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समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / शेषनाथ प्रसाद

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                                                                  2 अनामिका का ‘बारामासा’ आषाढ़ माह से शुरू होता है. ‘बारामासा’ शब्द हिंदी...


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अनामिका का ‘बारामासा’ आषाढ़ माह से शुरू होता है.

‘बारामासा’ शब्द हिंदी की हरियाणवी बोली का है. इसका अर्थ होता है बिरह गान. ‘बारामासा’ शैली की ऐसी कविताओं के लिए अधिक प्रचलित शब्द है ‘बारहमासा’, जो हिंदी की अन्य बोलियों में प्रयुक्त हुआ है. ‘बारहमासों’ में कवि किसी विरहिणी की मनोभूमि में प्रवेश कर उसकी विरहानुभूतियों को शब्द देते रहे है, प्रकृति उनकी विरहानुभूतियों के उद्दीपन के रूप में प्रयुक्त होती रही है उनकी जीवमसंगिनी बन कर. किंतु इस ‘बारामासा’ में कवयित्री ने किसी विरहानुभूतिशीला की मनोभूमि में न प्रवेश कर स्वयं अपने अनुभवों को शब्द दिया है. प्रकृति इसमें कवयित्री की न सहचरी है न उनके भावों को उद्दीप्त करती है. यह उनके निकट की भी नहीं लगती.

उन्होंने ग्रीष्म ऋतु के आषाढ़ के गिरते पारे में प्रकृति को कभी दूर से देखा, उसके आंगन में रबी की बालियों से पक कर छूट गिरे अन्न-कणों की खुशबुओं और मिट्टी की टटा रही जिह्वा पर आषाढ़ की पहली सिहरती हुई गिरती बूँदों के आस्वाद को अपनी गठरी में समेट लिया. जब वह ऋतु-यात्रा-लेखन में प्रवृत हुईं तो वह गठरी भी उनके साथ थी. उस गठरी में उक्त के अतिरिक्त और भी बहुत सारी निधियाँ उन्होंने भर रखी हैं, जिसमें उनका अधीत भी है, और भी जाने क्या-क्या हैं, यह उनको भी नहीं मालूम. यह गठरी उन्होंने ढीली ढाली बाँध रखी है. इसे लेकर वह काल की पीठ पर लद गई हैं. इस “जिसकी (काल की) पीठ पर लदी” वाक्य-खंड से कवयित्री ने कौन सा बिंब खडा किया है समझ से परे है. हम तो यही जानते हैं कि जीवन काल में प्रवहमान रहता है. और काल में ही सबकुछ होता है. उसे सब का पता होता है. महाभारत सीरियल में इसका बहुत ही सार्थक प्रयोग हुआ है. लेकिन कवयित्री तो कहती हैं उनकी गठरी से उनकी निधियाँ कैसे गिर गईं यह काल भी नहीं जानता.

आखिर यह गठरी है कैसी. मेरे जाने यह गठरी उनकी स्मृति की गठरी है, चुस्त नहीं ढीली ढाली बँधी, कदाचित लापरवाही से. स्मृति से जब निधियों के गिरने के क्रम मे (अर्थात् भूलने के क्रम में)      जतन से संभाला गया उनका ऋतु-विलास गिरने अर्थात भूलने को होता है तो उसे वह सायास पूरे स्मृतिपटल पर फैला लेती हैं. और इसी ऋतु-विलास को वह शब्दों की काया देती हैं. इस काया में वह अपने बारह महीनों की अनुभव-यात्रा के अंकन के लिए अपनी भावयित्री प्रतिभा के साथ प्रस्तुत होती हैं. लेकिन लगता है इसके लिए उनकी पूर्व तैयारी नहीं है. गठरी (स्मृति) में बँधी निधियाँ जल्दी  में बाँधी गई हैं. इसीलिए स्मृति की गठरी में ढीला-ढालापन है. इन निधियों के रखने में कोई तरतीब नहीं है अतः वह बेडौल है और कवयित्री उसके बेडौलपन का दुख झेल रही हैं. यह दुख नहीं, इसे कष्ट कहना चाहिए,  बारहो महीने के मौसम पर लिखी गई कविताओं से इस दुख या कष्ट का क्या सरोकार है, कुछ स्पष्ट नहीं होता.

‘बारामासा’ शीर्षक से प्रस्तुत इस कविता-गुच्छ की पहली कविता आषाढ़-1 पूरे बारामासे की भूमिका-सी है. इसकी सुष्ठु पंक्तियों से संकेत मिलता है कि इस बारामासे की भावसंपत्ति पूर्व के बारहमासों से अलग होगी. इसमें हृदयावेगों के स्थान पर बौद्धिक आवेग की प्रमुखता रहेगी. उन्होंने अपनी स्मृति की गठरी से गिरते ऋतु-विलास को संभाल कर उसे एक नए ढंग से अधुनातन शब्दों और बिंबों से सजाकर प्रस्तुत किया है-

                ये जो नसों का जंजाल

                पसरा पड़ा है मेरे भीतर-

                दीमकों की बाँबियों-सा सिहरता है,

                जग जाती है गुदगुदी इसमें

                अव्यक्त बूँदों से लदी हुई

                   ये जो हवा चलती है ऐसे

                   आषाढ़ में.                       (आषाढ़-2)

इन पंक्तियों में कवयित्री प्रकृति के साथ हैं. इसमें गीष्म ऋतु के उपरांत वर्षागमन के पद-चाप की आहट अव्यक्त बूँदों से लदी हुई/ ये जो हवा को उन्होंने सुंदर शब्द संयोजन के साथ एक मनोहारी बिंब रच कर प्रस्तुत करने की कोशिश की है. किंतु इसका आस्वाद लेने के लिए इस बिंब के एकाध शब्द पर आँखें जब ठहरती हैं तो उनके अर्थ को गुन कर आँखों में किरकिरी पैदा हो जाती है. पाठक इस बिंब के ‘जंजाल’ शब्द पर ध्यान दें. जंजाल का अर्थ होता है- प्रपंच, उलझन, किसी समस्या में फँसना. इससे मुहावरा भी बना है, “जी का जंजाल.” अब कवयित्री के भीतर नसों का जाल पसरा है या जंजाल? नसों से होकर ही हमारा जीवन रक्त-गति में समूचे शरीर में प्रवहमान है. और इन्हें वे जंजाल से लगते हैं. आर्द्र हवाओं के नम-स्पर्श से यह नसों का उनका जाल दीमकों की बाँबियों-सा सिहरता है. दीमकों की बाँबियाँ तो किसी गहरी चोट या किसी धमक से ही सिहरती हैं. तो क्या कवयित्री के भीतर पसरे नसों के जाल को ये हवाएँ चोट पहुँचाती हैं? किंतु चोट से गुदगुदी तो नहीं उभरती. फिर उनके फेफड़ों में हवा के ये बलबुले (?) डुब डुब करते हुए उन्हें उनके बचपन की याद दिला देते हैं, जब वह पपीते के फोंके से साबुन के बुलबुले उड़ाती थीं (यह तो किसी भी मौसम का खेल है). कभी वह किन्हीं बरसाती हवावों में शहर के मुहाने पर स्थित भुतही कोठी में चली गई थीं जहाँ उन्हें कुछ अधलिखे प्रेमपत्र मिले थे जो बारिस के झोंकों से सिहर सिहर जाते थे. बारिश की प्रबलता का यहाँ सुंदर चित्रण है. भुतही कोठी में उन्मत्त बरसाती झोंकों से—

                ...चरमराते थे दरवाजे

                तो ढनढनाने-सा लगता था

                      वह अधखुला-सा दराज-

                अपनी ही मेज से आधा बहिष्कृत

                तिरछा होकर अटका,

                आधा लटका यों ही

                       अधर में कहीं।

                कुछ अधलिखे प्रेमपत्र

                धरे हुए थे उसमें सदियों से।              (आषाढ़-2)

इस प्रेमपत्र के बहाने कवयित्री उन विरहिणियों के प्रति कहीं अपनी सहानुभूति तो नहीं प्रकट कर रहीं!

सावन भादो के महीने वर्षा ऋतु के लिए जाने जाते हैं. कवयित्री को सावन में सावन की पहली झड़ी से साक्षात होता है. वह बारिश में अपनी बच्ची के साथ छतरी लिए बाहर निकली हैं. हहाती हवा बह रही है. छतरी वश में नहीं आ रहीं. कंधे भींगने लगे हैं. हवा का बहाव इतना तीव्र है कि उनके, बच्ची के और बारिश के पाँव कहीं के कहीं पड़ रहे हैं (बारिश की धार कम-अधिक तिरछी हो जा रही है). उनके सामने ही फुटपाथ के पेड़ की डाली टूट गिरती है. वह पेड़ के दुख से दुखी होती है. पर कुछ बोलती नहीं, संसार के दैनिक व्यापार में सम्मिलित हो जाती हैं. सामने देखती हैं डाली की ओट लिए अंगीठियाँ सुगबुगा उठी हैं. भुट्टे सिंकने लगे हैं और सिंकने लगा है उनका अकेलापन.

                भुट्टों की लय में ही धीरे धीरे

                सिंकने लगा है

                ये मेरा अकेलापन

                एक मीठी आँच पर

                फिर से.                        (सावन की पहली झड़ी)

कवयित्री ने बारिश को जैसा देखा, महसूस किया. यहाँ उस पूरे दृश्य का अच्छा चित्रण हुआ है. ध्यान देने योग्य है, बारिश के मौसम में मीठी आँच पर भुट्टे को भुनता देख कवयित्री किसी मधुर स्मृति में खो जाती हैं. उनका अकेलापन उन्हें अखरने लगता है. यह नहीं पता चलता कि वह भीड़ में अकेली हैं या जीवन में. क्या उनकी मीठी आँच में सिंकने की स्मृति पूर्व के बारहमासों की विरहिणियों की विरहानुभूतियों से तुल्य हो सकती हैं. यह मैं अधिक समर्थ और सक्षम समीक्षकों पर छोड़ता हूँ.

भादो के महीने में वर्षा ऋतु का अनुभव उन्होंने तीन शीर्षकों में किया है- ‘’भादो की शाम’’, ‘भादो’ और ‘’खूँटी पर बरसाती : भादो की शाम’’. किसी विषय को टुकड़ों में बाँट कर देखना या अनुभव करना, यह आधुनिक प्रवृत्ति है. शायद इसीलिए किसी विषय या समस्या पर ऐसे लोगों की पकड़ नहीं बन पाती.

भादो में वर्षा का रूप प्रचंड हो जाता है. आकाश में बादल उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं, घटाओं में काले मेघ ताबड़तोड़ दौड़ने लगते हैं, तीव्र गर्जन के साथ बिजलियों के तीर चलने लगते हैं, फिर घारासार बारिश से नदियाँ प्रचंड वेग से समुद्र की तरफ दौड़ पड़ती हैं. किसी अनुभूतिशील या अनुभूतिशीला को प्रकृति का यह रूप अनेक उद्दीपनों से भर दे सकता है किंतु भादो की एक शाम कवयित्री को कुछ और ही अनुभूत होता है-

                टूट पड़ा आसमान

                जिनकी मसें भी नहीं भींगी थीं

                वे भी टूट गिरे डाली से !

                उर्वारुकमिवबन्धनात....

                .........................

                वेसे आराम से नहीं, अफरा तफरी में

                वे छूटे उद्दंड झटके से

                एकदम खचाक!

                बीच सड़क टूट गिरे

                वे युवा शरीर--                           (भादो की शाम)

पूरी कविता में कवयित्री प्रकृति के साथ नहीं दिखतीं. ‘’टूट पड़ा आसमान’’ में वर्षा की प्रलयंकरता की ध्वनि तो है किंतु कविता के शीर्षक में भादो न रहे तो इस मुहाबरे का अर्थ विपत्ति का टूट पड़ना होगा. डाली से भी यहाँ वृक्ष की डाली का द्योतन नहीं होता. “जिसकी मसें भी नहीं भींगी” पंक्ति पर ध्यान देने पर ‘डाली’ से किसी अभिभावक की सूचना मिलती है, डाली से टूट गिरने वाले से भी उनके लाढ़ले–लाढ़िली का द्योतन होता है. उर्वारकमिवबंधनात अर्थात जिस प्रकार कँकड़ी या खरबूजा अपनी लत्तर से खुद छूट जाते हैं (यह कवयित्री का किया अर्थ है) वैसे ही वे युवा भी अपने अभिभावकों से छूट जाते हैं. यह उपमा सटीक नहीं लगती. टूटने और छूटने में क्या समान धर्म है. एक खुद अपनी डंठल से छूटता है और दूसरे वैसे आराम से नहीं, अफरा तफरी में एक उद्दंड झटके से एकदम खचाक  छूट जाते हैं और बीच सड़क टूट गिरते हैं. आगे की एक पंक्ति में टूटने का कारण बताया गया है-टूट पड़ी ऐसी तो बिजली. यह बिजली बारिश की बिजली नहीं है. इस बिजली के नाम लोगों ने गैंगरेप, रोज रेड, आदि रख लिया है. इस अप्राकृत कारणों से खिन्न होकर कवयित्री मानवीय अनुभूति में डूब जाती हैं.

‘भादो’ शीर्षक कविता में वह थोडी दार्शनिक हो गई हैं. “उस दिन” उनहोंने अपने को एक बीज में समो लिया. बीज को खाद पानी तो मिला पर खिलने के लिए आकाश का आमंत्रण चाहिए था, वह (ध्वन्यामंत्रण) उन्हें टिटिहरी से मिला. बीज में अंकुरण हुआ, फूल पत्ती आई पर विकास के लिए अनुकूल अवसर न पाकर रूखी पड़ी सृष्टि को दादुर से आर्द्र भावों का स्नेह मिला. यह दादुर भावार्द्रता की बूँदों में लिपटा शास्त्रीय गीतों के बोलों से (बारिश के मौसम में कहीं शास्त्रीय संगीत चल रहा होगा) निकल कर कवयित्री की पीढ़िया तक चला आया था. पीढ़िया अर्थात प्राणों के छोर तक. यहाँ वह अनुभूति मे डूबी लगती हैं. कदाचित इस कविता में वर्षा को वह जीवन के सूत्रण के ऱूप में देख रही हैं.

“खूँटी पर बरसाती : भादो की शाम” में वह घनघोर बारिश में घरों के मिटे नंबरों मे आह से अपना घर खोजती हैं. बारिश में भींगी बरसाती को अपना वजूद मानकर उसे घर के बाहर वाली खूँटी पर टाँग देती हैं और साड़ी का फेटा बाँध कर घर के काम में लग जाती हैं. बरसात में घर-गृहस्ती कैसे अस्त व्यस्त हो जती है इसका सुंदर चित्रण है.

आश्विन और कार्तिक शरद ऋतु का महीना है, वर्षा ऋतु के बादल अपनी प्रचंडता खोकर अब धुनी हुई रूई के समान आकाश में तैर रहे है. कवयित्री उनसे छनकर आ रही आसिन की पहलौंठी धूप का आनंद ले रही हैं. वह घर बैठे अनुमान लगा रही हैं कि ऐसे सुहाने मौसम में बंगाली टोले में शहनाइयाँ बज रहीं होंगी. उनके मन में एक व्यंग्य उभरता है. शादियों में दस द्वारों से मिट्टी खनकर लाई जाती है उनमें से एक द्वार वारांगनाओं का द्वार भी होता है. इस मिट्टी में होता है- बासी सिंगार  / बाराँगनाओं का . कवयित्री के शब्दों में ये ऐसी कलाकृतियाँ हैं जिन्हें दुनिया की सारी थकानें अँकवार लेती हैं.

“आसिन की दोपहरी” की धूप चटकीली और तीखी होती है. जूतों में तब्दील होने के पहले / चमड़े इसी धूप में सूखते हैं /इसी धूप में सूख कर /कद्दू कमंडल बनते हैं.

‘कातिक’ के महीने में कवयित्री को सोनपुर के मेले की स्मृति आती है. सोनपुर के मेले में ग्रमीण महिलाओं में गोदना गोदवाने की परंपरा होती है. उनमें से अपने हाथों पर, कोई अपने नाम का तो कोई अपने साईँ के नाम का गोदना गोदवाती हैं. उसका स्थान अब टैटू ने ले लिया है. तब मेला जाते हुए मेलाघुमनियों के उनके साईँ उनसे चुहल करते थे- ‘का हो, का गोदना गोदाई ‘. घर लौटने पर कोई पूछे कि हो किसकी लुगाई /तो झट से हाथ दिखाओ ओर छुट्टी. फिर कवयित्री की नजर चाँद पर जाती है. वह कल्पना में खो जाती हैं- आकाश में चाँद ने गोदवाए थे गोदने /रात के नाम के / सी-सी-सी करते हुए. किंतु उनकी आँखों में चाँद के गोदने का सौंदर्य नहीं ठहरता, धरती पर  स्वस्तिक का / गोदते हुए गोदना  हिटलर उन्हें याद आ जाता है जिसने खून की नदियाँ बहा दी थी. युग की पीड़ा से कौन पीड़ित नहीं होगा. उनकी नानी ने गोदना गोदवाए थे कि युद्ध से उनके नाना लौटेंगे तो उन्हें दिखाएँगी. पर नाना लौटे कहाँ. ये सारी घटनाएँ कातिक में ही घटीं.

‘कातिक की शाम’ में उन्हें लगता है यह शहर एक घायल तेंदुआ है / क्या जाने कब झपट्टा मारे. कहीं और जाने को लोग चकितनयन (या चौकसनयन?) निकलते हैं खरगोश के समान. कवयित्री ने शहर में एक मृगमरीचिका भी निर्मित कर ली है घायल तेंदुआ की भयंकरता को दिखाने के लिए कि मरीचिका से त्रस्त मृग कैसे उससे बाहर निकले. सोचती हैं वे निकले तो होंगे जरूर पर गए कहाँ होंगे- दूर वन में या डरते काँपते लोगों के मन में. फिर वह इसे दादी के किस्से में ढाल देती हैं. किस्सा सुनाकर दादी कहती थीं किस्सा गया वन में /सोचो अपने मन में  और हंसने लगती थीं. यह कातिक की शाम भी उन्हें वैसी ही हँसती हुई लगती है. याने कातिक की तीखी धूप से घायल हुआ शहर एक किस्सा का हिस्सा है जिसे ईशारों में सुनाकर कातिक की शाम व्यंग्य में हँसती है.

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गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1880,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / शेषनाथ प्रसाद
समकालीन हिंदी कविता में बारहमासा / शेषनाथ प्रसाद
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