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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : इत्तु सी बात / मृदुला श्रीवास्तव

स मकान उर्फ घर के बाहर से जब भी वह रात्रि सैर के दौरान निकलता तो मकान की खिड़की से पति, पत्नी, वयस्क बेटी और बेटे के चीखने, चिल्लाने, लड़ने, झगड़ने की आवाजें उसे लगभग रोज़ आतीं. कभी कभी तो उसे लगता था कि बहुत सारे कुत्ते बिल्लियाँ आपस में एक साथ भिड़ते हुए किसी सूनी सड़क पर एक दूसरे को नोचने खसोटने के लिए भागे जा रहे हैं, तमीज़, लिहाज़, बड़प्पन, सम्मान और शालीनता की हदें कब की तोड़ निर्लज्जता की राह पर. वह सुनता और कानों में अंगुली घुसा आगे बढ़ जाता. पर उस दिन ऐसा नहीं हुआ.

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उसी मकान के बरामदे में खुलती तीन खिड़कियों में से एक खिड़की के नीचे उसी शोर के बीच एक बिल्ली मिक्की और एक कुत्ते चम्पू को वह रोज़ ही लोटते, पोटते प्रेमालाप करते देखता था. सो उस दिन हैरानीवश आखिरकार न चाहते हुए भी उनसे पूछ ही बैठा- ‘अरे भाई, तुम दोनों में आखिर ये क्या चल रहा है?’ सुनकर मिक्की बोली- ‘भाई साहब, मांइड योर वर्क. हमारे बीच अफेयर चल रहा है. कोई दिक्कत?’

‘अन्दर देखा है? कैसे लड़ रहे हैं?’ मिक्की की बात काटते हुए वह बोला.

‘श्रीमान जी आप कृपया यहाँ से प्रस्थान करें और हमें जेठ की इस ढलती गर्म रात में इस खिड़की में लगे कूलर के नीचे के इस ठंडे फर्श पर प्रेमालाप करने दें.’

‘पर फिर भी बताएं तो सही कि कुत्ते और बिल्ली होकर...यू नो, आपका तो छत्तीस में से एक भी गुण नहीं मिलता...मतलब समझ गए न आप कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ...इतने प्यार से कैसे आखिर रह पाते हैं? भई मैं तो कहूँगा. अभी भी संभल जाओ वरना अन्दर वालों की सी हालत होगी.’ कहते हुए उसने आंखें तरेरीं.

‘महोदय, आप इत्तु सी बात नहीं समझते. अरे भाई, हम कोई इंसान नहीं हैं जो कुत्ते बिल्लियों की तरह लड़ते रहें. हम तो साधारण कुत्ते बिल्ली हैं जो बिना रीढ़ वाले इंसानों की तरह नहीं बल्कि मजबूत रीढ़ की हड्डी वाले जानवरों की तरह प्यार से रहते हैं. महत्वाकांक्षा, स्वार्थ और एक दूसरे का चालाकी से दुरुपयोग करने की भावना से कोसों दूर विश्वास की धरती पर.’

इससे पहले कि वह कुछ कहता मिक्की बोली- ‘चल चम्पू, हम कहीं और चलें. प्यार के लिए ये जगह ठीक नहीं. मुझे लगता है ये इंसान हमें चैन से जीने न देंगे. खुद लड़ते हैं और दूसरों से कहते हैं प्यार से रहो.’

‘तू ठीक कहती है मेरी मिक्की. चल यहाँ से जल्दी निकल चलें. कहीं ऐसा न हो इन कुत्ते बिल्ली की तरह लड़ते इंसानों का असर हम जानवरों पर भी हो जाए.’ कहता हुआ चम्पू मिक्की के साथ ‘चल चमेली बाग में मेवा खिलाऊंगा’ गीत गाते हुए अगली गली में मुड़ लिया.

अन्दर से आवाजें आ रही थीं- ‘चुड़ैल! नौकरी करती है तो हम पर कोई अहसान नहीं करती.’ बेटा बहन को कह रहा था- ‘कल की मरती आज मर.’ बीवी कह रही थी- ‘अरे तेरे बाप ने भी कभी तेरी माँ से प्यार किया है जो तू मुझे करेगा? मैं अपने लिए कमाती हूँ समझा?’ और भी इस तरह की कई आवाज़ें.

‘राम-राम, शिव-शिव’ कहता हुआ कानों में अंगुली घुसा वह अभी भी इत्तू सी बात समझ नहीं पाया सो विपरीत दिशा की गली मुड़ लिया. यह बात दीगर थी कि ‘इत्तू सी बात’ अभी भी अपना अर्थ खोजने में व्यस्त थी.

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