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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : हास्य-व्यंग्य / बसन्त या बसन्ती ? / श्रवणकुमार उर्मलिया

मेरे प्यारे बसन्त, आज भी मेरे हृदय में गुलमोहरों की रक्तिम सत्ता से आच्छादित वे राज-पथ जीवित हैं. मेरी सुधियों को आज भी जब बसन्ती बयार सहला जाती है, तो मैं अतीत के उन पुष्पित-पल्लवित पलों की मादकता में खो जाता हूं. ऐ मित्र, आज भी मेरे मन में जीवित हैं सिंदूरी अग्नि में दहकते वे पलाश-वन. माई डियर बसन्त, फिर तुमने इतनी निष्ठुरता से कैसे कह दिया कि अब तू मुझे अच्छा नहीं लगता?

नहीं प्यारे दोस्त बसन्त, मैं तुझे भूला नहीं हूँ. पर तू ही बता कि पत्थरों के इस निर्मोही शहर में कहां ढूंढूं तुझे? यहाँ तो अपनी जिंदगी ढूंढ़े नहीं मिलती.

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बसन्त के साथ मन ही मन हो रहे वार्तालाप को स्थगित कर आसपास नजरें दौड़ाता हूँ. जनवरी का महीना अभी-अभी गुजरा है. हवा में शीत लहर के जो रेशे थे, वे दिन-प्रतिदिन महीन होते जा रहे हैं. हवा की आदतों में एक नाजुक सा बदलाव है, जो इस विषपायी हृदय में एक अनजानी गुदगुदी भर रहा है. मन फागुन-फागुन हो रहा है. वातावरण में बसन्त के आगमन के स्पष्ट संकेत हैं.

अपने फ्लैट की बालकनी नं. एक का द्वार खोलता हूँ ताकि अपने इस नश्वर शरीर में मन्द-मन्द हवा के मधुर हस्ताक्षर ले सकूं. मेरी आहट पाकर बगल वाले फ्लैट से एक शालीन नस्ल का कुत्ता स्नेहपूर्वक भौंकने लगता है.

सुना है कि कुत्ता अंधेरे में भूतों को देखकर भी ऐसे ही भौंकता है. तो क्या वह मुझे दिन में दिखने वाला भूत समझ रहा है?

बात मेरे खिलाफ जा रही है इसलिए मन में उभरी शंका को दबा देता हूं. मैं भूत हो ही नहीं सकता, क्योंकि मैं पत्थरों के इस शहर का गुमशुदा वर्तमान हूं.

मुझे बसन्त का इन्तजार है और कुत्ता भौंक रहा है. बसन्त की प्रतीक्षारूपी संगति में कुत्ता भौंकरूपी विसंगति फैला रहा है. मेरा मन खट्टा हो जाता है. मैं बालकनी नं. एक का द्वार बंद कर बालकनी नं. दो पर आ जाता हूं.

सौभाग्य से सामने वाले फ्लैट में कोई कुत्ता नहीं रहता, पर दुर्भाग्य से उस फ्लैट में कुत्ते से भी ज्यादा कर्कश एक काइयां बूढ़ा गृहस्थ रहता है. मैं बालकनी से बसन्त का जायजा लेना चाहता हूँ, उसी समय बूढ़े की कर्कश चीख सुनाई पड़ती है. वह अपनी अधेड़ सीधी-सादी पतिव्रता पत्नी को ‘कमीनी कुतिया’ की उपाधि से विभूषित कर रहा है.

बसन्त के आगमन की मधुर बेला में यह कैसी विडम्बना है? एक तरफ कुत्ता भौंक-भौंककर आते हुए बसन्त को दूर खदेड़े दे रहा है, तो दूसरी तरफ सभ्य-सुसंस्कृत दुनिया का एक मानव श्रेष्ठ वातावरण में वीभत्स रस घोल रहा है.

इन फ्लैटों में तो बस कुत्ते ही यह अहसास पाल सकते हैं कि वे इंसानों के बीच रह रहे हैं.

मन कुंठित हो उठता है. मैं बालकनी का द्वार बंद कर घर के भीतर आ जाता हूँ. किचन में मेरी इकलौती पत्नी की बड़बड़ाहट सुनाई पड़ती है, ‘नासपीटी बसन्ती अभी तक नहीं आई! घर का सारा काम पड़ा है! कभी-कभी तो रुला देती है यह बसन्ती!’

मैं बसन्त के ख्यालों में खोया हुआ पूछ बैठता हूँ, ‘मुझसे कुछ कह रही हो, प्रिये?’

बसन्त के आगमन पर पत्नी ‘कर्कशे’ से ‘प्रिये’ में परिवर्तित हो गई है. पत्नी अपनी स्वभावगत विवशता से कहती है, ‘अरे तुमसे नहीं कहूँगी तो यहाँ और कौन बैठा है मेरा दूसरा पति परमेश्वर! देखो जी, अब मैं इस बसन्ती की छुट्टी करके ही रहूंगी! देखो तो भला, सवा ग्यारह बज गए और अभी तक नहीं आयी!’

पत्नी को विनम्रतापूर्वक आश्वासन देता हूँ, ‘थोड़ा धीरज धरो, भाग्यवान! बसन्त तो आ ही रहा है, बसन्ती भी आ जायेगी!’

हो न गया मेरे सारे सौंदर्यबोध का सत्यानाश! मुझे प्राणों से भी प्रिय बसन्त की प्रतीक्षा है और पत्नी को मुझसे भी प्रिय बसन्ती का इन्तजार है. बसन्ती के सामने मेरा बसन्त गौण हो गया है. बसन्ती जो है वह बसन्त से बड़ा यथार्थ है. बसन्त के कारण कोई काम नहीं रुके हुए हैं. पर यदि बसन्ती नहीं आई तो इस घर में न झाड़ू लगेगी, न बर्तन साफ होंगे.

कहाँ प्यारा-सा, सुन्दर, सुघड़, मनभावन और मन में गुदगुदी भरने वाला बसन्त, और कहाँ वह श्यामवर्णा, पीतवसना एवं मत्स्यगंधा बसन्ती! घर रुपी इस भरी-पूरी इमारत में भी मन खंडहर-खंडहर हो जाता है. स्वर्गीय दुष्यंत के जमाने में खंडहरों के भी हृदय हुआ करता होगा, तभी उन्होंने लिखा थाः

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,

आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है.

हो सकता है कि बसन्त हृदयहीन हो, पर उसी की प्रतीक्षा शाश्वत लगती है. क्योंकि अब तो आदमी नामक प्राणी में भी हृदय रखने की परम्परा घट रही है.

हिम्मत कर मैं फ्लैट की मुख्य बालकनी का पट खोलता हूँ. जहाँ तक नजर जाती है, लोगों का काला ऐश्वर्य बिखरा पड़ा है.

दायीं ओर ग्राउंड-फ्लोर पर एक डॉक्टर-युगल ने क्लीनिक खोल रखा है. उन दोनों को बसन्त से कोई मतलब नहीं. उनका बसन्त हैं मरीज और गर्भवती महिलाएं. अच्छे हट्टे-कट्टे और स्वस्थ लोगों को देखते ही उनका बसन्त धराशायी हो जाता है. हंसते-खेलते बच्चे डॉक्टर पति की आंखों में चुभते हैं, क्योंकि वे बाल-रोग विशेषज्ञ हैं.

बायीं ओर पार्क में हवा में झूमते हुए यूक्लिप्ट्स के वृक्ष बसन्त के आगमन की सूचना दे रहे हैं. पत्तों की सरसराहट में एक लय है, एक ताल है. मन मेरा भावविभोर हो रहा है. तभी मेरी बेताल पत्नी जोरों से आवाज लगाकर पूछती है, ‘फिर उस मोटी को घूरने लगे न? उस कलमुंही का तो मैं मुंह नोंच लूंगी, कहे देती हूँ! इतना भी नहीं होता तुमसे कि बसन्ती को ही देख लो कि वह आती हुई दिख रही है या नहीं!’

विचित्र धर्मसंकट है. बसन्त को देखूं कि बसन्ती को? आता हुआ बसन्त मेरे सौंदर्यबोध को बढ़ा रहा है पर पत्नी का बसन्ती-बोध उसे चौपट किये दे रहा है.

घर की कॉल-बेल बजती है. पत्नी बड़बड़ाते हुए द्वार खोलती है. कचरेवाली का आगमन हुआ है. पत्नी बसन्ती का गुस्सा कचरेवाली पर उड़ेल देती है, ‘यह टाइम है तेरे आने का, ऐं? कचरा जब सड़कर महकने लगता है तब तू आती है उसे लेने, हैं? और पैसे लेने में एक दिन की भी देरी नहीं करती! है न? यही हाल रहा तेरा न, तो अगले महीने से पैसे काटूंगी, कहे देती हूँ!’

मुंहलगी कचरेवाली पत्नी को छेड़ती है, ‘देखो, बीबीजी, हमें जे रोज रोज की तुम्हारी किट्-किट् अच्छी न लागे! किसी दिन तुम्हारे घरवाले को भी कचरे के साथ उठा ले जाऊंगी, कहे देती हूँ!’

मैं आश्वस्त हूँ. पत्नी मुझे लाख निकम्मा, फालतू, बेकार कहे पर वह मुझे कचरेवाली के हवाले नहीं कर सकती. क्योंकि कचरेवाली सुन्दर भी है और जवान भी. यह प्रकृति का एक शाश्वत विरोधाभास है कि फूल बेचने वाली कुरूप होती है और कचरा ढोने वाली खूबसूरत.

मैं अपनी दृष्टि के विस्तार को चारों ओर खुला छोड़ देता हूँ. अब मुझे बसन्त का इन्तजार भी है और बसन्ती का भी.

नीचे चमचमाती कीमती कारें खड़ी हैं. इन कारों के मालिक अपनी अपनी पत्नियों के पति भी हैं और लक्ष्मी पति भी हैं. पैसा ही इनके लिए बसन्त है. ये काले धन का बसन्त भोगते हैं.

मुझ अकिंचन की अकिंचन कार धूल से भरी हुई है. उसने शायद इस चिरंतन सत्य को स्वीकार कर लिया है कि धूल से परहेज कैसा? सभी कुछ तो एक दिन धूल में ही मिल जाने वाला है.

फिर से बसंती हवा चल रही है. शीत पर धूप की शॉल बहुत गुनगुना अहसास दे रही है. पत्नी फिर पूछ बैठती है, ‘मेरी बात का कोई जवाब क्यों नहीं देते? बसन्ती दिखी कि नहीं? अरे, यदि खाली हो तो नीचे जाकर अपनी गाड़ी ही क्यों नहीं साफ कर लेते?’

मेरे बसन्त पर बुरी तरह से बसन्ती हावी होती जा रही है. न बसन्त पदार्पण कर रहा है न बसन्ती आ रही है.

सोचता हूँ पत्नी का सुझाव अच्छा है. आदमी को खाली नहीं बैठना चाहिए. मेरी पत्नी यदि मुझे अपनी गाड़ी साफ करते हुए देखने का सुख पाना चाहती है तो इसमें बुराई क्या है? महंगाई के इस जमाने में पत्नी को इसी तरह के छोटे-छोटे सुख तो दे सकता है निरीह पति.

क्या पता, मेरी पत्नी को मेरे द्वारा गाड़ी साफ करने पर कहीं यह तसल्ली भी मिलती हो कि हम 200 रुपये प्रतिमाह बचा रहे हैं.

पत्नी को कैसे समझाऊं कि अब मुझे अपनी गाड़ी साफ करने में एक दहशत सी होती है. अभी पिछले महीने की ही तो बात है. मैं बड़ी लगन से अपनी गाड़ी साफ कर रहा था कि एक सुविधाभोगी ने मेरे पास आकर पूछा, ‘ऐ भाई, महीने भर गाड़ी साफ करने के कितने रुपये लेते हो?’

मुझे इस बात की कतई शर्म नहीं कि मुझमें और कार साफ करने वाले में कोई अंतर नहीं. तकलीफ इस बात से हुई कि प्रतिष्ठापरस्ती ने मेहनत-मशक्कत को हेय दृष्टि से देखा.

बहरहाल, बात बसन्त की हो रही थी. वह बहुत निष्ठुर है, निपट निर्मोही है. वह बहुत प्रतीक्षा करवाता है. आते-आते आता है. गुलमोहर और अमलतास के कन्धों पर सवार बसन्त के पंछी शायद राह भटक गए हैं. न जाने वे कब सही दिशा पाएं!

बसन्त अर्थात् इस फ्लैट-भरी जिन्दगी में थोड़ा सा सुख. मन चाहता है कि दिनों के हरे-भरे बगीचे में पल-छिनों के रंग-बिरंगे फूलों के प्यार भरे गीत गुनगुनाये बसन्ती हवा, ताकि हम उदासी के काफिलों को विदा कर सकें.

बसन्त आएगा जरूर, इसका मुझे पूरा विश्वास है. उसने हमें कभी धोखा नहीं दिया. हाँ, बसन्ती के बारे में मैं निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कह सकता. उसका कोई भरोसा नहीं. जिस दिन पत्नी बसन्ती को ज्यादा याद करती है, उस दिन बसन्ती जरूर नहीं आती.

पर, मैं यह क्या देख रहा हूँ, दोस्तों! वह देखो...उधर...बसन्ती आ रही है. मुझे प्रतीक्षा बसन्त की है और बसन्ती आ रही है. बसन्त एक छलावा है पर बसन्ती एक सच्चाई है. भलाई इसी में है कि हमें बसन्ती से अपना काम चला लेना चाहिए.

सोचिये जरा, दोस्तों! यदि बसन्त आ जाता पर बसन्ती नहीं आती तो? तो मुझे गाड़ी के साथ साथ घर के बर्तन-भांडे भी साफ करने पड़ते कि नहीं?

सम्पर्कः 19/207 शिवम् खंड

वसुंधरा, गाजियाबाद-201012

मोः 9868549036

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