रविवार, 28 मई 2017

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : व्यंग्य कथा / आज़ादी वाया लाल रंग / मृदुला श्रीवास्तव


‘‘र, मेरा एक सुझाव था.’’

‘‘बोलिए, आप भी क्यों रह जाए?’’

‘‘सर मेरा कहना था कि स्कूल के टीचरों की यूनिफॉर्म सुर्ख लाल रंग की मत कीजिए. अब देखिए न, हमारे यहाँ अठहत्तर लेडीज टीचरें हैं. उनमें से ग्यारह विडो हैं. पांच कुंवारी हैं. और सोलह परित्यक्ता हैं.’’ वी डी ए वी स्कूल प्रबंधन मंडल की दो घंटे से चल रही उस बैठक में उपस्थित एक सदस्य कह रहा था. विषय था ‘स्कूल का गिरता परीक्षा परिणाम और लेडीज टीचर्स के लिए यूनिफॉर्म का रंग निर्धारित करना.’

अध्यक्ष- ‘‘तो?’’

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‘‘तो सर आप तो जानते हैं न हमारे समाज को. अभी भी लोग इतने ब्रॉड माइंडेड नहीं हुए हैं कि हमारी विधवा, कुंवारी, परित्यक्ता स्त्रियों को इतना सुर्ख माता के लाल रंग वाली ड्रेस में देखना पसंद करें. उन्हें इस ड्रेस में घर से स्कूल आते जाते कितने तानों की बौछारें सहनी पड़ेगी.’’ मिश्रा जी ने अपनी बात पूरी की.

अध्यक्ष- ‘‘तो?’’

‘‘तो सर बिलकुल वाइट ठीक रहेगा.’’ दूसरा बोला.

‘‘नहीं सर, यह तो संभव ही नहीं है. हमारे 30 से ज्यादा स्कूलों में बीस से ज्यादा टीचरें नवविवाहिता हैं. और कुछ की शादी जल्दी ही होने वाली है. क्या वह विधवा का लिबास पहनेंगी? तीसरे ने बात पूरी की.

अध्यक्ष- ‘‘तो?’’

‘‘तो सर दो दिन में उनकी सास-ननदें उनकी नौकरी छुड़वा देंगी या फिर वे बेचारी इस असुरक्षा के भाव का बोझ ढोएंगी कि कहीं उनका पति उनके सफेद कपड़े पहनते ही पतली गली से स्वर्ग की ओर कूच न कर जाए. और सफेद रंग तो वैसे भी सर नेताओं की बपौती है.’’

‘‘मिस्टर गुप्ता....’’ अध्यक्ष ने टोका. ‘‘सॉरी सर, सॉरी!’’ गुप्ता जी बोले. ‘‘इट्स ओके.’’ अध्यक्ष बोले.

‘‘आप लोग डरिए नहीं अपने मन की बात कहें.’’
अध्यक्ष ने सदस्यों के चेहरे का रंग उड़ते देख कहा.

‘‘पर सर मन की बात कैसे कहें. वह तो पेटेंट हो चुकी है.’’ हाँ, ये तो है. तो फिर दिल की कहें.’’ अध्यक्ष ने स्पष्ट किया. ‘‘हाँ सर मेरे दिल का कहना तो ये है कि ‘काला’ ठीक रहेगा.’’ पीछे से वर्मा जी बोले.

‘‘आपसे पूछा किसी ने?’’

‘‘नो सर!’’

‘‘तो? अरे वर्मा जी यह स्कूल है. कोई कब्रिस्तान नहीं जहाँ काला रंग पहनकर मातम करना हो.’’ अध्यक्ष ने खीझते हुए कहा.

‘‘सर हरा?’’

‘‘ये इस्लाम का रंग है.’’

‘‘तो पीला?’’

‘‘ये राम का रंग है.’’

‘‘सन्तरी?’’

‘‘ये तो जनाब साधुओं का रंग है.’’ एक सदस्य बोला. ‘‘आप तो ऐसे कह रहे है जैसे सन्तरी रंग की साड़ी आपको पहननी हो.’’ एक ज़ोरदार ठहाका. अध्यक्ष ने घूरा.

‘‘सॉरी सर, सॉरी’’ एक साथ कई स्वर. ‘‘इट्स ओके. आगे बढ़े.’’ तभी अध्यक्ष बोले, ‘‘जस्ट ए मिनट.’’ और उठकर बाहर निकल गए.

अध्यक्ष के बाहर जाते ही एक ने दूसरे के कान में कहा- तो तू बॉथरूम गया है.’’ उसके चेहरे से ही लग रहा था बहुत देर से रोके बैठा था. ‘‘देखा नहीं कितना कम बोल रहा था. जब हमें कुछ लगा होता है तो हम कम बोलते हैं.’’ दोनों हंसे. सचिव निरूपम भटनागर बोले- ‘हाँ तो मिसरा जी, आप क्या कह रहे थे कि बेचारी विधवा परित्यक्ता कुंवारी क्या करेगी? वैसे ठीक ही तो कह रहे थे आप.’’ ‘‘निरूपम जी आपको कब से महिलाओं की चिन्ता सताने लगी जो आप मिश्रा जी का समर्थन कर रहे हैं? पिछले साल नवागत कुंवारी टीचर के साथ आपने जो अभद्र व्यवहार किया था वह क्या भूल गए?’’ उप सचिव निरंजन भार्गव निरूपम जी से बोलना चाहते थे पर चुप रहे. उप सचिव थे शायद इसीलिए.

‘‘अरे मिसरा जी, आप काहे इतनी चिन्ता कर रहे हैं भाभी जी तो शादीशुदा है न? उनको लाल रंग से कोई दिक्कत नहीं होगी.’’ संतोष जी बोले.

‘पर फिर भी आप लोग कुछ भी कहें...’ मिश्रा जी सोचने लगे. अब किससे कहें कि साहित्य में रुचि रखने वाली हर चीज को साहित्य से जोड़कर देखने वाली उनकी श्रीमती एक दिन बोली थी, ‘‘चालीस पार कर चुकी हूँ. खबरदार, जो मेरे लिए अब ये लल्लू जैसे लाल रंग की कोई साड़ी लाए तो. लल्लू जी लाल जी का नाम नहीं सुना आपने?’’ बस तभी से दुबक कर लाल रंग से तौबा कर ली. पर बोले कुछ और. बोले-

‘‘लाल रंग वासना जगाता है.’’ ‘‘वासना? आपकी या टीचरों की?’’ ‘‘दोनों की.’’ मिश्रा जी ने उत्तर दिया. ‘‘उनकी नहीं जागेगी. आप बस अपनी चिन्ता कीजिए.’ जनार्दन शुक्ला बोले. ‘अरे मिसरा जी, बाकिया दि गल्ला छड्डो. दिल साफ होना चाईदा.’’ काफी देर से चुप बैठे सिंह साहब भी बोल ही पड़े.

एक ठहाका, दो ठहाके, पन्द्रह ठहाके, ठहर-ठहर कर. तभी अध्यक्ष महोदय रूमाल से गीले हाथ पोंछते हुए अन्दर घुसे.

‘‘देखा मैंने क्या कहा था. लगी थी.’’

‘‘तो फिर क्या डिसाइड हुआ.’’ अध्यक्ष ने थोड़े गीले हाथ अपनी पैंट से रगड़ते हुए पूछा.

सभी चुप. ‘‘तो ठीक है. आप लोग निर्णय नहीं ले पा रहे है तो मैं ही निर्णय देता हूँ. मैं तो माता का भक्त हूँ और आप लोग भी. इसलिए माता का लाल रंग इज दा बेस्ट रंग.’’ ‘‘वाह क्या अंग्रेजी है.’’ कोई बोला धीरे से. ‘‘शर्मा जी कुछ कहा आपने क्या?’’ ‘‘नहीं सर, कुछ नहीं लाल रंग ही ठीक है. ...फिर भी यदि वोटिंग हो जाती तो...’’ शर्मा जी ने घबराते हुए अपनी बात पूरी की.

‘‘हाँ वोटिंग करवा लीजिए. अभी इसी वक्त.’’ पर्चियां फाड़ी गईं. जूते का डिब्बा और चाकू मंगवाया गया चारों तरफ टेप से चिपकाया गया. एक होल बीच में चाकू से. इंस्टैंट कॉफी और इंस्टैंट वोटिंग दोनों का दौर साथ-साथ चला. माता का लाल रंग इज दा बेस्ट रंग. सभी के कानों में यह वाक्य गूंज रहा था. काऊंटिंग हुई. बीस में से बीस पर लिखा था- लाल रंग?

सर्वसम्मति से एक माह के भीतर नए सत्र में माता के लाल रंग की शिफॉन की साड़ियाँ टीचरों की यूनिफॉर्म हो गयी थी. यूनिफॉर्म खरीदने के लिए दस हजार रुपए हर टीचर को मिलेंगे यह भी जारी हुए परिपत्र में लिखा था.

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एक जुलाई

वी डी ए मंडल के सभी स्कूलों के बरामदे माता के लाल रंग वाली शिफॉन की साड़ियों में लिपटी टीचरों की चहलकदमी से चहक महक रहे थे. प्रबंधन के निर्णय से सामने सभी नतमस्तक थे. ‘‘अरे बीना जी, वी आर वैरी सॉरी. कैसा लग रहा है आपको ये लाल रंग?’’ पांच साल पहले अपने पति को खो चुकी लाल साड़ी में लिपटी बीना मल्होत्रा से मिश्रा जी पूछ रहे थे. ‘‘कष्ट हो रहा होगा आपको, मुझे पता है. हम आपके दुख को समझ सकते हैं. पर क्या करें प्रबंधन के दिमाग में कीड़ा घूम गया तो मतलब घूम गया.’’ मिश्रा जी ने अपनी बात पूरी की. बीना मल्होत्रा चुप थी. मन ही मन मिश्रा जी से बोली- ‘सच बताऊँ मिश्रा जी इन्हें गए हुए पांच साल हो गए. अब जो चला गया वो चला गया. दरअसल तो मेरा भी मन करता था कि मैं लाल, गुलाबी, पीला, नीला, या हरे चटक रंग के कपड़े पहनूँ. पर दुनिया भी कहाँ देखना चाहती है हमें इन रंगों में? आदमियों को छोड़ो औरतें भी तो. ये तो भला हो प्रबंधन का जिन्होंने यूनिफॉर्म का रंग ही लाल कर दिया. अब हम पूरी आजाद हैं लाल रंग पहनने के लिए. कम से कम स्कूल में.’

पर बोली कुछ और- ‘‘अब क्या करें मिसरा जी, पहनना ही पड़ेगा. मैनेजमेंट का डिसीजन जो है. नौकरी भी तो करनी है. फिर दस हजार रुपए भी मिले हैं. अब आपको क्या बताऊँ मिश्रा जी मेरी सास सबसे ज्यादा खुश हैं. कहती है- बहू तुम्हारी स्कूल की लाल यूनिफॉर्म प्रेस करवा दी है मैंने रात को ही. सुबह अच्छे से बांध कर जाना.’’ मेरी सास ने तो सांप के जैसे ऐसी पलटी खाई कि बस. कहती है- ‘‘लाल साड़ी पहनने के 10 हजार रुपए मिल रहे हैं तो बुरा क्या है. ये रंग वंग सब भौतिक चीजें हैं.’’

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स्कूल के प्रांगण में खुशियां दुगुनी लहरा रही थीं. माता के लाल रंग में शिफॉन की साड़ियों में लिपटी विधवा, परित्यक्ता और कुंवारी सभी टीचरें इतनी खुश थीं कि मानों कब से इस आनन्द को अहसास करना चाहती थीं. पर कोई था जो उन्हें ऐसा करने से रोकता था. समाज की परम्पराओं को अंगूठा चिढ़ाती लाल रंग के पंखों के सहारे वह अब प्रगति की ऊंचाइयां छूने को तैयार थीं. नया उत्साह, नयी उमंग. स्कूल का परिणाम? शत प्रतिशत. सभी हैरान कम और कुछ परेशान भी ज्यादा थे. टीचरों का गुस्सा अब जाने कहाँ काफूर हो गया? बच्चों को टीचरों से थप्पड़ खाए एक वर्ष बीत चुका था. अध्यक्ष महोदय वार्षिक बैठक में गत वर्ष की बैठक में लिए गए निर्णय के परिणाम को देख मंद मंद मुस्कुरा रहे थे. मिश्रा जी कह रहे थे- ‘‘वाह सर वाह मान गए. आज़ादी वाया लाल रंग.’’ एक साल में स्कूल का रिजल्ट 40 प्रतिशत से 90 प्रतिशत हो गया. वॉट ए गुड आइडिया वाज सर. आज़ादी वाया लाल रंग सम्मेलन कक्ष ठहाकों से गूंज उठा. लेकिन कॉमरेडी अध्यक्ष मंद मंद मुस्कुरा रहे थे क्योंकि उन्होंने तो एक तीर से दो निशाने लगा ही लिए थे.

सम्पर्कः फ्लैट नं-2, द्वितीय तल,

हिमालय अपार्टमेंट्स,

गोल्डी जनरल स्टोर के पास,

कसुम्पटी, शिमला-171009 (हि.प्र.)

मोः 9418539595, 9418008595

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