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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : व्यंग्य के दो रंग / संतोष त्रिवेदी

मुख्य धारा

व्यंग्य : क्या हाल है?

कविता : तू अपना हाल देख. तेरे यहाँ ज्यादा लट्ठ चल रहा है.

व्यंग्य : वो कैसे?   

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कविता : विधा बनाने पर उतारू कुछ लोग इसे साहित्य से विदा करने पर तुले हुए हैं.

व्यंग्य : ऐसी बात तो मेरे संज्ञान में नहीं है. हम तो दैनिक योजनाएँ निकाल रहे हैं. अभी बहुत कुछ करना है.

कविता : तभी कह रही हूँ. तुमने अपने दल सारी योजना में उन्हें भी शामिल कर लिया है जो हमारे यहाँ कुछ नहीं चुग पाए.

व्यंग्य : गलत बात. हम डस्टबिन में भी सम्भावनाएँ देख लेते हैं. हमें तो तीन बुजुर्गों में भी संभावना के तीव्र लक्षण दिखाई दे रहे हैं.

कविता : वो कैसे?

व्यंग्य : अरे बहन, उनसे ही तो हमारे सम्मान की संभावना बनती है.

कविता : फिर तो तुम वाकई मुख्य धारा में हो. तुम्हें बहने से यह बहन भी नहीं बचा सकती.

फालोअर

भूमिका : कैसी हो बहन?

समीक्षा : बस तुम्हारे झाँसे में आ गई.

भूमिका : कैसे?

समीक्षा : हमने सोचा कि जब तुमने लेखक को अद्वितीय कह दिया है तो मैंने भी अद्भुत कह दिया.

भूमिका : फिर इसमें दिक्कत क्या है ?

समीक्षा : दिक्कत ये है कि जिस लेखक की किताब को अद्भुत कहा है, वही अब मेरी निष्ठा संदिग्ध मान रहा है.

भूमिका : ठीक तो है. साहित्य में संदिग्ध बने रहने में ही भलाई है. सभी विकल्प खुले रहते हैं. इसलिए मैंने भूमिका के साथ डिस्क्लेमर लगा दिया था कि इसकी वैधता लिखने के दिन तक ही है. छपने के बाद मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है.

समीक्षा : यानी हमारे बचने का कोई रास्ता नहीं है?

भूमिका : ऐसा करो तुम अपनी बात पर डटे रहो. बस सबको बता दो कि ‘अद्भुत’ में श्लेष अलंकार का प्रयोग किया था. बात रह जाएगी.

समीक्षा : शुक्रिया. इसीलिए मैं आपकी फॉलोअर हूँ.

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सम्पर्कः जे 3/78 , पहली मंजिल,

खिड़की एक्सटेंशन, मालवीय नगर,

नई दिल्ली-110017

मो. 9818010808

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