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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : संपादकीय / डॉ. रमेश तिवारी

सम्पादकीय

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अतिथि संपादक की कलम से

र्तमान समय में विसंगतियों का मुख सुरसा के समान निरंतर बढ़ता ही जा रहा है. ऐसे समय में हास्य-व्यंग्य के लिए स्थान निरंतर सिकुड़ता जा रहा है. हम असहमत होने की संभावनाओं के द्वार निरंतर बंद करते जा रहे हैं. सहमति-असहमति वैचारिक कम, व्यक्तिगत अधिक होती जा रही है. व्यंग्य के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है. किन्तु इसी समय का सत्य यह भी है कि पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य निरंतर छापे-पढ़े और सराहे जा रहे हैं. यानी तमाम अवरोधों-विरोधों के बावजूद व्यंग्य लेखन और व्यंग्य की स्वीकार्यता निश्चय ही बढ़ी है. लोकप्रियता बढ़ी है, लोकप्रियता से उत्पन्न संकट भी बढ़े हैं, सहनशीलता का संकट बढ़ा है. आज हर दूसरा शख्स व्यंग्यकार बनने की लाइन में ही नहीं है, बल्कि वह स्वघोषित व्यंग्यकार बन चुका है. यह कहना उचित होगा कि पूर्व के समय से आज का समय इस मायने में भिन्न और बेहतर है कि आज लेखन-प्रकाशन के मंच बहुत हैं. पहले इतनी सुविधाएँ नहीं होती थीं. आज तो हर शख्स के हाथ में स्मार्टफोन है, उस फोन में वाट्सअप, फेसबुक, ट्विटर, स्काइप आदि ऐसे प्लेटफार्म हैं जिनसे जुड़ते ही वह देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है. हम किसी भी समय कहीं से भी बैठे-बैठे लिखते हैं और लिखे (टाइप किए) हुए को पोस्ट करते ही सारी दुनिया पढ़ती, पसंद-नापसंद करती, और टिप्पणियाँ करती है. हमारे आज के दौर के रचनाकारों को यह सुविधा सर्वाधिक शक्तिशाली बनाती है. पूर्ववर्ती पीढ़ी के पास यह सुविधा नहीं थी, बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी और निरंतर पढ़ते-लिखते रहे. परवर्ती पीढ़ी चाहे तो हार न मानने की यह जिद और निरंतर पढ़ने-लिखने के इस गुण को आत्मसात कर सकती है, इससे उनको बहुत लाभ हो सकते हैं.

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अपने अध्ययन के बल पर पहले की पीढ़ी के चंद रचनाकारों ने हिंदी व्यंग्य में अपनी दृष्टि और समष्टि दोनों को ही बड़ी प्रमुखता और दृढ़ता से प्रस्तुत करने का कार्य किया, उसकी अपेक्षा आज हममें से बहुत कम लोग ऐसे हैं जो पर्याप्त अध्ययन-विश्लेषण के उपरांत लेखन में उतरे हों. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम खूब पढ़ें, थोड़ा लिखें जब कि हो उल्टा रहा है. हम खूब लिखने और थोड़ा पढ़ने में विश्वास करने लगे हैं. यह भी हो सकता है कि मेरा सोचना गलत हो. बल्कि मैं तो चाहता हूँ कि मेरा सोचना गलत ही हो, किन्तु वास्तविक धरातल पर सच यह है कि खूब पढ़े बगैर लिखने के कारण हम अपनी रचनाओं में पाठकों को आनंद की अनुभूति कम ही प्रदान कर पाते हैं. जब तक हमारे लेखन से पाठक को आनंद की प्राप्ति नहीं होगी, वह रचना में प्रवृत्त नहीं होगा. जब तक प्रवृत्त नहीं होगा रचना पूरी तरह अर्थ के स्तर पर बोधगम्य नहीं हो पाएगी, और बोधगम्यता के अभाव में रचना में व्याप्त उद्देश्यों और साहित्यिक मूल्यों से पाठक अपरिचित ही रह जाएगा. इसलिए हमें विशेषकर हास्य-व्यंग्य के रचनाकारों को यह विशेष ध्यान रखने की जरूरत है कि रचना में पठनीयता,
बोधगम्यता, साहित्यिक मूल्य, तीनों के विशेष अनुपात से रचना लिखी जानी चाहिए.

इस अंक के निर्माण में हमने उपर्युक्त बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए रचनाओं का चयन करने की कोशिश की है. हर अच्छी रचना को पाठक तक पहुँचाना ही संपादक का गुणधर्म है. इस गुणधर्म के निर्वहन के साथ प्राची पत्रिका का यह ‘हास्य-व्यंग्य अंक’ आपके समक्ष प्रस्तुत है. हमारी योजनानुसार इस अंक को होली के सुअवसर पर आपके समक्ष प्रस्तुत करने की थी, किन्तु अपरिहार्य कारणों से यह अंक थोड़ा विलम्ब से प्रकाशित हो रहा है. फिर भी देर आए, दुरुस्त आए की तर्ज पर यह अंक तैयार किया गया है. अपनी योजना को क्रियान्वित करते हुए हमने कोशिश की है कि अधिकाधिक रचनाकारों की कम से कम एक महत्त्वपूर्ण रचना को सम्मिलित किया जा सके. फिर भी हो सकता है कोई रचना अपेक्षानुरूप न होने के कारण सम्मिलित न की जा सकी हो. यूँ तो प्रत्येक अंक में हमारी कोशिश रचना की गुणवत्ता के आधार पर उसे पत्रिका में स्थान देते हुए पाठकों तक पहुँचाने की होती है. फिर भी आप पाठकों की राय सर्वोपरि है. आप जो भी सम्मतियाँ देंगे हम उसे पूरे सम्मान के साथ स्वीकारते हुए उसके आलोक में आगे की दिशा निर्धारित करेंगे.

बहरहाल! यह अंक आपके हाथों में है. इस अंक में कुछ हास्य रचनाएँ सम्मिलित हैं और कुछ व्यंग्य रचनाएँ भी. कुछ मित्रों ने व्यंग्य कविताएँ भेजीं और हमने उल्लेखनीय व्यंग्य कविताएँ भी इस अंक में सम्मिलित की हैं. इनके अतिरिक्त तकरीबन सभी स्थायी स्तंभ भी सदा की भांति दिए गए हैं. आप स्वस्थ हों, खुशहाल हों, आप सबका जीवन रंगमय-आनंदमय हो, इसी शुभकामना और इस उम्मीद के साथ पत्रिका को आपको सौंप रहा हूँ. आप अपनी सम्मतियों को हमारे पते पर अवश्य भेजें. हमें प्रतीक्षा रहेगी. आप सभी सुधी पाठकों को भारतीय रंगोत्सव और नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...

डॉ. रमेश तिवारी

मो. 09868722444,

ईमेल vyangyarth@gmail.com

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