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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : धारावाहिक आत्मकथा (चौथी किस्त) अनचाहा सफर / रतन वर्मा

आत्म संदर्भ

धारावाहिक आत्मकथा (चौथी किस्त)

अनचाहा सफर

रतन वर्मा

संघर्ष की शुरूआत

शुरू में तो जब पता चला कि मेरा वेतन मात्र एक सौ पच्चासी रुपये प्रतिमाह होगा, तब मन थोड़ा खिन्न हुआ था. हालांकि 1972 में एक सौ पच्चासी रुपये प्रतिमाह का वेतन भी कम नहीं होता था. लेकिन कुछ ही दिनों में अपने पद के सारे दांवपेचों से मुझे टैक्स दारोगा ने अवगत करा दिया था. टैक्स दारोगा शहर भर के मकानों के टैक्स निर्धारित किया करते थे. टैक्स निर्धारण के बाद सारे मकान-मालिक टैक्स की राशि पर पुनःविचार के लिए अपील में जाते. वार्ड आयुक्तों का एक पैनल प्रतिदिन उनकी अपील पर विचार कर टैक्स की दर कम कर दिया करते थे. चूंकि मैं असेस्मेंट इंचार्ज था, इसलिए मकान मालिकों को मुझसे होकर गुजरना पड़ता था. किसका कितना टैक्स माफ करना है, इससे संबंधित अनुशंसा मुझे ही करनी होती थी. ऐसे में टैक्स-माफी की जितनी रकम होती थी, उसका दो किश्त मकान-मालिकों को टेबुल के नीचे से मुझे अर्पित करना पड़ता था. उस रकम में आधा हिस्सा टैक्स दारोगा का हुआ करता था.

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मसलन, रोज की चार से पांच सौ की आमदनी मुझे ऊपर से होने लगी थी. फिर तो मैं खुद को रईसों का रईस समझने लग गया था. लफंगे दोस्तों का साथ और पैसों का जोर मुझे बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था. बावजूद इसके घर में पूरा वेतन तथा ऊपरी आमदनी का भी कुछ हिस्सा देने के बाद मैं कपिल भैया के पास रोजाना थोड़ी-थोड़ी रकम जमा करवाता जाता था.

अभी मुझे नौकरी से लगे महीना भर भी नहीं हुआ था कि मां की तबीयत बिगड़ती गई थी. 1974 के जनवरी माह में चिकित्सक ने मां को पेट का कैंसर होने की घोषणा कर दी थी. यहां मैं बता दूं कि वैसे तो मां अपने सारे बच्चों को प्यार किया करती है, लेकिन चूंकि भाई-बहनों में मैं सबसे छोटा था, इसलिए तीनों की अपेक्षा मैं मां के सबसे करीब था. और मेरे लिए भी मां का स्नेह जिंदगी के सबसे बड़े उपहार की तरह था. उस उम्र में भी मैं मां के साथ ही सोता था और मां मन की सारी बातें, दुःख-दर्द मुझसे बांटा करती थी. ऐसे में जब पता चला कि मां को पेट का कैंसर है, तब मेरी मनःस्थिति क्या हुई होगी, यह मैं ही समझ पा रहा था. रह-रहकर मेरे मन में यही ख्याल आता कि चूंकि मैंने लोगों के दिल दुखाकर गलत ढंग से पैसे कमाने शुरू कर दिये हैं, भगवान ने इसी की सजा मुझे दी है. अंततः फरवरी 1974 में मां का स्वर्गवास हो गया था. मेरी हालत पागलों जैसे हो गयी. शायद उसी पागलपन में मैंने जाकर नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और निश्चय किया कि जीवन में कभी भी गलत पैसा नहीं कमाऊंगा और कोशिश करूंगा कि मुझसे किसी का दिल न दुखे.

रात में मां के बगैर जब मैं सोने जाता, तब मां को याद कर-करके सारी रात रोता रहता. मां की कमी ने एक तरह से बैरागी बनाकर रख दिया था मुझे.

मेरा दरभंगा से पलायन...

कहावत है कि इंसान के मन में चाहे कैसा भी जख्म हो, समय उस जख्म के लिए सबसे बड़ा मरहम सिद्ध होता है. मेरा भी दिन तो दोस्तों के साथ इधर-उधर आवारागर्दी करने में गुजर जाता, पर रात की तन्हाई आंसुओं और अंतस की कचोट को ही साथ लेकर आती. उसी दरम्यान अचानक मंजू से मेरी भेंट हुई. हम धीरे-धीरे करीब आते गये और दस दिसंबर 1974 को बिना घर वालों की मंजूरी लिये या बताये हम दोनों प्रणय-सूत्र में बंध गये.

मंजू मेरे लिए एक ऐसा मजबूत कंधा सिद्ध हुई, जिसपर सिर टिकाये मैं दृढ़तापूर्वक आज तक की यात्रा सहजता से तय करता आ रहा हूं.

शादी के बाद लगा कि अब मुझे किसी रोजगार की तलाश करनी चाहिए. हालांकि भैया की ठेकेदारी ठीक ही चल रही थी, जिसमें हम दोनों का भी जीवन-यापन ढंग से हो ही जाता, लेकिन मुझे लगा कि अब जबकि मैं अकेला नहीं हूं, तो भैया पर बोझ बनना ठीक नहीं. मेरा मन इसी चिंता से ग्रस्त रहने लगा. क्या करूंगा, क्या नहीं, समझ नहीं पा रहा था. इन्हीं सब सोचों, आवारागर्दी, मटरगस्ती करते, देखते ही देखते डेढ़ वर्ष का समय गुजर गया था. हार कर देहरादून में रह रहे अपने एक दूर के रिश्तेदार को मैंने पत्र लिखा, उन्होंने हमें देहरादून आ जाने का आमंत्रण दिया. मेरे उस रिश्तेदार को ‘लाइमस्टोन किंग’ के नाम से जाना जाता था. मसूरी में उनकी कई चूना पत्थर और मार्बल की खदानें थीं. मसूरी में ही ‘किंक्रेग’ स्थित डिग्री कॉलेज के पास भारत लाइम-स्टोन कंपनी नाम से उनका दफ्तर था. मुझे उसी दफ्तर में उन्होंने असिस्टेंट मैनेजर के पद पर नियुक्ति दे दी. रहने के लिए बड़ी मोड़ के पास लाला सुमेर चंद के मकान में किराये का एक कमरा दिलवा दिया. कंपनी का मैनेजर एक सरदार था. इंदरपाल सिंह, जिसे सभी ‘पाली’ कहकर पुकारते थे.

बड़ा ही जिंदादिल युवक था वह. हमेशा शेरो-शायरी और चुटकुले सुनाकर लोगों का मनोरंजन किया करता था, लेकिन मेरी नियुक्ति के बाद दो-तीन महीने ही रह पाया था वह वहां. नौकरी छोड़ते वक्त उसने कहा कि पांच महीनों से उसे वेतन नहीं मिला था.

मैंने पूछा भी था, ‘‘तो क्या, इतने सारे पैसे छोड़कर चले जायेंगे.’’

वह ठहाका लगा उठा था. बोला था, ‘‘अब यह तो आपको यहां रहकर पता चलेगा.’’

उसके आशय को मैं नहीं समझ पाया था. नौकरी मिल जाने के कारण मैं निश्चिंत हो गया था कि अब मेरे छोटे से परिवार की गाड़ी पटरी पर आ गयी है. नारायण सिंह ‘पवार’ और सरदार महेन्द्र सिंह जैसे लोगों से मेरी आत्मीयता बढ़ने लगी थी. दोनों म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के कर्मचारी थे. दोनों की बारी-बारी से वन-वे ट्रैफिक पर ड्यूटी लगा करती थी. उनका काम अत्यंत ही सीमित था, इसलिए ज्यादातर दोनों मेरे पास ही बैठा करते थे. मैं तुकबंदियां तो किया ही करता था, सो वे दोनों मेरे सुधी-श्रोता बन गये थे.

मेरा मसूरी प्रवास...

एक दिन नारायण सिंह पवार, आकर्षक से एक बीस-इक्कीस वर्षीय युवक के साथ मेरे कार्यालय में आया. पहली ही दृष्टि में वह युवक मुझे किसी दार्शनिक जैसा प्रतीत हुआ. बड़े-बड़े घुंघराले बाल, ललाट पर झूलती चंद लटें, सांवला, पर पानीदार गोल चेहरा, आकर्षक आंखें, मंझोला कद, पैंट-शर्ट और शायद दो स्वेटरों से ढका शरीर, कंधे से लटकता भूदानी झोला, मुंह में पान भरा हुआ...वह मुस्करा तो नहीं रहा था, पर स्वाभाविक तौर पर एक स्मित-सा उसके चेहरे पर चस्पां था.

एक नजर उस युवक पर टिकाने के बाद मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से नारायण की ओर देखा था.

‘‘इनसे मिलो बिहारी बाबू! सुधीर गैरोला ‘मयकश’. यहीं डिग्री कॉलेज में पढ़ता है. बी.ए. में. नारायण मुझे बिहारी-बाबू संबोधित करता था. मसूरी की तहजीब मैं, चाहे कोई उम्र में छोटा हो या बड़ा, दोस्त हो या अजनबी, सभी एक-दूसरे को ‘तुम’ से ही संबोधित किया करते थे. जब सभी वैसा करते थे, वो मैं भी वैसा ही किया करने लगा था.

सुधीर से वह पहली भेंट, जैसे नियति का ही खेल था, मेरे लिए. पूरे मसूरी में वह एक अच्छे कवि के रूप में जाना जाता था. चूंकि, चंद तुकबंदियों को सुनकर नारायण मुझे भी कवि मानने लगा था, इसलिए सुधीर से मेरा परिचय कवि के रूप में करवाया था उसने.

उस दिन सुधीर का, एक पीरियड के बाद, बाकी के पीरियड्स लीजर थे, इसलिए तब तक वह मेरे पास ही रहा था, जब तक कि मेरी ड्यूटी समाप्त नहीं हो गयी थी. उस बीच हम आपस में काव्य-वाचन का आदान-प्रदान भी करते रहे थे. उस एक दिन में ही हम आपस में कुछ ऐसे घनिष्ठ हो गये थे, जैसे हमारी वर्षों की जान-पहचान हो.

उस दिन ड्यूटी से छूटने के बाद मैं उसे अपने आवास पर भी लेता गया था, जहां उसका परिचय मेरी पत्नी और पुत्र से भी हो गया था. पुत्र का नाम मैंने रितेश रखा था, लेकिन वह मुझे रितु पुकारने लगा था. चाय-वाय पीने के बाद हम माल रोड की ओर निकल गये थे.

वैसे मॉल रोड आना-जाना तो रोज ही लगा रहा करता था मेरा- जरूरत के सारे सामान मॉल रोड के बाजार से ही, तो खरीदा करता था. लेकिन उस आने-जाने में न कोई रोमांच होता, न खुशी, बल्कि एक ऊब जैसा ही महसूस होता. जैसे यंत्रवत जाना, कुछ खरीदारी करना, फिर वापस लौट आना. लेकिन मेरे लिये सुधीर से भेंट, जैसे तपती दोपहर में अचानक ही ठंडी बयार बहने जैसा सिद्ध हुआ था. सुधीर मेरे रोज की दिनचर्या में शामिल हो गया था. कॉलेज से सीधे मेरे कार्यालय में आ जाता, तब तक हमारे पास बना रहता, जब तक मेरी ड्यूटी समाप्त नहीं हो जाती. फिर हम दोनों साथ ही मेरे निवास पर आ जाते, वहां चाय-वाय पीकर मॉल रोड की ओर निकल जाते. धीरे-धीरे मसूरी के लगभग सभी लोग हमारी जोड़ी को पहचानने लग गये थे. इत्तेफाकन यदि किसी परिचित को दोनों में से कोई अकेला मिल जाता, तो अवश्य प्रश्न उछाल देता, ‘आज अकेले? और वह?’

मसूरी में सुधीर एवं वहां के स्थानीय रचनाकारों ने एक संस्था भी रखी थी- ‘अलीक साहित्यिक संस्था.’ उसमें कई रचनाकार जुड़े हुए थे. एकमात्र किशन थापा कथाकार थे और उनकी एक कहानी उन दिनों ‘कादम्बिनी’ में छप चुकी थी. किशन भाई थापा हम सभी के बीच उम्र के लिहाज से बड़े थे, इसलिए हम उन्हें विशेष आदर दिया करते थे. वे नेपाल के मूल निवासी थे.

संस्था की साप्ताहिक गोष्ठियां हुआ करती थीं. अब मुझे भी संस्था का सदस्य बना लिया गया था. जब पहली गोष्ठी में मैंने भाग लिया और विभिन्न कवि मित्रों की कवितायें सुनी, तब खुद को मैं बौना-सा महसूस में लगा था. ऐसा इसलिए, क्योंकि मैंने जितना कुछ भी लिख रखा था, सारी की सारी रचनायें फूहड़ रूमानियत से भरी थीं. जैसे-

मोहब्बत के अजब दस्तूर देखे हैं जमाने में,

कि दिल को तोड़कर वापस यहां लौटाया जाता है,

वफा के गीत क्या गाऊं मेरी आवाज टूटी है,

कि दिल को आज दौलत से यहां तुलवाया जाता है’...

या

टूट गये हैं तार-तार दिल के सितार का,

कलाकार का भाव सिसकती साज बना है,

प्यार का अमृत आज बना हाला का प्याला,

कलम आज पीकर हाला अंगार बनी है.

यह ज्वाला वह नहीं कि जिसमें तुम जल जाओ,

इसमें तो बस मेरी ही काया सुलगेगी.

किया पाप मैंने जो तुझसे प्यार किया है,

इसकी सजा मुझे मिलनी है, मुझे मिलेगी.

तो मेरे पास उक्त प्रकार की कविताओं की ही पूंजी थीं, जबकि वहां के सारे कवि जन-चेतना के कवि थे. ऐसे में जब मेरे कविता-पाठ की बारी आयी, तब मुझे लगा कि मैं मना ही कर दूं. पर तभी डायरी में अंकित एक मात्र ‘पहचान’ शीर्षक कविता का ध्यान आ गया. पूर्व में इस कविता से संबंधित भी एक वाकया है. तब मैं दरभंगे में रहा करता था और कॉलेज का छात्र था. कवितायें भी यदा-कदा लिख ही लिया करता था. उन्हीं दिनों भैया के एक मित्र श्री राम एकबाल सिंह ‘विनीत’ का मेरे घर आगमन हुआ. वे पटना से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक पत्र ‘हुंकार’ के संपादक थे. भैया की कवितायें अक्सर उस पत्र में छपा करती थीं. दिनभर तो वे भैया के साथ ही हरे, पर रात में उनके सोने की व्यवस्था मेरे ही कमरे में की गयी. उसी समय उन्होंने मुझसे पूछा, ‘तुम कुछ लिखते हो या नहीं.’ मैंने कहा, ‘कभी-कभी कवितायें लिख लेता हूं.’

उन्होंने मुझे कवितायें दिखलाने को कहा.

सकुचाते हुए मैंने एक कॉपी उन्हें थमा दी, फिर बिना उनसे कुछ कहे मैं कमरे से बाहर निकल गया. उसके बाद तो संकोचवश कमरे में जाने की मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी, लेकिन कुछ ही देर बाद उनकी पुकार मुझे सुनायी दी. संकोच से दुहरा होते हुए मैं उनके सामने प्रकट हुआ.

मुझपर नजर पड़ने के साथ ही उन्होंने मुझे बैठने को कहा, फिर बोल पड़े, ‘रतन, तुममें एक संपूर्ण कवि का गुण है, लेकिन तुम जो यह सिर्फ रूमानियत और प्यार-मोहब्बत वाली कवितायें लिखते हो, इससे समाज को क्या दे पाओगे. समाज में भूख है, गरीबी है, असमानता है, भ्रष्टाचार है...इन सब पर कवितायें लिखो. तुममें भरपूर क्षमता है...हाँ, तुम्हारी ‘पहचान’ कविता अच्छी लगी, वैसे छंदों की अच्छी जानकारी है तुम्हें, इस लिहाज से सारी कवितायें अच्छी हैं. ‘पहचान’ कविता जन चेतना को उभारने वाली कविता है. तुम इस कविता को किसी कागज पर उतार कर दे दो. ‘हुंकार’ में छापूंगा.’

मेरी कविता छप भी सकती है, सुनकर अंतस आह्लाद से भर उठा. उसी वक्त मैंने कविता उतार कर उन्हें थमा दी, जिसे उन्होंने अपने पोर्टफोलियो बैग में रख लिया. फिर तो उस सारी रात मुझे नींद नहीं आयी थी. जब कभी झपकी भी आती तो ‘हुंकार’ का कोई अनजाना-सा पृष्ठ आंखों के सामने लहरा उठता, जिसपर मोटे-मोटे अक्षरों में मेरी कविता छपी नजर आती. बात में वह कविता छपी भी थी, जिसे मैंने अपने लगभग सारे मित्रों को पूरी हेठी के साथ दिखायी थी.

तो उस डायरी में मेरी पहचान कविता भी उपलब्ध थी. हालांकि वहां के सभी कवियों की कविताओं की तुलना में वह कविता बहुत कमजोर थी. फिर भी उसी कविता को मैंने कुछ ऐसे अंदाज में पढ़ लिया था, जैसे कविता का पाठ न कर रहा होऊं, बल्कि कुछ बकबकाये जा रहा होऊं.

लेकिन सिर्फ उस कविता से बात नहीं बनी थी. सुधीर की जिद पर एक प्रेम कविता भी सुनानी पड़ी थी मुझे, जिस पर वहां के अन्य मित्रों ने वाह-वाह तो किया था, पर उनके दाद में मुझे उपहास ही नजर आया था.

बाद में तो प्रत्येक गोष्ठियों में मैं शिरकत करने लगा था. अनेक सारे आत्मीय मित्र बन गये थे मेरे, जिनमें गजपाल सिंह ‘रौथाण’, अतिउर्रब सिद्दीकी, विजय श्रीवास्तव, विजय रावत, विजय द्विवेदी आदि नाम अबतक मेरे लिये न सिर्फ अविस्मरणीय हैं, बल्कि हम जब भी जबकि तीस वर्षों का लंबा अंतराल गुजर चुका है, आपस में संपर्क में हैं.

क्रमशः.....

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