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समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / तीसरी और अंतिम कड़ी / शेषनाथ प्रसाद

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                                       3 अगहन माह से जाड़े का आरंभ और पूस माह तक इसका प्रसार माना जाता है – “अगहन पूस हेमंत ही जान.” अगहन मे...

                                       3

अगहन माह से जाड़े का आरंभ और पूस माह तक इसका प्रसार माना जाता है – “अगहन पूस हेमंत ही जान.” अगहन में हल्की ठंढक पड़ने लगती है. छाँह में बैठने पर देह में कँपकँपी-सी लगने लगती है. लोग घरों से निकलकर धूप लोर्हने लगते हैं. औरतें गलियों में खाट खींच धूप-छाहीं में बैठ जाती हैं और स्वेटर आदि बुनने लगती हैं. कवयित्री ने अगहन के ऐसे ही एक क्षण का बहुत सुंदर चित्रण किया है-

भुइले बहुत मगन हैं। ....

गलियों में खाट खींचकर

औरतें धूप मुनने लगी हैं

पूरी यह धरती

उनकी ही काढ़ी हुई चादर—

ये देखो कैसे महीन बेल-बूटे.                (अगहन)

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घरों के पास के पेड़ों की झाँझर पत्तियों से छन कर धरती पर आते घूप के टुकड़े किसी चादर पर काढ़े गए बेल-बूटों की तरह दमक रहे है. इन औरतों के लिए एक साझा चूल्हा है. अगहन. ये एक साथ बैठी हैं, चूल्हे पर चढ़ी हुई है केतली, कुल्हड़ में चाय चल रही है. प्रत्येक का जीवन मानो सोंधा-सा कुल्हड़ हो गया है.

‘पूस‘ शीर्षक में लोगों को इस माह की ठिठुराती ठिठुरन कवयित्री की अपनी अनुभूत नहीं है, यह ठिठुरन प्रेमचंद “पूस की रात” कहानी के किसान की अनुभूत है और कोहरा तो चेखव की घोड़ागाड़ी में जुता हुआ है.

लोकप्रचलित कहावत है- “माघ फागुन शिशिर बखान”. माघ माह में जाड़ा उतरने लगता है. पेड़ों से पत्ते झड़ने शुरू हो जाते हैं. लोग कपड़ों के प्रति लापरवाह हो जाते हैं. पूस की अपेक्षा उनके शरीर पर कपड़े कम होने लगते हैं. फलतः ठिठुरन सताने लगती है. लोक में ठिठुरन से बचने के लिए बच्चे-बड़े हल्के कपडे पहनते हैं और जो अभाव में होते हैं वे घेंकुरी मारकर (घुटनों में माथा डाल) अपनी ठिठुरन भगाते हैं. कवयित्री का यह चित्रण देखें-

‘जाड़ा रइया

तोरा डरे घेंकुरी लगइया’

यह डर माघ के कड़क जाड़े का है. कवयित्री की दृष्टि में यह डर एक पवित्र घाव है. जिसमें सारा जहान घेंकुरी लगाया है. घाव में घेंकुरी ? माघ की ठिठुरन के डर में किसानों को जो अनुभूति होती है वह ‘घाव’ से व्यंजित नहीं होती.

फागुन महीने के लिए एक लोक व्यंजना है- “भर फागुन बुढ़ऊ देवर लागे, भर फागुन”. गाँवों में जो फगुआ गाया जाता है, यह उसका एक स्वर भी है. कवयित्री अपने ‘फागुन’ गीत को फगुआ-गान के इस टुकड़े से आरंभ करती हैं. वह अनुभव करती हैं कि मानो फागुन ही कटहली चंपा (एक सुगंधित फूल) के रूप में लोक-रगों में फूल रहा है. इस चंपा पुष्प की सुगंध सर्पों को इतनी पसंद है कि जहाँ यह फूल होता है वहाँ इसकी डालों से ये लिपटे रहते हैं. इसी लिए इस फूल का एक नाम नाग चंपा भी है. फागुन का महीना जब भी आता है लोग इन साँपों की तरह ही फागुनी भावों से लिपट जाते हैं. इस फागुनी रोमल संचार को यह प्रकृति भी खुला खेलती हैं-

बौरा गई है गिलहरी-

खीरी के पेड़ों पर बैठी गौरैया

एक पंख उठाए हुए

लेती है अँगड़ाई मीठी!

यह फागुन महीना ही ऐसा है कि बिना बात के ही उद्गारों के सोते फूट पड़ते हैं, आकाश की तरह साफ

मन से. फिर फागुन के रस से भरे कवयित्री के मन में एक विचार उड़ आता है चील-चाल से.-

एक विचार उड़ रहा है

चील-चाल से।

चील आकाश में उड़ती तो है मंद चाल से लेकिन उसका ध्यान अपने शिकार पर टिका रहता है. अवसर देखते ही वह शिकार पर झपट्टा मार उसे अपनी चोंच में दबोच लेती है. शिकार को बचने का भी अवसर नहीं मिलता. फागुन के महीने में भी कुछ लोक-चीलें मँडराती रहती हैं. कब झपट्टा मार दें कहा नहीं जा सकता.

फागुन के कुछ अनुभव कवयित्री ने ‘फागुनी बयार’ में दिया है. फागुन के महीने में कवयित्री किसी झील के एक किनारे बैठी हैं. अचानक कँपकँपी बढ़ाती फागुनी हवा उनसे टकराती है. उन्हें लगता है वह हहरकर (.यहाँ हहरकर विशेषण सटीक नहीं लगता) उनसे कहती है - देखो उस किनारे झील के पानी में पाँव डाले कोई बाँसुरी बजा रहा है. स्वर में कोई कोलाहल नहीं है. उसमें मंद समीरण की ध्वनि है जिसके प्रभाव में झील के पानी की सतह पर छोटी छोटी शांत बीचियाँ उभर-मिट रहीं हैं. मानो झील के कानों में गोरख (नाथपंथ के सद्गुरु) की बानी गूँज रही हो- हबकि न बोलिब, थपकि न चलिब, धीरे रखिब पाँव. लेकिन वह इसे आचरण में उतार नहीं पाती. वह अपने समंदरपन (सबकुछ हो रहने) से थक चुकी है. एक अगस्त्य प्यास (जो उसकी सारी बेचैनियों को पी जाए) की बाट जोहती उसकी लहरें उसी में डूब रही हैं. क्या गजब है, कहीं शांति की भी बाट जोही जाती है. यह तो अपने प्रयासो के प्रति जागरुक होने से बंचित रहने की चतुराई भी हो सकती है. नयी कविता के प्रयास कुछ ऐसे ही प्रतीत होते हैं.

प्रकृति की गति का क्रम भी बहुत अद्भुत और रोचक है. जेठ की गर्मी से राहत के लिए वह आषाढ़ माह में आकाश में बादलों के टुकड़े फैला देती है, कभी सूरज पर आवरण डाल देते हैं तो कभी चाँद को घेर कर बैठक करने लगते हैं. ये बादल सावन में आकाश में और उँचा उठ ढंढा होकर बारिश की झड़ी लगा देते हैं, भादो में उसे घटाटोप आच्छादित कर धारासार बरस जाते हैं. अगहन पूस में बारिशोपरांत जाड़ा तो आएगा ही क्योंकि पर्यावरण की हवा में जल-बूंदों की नमी धीरे धीरे ही जाएगी, इतना धीरे कि माघ फागुन में वातावरण को सम होने का अवसर मिल सके, प्रकृति अपने पुरानेपन को झाड़े और नए को उगने का अवसर दे.

चैत माह में इस नवांकुरण की गति ऐसी होती है कि प्रकृति का कोई भी अंग इससे अछूता नहीं रहता. खेत, बाग, जेल, जन सभी एक रंग (नया होने के) में रंग जाते हैं, मानो पूरे कुँए में ही भंग पड़ गई हो, कोई किसी की नहीं सुनता. इस धुन मे कुछ युवा जेल में कैदी हो गए हैं. कवयित्री के अनुसार बसंत ने गवाही दी होती अर्थात यह आकलन किया गया होता कि इनपर बसंतागम का प्रभाव है तो ऐसा नहीं होता. प्रकृति जानती है ये बेकसूर हैं. इसीलिए पीपल के टूसे के रूप में वह जेल की दीवार फोड़कर अंदर घुस गई है. पत्ते सिर हिलाकर उनके निरपराध होने की खबर दे रहे हैं. कोयल जन्मों से उनकी फरियाद में कुहुक रही है. हालाँकि कोयल इतनी चूजी नहीं होती. चूजी होना तो मनुष्य का स्वभाव है.

“चैत : एक अनंत-सा प्रसव” गीत में कवयित्री ने प्रकृति के प्रसव-रहस्य की ओर संकेत किया है. बसंत ऋतु में प्रकृति में जो भी हरियाली और नयापन दीख पड़ता है वह उसके नव-प्रसव का ही परिणाम है. प्रसव के पूर्व कारकों पर बसंत छा जाता है. कवयित्री पर भी यह बसंत छाया है. उनकी रातें नहीं कटतीं, उसी तरह जैसे हँसुए से पकठोसा कटहल नहीं कटता. अब यह उपमा बड़ी विचित्र है. पकठोसा कटहल के काटने में काटकर अलग करने का भाव है और रात के कटने में रात के बीतने का भाव है. इस कटने और बीतने में क्या साधर्म्य है. खैर, बसंती हवा बह रही है, फिजाँ में होली के जले सम्हत की गंध है. कल होली है शायद, वह लोगों को होली की शुभकामनाएँ देती हैं-

ह्वट्सएप पर छिड़क देती हूँ शुभकामनाएँ

जैसे कबूतरों को दाने।                                ( चैत : एक अनंत-सा प्रसव)

समय ही ऐसा है. अब शुभकामाएँ भी दी नहीं जातीं, छिड़क दी जाती हैं जैसे कबूतरों को दाने दिए जाते हों, वे कहीं पड़ें जिसे चुगना हो चुग ले, न चुगना हो न चुगे. फिर वह कुछ चित्रण में लग जाती हैं. इस समय आकाश चिनके हुए आईने की तरह है, उनके बच्चे अब बड़े हो गए हैं. उनका आँचल अब उनके लिए पूरा नहीं पड़ता. बोतल तिरछी कर पानी पीते, पसीना पोंछते कहीं भी सो जाते हैं. यह गजब का सिलसिला है-

सो जाते हैं फिर से गुड़ी मुड़ी होके।

है यह अजब सिलसिला।

घुटनों के बीच गाड़कर अपना पूरा वजूद

अपने ही गर्भ में गुड़प होना

और जन्म देना खुद को दोबारा हर रोज।      (चैत : एक अनंत-सा प्रसव)

घुटनों में अपना वजूद गाड़, जैसे वे गर्भस्थ हो रहे हों और फिर वहीं से एक नए वजूद का जन्म लेना, यह एक सिलसिला चल निकलता है वजूद के अनंत प्रसव का.

बैसाख, बसंत का उत्तर पक्ष. सूरज की तपन बढ़ने लगती है. सूरज की बढ़ती तपन के साथ जायसी की नागमती की विरह पीड़ा में भी तपन बढ़ती जाती थी. किंतु कवयित्री ने अपने इस ‘बैसाख’ कविता में एक ऐसा पात्र चुना है जिसे सूरज की तपन पसंद है. इस तपन से उन्हें प्रसन्नता होती है. वह है बैसाखनंदन अर्थात गधा या गधा जैसे स्वभाव वाले लोग जिनका काम ही है जीवन भर गठरी ढोना.

बैसाखनंदन ये

लादे गठरियाँ

लो फिर चले घाट पर-                   (बैसाख)

घाट पर याने जीवन के घाट पर. गठरी ढोते हुए भी उनके कान चौकस रहते हैं. वे हवा में तैरती कनबतियों को चौकस (कान उठाकर) होकर सुनते हैं. जमाने को देह की भूख (रसावेग) की आँखों से देखते दम साधे आगे बढ़ते जाते हैं-

भूख देह की आँख है।.....

रसावेग में इनकी

नस-नस फड़कती-सी है!

पर ये रसावेग साधे हुए

बढ़ रहे हैं घाट तक

मौन योगी-से। (बैसाख)

अपने एक ब्लॉगपोस्ट “शब्दों का सफर” में वाडनेरकर ने लिखा है कि बैसाख माह ही गधी का प्रसव काल है.

जेठ माह, गर्मी का पूर्व पक्ष है और आषाढ़ उत्तर पक्ष- “ग्रीषम जेठ आषाढ़ बखान.” जेठ माह में कड़ाके की धूप होती है. दिन में लू चलने लगती है. छाँह पाने के लिए लोग परीशान हो उठते हैं. जेठ की तपन को कवयित्री ने चार शीर्षकों में अनुभव किया है- ‘जेठ-1’, ‘जेठ की दुपहरिया’, जेठी ‘पूर्णिमा’ और ‘दुपहरिया जेठ की’. जेठी पूर्णिमा को छोड़ शेष तीन शीर्षकों में जेठ की दुपहरिया का ही चित्रण है.

लेकिन ‘जेठ-1’ की दुपहरी में वह झुलसाती तपन नहीं है जिसके लिए जेठ का महीना जाना जाता है. इसमें तो किसी बरगद की छाँव में खड़ी/बैठी कवयित्री को उस छाँव में बिछे धूप के टुकड़े ऐसे लगते हैं जैसे इस दुपहरिया ने धूल की चटाई पर फैंसी बिंदिया-चूड़ियाँ सजा दी हो एक मनिहारिन की तरह-

जेठ की यह दुपहरी

बरगद की छाँह-तले.....

बिंदिया-चूड़ियाँ फैंसी

सजा रही हों देखो-

धूल की चटाई पर

मनिहारिन-सी                              (जेठ-1)

उन्हें लगता है यह दुपहरी बरगद की चानी (शिखर) पर धूप की थाप दे रही है और हवा अपनी उँगलियों से उसकी जटाएँ सुलझा रही है. वह थोड़ी चिड़चिड़ी हो गई है कदाचित धूप की तपन से. इस हवा में आराम तो नहीं है पर जीव जीव का साथ कैसे छोड़े. थोड़ा ही आराम दे सके तो दे ले.

‘जेठ की दुपहरिया में’ गर्मी की सताती प्यास को बुझाने के लिए रखा प्याऊ का घड़ा / कंठ तक लबालब भरा घड़ा / थोड़ा-सा मता गया है , क्योंकि इसमें जेठ की धधकती हुई लू में / उड़ती हुई जब गदराए आमों की गंध प्रेम-पत्र की तरह आकर घुल गई है. जेठ की दुपहरी को झेलने के लिए कुछ उपाय तो प्रकृति स्वयं करती है और कुछ सहयोग जीव का भी होता है. दुपहरी की यह धूप कई तरह से सताती है. बाहर निकलो देह को जलाती है और घर के अंदर रहो तो पढ़ते पढ़ते विद्यार्थी पुस्तकों पर ही नींद में झूलते हुए लुढ़क जाते है.

जेठ के महीने में कभी कभी बड़े बड़े भयंकर बवंडर उठते हैं, जो एकाएक उत्पन्न होते हैं और जो भी उसकी चपेट में आ गया उसे चोटिल कर आगे बढ़ जाते हैं. ‘जेठी पूर्णिमा’ में कवयित्री ने एक ऐसे ही बवंडर का चित्र प्रस्तुत किया है. यह बवंडर उन्हें उस सनकी बाप की तरह लगा जो बच्चे को एकबारगी पीट देता है जिससे बच्चा बुरी तरह डर जता है, इस बवंडर की चोट से गड्ढों में फँसा पानी उस डरे बच्चे के हृदय-सा हकर हकर (पानी के छलकने की ध्वनि) करने लगता है. इस बच्चे के लिए जेठ-पूर्णिमा का चाँद ताबीज का काम देता है. ताबीज टोन टोटका के अलावे डर कम करने के लिए भी बाँधे जाते हैं. कवयित्री सोचती हैं कि यही बच्चा बडा होकर बडे बडे सपने देखेगा. देखेगा कि आकाश में एक बग्घी उड़ रही है जिसमें रेस के हारे हुए घोड़े जुते हुए हैं. पूर्णिमा का इकलौता चाँद उसे उस बग्घी का एक छिटका हुआ पहिया सा लगेगा. इन पंक्तियों में कवयित्री चुग के यथार्थ को अभिव्यक्त कर रही हैं. वह चिंतित हैं कि जो छिटके हुओं (जीवन से) के संताप को झेला होगा वही छिटके पहिए को बग्घी में लगा सकेगा. लेकिन समाज से छिटके हुओं को समाज से जोड़ने की कला क्या इन्हें आती है-

क्या तुमको आता है पहिया लगाना?

क्या तुमने झेले हैं संताप

छिटके हुओं के?                      (जेठी पूर्णमा)

किसी भी समाज की एक अपनी जमीन होती है. क्या किसी खास समाज-रचना का आग्रह लेकर उस जमीन से छिटकी इकाई उससे जोड़ी जा सकती है.

‘दुपहरिया जेठ की’ में जेठ की दुपहरी कवयित्री को उनके अपने बचपन में पढ़े जासूसी उपन्यास ‘ट्रेजर आइलैंड‘ की तरह लगती है-

आज तलक

लू के भभूखों से पटी पड़ी

दुपहरिया यह जेठ की

फड़फड़ाया करती है मेरे भीतर

जासूसी उपन्यास-सी।

अंत में थोड़े से शब्द अपने इस लेख के संबंध में—

अनामिका के इस गीत-गुच्छ की ओर मेरा ध्यान उनके एक सर्वथा नए प्रयास के लिए गया. इसके अध्ययन में मेरा ध्येय ‘बारामासा’ शीर्षक से दिए इस गीत-गुच्छ की पूर्ववर्ती बारहमासे से तुलना करना नहीं था. प्रसंगवश पूर्ववर्ती बारहमासे और इस बारामासे की केंद्रीयता दिखाने का प्रयास करना पड़ा. पूर्ववर्ती बारहमासा की अवधारणा से इस बारामासा ( मूलत: बारहमासा ही) की अवधारणा एकदम भिन्न है. यह मुझे षड्ऋतु वर्णन कोटि की रचना लगी. मेरे हिसाब से इसका शीर्षक ऋतु-विलास होना चाहिए था.

यह लेख समीक्षा नहीं है, अपितु एक सार-अध्ययन है. सार-अध्ययन इसलिए क्योंकि इसमें आज के परिप्रेक्ष्य के प्रतिबिम्ब आपको नहीं मिलेंगे. किंतु इसमें कविता-गुच्छ की कविताओं के मर्मों के उद्घाटन का पूरा प्रयास किया गया है. आम समीक्षाएँ जो देखने में आती हैं उनमें न तो विषय ही स्पष्ट हो पाता है न इसमें कविताओं के समझने का प्रयास दीख पड़ता है. इनमें समीक्षक कवि और कविता के मर्मोद्घाटन की अपेक्षा अपना ही उद्घाटन करते अधिक दीखते हैं.

इस लेख में किसी भी वादी समीक्षा के प्रति मेरा झुकाव नहीं है. इन वादी समीक्षाओं और आलोचनाओं ने हिंदी आनोचनाओं का बंटाढार ही किया है. हिंदी आलोचना का नया अस्तित्व गढ़ना अब आवश्यक हो गया है.

शेषनाथ प्र श्री

गोरखपुर

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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / तीसरी और अंतिम कड़ी / शेषनाथ प्रसाद
समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / तीसरी और अंतिम कड़ी / शेषनाथ प्रसाद
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