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गुरु रामदास की कृपा से बाँझ बनी तेजस्वी पुत्र की माँ / रमेशराज

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गुरु रामदास जी अपने विचारो से दृढ़, अद्भुत संगठनकर्ता और पारखी महापुरुष थे। वह छूआछूत, भेदभाव ऊंच-नीच, जाति-पांत में विश्वास नहीं रखते थे। गुरु रामदास ने ही अमृतसर की स्थापना की थी जो गुरुजी के समय में रामदास नगर कहलाता था। गुरुजी परमात्मा-स्वरूप थे। उन्होंने अनेक सरोवरों का निर्माण कराया। बावली बनवायी। गुरु जी के बताये रास्ते पर चलने वाले गुरु रामदास पवित्र आचरण की प्रतिभूर्ति थे।

एक बार फिरोजपुर के मालवे नामक गांव का एक जाट आदम जो पीर-फकीरों को बहुत मानता था, अपनी पुत्र-प्राप्ति की इच्छा को लेकर गुरु रामदास के चरणों में गिर गया। गुरुजी ने अपनी अंतर्दृष्टि से उस जाट की आन्तरिक पीड़ा को तुरंत पहचान लिया। उसे अपने चरणों से उठाकर गले लगाते हुए उन्होंने कहा-‘‘ गुरुनानकजी गद्दी की सेवा करते रहो, तुम्हारी हर इच्छा पूर्ण होगी।’’

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गुरु के चक की सेवा में वह जाट और उसकी पत्नी दिन-रात जुट गये। वे दोनों गुरु का ध्यान करते हुए रोज जंगल से सूखी लकड़ी इकट्ठी करते और लंगर में दे आते।

एक बार सर्दियों में भयंकर बरसात हुई। सूखी लड़की भी गीली हो गयीं। सिख-संगत की इस बढ़ती परेशानी को देख उस जाट ने अपने घर जमा समस्त सूखी लकडि़यां संगत में बांट दीं। सर्दी से ठिठुरते लोग सूखी लकड़ी पाकर अत्यंत प्रसन्न हुए। संगत ने जाट के इस कार्य की प्रशंसा जब गुरुजी से की तो गुरुजी उस जाट के प्रति अत्यंत प्रसन्न हुए। गुरुजी ने उससे कहा-‘‘तूने संगत को बहुत खुशी दी है अतः वाहे गुरु तेरी समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करेंगे। कल तू अपनी पत्नी के साथ यहां आना और अपना निवेदन गुरुनानक के चरणों में करना।

दूसरे दिन जाट अपनी पत्नी के साथ गुरु दरबार में आया। गुरुजी को नमन करने के बाद उसने और उसकी पत्नी ने गुरुजी से कहा-‘‘गुरुजी आप तो अन्तर्यामी है। आपको हम क्या बतायें कि हमें क्या कष्ट है।’’

यह सुनकर गुरु रामदास मन ही मन मुस्काये और बोले-‘‘तुम दोनों ने गुरु गद्दी की जो निष्काम सेवा की है, उससे हम अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम्हें गुरु-कृपा से केवल पुत्र ही नहीं, ऐसा प्रतापी पुत्र प्राप्त होगा जो आगे चलकर पूरे संसार में अपना नाम रोशन करेगा। अब अपने घर जाओ और सतनाम को स्मरण करो।

इस घटना के उपरांत जाट के घर एक पुत्र ने जन्म लिया। जाट आदम ने गुरुजी से पूछकर उसका नाम भगतू रखा। भगतू ने भक्ति ही नहीं, पराक्रम शौर्य के साथ अपना नाम जग विख्यात बनाया। कैथल के राजा लाल सिंह और ऊधम सिंह भगतू की संतान के रूप में आगे चलकर अत्यंत प्रकाशवान नक्षत्र बने, जिन्होंने महाकवि संतोष सिंह के मार्ग दर्शन में ‘नानक-प्रकाश’ नामक ग्रन्थ लिखवाया।

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