रविवार, 7 मई 2017

अमित कुमार की कविताएँ


 

जीवन


 

दिये के लौ की तरह
असमानता की हवा में
कभी बुझती, कभी दहक
आसमां छूती
सपने, उम्मीद, हौसले
और जुनून बन
चारों दिशाओं को
जब गले लगा लेती है
तब जीवन बन जाता है।

 


 

मेरा प्रेम


 

यकीन कर लूं मैं
कि तुम सलामत हो
मेरा प्रेम बस इतना ही है।

कोई कमी लगे तो
बेहिचक कह देना
मैं तुमसे एक कदम आगे
तेरे हाथों को थामें
वहाँ तक चलूंगा
जहाँ तेरा ख्वाब और
तेरी मंजिल होगी
तब जाकर मैं
सुकून का सांस लूंगा
और तसल्ली कर लूंगा
¬¬कि तुम सलामत हो
मेरा प्रेम बस इतना ही है।

वीर सैनिक


 

हमें ना अल्फाजों की दुहाई देना।
तिरंगे में लपेटकर विदाई देना।

कर्ज अधूरा रह गया मगर लौटूंगा
और हर जन्म इसी तरह रिहाई देना।

सारे दुश्मन गीदड़ है, उसके सीने पे
बंदूक रख, मुझे शहनाई देना।

है मेरा ही खून मेरे लाल में भी
उसे भी सैनिक बना भरपाई देना।

 

तन्हा है।


 

किसकी याद में सभी जज्बात तन्हा है।
तुमसे करनी थी वो हर बात तन्हा है।

दिल के अरमान अब धुआं-धुआं है
इश्क खामोश ओ कायनात तन्हा है।

मैं देख रहा हूँ उसके दिल का बवंडर
फिर भी जुबां संग ख्यालात तन्हा है।

जिसके वास्ते शहनाई, श्रृंगार है
आज उस बदनसीब की ही रात तन्हा है।

किस-किस को ‘अमीत’ दिखाए आईना
मैं इंसा हूँ मगर मेरी जात तन्हा है।


 

ये मेरी शराफत है


 

ये मेरी शराफत की हुरमत है।
कि एक बेवफा की हुकूमत है।

आब-ए-आईना नहीं भाता मुझे
हमें झूठ की न आती ख़िदमत है।

कुछ दिल में कीना था मेरे लिए
उससे जुदा होने की मर्सरत है।

इज़ाज़ ज़माने की मुस्कान का है
हर चेहरे से लगता कुर्वत है।

जिस तरह खुशियाँ रुठ बैठी है
लगता है हमसे रुठा कुदरत है।

गुफ्तगू हर घड़ी जिंदगी से है
हर बार पूछा के क्या हसरत है।

है लाख मेरे अस्फाक़ के दिन
आँख दिखाए किसकी जुर्रत है।

धरम रह गया


 

इंसानी आँखों की रौशनी कम रह गया।
अब कहाँ वफादारी, हया ओ शरम रह गया।

खुदा के दर पर झुककर इबादत करते हो
उस दहलीज के बाहर कहाँ धरम रह गया।

देख लो पढ़कर इतिहास के सभी पन्नों को
खुद को खुदा कहना उसका भरम रह गया।

हर पांच साल ओ हरबार वही ठगी जनता
उम्मीद टूटता उसका हर जनम रह गया।


 

गुनहगार हम रहें


 

इत्तेफाक जाने कहाँ से तूफान आया
वक्त ने संभलने का मौका न दिया
सबकुछ था धुंधला-धुंधला
हालात के उलट-फेर ने
दिल तोड़कर
जुबां सुन्न कर डाला
और चिल्लाते हम रहे।

एक अरसा गुजर गया
सूरज, चांद, तारों के बिना
अंधेरे में ही अब तेरा
चेहरा बनाता हूँ
सारा दिन तन्हां ही
आशियाने में
दुबके हम रहें।

ना वो आई
ना कोई पैगाम आया
मिलती पलभर को तो
तन्हाई मिटा लेते
इसी चाह, उम्मीद में
पागल बनकर हम रहें।

दुआ करता हूँ खुदा से
कोई उम्मीद न देना
खुशियों का क्या


बस उसे सलामती देना
देना बस रिहाई हमें
जिस इंतजार में हम रहें।

जा रहा हूँ
तुझे छोड़कर इस जहाँ से
बिछड़ने का गम न करना
फ़कत इसी खता के लिए
गुनहगार हम रहें।

 

किस सितारों को बुझाएं


 

मेरे यादों के झरोखे से
एक तस्वीर तो बनती है
जो बसी है रूह के भीतर
जहन की सख्त दीवारों पे
मिटती भी नहीं आसुओं की
बारिशों से
नींद का नाम न लो
कि जब भी आँखें बंद करता हूँ
हर तरफ बस ख्याल ही
तैरते है, मंडराते है
कोशिशों से मैं थक जाता हूँ
मगर आँखें नहीं थकती
नींद नहीं आती
क्या करूं कि तस्वीर से
जिंदगी कटती नहीं
तुम बताओ कि
किस सितारे को बुझाऊं कि
मैं चैन से सो पाऊं।


 

डर


 

फूल सी नाजुक वो लड़की
जिसे धर दबोचा
कुछ शैतानों ने
लहू-लुहान कर डाला
उसका सारा बदन
फिर भी चैन कहाँ था दरिंदों को
मिटा डाला उस मासूम की हस्ती

ये हादसे अब
हर सुबह की सुर्खियां है
जाने क्या हो गया है
जमाने को
अब हर वो शक्स डरा-सहमा है
जिसके घर है
बहन-बेटियाँ।

 

 



 

पहले से ना तुम हो


 

पहले से ना अब कुछ भी है
ना वो आंखें, ना ही दिल
ना प्यार किसी कोने में
जो लिपटकर चैन पाता था
और कुछ नहीं बस
मुझे जान-जहान कहते थे
मेरी साँसों की भी तुम
हिफ़ाजत करते थे
अब फुरसत ही नहीं तुम्हें
कि मेरी परवाह करो
अब तुम वो नहीं रहे
तुम बहुत बदल गए हो
तुम बहुत बदल गए हो।

हाँ, मैं बदला हूँ क्योंकि
वक्त रूकने का नाम नहीं लेता
हालात और दिल को
बहुत समझाता हूँ कि
रहने दे जैसा था मैं पहले
मगर ये मौसम
एक सा ठहरता नहीं
बदल जाता है बिन कहें
उड़ते बादलों की तरह
मेरे हालात बदले है
मेरे आँखों का रंग बदला है मगर
तुम दिल में हर घड़ी रहती हो

 

हरपल मैं तेरी परवाह करता हूँ
ये सच है कि अब जजबात
बयां नहीं होता
दिल की हर अरमां
जमाने के उलझनों में
लिपटकर खामोश कर देता है
फिर भी तेरे पास रहकर ही
मुझे सबसे ज्यादा सुकून आता है
ये मेरा प्यार है
जो हमेशा रहेगा
तुम हकदार हो इसका
उस उम्र तक भी जब
चश्मे की मोटी-मोटी शीशों से
दिखेगी तुम धुंधली-धुंधली
झुर्रियों से लिपटे तेरे गाल
और कंपकंपाती हाथों से मैं
तुम्हें महसूस करूंगा
उस पहली रात को जब तुम
डरी-सहमी घूंघट में
छिपकर बैठी थी
मैं हमेशा तुम्हारा हूँ और
आखिरी सांस तक प्यार करूंगा।

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लेखक परिचय
 
नाम -    अमित कुमार                                                            
पिता -    श्री विजय प्रसाद            
जन्म -    15.02.1988                              
पताः       C/o  एन. भाद्रा, साउथ देशबन्धुपाडा, न्युजलपाईगुड़ी,
   भक्तिनगर, जलपाईगुड़ी, प.बं, पिनः734007                               

स्थायी पता – कोर्ट एरिया, होरिलगंज, जहानाबाद
        बिहार-804408.
    फोनः    8585041678, 8101568760.    

ईमेलः    amitrajanjnb@gmail.com

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