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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : व्यंग्य / कहाँ है टोबा टेक सिंह? / निर्मल गुप्त

ह कद में नाटा और शरीर से स्थूल है. वह फिजिकली छोटा मोटा है. उसे यकीन है कि वह लेखक कद्दावर है. एक दिन वह ऊँचे दरख्त पर कुल्हाड़ी लेकर जा बैठा और उसी डाल को काटने लगा जिस पर बैठा हुआ था. एक राहगीर ने पूछ लिया- ‘‘अरे भाई यह क्या करते हो?’’ उसने प्रश्नकर्ता की ओर हिकारत से देखा. उसी तरह देखा जैसे महान लेखक अमूमन पाठक की तरफ देखते हैं. कहा- ‘‘दिखता नहीं क्या? मैं पूर्वजों के पदचिह्नों पर चलता हुआ यहाँ तक पहुंचा हूँ.’’

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‘‘आप आखिर करना क्या चाह रहे हैं?’’ जिज्ञासु राहगीर असल में राहगीर नहीं सुबह-सवेरे टहलने वाला है. उसने जिरह जारी रखी. मार्निंग वॉकर स्वभावतः दार्शनिक टाइप के होते हैं. वह बात में से बात निकालते जाते हैं और संवाद का सिरा कभी गुम नहीं होने देते.

‘‘आपके पास कैमरा है?’’ ऊपर से आवाज आई जो दरअसल सवाल की शक्ल में थी. “आपके पास माइक है?’’ दूसरा सवाल भी पेड़ से नीचे उतरा.

राहगीर अचकचाया. उसने अपने बचाव के लिए जेब से मोबाइल निकाल लिया. पहले जिस तरह संकट प्रकट होने पर आम आदमी लाठी डंडा या पत्थर उठाता था, अब मोबाइल उठा लेता है.

‘‘मैं समझ गया. आप फेसबुक वाले हैं.’’ पेड़ से इस बार अनुमान नमूदार हुआ.

‘‘नहीं. मैं ब्लागर हूँ. क्या अपने पर्सनल ब्लॉग के लिए तस्वीर ले सकता हूँ?’’ उसके इस सवाल में सोशल मीडिया वाली जल्दबाजी है. राहगीर कम मार्निंग वॉकर कम ब्लॉगर ने गुलेल की तरह मोबाइल पेड़ वाले की और ताना और पूछा, ‘‘आपका नाम?’’ पेड़ से कोई जवाब नहीं आया. उसने अपना सवाल बुलंद आवाज में फिर दोहराया. ऊपर वाला चुप रहा. जब तीसरी बार यही सवाल फिर आया तो पेड़ की कोटर में बैठे उल्लू ने आंखें मिचमिचाते हुए बाहर झाँका और बतायाः ‘‘वह अपनी निजी जानकारी अजनबियों से शेयर नहीं करता.’’

‘‘क्या आप उनके प्रवक्ता हैं?’’ जमीन से उठा सवाल कोटर तक गया.

‘‘प्रवक्ता नहीं उनका वेल विशर. जब से आदमी आदमी की जान का दुश्मन बना है, तब से हम उसके शुभचिंतक बन गये हैं.’’ उल्लू ने बताया और फट से कोटर का दरवाजा बंद कर लिया.

राहगीर ने हुम्म किया और बड़बड़ाता हुआ अपने रास्ते चल दिया. उसने ब्लॉग पर सारा वाकया लिखा. पेड़ पर टंगे ‘छोटे-मोटे’ की तस्वीर चस्पा की. उसे फेसबुक और ट्विटर पर शेयर किया. पोस्ट वायरल हो गयी. कुछ ही देर में पेड़ के नीचे मीडिया का जमघट लग गया.

पेड़ पर बैठे आदमी ने कुल्हाड़ी को बगल की डाल पर अटका दिया. जेब से कंघा निकाल कर बाल संवारे. कमीज का कॉलर दुरुस्त किया.

‘‘आपका नाम?’’ नीचे से पहला सवाल आया.

“सिर्फ काम की बात करें.’’ ऊपर से सुझाव मिला.

“आप वहां क्यों टंगे हैं?’’ किसी ने पूछा.

“इस असहिष्णु और क्रूर समय में लेखक यहीं सुरक्षित रह सकता है.’’ जवाब मिला.

“कैसे कैसे?’’ अनेक प्रश्न एक साथ आये.

‘‘पेड़ शरण देने से पहले मजहब नहीं पूछता. इसकी कोटर में रहने वाले उल्लू उदार हैं. मेरी पर्सनल फ्रीडम की कद्र करते हैं.’’ ब्रेकिंग न्यूज...ब्रेकिंग न्यूज, पेड़ के नीचे चीख पुकार शुरू हुई ‘‘आपका नाम क्या है सर?’’ नीचे से ससम्मान गुहार हुई.” मेरा नाम है बिशन सिंह वल्द सआदत हसन मंटो. मजहब जेड़ा नाम मुहब्बत.

‘‘आप पेड़ पर बैठ कर क्या रहे हैं?’’ सवाल में हैरानी थी.

‘‘मैं अपना पिंड टोबा टेक सिंह ढूंढ़ रहा हूँ?’’ आपको पता हो तो बताएं?’’ आवाज में नमी थी जिसे सबने महसूस किया.

‘‘आप आखिर कहना या करना क्या चाहते हैं?’’ मीडिया वालों ने पूछा.

‘‘औपड़ दि गड़ गड़ अनैक्स दि बेध्यानां दि तुर दि दाल आफ दि बीफ ते कलबुर्गी ते अकादमी अवार्ड.’’ पेड़ की डाल पर बैठे आदमी ने तल्ख स्वर में कहा और कुल्हाड़ी से फिर वही डाल काटने लगा जिस पर वह बैठा था.

मेरा नाम बिशन सिंह...नहीं...कबीर है...नहीं नहीं...कालिदास है. वह बुदबुदाता रहा. मीडिया वाले उसके डाल से गिरने या उतरने का इंतजार किये बिना आगे बढ़ लिये.

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