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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : साक्षात्कार / ‘हम लोगों के बिना सुगंध पैदा नहीं हो सकती’ (मिस्टर ग फू फिङ से डॉ. भावना शुक्ला की बातचीत)

नाम : ग फू फिङ, चीनी

जन्म : अप्रैल 1951, हिन्दी विभाग, पेजिंग विश्वविद्यालय से स्नातक, प्रोफेसर और निदेशक, हिन्दी विभाग, शीआन इंटरनेशनल स्टडीज विश्वविद्यालय, चीन

सलाहकार : विदेशी भाषा शिक्षण सलाहकार बोर्ड, शिक्षा मंत्रालय, चीन

सदस्य : राष्ट्रीय भारतीय साहित्य अनुसंधान परिषद, चीन

भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के कर-कमलों से ‘‘डॉ. डॉर्ज ग्रियर्सन पुरस्कार 2013 से सम्मानित.

40 साल के लिए हिन्दी शिक्षण (बी.ए. 40 साल, एम.ए. 20 साल) और अनुसंधान में कार्यरत

अनुसंधान क्षेत्र : हिंदी भाषा और साहित्य

प्रकाशित रचनाएं : हिंदी चीनी/चीनी हिन्दी व्यवहारिक शब्दकोश, हिंदी चीनी/चीनी हिन्दी राजनयिक शब्दकोश, बुनियादी हिंदी कोर्स, (बी.ए. के लिए), उन्नत हिंदी कोर्स (बी.ए. के लिए), उन्नत हिंदी कोर्स (बी.ए. के लिए), हिंदी से चीनी में अनुवाद, हिंदी में बातचीत, हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति, भारत की रूपरेखा आदि.

संपर्क सूत्र : डाक पता - Deptt. of Hindi School of Languages Studies, Xian International Studies University Xian, China, 3-2-502, Gate 6, 1#, Wenyuan South Road, Change District Xi'an, Shaaxi Province, China, 710128,

मोबाइल नं. : 0086-13951736953,

ई-मेल : gfp5364@sohu.com, gefuping@xisu.edu.cn

डॉ. भावना शुक्लः चीन और भारत दोनों देशों में गौतम बुद्ध के प्रति आस्था है, किन्तु क्या कारण है की उनकी शिक्षाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा?

ग फू फिङ : देखिये इसमें एक भ्रम है, शायद गलतफहमी है. दोनों देशों के प्रति चीन में बौद्ध धर्म के प्रति आस्था है और एक बात मैं कहना चाहता हूँ कि बौद्ध धर्म के प्रति आस्था होती आई है होती रही है और होती रहेगी. दोनों देशों के बीच दया है, प्रेम है, करुणा है, आस्था है, विश्वास है. इन सब चीजों का क्रियान्वयन हो रहा है, लेकिन शायद आपको मालूम नहीं है हमारे यहाँ बहुत से बौद्ध अनुयायी हैं. हमारे यहां बौद्ध अनुयायियों की संख्या के विषय में आप को सुनकर बहुत आश्चर्य होगा. बौद्ध धर्म का उत्थान और विकास भारत में हुआ है और उसका विकास होते-होते ही चीन में आया और चीन के आधार पर आया जापान में और दक्षिण पूर्व सभी जगह फैला हुआ है और उसके बाद बड़े पैमाने पर अन्य क्षेत्रों में भी इसका प्रसार-प्रचार होता आया है लेकिन इसके विपरीत भारत में इसका असर बहुत कम हो गया, क्योंकि इसके आधार पर इसका उत्थान हुआ. इसका विकास हुआ और किसी समय में यह कहा जा सकता है कि भारत में बौद्ध धर्म का समापन भी समझा जा सकता है लेकिन बाद में पुनरुत्थान का एक दौर ही हुआ है. अभी भारत में बौद्ध धर्म के अनुयायियों की संख्या है वह भी ज्यादा नहीं है. संख्या की दृष्टि से हम देखें यह देखा जाए तो चीन में बहुत ज्यादा है. दूसरी बात यह है कि हमारे यहां बौद्ध धर्म के बहुत से मंदिर है, वहां भिक्षु हैं. भिक्षुणी वहां हैं; बल्कि धर्म को मानने वाले धर्म के पूजा करने वाले बहुत होते हैं. वहां कॉलेज, विद्यालय कम से कम दसों हैं. यह विद्यालय मध्य स्तर के नहीं उन्नत स्तर के हैं. जैसे बी.ए., एम.ए., पी.एच डी, के बराबर हैं. हमारे यहां पर बड़ी मात्रा में अनुयायी होते हैं, न सिर्फ इसके अध्ययन करने वाले बहुत होते हैं. आप लोगों के पास जो अध्ययन हैं जो जानकारियां हैं वह बहुत पुरानी पड़ गए हैं. यह बहुत कम हैं. यह सही नहीं है. मैं चाहता हूं इस विषय पर शोध कार्य हो तो मैं यह कहना चाहता हूं कि वहां पर बौद्ध धर्म की बात उठी है तो मैं बहुत मजे से कहना चाहता हूँ वहां का बौद्ध धर्म जो है विद्या की तरह तो है बल्कि वहां के भिक्षु-भिक्षुणी हैं. वह आधुनिक समाज के हैं.

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डॉ. भावना शुक्ल : साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियां किस प्रकार चीन और भारत के संबंधों में सुगंध पैदा कर सकती है?

ग फू फिङ : भारत के संबंध विभिन्न क्षेत्रों में बहुत अच्छे होते जा रहे हैं और आजकल मुख्य रूप से देखा जाता है आर्थिक क्षेत्र में, लेकिन यह क्या है सिर्फ भ्रम है. मेरे ख्याल में जहां तक मैं समझता हूं. आजकल इधर कुछ 10 सालों से चीन और भारत के संबंधों में सबसे ज्यादा उपलब्धि साहित्य सांस्कृतिक गतिविधियों में हुई है और दोनों देशों के सरकार के नेतृत्व में अब जो यह गतिविधियां हैं बहुत जोरों पर हैं. मतलब दोनों देशों की सरकार है इसको लेकर बहुत काम कर रहे थे यानी इस दिशा में बहुत काम कर रही है. यानी सुगंध पैदा करना चाहिए और सुगंध पैदा कर रहा इसमें हम लोगों को भाग लेना चाहिए. क्योंकि हम लोगों के बिना यह संभव नहीं. हम लोग हिंदी के हैं, चीनी के हैं क्योंकि हम लोग शिक्षित हैं, प्रोफेसर हैं, बुद्धिजीवी हैं, राजनीतिक हैं, हम लोगों के बिना सुगंध पैदा नहीं हो सकती.

डॉ. भावना शुक्ल : चीन में हिंदी के प्रति कैसी भावना है. कृपा होगी यदि आप यह बता सकें की हिंदी की कितनी कृतियाँ चीन में अनुवादित हुई है?

हमारे चीन में हिंदी के प्रति कैसी भावना है आप लोग खुद अपनी आंखों से देख रहे हैं. हमारे साथ जो हमारे विद्यार्थी आए हैं वह सब अंग्रेजी के नहीं हिंदी के हैं. मतलब हिंदी के प्रति कैसी आस्था है, प्रेम है, यह धीरे-धीरे आगे बढ़ने की एक प्रक्रिया है. इधर कुछ 10 या 20 सालों से विकास हो रहा है. भारत के विकास के साथ-साथ इस प्रसार का असर चीन में भी दिख रहा है. हिंदी का प्रचार-प्रसार अच्छा हुआ. इसके पहले लोगों के विचार से हिंदी क्या चीज होती है, अच्छी तरह जानते नहीं थे. अब देखिये हमारे विश्वविद्यालय के लगभग 100 से ज्यादा हमारे स्नातक भारत में हैं जैसे- दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा, बेंगलोर, मुंबई, चेन्नई आदि शहरों में हैं. मतलब यह है कि यह सब हिंदी सीख कर वहां पर काम कर रहे हैं. ये तो एक हालत एक स्थिति है. मैं शिक्षा के बारे में आपको बताना चाहता हूं. हमारे यहाँ के बहुत सीमित विश्वविद्यालयों में हिंदी की शिक्षा होती थी लेकिन अब धीरे-धीरे लगभग दस विश्वविद्यालयों में हिंदी का कोर्स है. किसी में बी.ए. का, किसी में बी.ए के साथ एम.ए. का कोर्स भी पढ़ाया जाता है. आजकल की पीढ़ी के नौजवान के दौर में हिंदी की नहीं सोशल मीडिया के दौर में हिंग्लिश का चलन है. हिंदी भाषा सुंदर है. इधर कुछ सालों में भारत का जो विकास एक दौर से आर्थिक विकास हो रहा है भारत एक नई शक्ल में संसार के सामने जो दिख रहा है. अच्छी तरह हम भी सीख लें. धीरे-धीरे उसका विकास हो रहा है. सभी लोग जानना समझना चाहते हैं कि हिंदी क्या है? हिंदी का प्रसार हो रहा है, परन्तु उतना नहीं जितना होना चाहिए. आजकल नई पीढ़ी के लोग स्नातक होने के साथ नौकरी में जाते हैं. कमाई के लिए चले जाते हैं. लेकिन ये लोग हिंदी को पढ़ते हुए सीखते हुए इनका अनुभव गहरा होता जा रहा है. उसमें गोता लगाकर करने से यानी अनुभव लेने से मजबूती आएगी. मैं एक अध्यापक हूँ जितना मैं जानता हूँ, जितना मैं अनुभव कर रहा हूँ, सच्चे दिल से मतलब मैं जो कहता हूँ, वह सत्य है. हिंदी से चीनी में अनुवाद जैसे महाभारत, रामायण, रामचरितमानस का अनुवाद हुआ है लेकिन हिंदी से चीनी में प्रेमचंद का जो साहित्य है इनकी सभी रचनाओं का अनुवाद हो गया है, यशपाल की कहानियों का, कमलेश्वर की कहानियों का अनुवाद हुआ है. रामचरितमानस का अनुवाद बहुत मुश्किल से हुआ है यह महाकार्य हमारे गुरूजी ने किया. ये पहले व्यक्ति हैं जिन्हें राष्ट्रपति के करकमलों द्वारा पुरस्कृत किया गया.

डॉ. भावना शुक्ल : भारत में छन्दबद्ध कविता की परंपरा रही है, अब मुक्तछन्द और छन्दहीन कवितायें लिखी जा रही हैं. साहित्य और जीवन पर इनके प्रभाव के बारे में आप क्या सोचते हैं?

ग फू फिङ : ये जो छन्द हैं वह पुराने समय की बात है. यह अच्छी कही जा सकती है, पर यह उसी जमाने के लिए. आजकल जो है वह छन्दहीन कवितायें लिखी जा रही हैं क्योंकि आजकल समाज बदल गया है, मनुष्य बदल गया है. जिस समाज में आज के मनुष्य जो जी रहे हैं उसी आधार पर वो मुक्तछन्द ही ज्यादा लिख रहे हैं और जहाँ तक मैं समझता हूं ‘छन्दहीन कवितायें और...जहां तक आजकल के नई पीढ़ी के लोग हैं उनका सम्बन्ध आज के समाज से है, आज के जीवन से है, वे मुक्तछन्द में ज्यादा अच्छे से अपनी अभिव्यक्ति देते हैं’ लेकिन मेरा कविता से सरोकार नहीं ज्यादातर मुझे छन्दबद्ध कविता पसंद है, मजा आता है. मेरी जो अभिव्यक्ति है कितनी मैं दे पाया ये पता नहीं.

डॉ. भावना शुक्ल : भारत के भविष्य के बारे में आप क्या सोचते है?

ग फू फिङ : ये तो सोचने की बात है, ये कहने की बात नहीं है, ये जो होगा, जो होता जायेगा, ऐसा क्यों कहता हूँ, ये जो भारत है वह चीन की तरह है. काफी पुराना देश है. इसका इतिहास बहुत लम्बा है. यानि भारत सभ्यता इसकी संस्कृति पाश्चात्य देश अमरीका जैसे देश की तरह नहीं है. यह गर्व की बात है. हम लोग शक्तिशाली हैं, हम लोगों में ताकत है. इधर आधुनिक समाज में लोगों का विकास थोड़ा ज्यादा हुआ है. यह अच्छी बात है. इसको लेकर हमें लोगों से सीखना चाहिए. इसीलिए हम लोग सीख रहे हैं और सीखने के कारण ही हम लोग तेजी से बढ़ते जा रहे हैं. और दूसरी बात यह है ये जो हमारी सभ्यता है, हमारी संस्कृति है, ये जो राष्ट्र में परंपरागत सभ्यता का है. इस सभ्यता का आविष्कार भारत में हुआ है. जैसे आगरा का ताजमहल क्या इग्लैंड में है? क्या अमरीका में है? शायद होगा ये सिर्फ कहने के लिए है. यदि होता तो ऐसा होता. अब देखिये पिछले साल मैं कोई चार बार आया हूँ. भारत के आम जीवन में परिवर्तन हुआ है. ऐसा मैं महसूस करता हूँ. ये जो भौगोलिक जीवन में ये परिवर्तन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. ये खुशी की बात है पर ज्यादा नहीं, जिस चीज को मैं महत्त्व देना चाहता हूँ वो है विचार, विचारों में परिवर्तन आया है.

डॉ. भावना शुक्लः हम जानना चाहेंगे की भारत के प्रवास काल के बारे में आपकी क्या राय है?

ग फू फिङ : देखिये आप आये हुए हैं जो हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है. और हम यहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार में सम्मिलित होने आये हैं. यहाँ प्रोफेसर देश-विदेश से जो आये हैं वह अपने विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए ही आये हैं. विदेशों में हम लोग रहते हैं, काम करते हैं, हिंदी की सेवा कर रहे हैं, हमें जो देखने को पढ़ने को मिल जाता है, वह सीमित है. इसके बारे में हमारी जो आँखें हैं वह ज्यादा खुल गई हैं. देखने को मिला है, सुनने को कुछ ज्यादा मिला है. कहने का मतलब ये है सोशल मीडिया की वजह से विचारों के साथ-साथ हमारी आँखें खुल गई हैं. लोगों के विचारों में परिवर्तन आया है यानि परंपरा अच्छी है, परंपरा के साथ-साथ जो परिस्थिति है और जो भाषा है वह तो हिंदी है पर आजकल की हिंदी ठीक नहीं है. मुझे पसंद नहीं है, मुझे दिल्ली की हिंदी इतनी पसंद नहीं है. और अब देखा जाये तो लोगों का विचार है वह अलग हो गया है. जैसे- प्रेम. इधर कुछ जवानों के साथ मेरी बातचीत हुई है. पहले जो विवाह होता था, वह माता-पिता की पसंद से होता था आजकल प्रेम विवाह ज्यादा हो रहा है. अगर मुझसे पूछा जाये तो मैं कहूँगा जो माता-पिता की सहमति से होता है, उनके आशीर्वाद से होता है, वहीं सही है. मैं प्रेम को गलत नहीं मानता लेकिन प्रेम अँधा भी नहीं होना चाहिए.

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संपर्क : WZ/21 हरि सिंह पार्क, मुल्तान नगर,

पश्चिम विहार (पूर्व), नई दिल्ली-110030

Email : bhavanasharma30@gmail.com

मोः. 9278720311

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