गुरुवार, 4 मई 2017

माहिया छन्द / हरिश्चन्द्र शाक्य

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(1)
यौवन  में  चूर रहे
क्या थी मजबूरी
क्यों मुझसे दूर रहे।

(2)
अब याद सताती है
बेचैनी देती
रह-रह कर आती है।

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(3)
अब धड़क रही छाती
छोड़ गये तुम तो
अब नींद नहीं आती।

(4)
क्यों पागल कर डाला
प्यार सिखा मुझको
क्यों देते विष-प्याला।

(5)
जब   बिजली  जाती  है
उस पल की खुशियाँ
सारी   ले   जाती  है।

(6)
प्रिय अब तो आ जाओ
सावन आया है
अब और न तड़पाओ।

(7)
तुम जब से दूर हुए
मन की तड़पन से
हम तो  भरपूर हुए।

(8)
तुम छोड़ गये रोता
ग़म के सागर में
खाता रहता गोता।

(9)
जो मुझे सतायेंगे
अपनी करनी से
वे खुद मर जायेंगे।

(10)
दुख चुप चाप सहें
निश्चित जीत मिले
हम सच के साथ रहें।

(11)
तुम साथ नहीं रहते
मन कैसे बहले
हम पीर सदा सहते।

(12)
अन्दाज अधूरा है
तुम बिन जीवन का
हर साज अधूरा है।

(13)
नैना कजरारे हैं
गाल गुलाबी ये
हम इनसे हारे हैं।

(14)
दुख करे किनारा है
धारण धैर्य करें
सच कभी न हारा है।

(15)
सागर तो खारा है
मीठी झील कहाँ
जो लक्ष्य हमारा है।
(16)
आओ इस बस्ती में
हम नाचें गायें।
फागुन की मस्ती में।

(17)
सावन तो सूना है
याद करुँ तुमको
दुख बढ़ता दूना है।

(18)
तुम जब-जब आते हो
खुद हँसते रहते
पर मुझे चिढ़ाते हो।

डॉ० हरिश्चन्द्र शाक्य, डी०लिट्०
शाक्य प्रकाशन
घण्टाघर चौक, क्लब घर, मैनपुरी-205001
(उत्तर प्रदेश)
मोबाइल नं० 09411440154
स्थाई- ग्राम कैरावली पोस्ट तालिबपुर
जिला मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)
ई-मेल- harishchandrashakya11@gmail.com
जिला मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)

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