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कहानी – गछपकुआ आम / अविनाश कुमार झा

मदनलाल की कलाकृति


जतिन गाना  सुनते  सुनते यादों के  समन्दर  में  गोते  लगाने  लगा  था।


गांव  में खेत में जब मजदूर काम करते थे उसका " पनपिआई"(नाश्ता) लेकर खेत-बाद में जाता था। पनपिआई का स्वाद अद्भुत और गजब का होता था। मोटी मोटी रोटियां, प्याज-नमक-तेल- अचार का राई और कभी कभी थोड़ी सब्जी। लेकिन उसको खाने का मजा ही कुछ और था। वह अपने लिए भी पनपिआई रख लेते और खेत में जाकर " हरवाह" के साथ आरी-डरेर पर बैठकर खाते। इसमें अप्रतिम आनंद आता। आज भी उसके बारे में सोचकर ही मुंह में पानी आ जाता है।


एक बार गेहूं के खेत में पानी पटवाने "सरेह"(दूर का खेत) में गया था। लौटते वक्त शाम हो गई तो डर से अकेले इसलिए नहीं वापस आ रहा था कि रास्ते में पड़ने वाले एक सीम्मर गाछ पर भूत होने के किस्से सुनने को मिलता था। जब दो- तीन लोग वापस आने लगे तो साथ हो लिया।


शाम का धुंधलका हो चला था। सीम्मर गाछ से थोड़ी दूर पहले वे लोग थे तो दूर से कोई आता दिखा। थोड़ी देर में वह साया दो हो गया तो सबके कान खड़े हो गये। जो सबसे बुजुर्ग था ,उसकी हिम्मत भी जवाब देने लगी थी जब वहाँ तीन साया दिखने लगा। सबलोग आगे बढ़ रहे थे पर उनके पैर साथ नहीं दे रहा थे।

सभी बुरी डरने लगे थे। जब सायों की संख्या चार हो गई ,तब तो सभी की हिम्मत जवाब दे गई और वे पीछे की ओर चिल्लाते हुए भागना शुरू कर दिए। खेतों में पानी पटा होने के कारण कीचड़ था। कहाँ चप्पल गया, कहाँ बाल्टी, कहाँ कुदाल, पता नहीं?  पंपिंग सेट का इंजन इतना तेज बज रहा था कि उसके पास खड़े लोगों को उनकी आवाज सुनाई नहीं पड़ रही थी। जब वे गिरते पड़ते वहाँ पहुंचे तो वो लोग भी कहने लगे।

अरे। अच्छा किए नहीं गये। यह ब्रह्म पिशाच के निकलने का समय है।
हमलोग सोचे" जान बची तो लाखों पाये।" अब सब साथ में ही घर जायेंगे।
थोड़ी देर बाद वहाँ  बैठे ही थे तो दिखाई पड़ा कि कुछ दूर  आगे रजेसवा का पंपिंग सेट चल रहा था, उसकी मां, दोनों बहन और भाई, उसके लिए रात का खाना लेकर जा रहे हैं।

तब पता चला कि असल में जो दिखाई पड़े थे ,वो ये ही लोग थे। शाम के धुंधलके में एक सीध में आरी पर चलते होने के कारण पहला वाला ही शुरू में दिखाई दिया और जैसे जैसे वो लोग टेढ़े मेढ़े आरी पर चलते आये, अगल बगल दिखने लगे थे।


ये तो अच्छा हुआ कि भ्रम उसी समय खत्म हो गया, वरना जिंदगी भर ये सोचते रहते कि हमने भूत- पिशाच देखा था और बाल बाल बचे थे।


जतिन सोचने लगा कि रात में भ्रम भी ज्यादा होता है। कैसे एकबार जब वह काफी दिनों के बाद जब गांव गया था तो केले के लंबे चमकते पेड़ को भूत समझ लिया था । हवाओं के चलने से डोल रहे उसके पत्तों भूत के हाथों के समान उसे बुला रहे थे। रात भर वह दनान पर " गब्दी' मारे सोता रहा। सुबह किसी को कहता उससे पहले पता चला वो केला का पेड़ था।

आम के दिनों में गाछी पर से गिरे" गछपकुआ आम" खाने में काफी अच्छा लगता था। एक आम जहाँ टप्प से गिरता ,सभी बच्चे एक साथ उसे लूटने दौड़ जाते। आम को चोभ्भा मारकर खाने से स्वाद बढ़ जाता था। आम की" आंठी"(गुठली) चाटकर किसी पेड़ के खोखर में रखते और जोर से बोलते

" हे कोयली माता आम गिराओ"।

कभी कभी सच में कोयली माता बच्चों की सुन भी लेती थी।
जामुन खाकर रंग में रंगे जीभ को एक दूसरे को दिखाते तो कभी आइने में देखकर खुद ही खुश होते।


आम के दिनों में जब अंधड़ बयार चलता तो झोरा- बोरा लेकर" गुधनी"(आम का बगीचा) की ओर रात विरात भागते, अंधेरे में भी अपनी गाछी के नीचे पानी, डबरा, खत्ता, कीचड़ में आम और " टिकोला"(आम का बच्चा) हंसोरते। जाते वक्त तो उस सुनसान अंधेरी रातों में तो गाछी में चले जाते थे पर आते वक्त उसे बहुत डर लगता था।
जाने वक्त का जोश समाप्त हो जाने पर" जय हनुमान ज्ञान गुणसागर" और जय महरानी जी, जय बरहम बाबा के जाप करते घर लौटते। रास्ते भर इधर उधर नजर नहीं घुमाते कि कहीं कोई डायन, चुड़ैल, भूत- पिशाच या ब्रह्म पिशाच न दिखाई पड़ जाये।वापस घर पहुंच कर जान में जान आती थी।
अचानक  दरवाजे  पर  पड़ी  दस्तक  से  वह  चौंका।  तारतम्य  भंग  हो  चुका  था।  दरवाजा  खोला  तो    सामने  कशिश  खड़ी  थी।


" आज आफिस नहीं जाना है क्या?"


गांव का भूत तो वाकई में भ्रम था पर शहर का भूत भ्रम नहीं है। शहरी ब्रह्म पिशाच रोजाना आफिस में डराता है। काश। ये भी भ्रम होता। और " गछपकुआ आम " की तरह टप्प से किसी दिन गिर जाता। मजा आ जाता।

कहीं दूर एफ एम रेडियो  पर गीत गूंज रहा था " कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन"।प्यारे प्यारे दिन  वो मेरे प्यारे पल क्षिण"।

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