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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : व्यंग्य लोकतंत्र की हत्या पीयूष पांडेय

लीजिए फिर संसद के पूरे सत्र की हंगामे के बीच हत्या हो गई है. खुलेआम. मजे की बात यह है कि हत्या करने वाला हर पक्ष कह रहा है कि हत्या हो गई है लेकिन लोकतंत्र की. मैंने एक संविधान विशेषज्ञ से पूछा- जनाब बताइए, क्या वास्तव में लोकतंत्र की हत्या हो गई है या ‘अटेम्प्ट टू मर्डर’ वाला मामला भर है.

संविधान विशेषज्ञ जानकार आदमी थे. बोले- देखिए देश में हर रोज कम से कम 50 बार लोकतंत्र की हत्या होती है. कम से कम इस तरह की खबरें आती हैं कि छत्तीसगढ़ के छोटे से गांव से लेकर संसद के भीतर तक लोकतंत्र की हत्या हो गई है. लेकिन लोकतंत्र का आज तलक शव नहीं मिल पाया है. बस इसी चक्कर में लोकतंत्र को मृत घोषित नहीं किया जा पा रहा है. यू नो बेनिफिट ऑफ डाउट. मैंने मूर्खों की श्रेणी में खुद को खड़ा करते हुए पूछा- क्या किसी आरटीआई से जाना जा सकता है कि हर साल कितनी बार लोकतंत्र की हत्या होती है. आजकल तो हर बात आरटीआई से ही जानी जाती है. सरकार बताती नहीं है और उत्साही आरटीआई कार्यकर्ता नेता के कुत्ते पर किए खर्च से लेकर नहाने के साबुन पर किए खर्च तक को पता करके ही दम लेते हैं.

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संविधान विशेषज्ञ मेरी नादानी पर मुस्कुराए. बोले- देखो, ये मामला जटिल है. कुछ ऐसा कि लोकतंत्र खुद संविधान से बाहर निकलकर अगर आरटीआई डाले और पूछे कि बताइए मेरी कितनी बार हत्या हुई है तो उसे भी इस प्रश्न का उत्तर ये कहते हुए नहीं बताया जाएगा कि यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मसला है. अलबत्ता लोकतंत्र को गिरफ्तार किया जा सकता है.

मैं कन्फ्यूज था. सांसद हर सुबह नारेबाजी करते हुए, हाथों में तख्तियां लिए हुए, कभी बापू की प्रतिमा के सामने तो कभी सदन के भीतर ताल ठोंक के कहते हैं कि लोकतंत्र की हत्या हो रही है. और मुझे पता नहीं चल पा रहा है कि कैसे और कौन हत्या कर रहा है. और अब लोकतंत्र बच पाएगा या नहीं.

मैं वास्तव में कन्फ्यूज हूं कि सांसदों के हंगामे से लोकतंत्र की हत्या हुई या बांहों पर कालीपट्टी बांधने से या स्पीकर के घर के बाहर प्रदर्शन से. या फिर उस दिन लोकतंत्र की हत्या हुई जिस दिन निर्भया का सामूहिक बलात्कार हुआ और सभ्य समाज के रूप में हम उसे बचा नहीं पाए.

या फिर उस दिन लोकतंत्र की हत्या हुई जिस दिन दो ट्रेनें एक ही जगह पर दो अलग अलग ट्रैक पर ट्रैक से उतर गईं और 29 लोगों की मौत आंकड़ा बन गई. ट्रेनें इसलिए उतर गईं क्योंकि ट्रैक की पेट्रोलिंग हो नहीं रही थी और बाद में कहा गया कि प्राकृतिक आपदा की वजह से ट्रैक के नीचे से मिट्टी बह गई. या लोकतंत्र की हत्या उस दिन हुई, जिस दिन पाकिस्तान में बैठी एक गूंगी बहरी भारतीय लड़की की सुध भारतीय अधिकारियों ने इसलिए ली क्योंकि बजरंगी भाईजान फिल्म के बाद अचानक वो लड़की सुर्खियों में आ गई थी. यानी फिल्म नहीं आती तो वो लड़की गुमनामी में पड़ी रहती. कुल मिलाकर समझ नहीं पा रहा कि किस दिन लोकतंत्र की कायदे से हत्या हुई. वैसे, इससे सहमत हूं कि हत्या हुई. निकृष्टता की तोप से, धूर्तता की बंदूक से और छल कपट के बमों से लोकतंत्र की हत्या हुई है. काश! लोकतंत्र की हत्या पर ठप पड़ी संसद दो मिनट का मौन भी रखे.

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