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प्राची-अप्रैल 2017–हास्य-व्यंग्य विशेषांक : समीक्षा बुन्देलखण्ड के ग्रामीण पाल समाज का विमर्श है ‘बाड़ा’ / राजेन्द्र कुमार

यूँ तो लखनलाल पाल की कहानियाँ सुपरिचित पत्र-पत्रिकाओं में दिखाई देती रही हैं, लेकिन अब हाल ही में उनका पहला उपन्यास ‘बाड़ा’ प्रकाशित हुआ है, जिसकी पृष्ठभूमि भी उनकी कहानियों की तरह ग्रामीण ही है. बुन्देलखण्ड के एक पिछड़े गाँव सिटैलिया की भीतरी कहानी है, जहाँ आज भी पाल समाज में लड़के का रिश्ता तय करना एक टेढ़ी खीर है. तमाम आशंकाओं व दुविधाओं में पड़ा पाल समाज परम्पराओं और रूढ़ियों में इस तरह जकड़ा है कि उनसे उबरना नहीं चाहता, बल्कि जरा से मनमुटाव के कारण गुटबाजी करके आपस में एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिये पैंतरेबाजी में अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहा है. थोड़ी सी असन्तुष्टि या अनादर पर बिरादरी से बाहर कर देने का षड्यन्त्र मुखिया के माध्यम से चलता रहता है.

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समाज का मुखिया भदोले दाऊ है, जो पुरानी परम्पराओं का पोषक तो है ही और वाक्पटु भी है. दूर-दूर तक बिरादरी की पंचायतें निबटाता है. उसके बिना समाज में पत्ता नहीं हिल सकता. बिरादरी से बन्द किये जाने का अधिकार उसके पास है, जिसे वह एक अस्त्र की तरह प्रयोग करता है. सामाजिक बहिष्कार को लोग घोर मानहानि के रूप में लेते हैं और डरते हैं. इसी दम पर समाज के उसकी सत्ता कायम है. रामकेश ‘माड़साब’ जैसे प्रगतिशील युवा ऐसे हथियार को भोथरा कर देना चाहते हैं. इन्हीं टकराहटों से उठी चिंगारियाँ ही अनेक रोचक प्रसंगों व अन्तर्कथाओं को जन्म देती हैं.

कहानी के केन्द्र में पण्डिताइन चाची का एक बाड़ा है, जिसे वह बेचना चाहती है. बाड़ा पाल समाज के घरों से लगा होने से उनमें खरीदने की होड़ लग जाती है तो चाची भाव बढ़ा देती है, जिससे आपसी मनमुटाव हो जाते हैं और गुटबाजी शुरू हो जाती है. शोषण और पीड़ा का खेल शुरू हो जाता है. अन्य वर्ग के लोग फायदा उठाने को सक्रिय हो उठते हैं. अनेक रोचक मोड़ आते चले जाते हैं.

जब गाँव है तो चुनाव है, राजनीति है, जातिवाद है, आर्थिक व शारीरिक शोषण है, भ्रष्टाचार है, आपसी झगड़े हैं, बेरोजगारी है, सूखा है, अकाल है. अन्य पिछड़े वर्ग की दबंगी है. सरपंच के चुनाव में जातिवाद का बोलबाला है. चन्दू जब हिरिया भौजी को चुनाव में खड़ा करता है तो उसकी जीत पर लोग मूँछ मुड़ाने का ऐलान कर देते हैं. गाँव में अनेक जातियाँ हैं. ब्राह्मणों में सम्मान की भूख है और जमींदारी की ठसक-भसक उनके खून में है. दलितों से बेगार करवाते हैं. फसलों की बुआई, कटाई उन्हीं के जिम्मे रहती है. विरोध करने पर लोगों के सामने मूड़-थपड़ी कर देते हैं. दलितों की नज़र ब्राह्मण के पैरों से ऊपर कभी नहीं उठी. (पृष्ठ 19) गाँव में रोजगार न होने से लोग दूर ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करके घर चलाते हैं. शादी-विवाह के मामले पेचीदा एवं दुश्मनी निकालने के मौके बनते हैं. मान-मनौव्वल माँगते हैं. छोटे-मोटे कारणों से बिरादरी से बाहर कर दिया जाता है. सामूहिक दण्ड, भोज, भागवत कथा पर ही समाज में शामिल हो पाते हैं. सत्यनारायण की कथा शुद्धि का उपाय होता है, जो ब्राह्मणों द्वारा ही ग्रामीणों के मन में भर रखा है. उत्सव की तरह भोज जीमकर बिरादरी को सन्तुष्टि मिलती है. दूसरे का खूब खर्च होता है तो समझते हैं उसे खासा दण्ड मिल गया है.

गुन्दी और हरकू मिसिर की कथा है, जो दिमाग से उतर कर शरीर पर समाप्त होती है. गुन्दी का विवाह 15 वर्ष की उम्र में 48 के विधुर अजुद्धी से होता है, जो टीबी का मरीज है. गुन्दी से सभी मजाक करते हैं और उसके शरीर तक पहुँचना चाहते हैं. हरकू मिसिर की पत्नी का वर्षों पहले निधन हो चुका है. वह गुन्दी से स्त्रीसुख चाहते हैं, लेकिन ब्राह्मणत्व बचाकर. मिसिर का जीवन ब्याज पर निर्भर है. गुन्दी पति के इलाज के लिए हरकू मिसिर से पैसे लेने जाती है तो वह उसे बखरी से पकड़कर मड़ैया में ले जाते हैं. उपन्यासकार के अनुसार, ‘एकान्त में साम्यवाद स्थापित करते हैं.’ जब गुन्दी से पैसा वापस माँगते हैं तो वह स्पष्ट कहती है, ‘मिसुर तुम्हाई मसखरी की आदत न गयी!...वहीं भूसा वाली बखरी में तो नईं दे आईती?’...‘कब?’...‘उसी दिन, मड़इया के कोने में. ध्यान करो मिसुर’ गुन्दी मुस्कराई. मिसिर गुन्दी की कमर में हाथ डालकर बोला, ‘अधबीच में तो नहीं छोड़ जाओगी?’...‘गारण्टी नईं देत’...‘गारण्टी?’...‘रोज-रोज की भटा-लुँचई थोरी है.’

मिसिर के पुत्र ने जब उन्हें घर से निकाला तो कहा, ‘पण्डित के घर में जन्म लेने पर ऐसे करोगे तो नरक में जाओगे.’...मिसिर बुदबुदाये, ‘जिसके पास लुगाई है, वो पण्डित है. लुगाई नहीं होती तब असलियत पता चलती कि आदमी पण्डित है या भंगी.’

गाँव में पानी की टंकी है, लेकिन पाइप लाइन टूटी है. इन्दिरा आवास बने हैं, लेकिन अधूरे और भ्रष्टाचार के नमूने भर हैं. राठ कस्बे के बाजार में बनियों द्वारा ग्रामीणों से ठगी के किस्से हैं.

लाली की सास और गुन्दो का प्रवाही वाक्युद्ध घोर अचम्भित करता है. ग्रामीण महिलाएँ झगड़ती हैं तो किस तरह जननांगों का उल्लेख करते हुए एक-दूसरे का चरित्रहनन करती हैं. किसी भी भद्दी गाली को रसमय तारतम्य से जुबान पर लाने में बिना हिचकती नहीं हैं.

बुन्देली कहावतों और मुहावरों के साथ कहीं-कहीं ठेठ बुन्देली संवादों के प्रयोग से उपन्यास में भीनी लोकगन्ध है, जिससे इसे आँचलिक उपन्यास कहा जा सकता है. पात्रों की संख्या अधिक होते हुये भी संवादों के चुटीलेपन व सटीक होने से पात्रों को याद रखा जा सकता है. मैत्रेयी पुष्पा के बुन्देलखण्ड की पृष्ठभूमि पर लिखे उपन्यासों को स्त्री विमर्श के रूप में देखा जाता है, पर लखनलाल पाल का यह उपन्यास बुन्देलखण्ड के पिछड़े वर्ग पाल बिरादरी के विमर्श के रूप में देखा जाना चाहिए. यह उनके संघर्ष, पीड़ा व कुण्ठा का ज्वलन्त रूप प्रस्तुत करता है. उनकी विसंगतियों को समेटे है तथा एक अनोखे परिवेश से साक्षात्कार कराता है. यह नायक-नायिका जैसे पात्रों नहीं बल्कि समूह का उपन्यास है.

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समीक्षक सम्पर्क : 282, राजीवनगर,

महावीरन, नगरा, झाँसी-284003

मोबाइल : 9455420727

समीक्षित कृति : बाड़ा (उपन्यास)

प्रकाशक : नीरज बुक सेण्टर, सी-32, आर्यनगर सोसायटी, प्लॉट-91, आई.पी. एक्सटेंशन, दिल्ली-110092

मूल्य : 450 रुपये, पृष्ठ संख्या-216

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