रचनाकार

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अंकुश्री की लघुकथाएँ व अन्य रचनाएँ

(लघुकथा)

                  एकाधिकार

- अंकुश्री

      शहर का सबसे बड़ा मंदिर होने के कारण वहां भिखारियों की भीड़ लगी रहती थी. उस मंदिर में दूर-दूर से भक्तगण आते थे, इसलिये वहां भिखारियों को अच्छी भीख मिल जाती थी.

मंदिर के सामने भिखारियों की एक टेढ़ी-मेढ़ी और लंबी कतार लगी हुई थी. उसी कतार में एक बाहरी भिखारी आकर बैठ गया.

      नये भिखारी का कतार में बैठना था कि पहले से बैठे हुए भिखारी   उस पर टूट पड़े. भिखारियों ने चिल्लाना शुरू कर दिया, ''भगाओ स्साले को ! अपने बाप की जगह समझ ली है ? आया और बैठ गया ?''

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      ''माना कि जगह मेरे बाप की नहीं है. लेकिन इससे यह जगह तुम्हारी तो नहीं हो जाती ?''

      ''नहीं तो क्या तुम्हारी जगह है ?' सभी भिखारी चीख पड़े, ''चल, भाग यहां से - - - -.'' पहले से बैठे भिखारी नये भिखारी को मारने पर उतारू हो गये.

      नया भिखारी बहुत गिड़गिड़ाया. मगर बेकार ! उसे वहां नहीं बैठने दिया गया. पहले से बैठे भिखारियों का एकाधिकार स्वीकार कर नया भिखारी नयी जगह की तलाश में चल पड़ा.

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(लघुकथा)

अश्लील दृश्य

                                    - अंकुश्री

      एक फिल्म निर्माता को फिल्म में अश्लील दृश्य नहीं देना था. लेकिन कम से कम नृत्य का दृश्य नहीं होने से फिल्म में मजा नहीं आ रहा था. नृत्य के दृश्य से दर्शकों को बांधा जा सकता था, जो फिल्म की सफलता के लिये आवश्यक माना जा रहा था. किंतु समस्या यह थी कि नृत्य को भी लोग अश्लील मान रहे थे. बेचारा निर्माता बहुत परेशान था.

      परेशानी में पड़े निर्माता को देख कर उसका लेखक मित्र बोला, ''फिल्म में महाविद्यालय की चर्चा है. आप ऐसा करें कि छात्रों के सांस्कृतिक कार्यक्रम के बहाने कृष्णलीला पर आधारित एक नाटिका दिखा दें. कृष्णलीला में कृष्ण के इर्द-गिर्द राधा और उनकी सहेलियों को छूट कर नचवाया जा सकता है.''

      ''बहुत अच्छा विचार है,'' निर्माता ने कहा, ''कृष्णलीला एक धार्मिक प्रावधान है.''

      ''बिलकुल !'' लेखक मित्र ने जवाब दिया, ''कृष्णलीला का दृश्य देखने के लिये धार्मिक लोगों की भीड़ लगेगी ही, राधा-कृष्ण की प्रेमलीला देखने के लिये अन्य लोगों की भीड़ भी उमड़ पड़ेगी.''

      लेखक की राय सुन कर निर्माता की परेशानी खत्म हो गयी.

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(बालकथा)

परोपकारी महात्मा 

- अंकुश्री

   

एक थे महात्मा जी. उनके अनेक भक्त थे, जिनका आना-जाना लगा रहता था. वे भक्तों को तरह-तरह का उपदेश दिया करते थे. उनकी ज्ञान भरी बातें भक्तगण बहुत ध्यान से सुना करते थे. महात्मा जी दूसरे के दुख-सुख का भी ध्यान रखते थे. वे परोपकार में लगे रहते थे.

महात्मा जी बूढ़ा हो चले थे. बुढ़ापे का शरीर, लोगों की चिंता. वे दुबले हो गये थे. उनका स्वास्थ्य गिरने लगा. महात्मा जी के गिरते स्वास्थ्य से उनके भक्त चिंतित हो गये. भक्त महात्मा जी की व्यवस्था में लग गये. उनके लिये फल-दूध आदि आने लगा. भक्तों द्वारा तरह-तरह के भोजनादि भी लाये जाते. किंतु सब बेकार. भक्त जो भी लाते, महात्मा जी उसे उन्हीं के बीच बांट देते थे.

महात्मा जी का कहना था, ''जीवन भर खाया. अब और कितना खाऊं ? मैं जा रहा हूं. जिसे रहना है, वह खाये.'' वे अल्पाहार से अपना काम चला रहे थे.

श्रद्धालु भक्तों को चिंता लगी हुई थी. वे चाहते थे कि महात्मा जी उनके बीच बने रहें. उन्हें लोग स्वस्थ और ठीक-ठाक देखना चाहते थे. एक भक्त ने एक उपाय सोचा. परोपकारी महात्मा जी को दूसरे की चिंता लगी रहती थी. उस भक्त ने महात्मा जी से विनम्र शब्दों में कहा,

''आपने हम सबों को ज्ञान की बातें बतायी है. आपने यह भी बताया है कि मृत्यु के उपरांत भी दूसरों के काम आना चाहिये. लेकिन हमें लगता है कि मृत्यु के बाद आप किसी के काम नहीं आयेंगे.''

''मेरा मृत शरीर मांसाहारी पशु-पक्षियों और कीटों के काम आयेगा.'' महात्मा जी ने आश्वस्त होकर कहा, ''वे मेरे मृत शरीर का बोटी-बोटी मांस खा जायेंगे.''

''बोटी-बोटी मांस ? हूंह !'' एक श्रद्धालु भक्त ने व्यंग्यपूर्वक कहा, ''शरीर में मांस हो तब तो खायेगा ? सूखी हड्डियों के ढांचा में उन्हें क्या मिलेगा ? इसलिये मरने से पहले आप मोटा-तगड़ा हो जायें. इससे मरने के बाद आपके मृत शरीर से कुछ जीवों का सचमुच पोषण हो सकेगा.''

महात्मा जी को उस भक्त की बात लग गयी. अपना शरीर ढ़ीलने का विचार उन्होंने बदल दिया. वे भक्तों के लाये फल-दूध आदि में से खाने लगे. इसका प्रभाव अच्छा रहा. कुछ ही दिनों में वे स्वस्थ और तगड़ा हो गये. अपने भक्तों को वे पूर्ववत् उपदेश देने लगे. भक्त यही तो चाहते थे.

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कविता

अच्छा लगता है

- अंकुश्री

हमारा गीत

कुछ लोगों को अच्छा लगता है।

संस्था बना कर

भुनाना उन्हें अच्छा लगता है।

जुलूस बन कर

भूखे रहना न अच्छा लगता है।

मेरा अस्तित्व

सच्च में सबको अच्छा लगता है।

रोटी सिमटना

पर नहीं मुझे अच्छा लगता है।

बजट आवंटन

सुन-सुन कर नहीं अच्छा लगता है।

रोटी-किल्लत

मुझे हो, उन्हें अच्छा लगता है।

नाम हमारा

झंडा उनका अच्छा लगता है ?

समाधान हो

उन्हें नहीं यह अच्छा लगता है।

शोषण की बात

करना उनको अच्छा लगता है।

शोषित करना

उन्हें और भी अच्छा लगता है।

मुद्दा बनाना

उनको सबसे अच्छा लगता है।

समस्या बनना

मुझे बिल्कुल नहीं अच्छा लगता है।

मुद्दा बन कर

भूखे रहना नहीं अच्छा लगता है।

बाल श्रमिक हूं

खट कर खाना अच्छा लगता है।

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नाम

अंकुश्री

माता/पिता का नाम

स्व0 कांति देवी / स्व0 बासुदेव प्रसाद

जन्म तिथि

01.01.1954

शैक्षणिक योग्यता

स्नातकोत्तर (हिन्दी), रांची विश्वविद्यालय

लेखन आरम्भ

1969 से

प्रथम प्रकाशन

1971 में

लेखन का विषय

वन, वन्यप्राणी, पर्यावरण, बालोपयोगी, सामाजार्थिक सुधार, चरित्र निर्माण, पर्यटन, झारखण्ड के स्वतंत्रता सेनानी, विशेष व्यक्ति, आदि.

विधाएं

लघुकथा, बालकथा, कहानी, निबंध, हास्य-व्यंग्य, बाल निबंध, बाल कविता, कविता.

सम्मान

झारखण्ड सरकार द्वारा हिन्दी सेवी सरकारी सेवक सम्मान से 14 सितम्बर, 2013 को सम्मानित.

मानद उपाधि

राष्ट्रीय राजभाषा पीठ (इलाहाबाद) द्वारा भारती-भूषण (2008) आसरा, बलदेव (मथुरा) द्वारा साहित्य सम्राट (2009).

प्रकाशन

निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाओं में चार हजार से अधिक रचनाएं प्रकाशितः- सारिका, कादम्बिनी, आजकल, नवनीत, नया ज्ञानोदय, अहा! जिन्दगी, हरियाणा संवाद, जागृति, कुरूक्षेत्र, पंजाब सौरभ, समाज कल्याण, योजना, योजना (जम्मू), पर्यावरण, गगनांचल, भारतीय रेल, भारतीय डाक, जल चेतना, लोक गंगा, हिमप्रस्थ, संस्कृति, अक्षर पर्व, मेरी सहेली, सृजन, सरिता, सहिति सारिका, अनामा, राष्ट्रदूत, उर्वशी, सुपरब्लेज, युग मर्यादा, विश्व ज्योति, ज्ञान विज्ञान, तुलसी प्रभा, आदिवासी, सैनिक समाचार, गरिमा भारती, खनन भारती, दशकारंभ, कंचनलता, प्रगति वार्ता, नागरी वाग्ड़मय, कथा समवेत, मोदिनी, नवभारत टाइम्स, लोकमत समाचार, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता, पंजाब केसरी, नवज्योति, अमर उजाला, नई दुनिया, दैनिक राजस्थान, नवीन दुनिया, आर्यावर्त, रांची एक्सप्रेस, प्रभात खबर, आज, प्रदीप, देशप्राण, स्वतंत्र भारत, दैनिक चेतना,  दैनिक ट्रिब्यून, देशबन्धु, अमृत प्रभात, नवभारत, सान्ध्य टाइम्स, हिन्दुस्तान (दिल्ली, पटना, लखनऊ, रांची), जागरण (कानपुर, नोएडा, झांसी, रांची), दैनिक सन्मार्ग, वीर प्रताप, पाटलिपुत्र टाइम्स, हिमाचल टाइम्स, दून दर्पण, स्वदेश, दैनिक भास्कर,  भोजपुरी कहानियां, भोजपुरी माटी, निर्भीक संदेश, अंगना, लुकार,

नंदन, बालक, बाल भारती, पराग, बालहंस, हंसती दुनिया, देवपुत्र, बच्चों का देश, मधु-मुस्कान, समझ-झरोखा, नन्हे तारे, स्नेह, बाल वाटिका, बाल सेतु, आदि में.

विशेष

लेखों की शृंखला प्रकाशित : दै0 नवज्योति(अजमेर)- वन्यप्राणी परिचय, दै0 रांची एक्सप्रेस (रांची)- वन्यप्राणी परिचय (1 से 26) और पक्षी परिचय (1 से 26), दै0 प्रभात खबर(रांची) तथा स्नेह(बाल मासिक, भोपाल)-पर्यावरण से संबंधित बाल रचनाएं, हिन्दुस्तान(रांची)- स्वाधीनता संग्राम में झारखण्ड का योगदान.  

प्रकाशित पुस्तकें

करीब चार दर्जन सम्पादित संकलनों में लघुकथाएं, बालकथाएं एवं कहानियां प्रकाशित.  हमारे वन्यप्राणी, हमारे पक्षी, हमसे है पर्यावरण (बालोपयोगी पुस्तकें) एवं सागर के तिनके (लघुकथा संकलन) प्रकाशित. कहानी संकलन टुकड़ा-टुकड़ा आदमी प्रकाशनाधीन.

पाठ्य पुस्तक में

झारखण्ड सरकार की पांचवी कक्षा के पाठ्यक्रम में 2016-17 सत्र से बालकथा एतवा सम्मिलित.

अन्य प्रकाशन

लखनऊ की शैक्षणिक संस्था नालन्दा द्वारा जनवरी, 2012 में आयोजित कार्यशाला में 17 लेखकों की चयनित 6 पुस्तकों में इनकी दोनों पुस्तकों नगाड़ा और पेड़ का प्रकाशन.  वन पदाधिकारी श्री पंकज श्रीवास्तव की पुस्तक कैद के 64 दिन (2010) और देख अपनी ओर (2016) का संपादन.  वन विभाग की लाह का विकास पुस्तक लेखन में सहयोग (2013).

अनुवाद

वानिकी संबंधी जेरकर थनबर्ग की स्वीडिश पुस्तक का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद.  विश्व खाद्य कार्यक्रम (वन विभाग) के प्रास्थिति पत्र का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद.

अप्रकाशित पुस्तकें

स्वाधीनता आंदोलन में झारखण्ड का योगदान, झारखण्ड के पर्यटन स्थल, हमारा पर्यावरण, लघुकथाएं, भोजपुरी कहानियां, बाल कहानियां, कहानियां आदि

प्रसारण

आकाशवाणी से कहानियां, बालकथाएं, लघुकथाएं, बाल निबंध एवं अन्य रचनाएं 1981 से प्रसारित.

प्राप्त पुरस्कार

प्रतियोगिता आयोजक

पुरस्कृत लघुकथा

प्राप्त पुरस्कार

1. प्रज्ञा मंच, सांपला(रोहतक) द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता-1980

एक तमाचा और

सांत्वना

2. सारिका द्वारा आयोजित सर्वभाषा कहानी एवं लघुकथा प्रतियोगिता-1984

रेजा कुली

तृतीय

3. युवा रचनाकार समिति, अलवर द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता-1984

विस्मृति

तृतीय

    4.  युवा रचनाकार समिति, अलवर, प्रतियोगिता-1985

भाग्य से

प्रोत्साहन

5. प्रभात खबर (दैनिक, रांची) द्वारा आयोजित प्रथम लघुकथा प्रतियोगिता-नवंबर,1994

अपना-अपना हिन्दुस्तान

तृतीय

सम्प्रति

झारखण्ड सरकार से जनवरी, 2014 में सेवानिवृत्ति के उपरांत स्वतंत्र लेखन.

सम्पर्क

प्रेस कॉलोनी, सिदरौल, नामकुम, रांची (झारखण्ड)-834 010  (मो0 8809972549)  Ankushree Hindi Writer <ankushreehindiwriter@gmail.com>

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