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व्यंग्य : लोकतंत्र का रक्षक : रेनसमवेयर वाईरस – अमित शर्मा


आजकल हैक करने का सीजन चल रहा है, हालाँकि कुछ लोग इसे दौड़ाने की भी कोशिश कर रहे है लेकिन इसके पीछे के विचार दिव्यांग होने के कारण यह दौड़ नहीं पा रहा है। हैकिंग करने लिए तकनीकी ज्ञान के साथ साथ विचारो की दिव्यांगता भी एक अनिवार्य शर्त है। दोनों एक दूसरे के पूरक है। अगर “आप” केवल वैचारिक दिव्यांगता के धनी है तो केवल हैकिंग का डेमो दिखाने तक सीमित रह जाएंगे और असल में हैकिंग “आप” पर भरोसा रखने वालों के विश्वास की हो जाएगी।

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सीमित सोच और क्षमता असीमित मूर्खताओं को जन्म देती है और आजकल इनकी डिलीवरी आसानी से मोहल्ला क्लिनिक में हो जाती है। हर इंसान अपनी लाइफ में हैकिंग में हाथ आजमाता है पर सफलता हर किसी के कदम नहीं चूम पाती है क्योंकि कभी कभी ज़्यादा मेहनत करने वालों के ज़ुराबों से बहुत बदबू आती है जिससे सफलता पास आने से कतराती है। मैंने भी दिलफेंक होने के नाते स्कूल-कॉलेज में कई लड़कियो का दिल हैक करने की कोशिश की थी लेकिन अपनी मदर के काफी स्ट्रीक्ट होने के चलते किसी भी लड़की के दिल का मदरबोर्ड बदल पाने में कामयाब नहीं हो पाया था और इस नाकामयाबी के बाद स्कूल-कॉलेज में गाया जाने वाला “हम होंगे कामयाब” ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा लगता था।


आमरस के सीजन में वायरस दांत खट्टे कर रहा है। सब रेन का इंतज़ार कर रहे है लेकिन रेनसमवेयर वाईरस डिजिटल इंडिया की छत में से टपकने के लिए “डगआउट” में तैयार बैठा है। सरकार चाहे तो अपने बचाव में कह सकती है की उसने न्यू-इंडिया के तहत टूरिज़्म को बढ़ावा और प्रोत्साहन देने के लिए रेनसमवेयर को “पधारो म्हारे देश” कहकर न्यौता दिया है। हम कैशलेस इकॉनमी की तरफ बढ़ रहे है तो अब लूटपाट भी कैशलेस ही होनी चाहिए ताकि हम डिजिटल समाजवाद स्थापित करने की दिशा में तेज़ी से बढ़ सके।


विशेषज्ञ रेनसमवेयर को बहुत खतरनाक बता रहे है, लगता है विशेषज्ञों का पाला अभी तक नेताओं से नहीं पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर ये वाइरस आपके कंप्यूटर, लैपटॉप या स्मार्ट फ़ोन में प्रवेश कर जाए तो सिस्टम पर आपका नियंत्रण पूरी तरह से चला जाता है, मुझे लगता है हमें इससे ज़्यादा डरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते गर्व से कह सकते हैं कि इतने सालों से मतदान करके हम “सिस्टम” पर अपना नियंत्रण खोते आ रहे हैं लेकिन कभी हमने इसकी शिकायत नहीं की।


विशेषज्ञ यह कहकर भी डरा रहे है की हैकर रेनसमवेयर वायरस से आपका सिस्टम हैक करने के बाद आपके डेटा डिलीट और लीक करने की धमकी देते हैं और इसके लिए पैसो की भी माँग करते हैं। मुझे लगता है ऐसी धमकियां तो सरकार और हम भारतीयों के कान पर जू भी नहीं रेंगा सकती हैं क्योंकि जब हम आतंकवादियों और नक्सलियों की धमकी से नहीं डरते तो हैकर्स की धमकियों से डरकर हम अपने डर का अवमूल्यन कैसे करवा सकते है। जहाँ तक डेटा का सवाल है जब डेटा अधिक हो जाए तो उसका नष्ट हो जाना ही समाज और देश हित में होता है क्योंकि ज़्यादा डेटा मतलब ज़्यादा जानकारी और ज़्यादा खुलासे जो की गोपनीयता को भंग करते है जो की लोकतंत्र के लिए खतरे से खाली नहीं है क्योंकि हमारा लोकतंत्र भी सत्ता पर काबिज़ होने वालों को पद और गोपनीयता की ही शपथ दिलाता है। गोपनीयता के प्रति सत्ताकेंद्रों के कमिटमेंट का आलम यह है की जब सूचनाएं फाइलों की गर्मी से उबल कर गोपनीयता की सीमा लांघकर पब्लिक -डोमेन में आना चाहती है तो मंत्रालय की फाइल्स में आग लगा दी जाती है। ऐसी अग्नि परीक्षा में तप कर ही गोपनीयता सोना बन सकती है जो अंततोगत्वा लोकतंत्र का ही ज़ेवर बनेगी।


इसलिए रेनसमवेयर वायरस को एक्सपर्ट्स भले ही खतरा बता रहे हो लेकिन ये लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ गोपनीयता को बनाये रखने में मददगार साबित होगा। आखिरकार डेटा बचे या ना बचे लोकतंत्र बचना ज़्यादा ज़रूरी है और रेनसमवेयर वायरस के बचाव के लिए कोई प्रभावी मैकेनिज्म ना होना लोकतंत्र की रक्षा के प्रति हमारी सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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