रविवार, 28 मई 2017

प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : व्यंग्य / ‘चुनाव के बाद होली’ / अरविन्द तिवारी

चुनाव और होली, दोनों एक जैसे त्यौहार है. दोनों ही राष्ट्रीय जीवन में उल्लास भरकर जनता में हलचल पैदा करते हैं. चुनाव चाहे आम हों या फिर यूपी-पंजाब के खास, पूरे देश को झकझोर कर रख देते हैं. किसी को ‘माया’ और ‘राम’ दोनों मिल, जाते हैं, किसी को न माया मिलती न राम!

आम गरीब को न चुनावों से फ़र्क़ पड़ता है न होली से. दोनों त्यौहारों पर कानून व्यवस्था बनानी पड़ती है. दोनों में दंगा होने की संभावना बनी रहती है. पश्चिमी यूपी बेहद संवेदनशील है, चुनाव और होली दोनों के लिहाज से. ब्रज की लट्ठमार होली में ‘हुरियारिन’ अपनी नाजुक कलाइयों से पुरुषों को लट्ठ मारती हैं, और पुरुष हँसते हुए पिटते रहते हैं. जो सबसे ज्यादा पिटता है, उसे बाकी के पुरुष ईर्ष्या से देखते हैं. यों तो रस्ते चलते छेड़-छाड़ करने वाले पर जब नारी की चप्पल बजती है, तो कई मजनुओं को भी ईर्ष्या होती है! चुनाव में मतदाता छोटे से बटन को दबाकर नेताओं को बुरी तरह पीटता है! कई नेता तो बटन कम दबाए जाने के कारण राजनीति से ही संन्यास ले लेते हैं. अपनी पेटी और बटन संभालो, हम तो ये चले! अब नहीं देखेंगे सियासत की ओर.

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होली के मज़ाक को लोग भूल जाते हैं, मगर चुनाव में किए गए मज़ाक से पूरा देश प्रभावित होता है. अगले चुनाव तक दुश्मनी कायम रहती है. होली हर वर्ष आती है, चुनावों का कोई भरोसा नहीं कब आ जायें, इसलिए कीचड़ कागज, कपड़ों पर छिड़कने को स्याही आदि का स्टॉक हमेशा रखना पड़ता है. चुनाव में इतने भद्दे मजाक होते हैं कि पशु भी घबराकर कपड़े पहनने लगते हैं! नेता मतदाता से, पुलिस कानून व्यवस्था से, पत्रकार पत्रकारिता से, विधायक व्यवस्थापिका से ऐसे अश्लील मज़ाक करते हैं कि आम आदमी कान और आँखें बन्द कर लेता है.

होली जब खेली जाती है, तब कोई ख़ास मज़ा नहीं आता, लेकिन चुनाव जब खेले जाते हैं तो जमकर आनंद आता है. मामला आर-पार का होता है. इधर तमंचा चला, उधर सामने वाली पार्टी का सबसे कमजोर कार्यकर्ता ढेर! इधर रायफल चली, उधर लाशें बिछीं! इस पार्टी के पोस्टर जले, उस पार्टी की गाड़ी. न तू अगाड़ी, न हम पिछाड़ी. बड़े नेताओं पर आँच नहीं आती. चुनाव के बाद ऐसे कुछ नेता रायफलें फेंककर गले मिलते दिखाई देते हैं. भाड़ में जाये मरने वाला, और भाड़ में जाये वोट देने वाला! एकाध प्रत्याशी ऐसा भी होता है जो चुनावी सहानुभूति के लिए अपने भाई को ही मरवा देता है! कोई अपने बाप को ही घर बैठा देता है. बाप तसल्ली कर लेता है, औलाद औरंगजेब नहीं है! चुनावी होली में, होलिका जिन्दा रह जाती है- प्रहलाद जल जाता है! अबकी बार होली है या दीवाली या रक्षाबंधन, पता ही नहीं चल रहा. ‘रेनकोट’ बरसात में पहने जाते हैं मगर इधर होली में भी रंगों से बचने के लिए पहने जा रहे हैं.

हमारे देश की विशेषता है, बात जब ‘हवा’ में होती है तब संसद से लेकर सड़क तक हंगामा होता है. वास्तविक घटनाओं को दफ़ना दिया जाता है. ‘स्कैम’ का एब्रीविएशन अभी तक तय नहीं हो पाया. अब ‘स्कैम’ का मतलब घोटाला नहीं रहा. इतनी जल्दी भाषा में परिवर्तन, भारत के अलावा और किसी देश में नहीं होता.

जो लोग ‘दबंग’ नेता पर रंग डालने से बचते थे, वे नेताजी को कीचड़ में घसीट रहे हैं. दरअसल इस बार वह दबंग नेता हार गया है. हार-जीत होली को प्रभावित करती है. चुनाव के बाद नेताओं का होली खेलना सामान्य बात नहीं है. हारा हुआ नेता तो घर से निकलता ही नहीं. होली के अवसर पर विपक्ष सरकार से इस्तीफा मांगता है. यह होली पर की जाने वाली सबसे प्रचलित ठिठोली है! विपक्ष को बस इस्तीफा मांगना है, जिसे सरकार को देना नहीं है. सबकुछ हवा में. वैसे फागुनी हवा बेहद ख़तरनाक होती है, ऊपर से चुनाव हो तो यह हवा ही तूफान की शक्ल अख्तियार कर लेती है. कोई भी सरकार ‘होली पैकेज’ नहीं देती, क्योंकि तब रंग और कालिख का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ ही होगा!


सम्पर्कः रोडवेज डिपो के पीछे,

मेहरा कॉलोनी, शिकोहाबाद-283135

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