रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : व्यंग्य / स्मार्ट / कमलेश पांडेय

मैं ट्रेन के डिब्बे में खिड़की की तरफ की एक अकेली सीट पर एक किताब के साथ मौन-यात्रा कर रहा था. आसपास बैठे यात्रियों के मोबाइल फोनों से केंचुए से पतले-पतले काले तार निकल कर उनके कानों में घुसे हुये थे. एक बच्चा बार-बार अपने बाप से उसका फोन झटक लेता था. वह जैसे ही उस-पर किसी खेल में मशगूल होने लगता, फोन की घंटी बज जाती और फोन उसके हाथ से छिन जाता. बच्चे की खीझ और गुस्से पर एक उचटती सी नजर डाल कर मैं पन्ने पलट लेता. ये लोग भी कभी-कभी मुझे इस भाव से देखते मानों रेल में एक मोटी किताब पढ़ता आदमी इस युग में किसी दुर्लभ प्रजाति का जीव हो.

[ads-post]

तभी गाड़ी स्टेशन पर रुकी और दरवाजे से दो भारी सूटकेस, कंधे पर एयर बैग, कुछ और ताम-झाम और माथे पर ढेर सारी शिकन लादे एक यात्री घुसा. उसके पीछे खुद को बड़ी नजाकत से संभाले, उंगलियों में पूरी नफासत से एक नाजुक-सा पर्स थामे एक महिला भी अंदर आई. स्थिति के इस चित्रण से दोनों के आपसी रिश्ते की बाबत आपके मन में भी कोई संशय नहीं उठेगा कि दोनों पति-पत्नी ही थे.

अपने बर्थ की खोज, पति ने सारा सामान लादे-लादे ही की. मिल जाने पर सामान को इधर-उधर जमा कर पति के बोझ-मुक्त होने तक पत्नी अनुगामिनी ही बनी रही. पर सीट पर जमते ही उसने मोर्चा संभाल लिया.

‘‘तुम ढंग से सामान भी नहीं रख पाते कभी. इस बैग को जरा कोने तक खींचो. हां, अब जंजीर को हैंडल से होकर जाने दो. अरे! ताला ठीक से बंद नहीं हुआ, क्या करते हो! मेरे भैया तो हमारे बैठने से पहले ही ये सब काम समेट देते थे. ये लो! एयर बैग का स्ट्रैप खुल गया. अब लाद कर चलना इसे सर पर. मैं हमेशा कहती रहती हूं.’’

मैंने किताब रख दी और उस आत्मविश्वास से तमतमाते चेहरे के मुख नामक छिद्र से बहते लावे को देखने लगा. ये किसी ज्वालामुखी का विस्फोट नहीं था; बल्कि अंदर ही अंदर सुलगते रहने से लगातार रिसते लावे जैसा मामला था. विस्फोट की स्थिति में क्या होता होगा, इसकी कल्पना करने की जरूरत मुझे नहीं थी, न ही उसके पति को, जिसे इसका अनुभव तो अक्सर साक्षात ही होता रहता होगा.

घंटे भर में उसने पूरे डिब्बे को अपने पति के मार्फत ये सूचना दे दी कि वो कान्वेंट में पढ़ी, एक मॉडर्न सोसायटी में पली-बढ़ी, फलां इंस्टीट्यूट की एक ‘स्मार्ट’ ग्रैजुएट है. वो कोई ‘डिपेंडेंट’ नहीं, बल्कि समाज में सभी पुरुष नारियों से कंधे से कंधा मिला कर चलने में यकीन रखने वाली एक प्रोग्रैसिव स्त्री है. बगैर किसी संदर्भ के उसने पति को लगभग धमकाते हुये ये भी सूचित किया कि घर तो वो संभालती ही है, बाहर भी सबकुछ संभाल सकती है. मैंने उसके प्रवचन से खुद को प्रभावित होता महसूस किया. डिब्बे में इस प्रवचन का लाभ उठा पानेवाली अन्य नारियों की आंखों में एक साथ प्रशंसा, आतंक, जलन और हताशा के भाव झलके. गाड़ी ने पटरी बदली तो मानों पटरियों से तालियों की गड़गड़ाहट गूंजी कि लो! ये है आज की स्वतंत्र, आत्मविश्वास से भरी, शिक्षित और सक्षम स्त्री.

बहरहाल कुछ चीजें खरीद कर लाने के इरादे से एक स्टेशन पर उसका पति नीचे उतरा तो उसी दौरान एक काले कोट ने उससे टिकट दिखाने को कहा. वह पूरे इत्मीनान से अपने हसबैंड के पास टिकट होने का आश्वासन देकर खिड़की से बाहर देखने लगी. इस बीच गाड़ी चल दी और उसके गति पकड़ने तक भी पतिदेव नमूदार नहीं हुये तो टीटी ने फिर टिकट दरियाफ्त की. मुझे लगा कि उसके चेहरे से आत्मविश्वास काफूर हो गया है और उसकी जगह घबराहट आ बैठी है. अब तो रुआंसापन उतर आया है. टीटी दुबारा चक्कर लगाने और तब तक टिकट जरूर दिखा पाने की हालत में होने को कहकर चला गया. अब वो अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही अपने पति की तलाश में जुट गई यानी उसका नंबर मोबाइल से बार-बार डायल करने लगी. बदहवासी आंखों की कोर से टपकने को ही थी कि पतिदेव कई खाद्य-पेय के थैले लटकाये हाजिर हो गये. चेहरे ने एक रंग और बदला और कुछ-कुछ लावे के विस्फोट की उस स्थिति तक जा पहुंचा जिसकी कल्पना से मैं ऊपर कन्नी काट गया था. अभ्यस्त कानों से सब झेल कर आखिर पति ने भविष्य में ऐसी नादानी न दुहराने का वादा किया, हालांकि मैं सोचने लगा कि प्लेटफार्म पर उतरे बगैर वह भजिया-चिप्स-कोल्ड ड्रिंक कैसे ला पायेगा और न लाने की हालत में कौन से वादे करने पर मजबूर होगा.

शाम ढली. बाहर अंधेरा उतरते-उतरते आस-पास में मौजूद तीन-चार महिलाओं की वह सहज आदर्श बन गई. बात-चीत के इस दौर में समाज में स्त्री के आगे बढ़ते कदमों पर चर्चा हुई. पता चला कि शहरों में शिक्षा के आलोक ने स्त्रियों का मार्ग प्रशस्त कर उन्हें अपने कदमों पर खड़ा कर दिया है. अब वे किसी की मोहताज नहीं रहीं और कैसे भी हालात से जूझ सकती हैं. इस बात पर सख्त अफसोस जाहिर किया गया कि गांव-कस्बों में स्त्रियां अब भी हीनता की शिकार हैं और उन्हें यानि डिब्बे में बैठी चार-पांच नारी-रत्नों को अपने आत्म-विश्वास और हिम्मत का कुछ हिस्सा उन बेचारी स्त्रियों में भी बांटना चाहिये.

बत्तियां बुझा दी गईं. सब सो गये. रात गई, बात गई.

सुबह जोरदार झांय-झांय की आवाज से आंख खुली तो मैंने अपनी बर्थ के इर्द-गिर्द भिंडी, लौकी और तुरई बिखरा पाया. पैंतीस के करीब वय की एक औरत दो खाकीधारियों से उलझी हुई थी. कसा हुआ सांवला जिस्म, जिसपर पसीने की बूंदों के कसीदे और कमर से कस कर लिपटी मटमैली साड़ी. निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’ सरीखी. तीखे नाक-नक्श, पान से रंगे होंठ-दांत और भूरे उलझे बाल. उसने एक सिपाही का हाथ उमेठ कर उसे बेबस कर रखा था और दूसरे हाथ से दूसरे सिपाही को परे धकेल रही थी. लगे हाथों अपनी रोजी-रोटी को ट्रेन के फर्श पर यों गिरा कर रौंदने वालों को वो अपनी जुबान से नंगा कर रही थी.

बात इतनी सी थी कि वह पिछले बीस सालों से सुबह की इस गाड़ी से राजधानी की सब्जी-मंडी तक रोज जा रही है और इन दिनों इसके दो रुपये ‘फिक्स’ हैं तो आज ये चार क्यों मांग रहा है. पुलिसवालों को जिस्म-फरोशों की जमात में शामिल करते और उनकी मां-बहनों को भी इस बहस में घसीटते हुये उसने ऐलान किया कि अपनी रोजी पर इस तरह लात मारने वाले इन ‘भिखमंगों’ की सात-पुश्तों में तो वो अकेली ही भुस भर देगी. दोनों सिपाहियों को भागने का रास्ता तक नहीं दे रही थी वो. आखिर एक औरत के हाथों इस सार्वजनिक धुलाई के बाद किसी तरह हाथ छुड़ा कर दोनों रेंगती गाड़ी से कूद भागे.

मैंने बिखरी सब्जियों को बटोरने में उस ‘स्मार्ट’ स्त्री की मदद करते हुये रात की उन स्त्री-विमर्शकारों के चेहरों को कनखियों से परखा जो पूरी घटना के दौरान महज तमाशबीन बने रहने के बाद अब सन्नाटे में दिख रही थीं और न जाने क्या बुदबुदा रही थीं.

ई-मेल रू kamleshpande@gmail.com

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget