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समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / शेषनाथ प्रसाद


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अनामिका का ‘बारामासा’ आषाढ़ माह से शुरू होता है.

‘बारामासा’ शब्द हिंदी की हरियाणवी बोली का है. इसका अर्थ होता है बिरह गान. ‘बारामासा’ शैली की ऐसी कविताओं के लिए अधिक प्रचलित शब्द है ‘बारहमासा’, जो हिंदी की अन्य बोलियों में प्रयुक्त हुआ है. ‘बारहमासों’ में कवि किसी विरहिणी की मनोभूमि में प्रवेश कर उसकी विरहानुभूतियों को शब्द देते रहे है, प्रकृति उनकी विरहानुभूतियों के उद्दीपन के रूप में प्रयुक्त होती रही है उनकी जीवमसंगिनी बन कर. किंतु इस ‘बारामासा’ में कवयित्री ने किसी विरहानुभूतिशीला की मनोभूमि में न प्रवेश कर स्वयं अपने अनुभवों को शब्द दिया है. प्रकृति इसमें कवयित्री की न सहचरी है न उनके भावों को उद्दीप्त करती है. यह उनके निकट की भी नहीं लगती.

उन्होंने ग्रीष्म ऋतु के आषाढ़ के गिरते पारे में प्रकृति को कभी दूर से देखा, उसके आंगन में रबी की बालियों से पक कर छूट गिरे अन्न-कणों की खुशबुओं और मिट्टी की टटा रही जिह्वा पर आषाढ़ की पहली सिहरती हुई गिरती बूँदों के आस्वाद को अपनी गठरी में समेट लिया. जब वह ऋतु-यात्रा-लेखन में प्रवृत हुईं तो वह गठरी भी उनके साथ थी. उस गठरी में उक्त के अतिरिक्त और भी बहुत सारी निधियाँ उन्होंने भर रखी हैं, जिसमें उनका अधीत भी है, और भी जाने क्या-क्या हैं, यह उनको भी नहीं मालूम. यह गठरी उन्होंने ढीली ढाली बाँध रखी है. इसे लेकर वह काल की पीठ पर लद गई हैं. इस “जिसकी (काल की) पीठ पर लदी” वाक्य-खंड से कवयित्री ने कौन सा बिंब खडा किया है समझ से परे है. हम तो यही जानते हैं कि जीवन काल में प्रवहमान रहता है. और काल में ही सबकुछ होता है. उसे सब का पता होता है. महाभारत सीरियल में इसका बहुत ही सार्थक प्रयोग हुआ है. लेकिन कवयित्री तो कहती हैं उनकी गठरी से उनकी निधियाँ कैसे गिर गईं यह काल भी नहीं जानता.

आखिर यह गठरी है कैसी. मेरे जाने यह गठरी उनकी स्मृति की गठरी है, चुस्त नहीं ढीली ढाली बँधी, कदाचित लापरवाही से. स्मृति से जब निधियों के गिरने के क्रम मे (अर्थात् भूलने के क्रम में)      जतन से संभाला गया उनका ऋतु-विलास गिरने अर्थात भूलने को होता है तो उसे वह सायास पूरे स्मृतिपटल पर फैला लेती हैं. और इसी ऋतु-विलास को वह शब्दों की काया देती हैं. इस काया में वह अपने बारह महीनों की अनुभव-यात्रा के अंकन के लिए अपनी भावयित्री प्रतिभा के साथ प्रस्तुत होती हैं. लेकिन लगता है इसके लिए उनकी पूर्व तैयारी नहीं है. गठरी (स्मृति) में बँधी निधियाँ जल्दी  में बाँधी गई हैं. इसीलिए स्मृति की गठरी में ढीला-ढालापन है. इन निधियों के रखने में कोई तरतीब नहीं है अतः वह बेडौल है और कवयित्री उसके बेडौलपन का दुख झेल रही हैं. यह दुख नहीं, इसे कष्ट कहना चाहिए,  बारहो महीने के मौसम पर लिखी गई कविताओं से इस दुख या कष्ट का क्या सरोकार है, कुछ स्पष्ट नहीं होता.

‘बारामासा’ शीर्षक से प्रस्तुत इस कविता-गुच्छ की पहली कविता आषाढ़-1 पूरे बारामासे की भूमिका-सी है. इसकी सुष्ठु पंक्तियों से संकेत मिलता है कि इस बारामासे की भावसंपत्ति पूर्व के बारहमासों से अलग होगी. इसमें हृदयावेगों के स्थान पर बौद्धिक आवेग की प्रमुखता रहेगी. उन्होंने अपनी स्मृति की गठरी से गिरते ऋतु-विलास को संभाल कर उसे एक नए ढंग से अधुनातन शब्दों और बिंबों से सजाकर प्रस्तुत किया है-

                ये जो नसों का जंजाल

                पसरा पड़ा है मेरे भीतर-

                दीमकों की बाँबियों-सा सिहरता है,

                जग जाती है गुदगुदी इसमें

                अव्यक्त बूँदों से लदी हुई

                   ये जो हवा चलती है ऐसे

                   आषाढ़ में.                       (आषाढ़-2)

इन पंक्तियों में कवयित्री प्रकृति के साथ हैं. इसमें गीष्म ऋतु के उपरांत वर्षागमन के पद-चाप की आहट अव्यक्त बूँदों से लदी हुई/ ये जो हवा को उन्होंने सुंदर शब्द संयोजन के साथ एक मनोहारी बिंब रच कर प्रस्तुत करने की कोशिश की है. किंतु इसका आस्वाद लेने के लिए इस बिंब के एकाध शब्द पर आँखें जब ठहरती हैं तो उनके अर्थ को गुन कर आँखों में किरकिरी पैदा हो जाती है. पाठक इस बिंब के ‘जंजाल’ शब्द पर ध्यान दें. जंजाल का अर्थ होता है- प्रपंच, उलझन, किसी समस्या में फँसना. इससे मुहावरा भी बना है, “जी का जंजाल.” अब कवयित्री के भीतर नसों का जाल पसरा है या जंजाल? नसों से होकर ही हमारा जीवन रक्त-गति में समूचे शरीर में प्रवहमान है. और इन्हें वे जंजाल से लगते हैं. आर्द्र हवाओं के नम-स्पर्श से यह नसों का उनका जाल दीमकों की बाँबियों-सा सिहरता है. दीमकों की बाँबियाँ तो किसी गहरी चोट या किसी धमक से ही सिहरती हैं. तो क्या कवयित्री के भीतर पसरे नसों के जाल को ये हवाएँ चोट पहुँचाती हैं? किंतु चोट से गुदगुदी तो नहीं उभरती. फिर उनके फेफड़ों में हवा के ये बलबुले (?) डुब डुब करते हुए उन्हें उनके बचपन की याद दिला देते हैं, जब वह पपीते के फोंके से साबुन के बुलबुले उड़ाती थीं (यह तो किसी भी मौसम का खेल है). कभी वह किन्हीं बरसाती हवावों में शहर के मुहाने पर स्थित भुतही कोठी में चली गई थीं जहाँ उन्हें कुछ अधलिखे प्रेमपत्र मिले थे जो बारिस के झोंकों से सिहर सिहर जाते थे. बारिश की प्रबलता का यहाँ सुंदर चित्रण है. भुतही कोठी में उन्मत्त बरसाती झोंकों से—

                ...चरमराते थे दरवाजे

                तो ढनढनाने-सा लगता था

                      वह अधखुला-सा दराज-

                अपनी ही मेज से आधा बहिष्कृत

                तिरछा होकर अटका,

                आधा लटका यों ही

                       अधर में कहीं।

                कुछ अधलिखे प्रेमपत्र

                धरे हुए थे उसमें सदियों से।              (आषाढ़-2)

इस प्रेमपत्र के बहाने कवयित्री उन विरहिणियों के प्रति कहीं अपनी सहानुभूति तो नहीं प्रकट कर रहीं!

सावन भादो के महीने वर्षा ऋतु के लिए जाने जाते हैं. कवयित्री को सावन में सावन की पहली झड़ी से साक्षात होता है. वह बारिश में अपनी बच्ची के साथ छतरी लिए बाहर निकली हैं. हहाती हवा बह रही है. छतरी वश में नहीं आ रहीं. कंधे भींगने लगे हैं. हवा का बहाव इतना तीव्र है कि उनके, बच्ची के और बारिश के पाँव कहीं के कहीं पड़ रहे हैं (बारिश की धार कम-अधिक तिरछी हो जा रही है). उनके सामने ही फुटपाथ के पेड़ की डाली टूट गिरती है. वह पेड़ के दुख से दुखी होती है. पर कुछ बोलती नहीं, संसार के दैनिक व्यापार में सम्मिलित हो जाती हैं. सामने देखती हैं डाली की ओट लिए अंगीठियाँ सुगबुगा उठी हैं. भुट्टे सिंकने लगे हैं और सिंकने लगा है उनका अकेलापन.

                भुट्टों की लय में ही धीरे धीरे

                सिंकने लगा है

                ये मेरा अकेलापन

                एक मीठी आँच पर

                फिर से.                        (सावन की पहली झड़ी)

कवयित्री ने बारिश को जैसा देखा, महसूस किया. यहाँ उस पूरे दृश्य का अच्छा चित्रण हुआ है. ध्यान देने योग्य है, बारिश के मौसम में मीठी आँच पर भुट्टे को भुनता देख कवयित्री किसी मधुर स्मृति में खो जाती हैं. उनका अकेलापन उन्हें अखरने लगता है. यह नहीं पता चलता कि वह भीड़ में अकेली हैं या जीवन में. क्या उनकी मीठी आँच में सिंकने की स्मृति पूर्व के बारहमासों की विरहिणियों की विरहानुभूतियों से तुल्य हो सकती हैं. यह मैं अधिक समर्थ और सक्षम समीक्षकों पर छोड़ता हूँ.

भादो के महीने में वर्षा ऋतु का अनुभव उन्होंने तीन शीर्षकों में किया है- ‘’भादो की शाम’’, ‘भादो’ और ‘’खूँटी पर बरसाती : भादो की शाम’’. किसी विषय को टुकड़ों में बाँट कर देखना या अनुभव करना, यह आधुनिक प्रवृत्ति है. शायद इसीलिए किसी विषय या समस्या पर ऐसे लोगों की पकड़ नहीं बन पाती.

भादो में वर्षा का रूप प्रचंड हो जाता है. आकाश में बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं, घटाओं में काले मेघ ताबड़तोड़ दौड़ने लगते हैं, तीव्र गर्जन के साथ बिजलियों के तीर चलने लगते हैं, फिर घारासार बारिश से नदियाँ प्रचंड वेग से समुद्र की तरफ दौड़ पड़ती हैं. किसी अनुभूतिशील या अनुभूतिशीला को प्रकृति का यह रूप अनेक उद्दीपनों से भर दे सकता है किंतु भादो की एक शाम कवयित्री को कुछ और ही अनुभूत होता है-

                टूट पड़ा आसमान

                जिनकी मसें भी नहीं भींगी थीं

                वे भी टूट गिरे डाली से !

                उर्वारुकमिवबन्धनात....

                .........................

                वेसे आराम से नहीं, अफरा तफरी में

                वे छूटे उद्दंड झटके से

                एकदम खचाक!

                बीच सड़क टूट गिरे

                वे युवा शरीर--                           (भादो की शाम)

पूरी कविता में कवयित्री प्रकृति के साथ नहीं दिखतीं. ‘’टूट पड़ा आसमान’’ में वर्षा की प्रलयंकरता की ध्वनि तो है किंतु कविता के शीर्षक में भादो न रहे तो इस मुहाबरे का अर्थ विपत्ति का टूट पड़ना होगा. डाली से भी यहाँ वृक्ष की डाली का द्योतन नहीं होता. “जिसकी मसें भी नहीं भींगी” पंक्ति पर ध्यान देने पर ‘डाली’ से किसी अभिभावक की सूचना मिलती है, डाली से टूट गिरने वाले से भी उनके लाढ़ले–लाढ़िली का द्योतन होता है. उर्वारकमिवबंधनात अर्थात जिस प्रकार कँकड़ी या खरबूजा अपनी लत्तर से खुद छूट जाते हैं (यह कवयित्री का किया अर्थ है) वैसे ही वे युवा भी अपने अभिभावकों से छूट जाते हैं. यह उपमा सटीक नहीं लगती. टूटने और छूटने में क्या समान धर्म है. एक खुद अपनी डंठल से छूटता है और दूसरे वैसे आराम से नहीं, अफरा तफरी में एक उद्दंड झटके से एकदम खचाक  छूट जाते हैं और बीच सड़क टूट गिरते हैं. आगे की एक पंक्ति में टूटने का कारण बताया गया है-टूट पड़ी ऐसी तो बिजली. यह बिजली बारिश की बिजली नहीं है. इस बिजली के नाम लोगों ने गैंगरेप, रोज रेड, आदि रख लिया है. इस अप्राकृत कारणों से खिन्न होकर कवयित्री मानवीय अनुभूति में डूब जाती हैं.

‘भादो’ शीर्षक कविता में वह थोडी दार्शनिक हो गई हैं. “उस दिन” उनहोंने अपने को एक बीज में समो लिया. बीज को खाद पानी तो मिला पर खिलने के लिए आकाश का आमंत्रण चाहिए था, वह (ध्वन्यामंत्रण) उन्हें टिटिहरी से मिला. बीज में अंकुरण हुआ, फूल पत्ती आई पर विकास के लिए अनुकूल अवसर न पाकर रूखी पड़ी सृष्टि को दादुर से आर्द्र भावों का स्नेह मिला. यह दादुर भावार्द्रता की बूँदों में लिपटा शास्त्रीय गीतों के बोलों से (बारिश के मौसम में कहीं शास्त्रीय संगीत चल रहा होगा) निकल कर कवयित्री की पीढ़िया तक चला आया था. पीढ़िया अर्थात प्राणों के छोर तक. यहाँ वह अनुभूति मे डूबी लगती हैं. कदाचित इस कविता में वर्षा को वह जीवन के सूत्रण के ऱूप में देख रही हैं.

“खूँटी पर बरसाती : भादो की शाम” में वह घनघोर बारिश में घरों के मिटे नंबरों मे आह से अपना घर खोजती हैं. बारिश में भींगी बरसाती को अपना वजूद मानकर उसे घर के बाहर वाली खूँटी पर टाँग देती हैं और साड़ी का फेटा बाँध कर घर के काम में लग जाती हैं. बरसात में घर-गृहस्ती कैसे अस्त व्यस्त हो जती है इसका सुंदर चित्रण है.

आश्विन और कार्तिक शरद ऋतु का महीना है, वर्षा ऋतु के बादल अपनी प्रचंडता खोकर अब धुनी हुई रूई के समान आकाश में तैर रहे है. कवयित्री उनसे छनकर आ रही आसिन की पहलौंठी धूप का आनंद ले रही हैं. वह घर बैठे अनुमान लगा रही हैं कि ऐसे सुहाने मौसम में बंगाली टोले में शहनाइयाँ बज रहीं होंगी. उनके मन में एक व्यंग्य उभरता है. शादियों में दस द्वारों से मिट्टी खनकर लाई जाती है उनमें से एक द्वार वारांगनाओं का द्वार भी होता है. इस मिट्टी में होता है- बासी सिंगार  / बाराँगनाओं का . कवयित्री के शब्दों में ये ऐसी कलाकृतियाँ हैं जिन्हें दुनिया की सारी थकानें अँकवार लेती हैं.

“आसिन की दोपहरी” की धूप चटकीली और तीखी होती है. जूतों में तब्दील होने के पहले / चमड़े इसी धूप में सूखते हैं /इसी धूप में सूख कर /कद्दू कमंडल बनते हैं.

‘कातिक’ के महीने में कवयित्री को सोनपुर के मेले की स्मृति आती है. सोनपुर के मेले में ग्रमीण महिलाओं में गोदना गोदवाने की परंपरा होती है. उनमें से अपने हाथों पर, कोई अपने नाम का तो कोई अपने साईँ के नाम का गोदना गोदवाती हैं. उसका स्थान अब टैटू ने ले लिया है. तब मेला जाते हुए मेलाघुमनियों के उनके साईँ उनसे चुहल करते थे- ‘का हो, का गोदना गोदाई ‘. घर लौटने पर कोई पूछे कि हो किसकी लुगाई /तो झट से हाथ दिखाओ ओर छुट्टी. फिर कवयित्री की नजर चाँद पर जाती है. वह कल्पना में खो जाती हैं- आकाश में चाँद ने गोदवाए थे गोदने /रात के नाम के / सी-सी-सी करते हुए. किंतु उनकी आँखों में चाँद के गोदने का सौंदर्य नहीं ठहरता, धरती पर  स्वस्तिक का / गोदते हुए गोदना  हिटलर उन्हें याद आ जाता है जिसने खून की नदियाँ बहा दी थी. युग की पीड़ा से कौन पीड़ित नहीं होगा. उनकी नानी ने गोदना गोदवाए थे कि युद्ध से उनके नाना लौटेंगे तो उन्हें दिखाएँगी. पर नाना लौटे कहाँ. ये सारी घटनाएँ कातिक में ही घटीं.

‘कातिक की शाम’ में उन्हें लगता है यह शहर एक घायल तेंदुआ है / क्या जाने कब झपट्टा मारे. कहीं और जाने को लोग चकितनयन (या चौकसनयन?) निकलते हैं खरगोश के समान. कवयित्री ने शहर में एक मृगमरीचिका भी निर्मित कर ली है घायल तेंदुआ की भयंकरता को दिखाने के लिए कि मरीचिका से त्रस्त मृग कैसे उससे बाहर निकले. सोचती हैं वे निकले तो होंगे जरूर पर गए कहाँ होंगे- दूर वन में या डरते काँपते लोगों के मन में. फिर वह इसे दादी के किस्से में ढाल देती हैं. किस्सा सुनाकर दादी कहती थीं किस्सा गया वन में /सोचो अपने मन में  और हंसने लगती थीं. यह कातिक की शाम भी उन्हें वैसी ही हँसती हुई लगती है. याने कातिक की तीखी धूप से घायल हुआ शहर एक किस्सा का हिस्सा है जिसे ईशारों में सुनाकर कातिक की शाम व्यंग्य में हँसती है.

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