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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : लघुकथाएँ

बड़ा कौन?

अतुल मोहन प्रसाद

‘मां! अब मैं बच्चा नहीं रहा. तुमने मुझे सृजित किया. आज मैं बड़ा हो गया हूं. मेरी अब अपनी पहचान बन गयी है. अब कोई यह नहीं कहता है कि मैं अमुक का बेटा हूं।’ संसद ने गर्व से सीना तान कर कहा.

‘बेटा! मैंने तुम्हारा सृजन नहीं किया. सृजन करने वाला तो कोई और रहा है. हां, मैंने तुम्हें जन्म दिया है. तुम्हें योग्य बनाया. अब तुम्हारी पहचान बन गयी है. इस पहचान को बनाए रखने के लिए अपनी अस्मिता के साथ खिलवाड़ मत करो. मां, मां होती है और बेटा, बेटा. मां की दृष्टि में बेटा कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए बेटा ही रहता है, मां नहीं हो सकता.’ जनता मां ने दो टूक शब्दों में जवाब दिया.

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सुहाग की निशानी

अतुल मोहन प्रसाद

‘माँ! मैं बैंक की परीक्षा में पास हो गई हूं.’ ‘बहुत खुशी की बात है बेटे! तुम्हारी पढ़ाई पर किया गया खर्च सार्थक हो गया. गांव में कॉलेज रहने का यही तो लाभ है. लड़कियां बी.ए. तक पढ़ जाती हैं.’ मां खुशी का इजहार करती हुई बोली.

‘इंटरव्यू लगभग तीन माह बाद होगा. बैंक की शर्त के अनुसार कम्प्यूटर कोर्स करना आवश्यक है.’

‘तो कर लो.’

‘शहर जाकर करना होगा. उसमें पांच हजार के करीब खर्च है.’ उदास होती हुई बेटी बोली.

‘कोई बात नहीं.’ मां अपने चेहरे पर आई चिंता की रेखाओं को हटाती हुईं बोली- ‘मैं व्यवस्था कर दूंगी.’

‘कैसे करोगी मां?’ बेटी विधवा मां की विवशता को समझती थी. ‘अभी मंगलसूत्र है न? किस दिन काम आएगा.’

‘नहीं मां! वह तो तुम्हारे सुहाग यानी पिताजी की निशानी है. तुम उसे हमारे लिए...’

‘तुम भी तो उसी सुहाग की निशानी हो, उसी पिता की निशानी हो. इस सजीव निशानी को बनाने के लिए उस निर्जीव निशानी को गंवाना भी पड़े तो कोई गम नहीं.’ कहती हुई मां के कदम आलमारी में रखे मंगलसूत्र की ओर बढ़ गए.

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लुटेरे

अतुल मोहन प्रसाद

तिहास के दो छात्र भारत पर हुए आक्रमण एवं लुटेरों के विषय पर अत्यंत ही तार्किक ढंग से बात कर रहे थे- ‘अति प्राचीन काल से अनेक आक्रमणकारी यहाँ आए. कुछ भारत विजय की इच्छा लेकर आए तो कुछ लूट-पाट की नीयत से. अनेक बहादुरी की डींग मारते आए और रोते-पीटते वापस गए. भारत के वैभव की कहानियां उन्हें भारत आने के लिए आकर्षित करती रहीं. शक, हूण, मंगोल तो यहीं रच-बस गए.’ पहले छात्र ने बात को प्रारंभ किया.

‘किन्तु भारत पर सबसे पहला आक्रमण कोई पुरुष न होकर महिला थी- मिस्र की महारानी सैरेमिस.’ दूसरे छात्र ने प्रथम आक्रमणकारी का खुलासा करते कहा.

‘उसके बाद नाम आता है- यूनान के बच्छूस एवं डायनोसियस का. यूनान के बाद ईरान के डेरियस प्रथम.’ पहले छात्र ने आक्रमणकारियों का क्रम देते हुए कहा- ‘इसके बाद आते हैं- कासिम, गजनवी, गोरी, चंगेज खां, कुतबुद्दीन, तैमूर, कंग, सिकंदर लोदी, इब्राहीम लोदी, बाबर, अंग्रेज...रुक क्यों गए? ये लोग बाहर से आए और भारत की
धन-सम्पदा को लूटकर अपने देश ले गए. किन्तु आज अपना देश विपरीत परिस्थिति के लुटेरों को झेल रहा है. ये लोग यहीं के हैं और यहां के धन सम्पत्ति को लूटकर बाहर के देशों में जमा करते हैं. जानते हो ये लुटेरे कौन हैं?’

‘बड़ा ही विषम सवाल खड़ा कर दिया भाई. इस पर तो हमारी संसद भी मौन है.’

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मोह

अतुल मोहन प्रसाद

क आतंकी को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी. फांसी की तिथि निश्चित हो गई थी.

‘मेरी साजिश या करतूत के कारण ढाई सौ से
अधिक जान चली गयी. मुझे इसका कभी अफसोस नहीं रहा. किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं हुई. मोह तो छूकर भी नहीं गया. किन्तु अभी न जाने क्या हुआ है? एक जान जाने की बात सुनकर तकलीफ चरम सीमा पर पहुंच जाती है. ऐसा क्यों हो रहा है?’ उसने अपने आपसे सवाल किया.

‘क्योंकि वह सारी जान दूसरों की थीं. अब अपनी बारी है. सबकी जान उतनी ही प्यारी होती है, जितना अभी अपनी लगती है.’ स्वयं ही उसने उत्तर दिया.

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