से नीचे जा गिरता है जहाँ चारों कुत्ते पहले ही दावत के इन्तेज़ार में थे मीनू की जगह इतना अच्छा शिकार पाकर वह फूले नहीं समा रहे थे और बिल्ले को घेर कर वह झट से पकड़ लेते हैं और खैंचते हुए उसे ले जाते हैं।

मीनू और पीलू भी फ़ौरन सोनू के पास पहुँच जाते हैं और मीनू अपनी आकड़े नुमा चोंच से पिंजरे का दरवाज़ा खोल देती है, सोनू तेज़ी से पिंजरे के बाहर आ जाता है, और तीनों फुर र र र से आकाश की ओर उड़ अपने ठिकाने की तरफ़ चल देते हैं। मीनू पीलू की मदद के लिए उसका धन्यवाद करती है। इधर थोड़ी देर बाद महिला जब अपने बच्चे के साथ बॉलकनी में आती है तो वहाँ न तोता था और न उसका प्यारा बिल्ला, वह सोच में पड़ जाती है कि दोनों कैसे और कहाँ ग़ायब हो गए।

थोड़ी देर बाद पूरे जंगल में सोनू के आज़ाद होने की ख़बर आग की तरह फैल चुकी थी, चारों ओर जंगल में जश्न का आलम था सभी मीनू और पीलू की सूझबूझ और होशियारी की दाद देते हुए उन्हें मुबारकबाद दे रहे थे।

डॉ0 आसिफ़ सईद

G.4एरिज़वी अपार्टमेन्ट- II

मेडिकल रोड, अलीगढ़ 202002

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