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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : पाठकीय

आपने कहा है

व्यंग्य सामाजिक विसंगति को उजागर करता है

अपने आकर्षक मुख पृष्ठ से युगीन कथा का एहसास कराती हुई ‘प्राची’ का बहु-आयामी अंक प्राप्त हुआ. एतदर्थ प्रबंधन की नियमितता को अनेकशः बधाइयां. संपादकीय हम गधे नहीं हैं’ मनुष्य के लिए एक सदाशयी स्वीकृति प्रकारांतर से उद्घाटित होती है. खुली दृष्टि की इस कथा-धर्मिता से कितने-कितनों की आंखें खुल जायेंगी यह व्यंग्य की रस-सत्ता है. व्यंग्य सामाजिक विसंगति को उजागर तो करता ही है और नसीहत आसेज़ ‘जेनुइन’ रास्ता प्रदायित करता है. आप की सम्पादकीयों को पढ़कर मन में बराबर यह भाव जागृत होता रहा है कि काश! आप का समूचा सम्पादकीय एक ‘बुक-शेप’ में आ सकता. तकरीबन हर संपादकीय आप के व्यंग्यकार को परिभाषित-रेखांकित करता है.

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‘मैला आंचल’ को मीटर मानकर भारत यायावर जी ने रेणु की वैचारिक सोच का मर्मी मूल्यांकन-आकलन किया है. रेणु की भाषाई आत्मा में काया-प्रवेश करके भारत यायावर ने नये सिरे से रेणु पर विचार करने की सारस्वत दिशा दी है. आज की अधिसंख्य कथा-कृतियों और औपन्यासिक कृतियों को पढ़कर एक ऊब होती है किंतु रेणु जैसे कृतिकारों को एक ‘सिटिंग’ में पढ़ डालने का भाव जाग्रत होता है. डॉ. कुंवर प्रेमिल की कहानी तो मैं अभी नहीं पढ़ सका हूं किंतु उनका ‘आत्मकथ्य’ पढ़ किया है. ‘‘....यदि ऐसा सर्वेक्षण किया जाये कि किन-किन पत्रिकाओं के संपादकीय उल्लेखनीय रहे हैं तो इसमें ‘प्राची’ नाम शामिल किया जा सकता है...’’ डॉ. कुंवर प्रेमिल के अभिमत की सच्चाई इस पंक्तिकार के पूर्व पत्रों के परिदृश्य में भी हकीकत बयानी है. डॉ. भावना शुक्ल का आलेख ‘प्रवासी लेखन और भारतीयता’ एक संयमित और श्रमपूर्ण आलेख है. प्रवासी भारतीयों की रचनाशीलता से सम्बद्ध नयी जानकारियां मिली हैं. प्रोफेसर हरिशंकर ‘आदेश’ द्वारा स्थापित ‘भारतीय विद्या संस्थान’ ट्रिनीदाद-टुबैगो के आयोजन में इस पंक्तिकार को उपस्थित होने का अवसर मिल चुका है. स्वर्गीया डॉ. मधुरिमा सिंह, माननीय जगन्नाथ सिंह पूर्व
जिलाधिकारी चित्रकूट, और पंजाब विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्ष हिन्दी (नाम भूल रहा हूं) भारत से थे. प्रो. आदेश के आवास ही पर हम लोगों के ठहरने की व्यवस्था थी. निर्मला आदेश उनकी पली की शालीनता आज तक जेहन पर अक्स है. प्रो. आदेश की पुत्री लता मंगेशकर के पाये की संगीत-गीत विद् हैं जो अब कनाडा में रहती हैं. सुमीता ब्रूम उद्घोषिका कैरेबियन चैनल की संयोजना प्रो. आदेश की अध्यक्षता में डॉ. मधुरिका सिंह और इस पंक्तिकार का अंग्रेजी रूपांतर सहित काव्य-पाठ का अवसर नसीब हुआ. कबीर विषयक संगोष्ठी ने खाकसार को अध्यक्षता और संचालन का अवसर मिला. प्रो. आदेश द्वारा स्थापित भारतीय विद्या संस्थान के आडीटोरियम में, वहां के शिक्षा मंत्री ने ‘ट्रिनीदाद हिंदी गौरव’ सम्मान से मुझे सम्मानित किया गया था. डॉ. भावना शुक्ल ने वहां का संदर्भ लेकर कितनी ही यादों को ताजातरीन कर दिया है. प्रो. आदेश के प्रयास से वहां लघुभारत की स्थापना संभव हो सकी है.

कथ्य-शिला से भरपूर राकेश भ्रमर, यूनुस अदीब की ग़ज़लें प्रभावशाली हैं. कैलाश मीणा का आलेख, संदर्भित ‘सोहर’, ‘छापक पेड़.....किंचित परिवर्तित रूप में ‘अवधी’ और ‘भोजपुरी’ भाषाओं-बोलियों में हैं. इतना संवेदनापूरित गीत हिंदी या अन्य भाषाओं में ‘रेयर’ है. राज किशोर राजन को काव्य-कृति पर स्वप्निल श्रीवस्ति और राकेश भ्रमर की कथा-कृति ‘उसे जल्दी थी’ पर समीक्षाएं काफी असरकारी हैं. ‘बची रहे हमारी दुनिया’ गणेश चंद्र ‘राही’ की कृति पर ‘जहां न जाये रवि वहां जाय कवि’ का प्रयोग हुआ है. कवि शब्द जिस रूप में प्रयुक्त है, वहां अर्थ कवि (पोयट) का देता है जब कि ‘रवि’ के तुकांत में ‘कवि’ का अर्थ आग है. गणेश चन्द्र ‘राही’ की कृति से संदर्भित कविताएं काफी अच्छी हैं.

डॉ. मधुर नज्मी, मऊ (म.प्र.)

मोः 9369973494

दुनिया में संघर्ष का भाव स्थायी है

‘प्राची’ का दिसंबर 16 और जनवरी 17 अंक भाई कुशेश्वर से प्राप्त हुआ. खुशी हुई कि आप इतनी अच्छी गंभीर पत्रिका निकाल रहे हैं. जनवरी-17 अंक में विशेष अध्ययन के तहत दूधनाथ सिंह को पढ़ने का मौका मिला. उनकी करीब साठ साल पुरानी कहानी ‘रक्तपात’ से उनके लेखन के मिजाज को समझा जा सकता है. जहां वे (नायक) अपनी पत्नी को ‘वे’, ‘उन्होंने’, ‘उन्हें’ से संबोधित किया है, जो प्रायः उत्तरी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं होता. देह और देह से उपजा हुआ तनाव का चित्र बड़ा स्वाभाविक है.

इसी अंक में राधाकृष्ण की एक कहानी ‘मां बेटी’ भी प्रकाशित है. यह कहानी भूख-गरीबी और संघर्ष को जिस रूप में प्रदर्शित करती है, उससे प्रतीत होता है कि भारत क्या पूरी दुनिया में संघर्ष का यह भाव स्थायी है. कहानी एक धेला, दो रुपये के जमाने की है. एक युवती पांच रुपये के कारण अपना जिस्म बेचने को मजबूर है. इससे समझा जा सकता है कि आजादी के कुछ बाद की कहानी है और उस समय भी निर्धन, असहाय निरंकुश लोग बड़ी उपेक्षा में जीते थे. उनके सामने देह बेचने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं था. स्त्री क्या पुरुष भी कहीं गिरवी रहता था. इस अंक में राजकिशोर राजन की टिप्पणी और कवि-कथाकार कुशेश्वर की कविताएं तथा विशिष्ट कवि के रूप में एकांत श्रीवास्तव को पढ़ना सीखने जैसा है.

ख्याल खन्ना और अशोक अंजुम की ग़ज़लें जमाने को आइना दिखाने सी लगीं.

और अंतिम पृष्ठ पर मित्र अरुण अभिषेक की मृत्यु की खबर ने बेचैन कर दी. उनसे कभी मिल न सका, लेकिन हम दोनों बराबर एक-दूसरे के संवाद में रहे.

सेराज खान बातिश, कोलकाता

मोः 9339847198

ईश्वर ऊटपटांग बातें नहीं लिख सकता

‘प्राची’ का मार्च-17 अंक पढ़ा. राजनारायण ने अपने ब्लॉग लेख के माध्यम से बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है. वैदिक साहित्य के संबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी के विचारों को
उद्धृत कर. उस पर संपादक की पैनी दृष्टि ने आम पाठकों के लिए जो सुलभ किया, वह प्रशंसा के योग्य है. महावीर प्रसाद द्विवेदी हिन्दी साहित्य की आलोचना के गुरु माने जाते हैं. उनके अध्ययन और विचार पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता. न वे वामपंथी थे, न ही मार्क्सवादी. वे वाद निरपेक्ष साहित्य के
अध्येता थे. उनके पास वैज्ञानिक और भौतिकवादी सोच थी. उन्होंने वैदिक साहित्य में जो कमी-विशेषता देखी, उसी को अभय होकर लिखा. आज के कई लेखकों ने भी वैदिककालीन मंत्र-òष्टाओं को चारण-भांट ही माना है. यानी वेद उस युग के चारण-भांटों द्वारा ही लिखित ग्रंथ हैं न कि ईश्वर-वचन. क्योंकि कोई ईश्वर इतनी ऊटपटांग बातें नहीं लिख सकता, जिसे आज पढ़ कर हँसी आवे और शर्म से सिर झुके, जैसा कि द्विवेदी जी वर्षों पहले कह चुके हैं अपनी सभ्य भाषा में. उनके शोधपरक लेख को आज के पोंगा पंडितों, धर्मगुरुओं और दक्षिणपंथियों को पढ़ना चाहिए जो गलत धारणाओं को सही ठहराने की जिद ठाने बैठे हैं. अंधविश्वास-रूढ़िवाद के समर्थन में हवा बनाकर अपनी कमाई करते हैं. इस अर्थ में ईश्वर की कल्पना ही मूर्खता है. और जो नहीं है उसी को ‘है’ मानकर आस्तिक बनना.

रेणु की रचनाओं के अधिकारी संपादक-संयोजक भारत यायावर के लेख में रेणु की कहानियों के अन्तर्निहित भाव को प्रभावी रूप से रखा गया है और उनकी कहानियों का पुनर्पाठ करने की उत्सुकता जगाई है. रेणु की कहानियों में द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका और उससे उत्पन्न कोलाहल और तकलीफों का बयां है. बटबाबा, पहलवान की ढोलक...बदलते समय में हृदयहीन अर्थतंत्र ने ही उनकी अप्रासंगिकता-अनुपयोगिता के कारण उनके लिए दुःखद स्थिति को पैदा किया है. प्रेम-प्रसंग पर लिखी गई भगवान अटलानी की कहानी ‘बगूला’ और डॉ. कुँवर प्रेमिल की ‘रेत की नदी रेत की औरत’ अच्छी बन पड़ी हैं. मानवीय संवेदना में हो रहे हास को कहानी ‘वृद्धा’ में देखा जा सकता है जिसमें एक बेटा ही अपनी वृद्ध माँ की कुल जमा-पूँजी हड़प कर उसे रोड पर खड़ा कर देता है और कानून कुछ नहीं कर पाता.

ललन तिवारी, बोकारो, झारखंड-827013

मोः 9470972093  

पत्रिका अच्छी लगी

मार्च 2017 का अंक संयोगवश मेरे मित्र डॉ. कृपा शंकर शर्मा ‘अचूक’ के सौजन्य से पढ़ने को मिला. उनका गीत ‘‘भीतर की उथल-पुथल करती बेजार है.’’ काफी सारगर्भित है और उसको पढ़ने की बार-बार इच्छा होती है. पत्रिका ‘प्राची मासिक’ भी अच्छी लगी. काफी ज्ञानवर्धक सामग्री है.

डॉ. एस.एस. सक्सेना, जयपुर

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