रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : व्यंग्य / दल बदल समारोह उर्फ आ गले लग जा / घनश्याम अग्रवाल

जैसे-जैसे चुनाव करीब आते हैं, वैसे-वैसे, आम कार्यकर्ता से लेकर आलाकमान तक, अपनी और अपनी पार्टी की कमर कसते हुए, अपने -अपने काम-धंधे में लग जाते हैं. इनमें एक प्रमुख काम होता है, दूसरे दल के असंतुष्ट सदस्यों को टटोलना. फिर उनके असंतुष्टिकरण को अपनी संतुष्टिकरण नीति के तहत समाप्त कर, उसे एक समारोह में गले लगाना. इसी समारोह को दल बदल या आ, गले लग जा समारोह कहते हैं. इस समारोह में आगंतुक का शाल, श्रीफल, हार, रामनामी दुपट्टा (आगंतुक, यदि कट्टर हिन्दूवादी हो तो ) या फिर पार्टी के रंग का कपड़ा जिसे वे अंगवस्त्र कहते हैं, आगंतुक के अंग में डालकर स्वागत करते हैं.

[ads-post]

आगंतुक अपनी स्थिति स्पष्ट करता है कि उसने वह पार्टी क्यूं छोड़ी? और उसे ये पार्टी क्यूँ भायी. साथ ही इस बात की कसम खाता है कि अब मैं सदा यहीं रहूँगा. मेरा जनाजा भी इसी पार्टी के दफ्तर से यही कार्यकर्ता उठायेंगे. इस पर खूब तालियाँ बजती हैं. पार्टी प्रमुख आगंतुक को गले लगाता है. चमचे रिकॉर्ड बजाते हैं- ‘दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात...’.

समारोह कितना बड़ा और कैसा हो? यह सारा दारोमदार इस बात पर रहता है कि आगंतुक कितना प्रभावी है. जिस दल-बदलू के पीछे बीस-पच्चीस एम.एल.ए. लटके होते हैं वह प्रधानमंत्री से (वर्तमान, भूत, भविष्य) कम के सामने दल बदलने की घोषणा नहीं करता. सिंगल एम.एल.ए. मुख्यमंत्री के सामने, आधा एम.एल.एम. पालकमंत्री के सामने और सामान्य कार्यकर्ता जिला अध्यक्ष या मोहल्ला अध्यक्ष के सामने दल बदलने की घोषणा करता है. दूसरे दिन अखबार में छपाया जाता है कि अमुक कार्यकर्ता अपने असंख्य कार्यकर्ताओं के साथ हमारे दल में शामिल हुआ. दल में प्रवेश करने वाला उसी दल का पुराना पापी हो तो वह खुद को सुबह का भूला कहता है, किन्तु लोग ‘लौट के बुद्धू घर को आए’ समझते हैं. ऐसे में पार्टी कार्यकर्ता ‘घर आया मेरा परदेसी’ यह गीत बजाते हैं. भाजपा वाले ‘मेरा पिया घर आया ओ रामजी’ बजाते हैं.

ऐसे समारोह में पार्टी का गिरा हुआ मनोबल ऊँचा हो जाता है. पर वह ज्यादा देर टिकता नहीं.

क्योंकि जैसे ही कोई दल में शामिल होता है वैसे ही दल के वे लोग अपनी आत्मा सहित दुखी हो जाते हैं, जो इनके टिकट पाने से वंचित हो जाते हैं.

धीरे-धीरे ये दुखी कार्यकर्ता अपनी चाल-ढाल और हाव-भाव से इस बात की घोषणा कर देते हैं कि अब हम पूरी तरह से असंतुष्ट हो गए हैं. अब हम कहीं भी जा सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं. आलाकमान समझाते हैं कि- ‘नादानी मत करो. अरे, टिकट नहीं मिला तो क्या? तुम निष्ठावान हो.फिर सरकार तो बनने दो. इतनी अकादमियों और मलाईदार संस्थाएँ होती किसलिए? तुमको यहाँ, उसको वहाँ, कुछ को
इधर और कुछ को उधर चिपका देंगे.’ फिर भी कुछ बच जाते हैं. आलाकमान उनकी फिक्र नहीं करते. जाते हो तो जाओ, अरे आने वाला बीस एम.एल.ए. की ताकत साथ ला रहा है. दो एम.एल.ए. जाते हैं तो हमारी बला से. ऐसे में इन बेचारों का दिल टूट जाता है.

अपमान-घोर अपमान. इस पार्टी में निष्ठावानों की कोई कदर नहीं. इनके मुंह से ये शेर फूट पड़ता है- ‘घर की औरत की मानिंद हम चाटते रहे तलुए. कल आई सौत ने आलाकमान का मुंह चूम लिया.’

इनके रोम-रोम से असंतुष्टि झलकने लगती है. दूसरी पार्टी वाले इसी टोह में रहते हैं. पका आम है, जरा हिलाओ तो टपक पड़ेगा. और वे इसे हिलाते हैं. और आमजी टपक जाते हैं. अपने असंख्य कार्यकर्ताओं सहित. फिर ऐसा ही समारोह दूसरी पार्टी करती है.

कुछ असंतुष्ट पके नहीं, सड़े आम होते हैं. कोई भी पार्टी इनकी शर्तें नहीं मानती. इनमें से कुछ तो अपनी पार्टी को ही सड़ाते रहते हैं यह सोचकर कि- ‘बहू की लात खाने से बेटे की लात खाना ज्यादा अच्छा है.’ पर कुछ पार्टी छोड़कर भटकते रहते हैं. जब इन्हें ऐसे ही दूसरे भटके मिलते हैं तो ये सब भटक बहादुर मिलकर नई ‘समदरदी’ पार्टी बना लेते हैं. पार्टी कुछ बड़ी बन जाती है तो ये गठबंधन, युति या समर्थन के सहारे चुनाव लड़ते हैं. पार्टी कुछ छोटी बनती है तो एक छोटे नाले की तरह किसी बड़ी नदी में मय बदबू के जा गिरते हैं. फिर होता है वही समारोह, वही सत्कार, वही गले लगना और वही असंख्य कार्यकर्ताओं वाली घोषणा.

इस प्रकार संतुष्ट-असंतुष्ट का यह खेल जारी रहता है.कुछ संतुष्ट होने वाले हैं, तो कुछ असंतुष्ट हो कर चले जाते हैं. पार्टी की स्थिति पुनः वैसे ही हो जाती है. राजस्थानी कहावत के अनुसार कि- ‘बाबो गयो गीगली आई, रह्य् तीन का तीन’. इधर बूढ़ा मरा, उधर घर में बच्ची पैदा हुई. सदस्य संख्या वहीं तीन की तीन.

पर बाबा के जाने पर गम और गीगली के आने पर समारोह तो करना ही होता है. और ऐसे समारोह आजकल हर पार्टी में रोज हो रहे हैं.

यत्र-तत्र-सर्वत्र.

--

मो. 09422860199

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget