मंगलवार, 2 मई 2017

मुखौटों का जादुई संसार - सोनम सिकरवार एवं रेखा श्रीवास्तव

शोधार्थी- कु. सोनम सिकरवार

निर्देशिका- डॉ. रेखा श्रीवास्तव

सहायक प्रध्यापक

शास.म.ल.बा. कन्या महा. भोपाल

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मुखौटों का जादुई संसार

मुखौटा, मुखटा भतरा, भुरिया, यातुक

सम्पूर्ण विष्व में आदि काल से मुखोटे का प्रचलन रहा है। आज भी अनेक अवसरों पर कुछ जाति विषेष में मुखौटे का प्रयोग किया जाता है। आदिवासियों में मुखौटे के लिये मुखटा शब्द प्रचलित है। मुखौटे मुख का प्रतिरूप भी होते हैं मुखौटे का अर्थ जिससे मुख को ओट करे,। मुखौटे का प्रथम प्रयोग यातु मूलक रहा है जिसमें तंत्र मंत्र और जादुई प्रभाव की केन्द्रियता रही है। देवीलाल पाटीदार का मानना है कि किसी का भी चेहरा दो तरह का होता है एक-जो हम सबके सामने रखते हैं। दूसरा-वो जो हमारे भीतर होता है और विभिन्न भाव लिए रहता है। उन्होंने चित्रों में मानवों के मुख पर आने वाले हर भाव को प्रस्तुत करने का प्रयास किया हैं। जिसमें स्नेह, क्रोध, दुख, खुशी आदि शामिल हैं।

प्रागैतिहासिक काल से ही आदिमानव कला के माध्यम से अपनी भावाभिव्यक्ति करते आये हैं। पाषाण पर निर्मित भित्ति अलंकरण इसके प्रबल साक्ष्य हैं। इसी तरह आदिमानव जब विकास के पथ पर था तभी से उसने मुखौटें का रहस्य समझ लिया था इसलिए उसने अपने अनुष्ठान और कला में मुखौटों को स्थान दिया लगभग सभी संस्कृतियों में संचार के प्रयोजनों में किसी न किसी रूप में मुखौटे रचनात्मक अभिव्यक्ति प्रकट करते रहे हैं।

मुखौटों का प्रचलन लोक एवं आदिवासी समुदायों में भी विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों, नृत्यों, महामारियों बीमारियों, दुष्टात्माओं, विपदाओं से मुक्ति मनोरंजन इत्यादि के लिये आदिकाल से ही रहा है। यह कहा जा सकता है कि मुखौटों के माध्यम से आदिमानव ने''सौन्दर्यबोध और रचनात्मकता को कला प्रतिभाओं के माध्यम से अभिव्यक्तियाँ दी है, मुखौटों का उपयोग उत्सवों में नृत्यों के दौरान करने से लेकर नाटकीय प्रस्तुतियों में चरित्रों के निर्वहन में बखूबी होता है।''(1) संभवत मुखौटे आदिम युग से मनुष्य की कल्पनाशीलता एवं रचनात्मक का दोहन किया है। मनुष्यता के संबंध में भी शिकारियों के मुखौटों को शैलचित्र कला में देखकर आज भी अभिव्यक्ति से संबंधित सटीक अनुमान लगाये जा सकते हैं।

मुखौटों का प्रचलन न केवल भारत में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित होने के प्रमाण उपलब्ध होते हैं। जो अत्यधिक कल्पनाशील बहुआयामी, जादुई धार्मिक और वैविध्यपूर्ण होते हैं।

मुखौटों के प्रयोजन, निर्माण एवं उपयोग से संबंधित तथ्यों को समझने से पूर्व मुखौटों के अर्थ को समझना समीचीन होगा। मुखौटे का अर्थ ''मुख की ओट से कहा जाए वह मुखौटा कहलाता है।'' मुखौटा मुख का प्रतिरूप भी होता है। प्रतिरूप बदला भी जा सकता है मुखौटा मनुष्य के आंतरिक और बाह्य भाव विचार का दर्पण होता है। मुखौटा मुख का प्रतिबिम्ब भी होता है। चेहरे पर भाव और विचार के हजारो रंग और रूप देखे जा सकते है। फलस्वरूप मुखौटे भी हजारों तरह के हो सकते हैं। मुखौटे का प्रथम प्रयोग यातु मूलक है जिसमें तंत्र मंत्र और जादुई प्रभाव की केन्द्रियता रही है।

मुखौटा यानी मुख की ओट करे अर्थात चेहरे पर चढ़ाया गया नकली चेहरा आँख कान ओंठ नाक और शरीर के सभी अंगों के माध्यम से बनायी जाने वाली विविध भंगिमाओं के द्वारा एक अकल्पित व्यक्तित्व को धारण करना।(2) आदिवासियों में मुखौटे के लिये मुखटा शब्द प्रचलित है जो मूर्ति और मुखाकृति की अभिव्यंजना से साम्यता रखता है।

देवीलाल पाटीदार का मानना है कि किसी का भी चेहरा दो तरह का होता है एक-जो हम सबके सामने रखते हैं। दूसरा-वो जो हमारे भीतर होता है और विभिन्न भाव लिए रहता है। उन्होंने चित्रों में मानवों के मुख पर आने वाले हर भाव को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। जिसमें स्नेह, क्रोध, दुख, खुशी आदि शामिल हैं।(3) अधिकतर मुखौटे उपयोगकर्ताओं द्वारा स्वयं तैयार किये जाते हैं किन्तु भवाड़ा से सम्बधित मुखौटे सभी उपयोगकर्ताओं द्वारा नहीं बल्कि उनमें से ही कुछ विशेषज्ञों द्वारा बनाये जाते हैं और उनके लकड़ी के आकार बहुत बड़े होने के कारण इसमे लगने वाली लकड़ी सामुदायिक प्रयास से एकत्रित कर पहुँचायी जाती है। कलाकार का घर नाटकघर के वर्कशाप जैसा दृश्य उपस्थित करता है। जिसमें अनेक मुखौटे एक साथ बनने होते है जिन्हें दूर-दूर के गाँव के लोग आकर ले जाते हैं।

''सामान्यतः व्यक्ति के अंदर भी एक अदृश्य मुखौटा होता है एक तो वह जो वह दिखता है और एक वह जो वास्तव में होता है सामान्यतः व्यक्ति अपनी मुखाभिव्यक्ति को छुपाने के लिये मुखौटे का प्रयोग करते हैं जबकि कलाकार अपनी अनुभूतियों की बाह्य अभिव्यक्ति हेतु विभिन्न रूपाकारों में मुखौटे का निर्माण करता है। विभिन्न माध्यमों में निर्मित मुखौटों से व्यक्ति उसके वातावरण और यथार्थ की प्रस्तुति सशक्त तरीको से कर सकता है।''(4)

प्रागैतिहासिक काल के गुहा चित्रों में मुखौटे का अंकन इस बात के प्रमाण हे कि आदिम मानव मुखौटे का प्रयोग करना जानता था। मुखौटे के लिए पहला साधन पत्ता रहा होगा फिर मिट्टी के मुखौटे बने होंगे। विकास के साथ-साथ कपड़े लुगदी आदि के मुखौटों का निर्माण होता चला गया और वर्तमान में भी आदिवासी समुदाय मुखौटों का प्रयोग विभिन्न संस्कारों में करता आ रहा है।

वैश्विक परिदृश्य पर भी नजर डाले तो प्रत्येक देश के अपने अलग-अलग रंग एवं रूपाकारों के मुखौटों की परम्परा मिलती है मुखौटों की दुनिया ही अलग है जो मनुष्य को एक चमत्कारी रहस्यमयी माहौल में ले जाते है विश्व में कई देशों में मुखौटों की परम्परा विभिन्न संस्कारों में प्रचलित है जिसमें अलग-अलग माध्यमों में एवं रूपाकारों में निर्मित मनोहारी आकर्षक मनमोहक एवं यातुक मुखौटों के उदाहरण उपलब्ध है।

जिसमें अफ्रीका के आदिम मुखौटे विशाल आकार के होते हैं। पितरों के प्रतीक रूप में इनकी पूजा होती है। मिश्र के ममी मुखौटे विश्व भर में प्रसिद्ध है यहाँ के भित्ति चित्रों में भी देवताओं के मुखौटों का अंकन मिलता है।

यूरोप के अनेक स्थानों पर शव को मुखौटा लगाकर दफनाने की परम्परा रही है। कम्बोदिया में शव को व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुरूप सोने, चाँदी, पीतल या मिट्टी के मुखौटे पहनाकर दफन करने की प्रथा प्रचलित थी।

चीन में चानवंश के पीतल के मुखौटे मिलते हैं, जापान में नोह नाटक के तथा मलेशिया सिक्किम भूटान के लकड़ी के मुखौटे, कांगो में लकड़ी पर खरादे गये मुखौटे प्रसिद्ध है। श्रीलंका में भी भारत के अनेक प्रांतों के सदृश्य भूत-प्रेत भगाने के लिए, पशुओं को निरोगी रखने, रक्षा, आवासीय स्थल को दुष्टात्माओं से बचाने के लिए मुखौटे लगाये जाते हैं। तिब्वत मुखौटो के अद्वितीय संसार के लिये जाना जाता है।

एशिया के देशो में धार्मिक कर्मकाण्डों के अलावा नाटकों और नृत्यो में मुखाटों का उपयोग होता है भारत में कथकली, यक्षगान, छाऊ नृत्य और विभिन्न रामलीला शैलियों में मुखौटों का प्रयोग होता है। महाराष्ट्र, गुजरात और दादर नगर हवेली में रहने वाली कुछ जनजातियों के भवाड़ा नृत्य मुखौटे पहनकर करते हैं। मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ की जनजाजियाँ मुखौटों को विवाह और अन्य पर्वों पर उपयोग करती है।

कुछ गैर आदिवासी समाजों में मुखौटे का उपयोग धार्मिक न होकर नाटकों में चरित्र के प्रकार के अनुसार उसके चेहरे को एक भिन्न शक्ल देने के लिये ही किया जाता है। म.प्र. के आदिवासियों में नृत्य, नाट्य, उत्सव आदि अवसरों पर मुखौटे धारण करने की परम्परा रही है। माण्डला जिले के गोण्ड और सरगुजा के पण्डों, कॅवर और उराँव आदिवासी मुखौटों को विभिन्न रूप से प्रयोग में लेते है। बस्तर की भतरा जनजाति में भरता नाट में विभिन्न मुखौटों का चलन है जैसे गणेश, जामवन्त, हनुमान आदि। मुखौटों का बाह्य स्वरूप न केवल आदिवासियों को वरन दर्शकों को भी प्रभावित एवं आकर्षित करता है। (5)

मुखौटों ने म.प्र. के समकालीन कलाकारों को भी विषय बनाकर कृति निर्माण की ओर प्रेरित किया। ऐसे ही कलाकारो में देवीलाल पाटीदार का नाम भी जाना जाता है। जिन्होंने मुखोटे विषय पर अनेक कृतियों का निर्माण किया है। इस कार्य की प्रेरणा उन्हें बचपन से गाँव में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों से मिली जिसमें वे स्वयं गाँव में नृत्य, तीज, त्यौहारों आदि अवसरों पर होने वाले कार्यक्रमों में मुखौटे तैयार करते थे। वहीं से उन्हें इन विषयों को लेकर चित्र बनाने की असीम लालसा उठी थी जिसे उन्होंने कालान्तर में कार्य रूप में परिणित किया और इन्ही विषयों पर अनेक चित्रों की श्रृंखला तैयार की।

आज देवीलाल पाटीदार ने कला में अपना एक विशेष स्थान प्राप्त कर लिया है उनकी कला ने उन्हें भारत में ही नही विदेशों में भी सम्मान दिलाया है आज पाटीदार अपने गुणों के कारण काम में बहुत सिद्धहस्त हो चुके हैं।

किसी भी व्यक्ति को समझने में उन्हें वक्त नहीं लगता और जब वह अपना काम करते हैं तो जीवन के कई पहलुओं को अपने काम में शामिल करते हैं। पाटीदार उन सफल कलाकारों की श्रेणी में आते हैं जो अपनी मिट्टी से गहराई से जुड़े हैं।

 

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 सम्पूर्ण विष्व में आदि काल से मुखोटे का प्रचलन रहा है। आज भी अनेक अवसरों पर कुछ जाति विषेष में मुखौटे का प्रयोग किया जाता है। आदिवासियों में मुखौटे के लिये मुखटा शब्द प्रचलित है। मुखौटे मुख का प्रतिरूप भी होते हैं मुखौटे का अर्थ जिससे मुख को ओट करे,। मुखौटे का प्रथम प्रयोग यातु मूलक रहा है जिसमें तंत्र मंत्र और जादुई प्रभाव की केन्द्रियता रही है।

देवीलाल पाटीदार का मानना है कि किसी का भी चेहरा दो तरह का होता है एक-जो हम सबके सामने रखते हैं। दूसरा-वो जो हमारे भीतर होता है और विभिन्न भाव लिए रहता है। उन्होंने चित्रों में मानवों के मुख पर आने वाले हर भाव को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। जिसमें स्नेह, क्रोध, दुख, खुशी आदि शामिल हैं। वैश्विक परिदृश्य पर भी नजर डाले तो प्रत्येक देश के अपने अलग-अलग रंग एवं रूपाकारों के मुखौटों की परम्परा मिलती है मुखौटों की दुनिया ही अलग है जो मनुष्य को एक चमत्कारी रहस्यमयी माहौल में ले जाते हैं विश्व में कई देशों में मुखौटों की परम्परा आज भी विभिन्न संस्कारों में प्रचलित है जिसमें अलग-अलग माध्यमों में एवं विभिन्न पशुओं पक्षियों एवं काल्पनिक रूपाकारों में निर्मित मनोहारी आकर्षक मनमोहक एवं यातुक मुखौटों के उदाहरण उपलब्ध है।

मुखौटों ने म.प्र. के समकालीन कलाकारों को भी विषय बनाकर कृति निर्माण की ओर प्रेरित किया। ऐसे ही कलाकारो में देवीलाल पाटीदार का नाम भी जाना जाता है। जिन्होंने मुखोटे विषय पर अनेक कृतियों का निर्माण किया है। इस कार्य की प्रेरणा उन्हें बचपन से गाँव में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों से मिली जिसमें वे स्वयं गाँव में नृत्य, तीज, त्यौहारों आदि अवसरों पर होने वाले कार्यक्रमों में मुखौटे तैयार करते थे। वहीं से उन्हें इन विषयों को लेकर चित्र बनाने की असीम लालसा उठी थी जिसे उन्होंने कालान्तर में कार्य रूप में परिणित किया और इन्ही विषयों पर अनेक चित्रों की श्रृंखला तैयार की।

आज देवीलाल पाटीदार ने कला में अपना एक विशेष स्थान प्राप्त कर लिया है उनकी कला ने उन्हें भारत में ही नही विदेशों में भी सम्मान दिलाया है।

संदर्भ -

1. तिवारी कपिल संपादक, प्रतिरूप (म.प्र. के जनजातिय मुखौटे) प. पक्रिया

2. तिवारी कपिल संपादक, प्रतिरूप ''(म.प्र. के जनजातिय) मुखौटे

3. साक्षात्कार, पाटीदार देवीलाल भारत भवन 4 जुलाई 2014

4. ब्रोशर अन्तराष्ट्रीय मास्क प्रदर्शनी दिल्ली नव सिद्धार्थ आर्ठ ग्रुप दिनांक 2012

5. मुखौटा गैलरी, इंद्रगाँधी मानव संग्राहलय भोपाल में प्रदर्शित

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