लघु व्यंग्य / विसंगति / शशिकांत सिंह 'शशि'

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

 image
विसंगति बेचारी, पगडंडी पकड़े व्यंग्यकारों की नजर से बचकर जा रही थी।
   एक लेखक जो दो खेतों के बीच बैठकर अपने को पूरी तरह सुरक्षित रखते हुये, व्यंग्य रच रहा था, उसकी नजर पड़ गई। उसने कड़कर पूछा-
-'' कहां जा रही है ? चल इधर आ, मैं तुम पर व्यंग्य लिखूंगा। तुमने सबकी नाक में दम कर रखा है।''
              विसंगति तुनककर बोली-
-'' नहीं मेरा अनुबंध चौबे जी के साथ है। वे आजकल मुझपर व्यंग्य लिख रहे हैं। ''

[ads-post]
   व्यंग्यकार चौंका। अच्छा, तो आजकल चौबे के पंख निकल आये हैं। जिस विसंगति पर मेरी नजर थी, उसी पर नजरें गड़ाये बैठा है। मैं भी देखता हूं बेटा तुम कैसे लिखते हो।
-'' तू तो भागी ही जा रही है। चौबे तेरे पीछे क्यों पड़ा है ? और, क्या-क्या कहता है ? बैठ तो सही दो घड़ी के लिए। ले ठंडा पानी पी। ''
   विसंगति चौंकी। व्यंग्यकार और विसंगति का प्रेम! भला कौन भरोसा करेगा ? उसने भी दुनिया देखी थी उसे पता था कि साथी लेखक को पछाड़ने के लिए जुझारू लेखक किसी भी हद तक जा सकता है। वह मेढ़ पर बैठती हुई बोली-
-'' उनका मानना है कि मुझे अखबारों के संपादक खूब पसंद करते हैं। मुझपर लिखे व्यंग्य ही छपते हैं। चौबे जी का साफ मानना है कि अखबार के संपादक जिस विसंगति को पकड़ने के लिए कहें उसे पकड़ना व्यंग्यकारों के लिए शुभ होता है। संपादक, साहित्यिक वैतरणी की गाय है उसकी पूंछ पकड़कर ही भव भय दूर होगा। पर, तुझे क्या हो गया ? तू तो पड़ोस वाली विसंगति के पीछे पड़ा था न ?''
-'' नहीं यार, अब उसमें कोई ग्लैमर ही नहीं बचा। उसपर लिखी रचनाएं अब कहीं छपती ही नहीं है। तू तो जानती है कि  बिना लिखे रचना छपती रहे इसे तो लेखक बर्दाश्त कर सकता है लेकिन बिना छपे लिखता रहे यह कदापि नहीं हो सकता। एक पेंच और है , राजधानी की एक संस्था है -' साहित्यिक दिव्यांग ,' वह प्रकाशित रचनाओं को तौल कर पुरस्कार देती है। प्रकाशित रचनाओं के वजन के हिसाब से पुरस्कार राशि तय की जाती है। पांच किलो प्रकाशित रचनाएं हैं तो पांच हजार की राशि मिलेगी। तू तो मुझे पहले से ही बहुत प्रिये है।  व्यंग्यकार और विसंगति का तो चोली-दामन का साथ होता है। मेरे पास पंद्रह किलो रचनाएं हो गई हैं यदि दस किलो और हो जायें तो पच्चीस हजार का जुगाड़ पक्का। तू साथ देगी न ?''
               तब से विसंगति असमंजस में बैठी  है कि किसका साथ दे ?

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736
मोबाइल-7387311701
इमेल- skantsingh28@gmail.com

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "लघु व्यंग्य / विसंगति / शशिकांत सिंह 'शशि'"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.