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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : व्यंग्य / चप्पा चप्पा चरखा चले / कैलाश मंडलेकर

जैसे कि हर शहर में होता है, मेरे शहर में भी एक खादी भंडार है. मैं रोज वहां से निकलता हूँ. दफ्तर जाने का रास्ता उधर से ही है. वर्षों से खादी भंडार के काउंटर पर एक आदमी को बैठे देख रहा हूँ. वह पुराने मरफी रेडियो पर विविधभारती के फरमाइशी नगमे सुनता रहता है. कभी-कभी रेडियो सुनते हुए सो भी जाता है. लम्बे समय तक दुकान पर ग्राहक न आये तो दुकानदार को नींद आना स्वाभाविक है. इसमें कुछ भी गलत नहीं है. बल्कि खादी भंडार में सोना एक तरह की राष्ट्रभक्ति ही है. ऐसा गांधीवादी कहते हैं. खादी भंडार वाले सज्जन ने भी बताया कि यहाँ नींद बहुत अच्छी आती है. बहरहाल राष्ट्रप्रेम को व्यक्त करने के अपने-अपने तरीके हैं.

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कुछ लोग जो पुराने गांधीवादी हैं और गांधीवाद को कस के पकड़े हुए हैं, उनकी मान्यता है कि साल में एक बार खादी भंडार जरूर जाना चाहिए. पुण्य का काम है. वे हर साल जाते हैं और गृह उद्योग में बनी अगरबत्ती खरीद कर घर लौट आते हैं. उन्हें लगता है कि वे देश की अर्थ व्यवस्था और कुटीर उद्योग को एक साथ सुदृढ़ कर रहे हैं. जब भी अर्थ व्यवस्था पटरी से उतरती है वे खादी भण्डार जाकर अगरबत्ती खरीद लेते हैं. उन्होंने अर्थ व्यवस्था को अगरबत्ती से जोड़ रखा है. कुछ ऐसे भी हैं जो खादी का कुरता खरीदने खादी भंडार जाते हैं, और उसे सिर्फ उस वक्त पहनते हैं जब किसी को श्रद्धांजलि देना हो. वे बताते हैं कि खादी का कुरता पहनकर श्रद्धांजलि देने से मृतक की आत्मा सीधे परमात्मा से मिल जाती है. इस संदर्भ में दीनानाथ जी का मामला अलग है. वे भी खादी भण्डार जाते हैं. उन्होंने बताया कि वहां खादी चाहे जैसी भी मिले पर शहद असली मिलता है. आजकल बाजार में इतना मिलावटी शहद आ रहा है कि असली नकली की पहचान ही नहीं रही. यही कारण है कि वे खादी भण्डार जाकर आँख मूंदकर शहद खरीद लेते हैं. उल्लेखनीय है कि आँख वे खुद की ही मूंदते हैं, खादी भंडार वाले की नहीं! क्योंकि उसकी आँख तो पहले से ही मुंदी रहती है. शहद के बारे में इन दिनों लोगों की अलग-अलग मान्यताएं हैं. कुछ लोगों का कहना है कि जब तक शहद की बोतल में चार छः मारी हुई मधु मक्खियाँ न दिखाई दें, तब तक वह असली शहद नहीं हो सकता. आजकल बिना मारकाट के असलियत की पहचान नहीं होती. फुटपाथ पर यदि लाशें नहीं दिखाई पड़े तो सरकारों को यकीन ही नहीं होता कि लोग ठण्ड से भी मर सकते हैं. खैर.

अभी जब खादी ग्रामोद्योग के कैलेण्डर पर प्रधानमंत्री की तस्वीर छपी तो वर्षों से उपेक्षित खादी भंडारों की तरफ लोगों का ध्यान गया, और देश के बुद्धिजीवियों को बहस का मुद्दा मिल गया. कहावत है कि जब सूत और कपास दोनों नहीं हो और फिर भी जुलाहों में लट्ठम लठ्ठा होने लगे तो यह बुद्धिवादियों के लिए आनंद के क्षण होते हैं. उन्होंने कैलेण्डर को राष्ट्रीय बहस की दीवार पर टांग दिया. एक विद्वान् ने कहा कि देश में परिवर्तन की लहर चल रही है और बहुत कुछ बदल रहा है. ये ‘मेक इन इण्डिया’ का दौर है, इसलिए खादी भंडारों को भी बदलना पड़ेगा. अब खादी को गांधी जी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. माना कि उन्होंने चरखा चलाया था, लेकिन जाकिट नहीं पहनी थी. जाकिट पहनकर चरखा चलाने से यह सन्देश जाता है कि इस खादी से जाकिट बनायी जा सकती है और सही जाकिट बन जाए तो आदमी प्रधान मंत्री भी बन सकता है.

अब खादी ग्रामोद्योग वाले सजग हो गए हैं. खादी जैसी भी बने, पर कैलेण्डर अच्छा छपना चाहिए. उससे बिक्री बढ़ती है. बिक्री अच्छी होगी तो आत्मनिर्भरता बढ़ेगी. गांधी जी ने खादी से ज्यादा आत्मनिर्भरता पर बल दिया था. यह बात खादी ग्रामोद्योग वाले समझ चुके हैं आप लोग भी समझ जाएँ तो अच्छा है.

सम्पर्कः 38, जसवाड़ी रोड,

बैंक ऑफ इण्डिया के पीछे,

खंडवा-450001 (म.प्र.)

मोबाइलः 9425085085

ई-मेलः kailash.mandlekar@gmail.com

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