रविवार, 28 मई 2017

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : दो व्यंग्य रचनाएं / हरि जोशी

गड्ढे में गिर जा

नघोर बरसात हो रही थी. स्कूल गाँव के बीचों बीच था. सभी बच्चे फिर भी मन मारकर स्कूल जा रहे थे. नंदू की तबीयत स्कूल जाने की नहीं हो रही थी. एक दो बच्चे जो स्कूल जाने की तैयारी से आये थे, वे छतरी सिर पर लगाये नंदू की दालान में खड़े हुए अपने मित्र की प्रतीक्षा कर रहे थे. नंदू ने अपने मित्रों से उस समस्या का हल पूछा कि वह कौन सी विधि है जिसे अपनाकर स्कूल जाना बच सकता है? यह भी कहा कि माता पिता तो मान नहीं रहे हैं. वे जिद पर अड़े हैं कि “नंदू तुझे स्कूल तो जाना पड़ेगा.”

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गोलू ने सुझाया, “अपना गणवेश पहन, बस्ता लेकर घर के बाहर निकल आ, मैं तुझे कोई ऐसा रास्ता बता दूंगा, जिसकी सहायता से तुझे स्कूल तक भी न जाना पड़ेगा, बल्कि जो रास्ता मैं तुझे दिखाऊंगा, उसपर चलकर तू सीधे ही अपने घर पहुँच जायेगा. तेरे घर वाले तक तेरी सेवा सुश्रूषा करेंगे और स्वयं ही कह देंगे की अब क्या करेगा स्कूल जाकर? घर के पास में ही सड़क पर एक गड्ढा है. धीरे से उसमें गिर जाना. थोड़ी देर बाद कीचड़ सनी ड्रेस में ही घर पहुंच जाना. स्कूल जाने के लिए तेरे पास एक ही तो यूनिफॉर्म है, जब वही गन्दा हो जायेगा तो तू स्कूल कैसे जा पायेगा? चाहेगा तो तेरी सेवा भी हो सकती है. यह भी कह देना तुझे पाँव में चोट लग गयी है.”

2.                  

वह हिंदुस्तान में खेल करते करते थक गए थे. यहाँ रहकर सब जगह सफलता पाई.बड़े बड़े काम किये पर एक भी जगह नहीं फंसे. सभी जगह साफ साफ बचते चले गए. ऐसी दिन दूनी रात चौगुनी सफलता ने उनकी मंशा में पंख लगा दिए थे. अब उनकी इच्छा अमेरिका में ऐसे ही खेल सफलता पूर्वक खेलने की थी. जब यहाँ रहकर कोई उनका हाथ नहीं पकड़ पाया तो वहां क्या पकड़ लेगा? वह डॉक्टर की डिग्री गले में टांगे हुए थे. अच्छे अच्छों का इलाज करने में माहिर!

अमेरिका में अगर कोई मौलिकता है तो वह इसी बात में है कि कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा को सर्वव्यापक बनाने में सबसे आगे है. भारतवर्ष में खा गया है “ईश्वरः सर्व व्यापको अस्ति” “अमेरिका में कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा” ईश्वर की तरह सर्व व्यापक है.

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मुंबई में कौए

शायद मुंबई के कौओं को भी वह गुजराती कहावत समझ में आती है कि इस शहर में रोटलो तो मिले पर ओटलो नीं. अर्थात यहाँ खाने को तो सस्ता मिल जाता है पर सिर छुपाने को जगह नहीं मिलती, इसीलिये बहुत बड़ी संख्या में वे यहाँ आ बसे हैं. उन्हें ओटला चाहिए भी नहीं, किसी भी झाड़ की शाख पर वे सो सकते हैं. रोटला तो मछली और चिकेन की कृपा से मिल ही जाता है. कहा जाता है कि देश भर के किसी एक शहर में कौओं की सर्वाधिक संख्या का आंकलन किया जाए तो मुंबई शीर्ष पर होगी. और कौए ही क्यों दो पांव वाला आदमी भी यहाँ देश में सबसे बड़ी संख्या में है.

मुंबई में कौए और दिल्ली में सांड़ प्रचुर मात्रा में हैं. एक वर्ग आसमान को पकड़े हुए है तो दूसरा धरती को. दिल्ली में धरती पकड़ लोगों की भरमार है तो मुंबई में फिल्मी सपनों को साकार करते हुए आसमान पकड़ लोगों की. बिना कुछ पकड़े हुए व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता. कोई भगवान को थामे हुए है तो कोई सम्पत्ति को. कोई पद को पकड़े हुए है तो कोई प्रतिष्ठा को. हर कोई किसी न किसी को पकड़े हुए है. किसी को पकड़कर चलने से आदमी गिरता नहीं है.

ऐड़ाते ऊंट पहाड़ चढ़ते हैं

एक कहावत है कि ऐड़ाते ऊंट पहाड़ चढ़ते हैं या ऊंट ऐड़ाते रहते हैं, गाड़ी चलती रहती है. इसका अर्थ यही है कि असंतोष बना रहता है और जीवन आगे बढ़ता रहता है. इन्सान की हसरतों की कोई इन्तहा नहीं, दो गज जमी भी चाहिए दो गज कफ़न के बाद.

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