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रमेशराज के त्योहारों पर आलेख

[बैकुण्ठ चतुर्दशी 30 अक्टूबर ]

भगवान ने कहा-“हम नहीं मनुष्य के कर्म बोलेंगे“

 

नारदजी ने भगवान विष्णु से कहा कि, ‘‘प्रभु आज कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी है। आज के दिन पृथ्वी लोकवासी साक्षात स्वर्ग प्राप्ति के लिये क्या-क्या उपाय कर रहे हैं, उन्हें देखना चाहता हूँ।’’

भगवान विष्णु से आज्ञा पाकर नारदजी पृथ्वीलोक पहुँचे तो देखते हैं कि एक हलवाई सिथेंटिक दूध और नकली खोवा बना रहा है। एक व्यापारी टायरों की प्लास्टिक को पीसकर उससे धूप-बाती बनवा रहा है। एक तस्कर नकली नोटों को बाजार में खपा रहा है। एक नेता नकली दारू खिंचवा रहा है। एक चरमपंथी मानव-बम बनाने के तरीके और धर्म की महत्ता समझा रहा है।

नारदजी पृथ्वीलोक पर जहाँ-जहाँ पहुँचे, वहाँ-वहाँ मानव नामक जन्तु को उन्होंने केवल काली करतूतों में ही लिप्त पाया तो ऋषि का मन भारी दुःख और विषाद से भर गया। वे पुनः बैकुण्ठ धाम पहुंचे और भगवान विष्णु को पृथ्वी लोक का हाल बताया।

भगवान विष्णु ने नारद को समझाया-‘‘ ऋषिवर, यह कलियुग है, कलि अर्थात् पाप का युग। तुमने जिस हलवाई को सिथेंटिक दूध और नकली खोवा बनाते देखा है, उसने मुझे प्रसन्न रखने के लिए एक दर्जन मंदिरों का निर्माण कराया है। जो व्यापारी टायरों की प्लास्टिक पीसकर धूपबत्ती बनवा रहा था, वह अनेक धार्मिक संस्थाओं के अध्यक्ष पद पर विराजमान है। जो तस्कर नकली नोटों को बाजार में खफा रहा है, उसके चार अनाथ आश्रम हैं और आठ नारी-निकेतन बनवा रहा है। नकली दारू का कारोबार करने वाले नेता का भी अनेक मंदिरों में भारी चंदा पहुँचता है। चरमपंथी भी कई धार्मिक संस्थानों से जुड़ा है। आपने पृथ्वीलोक पर जिन-जिन मनुष्यों का सूक्ष्म अवलोकन किया है, वे सब सपरिवार साक्षात स्वर्ग को भोग रहे हैं। आलीशान कोठियाँ, वातानुकूलित कमरे, अनेक सुविधायुक्त वाहन, इनका मन हमेशा प्रसन्न रखते हैं।’’

भगवान विष्णु की बात सुनकर नारद ने सवाल किया-‘‘क्या प्रभु! इनके लिये स्वर्ग के द्वार खोलेंगे?’’

भगवान विष्णु बोले-‘‘हम नहीं, इनके कर्म बोलेंगे।’’

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धनतेरस जुआ कदापि न खेलें

 

कार्तिक बदी त्रयोदसी मनाये जाने वाले त्यौहार ‘धनतेरस’ को ‘धन्वन्तरि जयंती’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन ही धन्वन्तरि वैद्य समुन्द्र से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस दिन हर परिवार में कुछ न कुछ इसलिए खरीदकर लाया जाता है क्योंकि इसी दिन देवी लक्ष्मी का घर में आवास माना जाता है।

इस दिन हर दुकानदार के क्रय-विक्रय का सारा कारोबार ‘नकद नारायण’ के बूते चलता है। इसलिये विभिन्न वस्तुओं की नकद खरीद-फरोख्त करते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि यह खरीद आपकी जेब पर भारी न पड़े।

इस दिन गृहणियाँ अपनी-अपनी सामर्थ्य अनुसार पुराने बर्तनों को हटाकर नये बर्तनों से रसोई को सजा सकती हैं।

दार्शनिक, वैज्ञानिक, साहित्यिक और संगीत की अभिरुचि के लोग माँ सरस्वती की मिट्टी, चाँदी की मूर्ति या चित्र खरीदकर अपने घर के अध्ययन या साधना कक्ष में माँ सरस्वती को विराजमान कर सकते हैं। माँ सरस्वती भी लक्ष्मीजी की तरह माँ भगवती का ही एक रूप हैं, जो मनुष्य को आत्म-प्रकाश से भरती हैं। अतः आत्म-प्रकाश को वरीयता देने वाले व्यक्ति इस दिन अच्छी-अच्छी पुस्तकें खरीदकर अपनी अलमारियाँ सजा सकते हैं।

विभिन्न देवी-देवताओं की चाँदी की मूर्तियाँ खरीदकर घर के छोटे-से मंदिर को सजाने वाले व्यक्ति माँ लक्ष्मी से विशेष कृपा की आकांक्षा कर सकते हैं। मिट्टी की बनी हुई मूर्तियों से साधारण परिवार के लोग भी देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा कर उनसे वरदान प्राप्त कर सकते हैं।

घर की शोभा बढ़ाने वाली हर वस्तु को धनतेरस के दिन खरीदा जा सकता है। वस्तु को खरीदने से पूर्व उसकी गुणवत्ता और मूल्य को परखा जाना अत्यंत आवश्यक है।

धनतेरस पर खरीदारी अवश्य करें, लेकिन अनावश्यक खरीदारी से बचें। मसलन यदि आपके घर में अच्छी पार्किंग की व्यवस्था नहीं है तो कार का खरीदा जाना आपको मुश्किल पैदा कर सकता है।

धनतेरस पर धन जुटाने की चाह में जुआ कदापि न खेलें। आपका यह कर्म माँ लक्ष्मी को नहीं, लक्ष्मी को बड़ी बहन ‘दरिद्रा’ का आपके घर में स्थायी वास करा देगा।

ठीक इसी प्रकार चोरी, डकैती, फिरौती, घटतौली, मिलावटखोरी से कमाया धन भी आपके मन को प्रसन्न रखने के बजाय किसी न किसी अशुभ घड़ी में डाल सकता है और आपके घर दरिद्रता वास कर सकती है, इसलिए धनतेरस के दिन ऐसे अपकार्यों से बचते हुए केवल शुभ ही शुभ कर्म करें और संध्याकालीन रात्रिवेला में घर की देहरी पर दीपक रखकर केवल अपने ही घर तक नहीं, दूसरों के घर तक भी उसके प्रकाश को जाने दें। आपकी देहरी पर रखे दीपक की रोशनी जब गली या दूसरे के घर तक जायेगी तो माँ लक्ष्मी अवश्य ही आपके घर पधारेगीं।

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मस्ती का त्योहार है होली

 

होली शरारत, नटखटपन, मनोविनोद, व्यंग्य-व्यंजना, हँसी-ठठ्ठा, मजाक-ठिठोली, अबीर, रंग, रोली से भरा हुआ एक ऐसा त्योहार है जो रंगों की बौछार के मध्य अद्भुत आनंद प्रदान करता है। कुमकुम और गुलाल से रंगे हुए गाल गवाही देते हैं कि हर तरफ मस्ती ही मस्ती है। बूढ़े या जवान सबके अधरों पर बस एक ही तान-‘होली है भई होली है।’

इस त्योहार से पन्द्रह दिन पूर्व और पन्द्रह दिन बाद तक हर कोई अद्भुत आनंद से भरा हुआ बस एक ही टेर लगाता है-‘होली खेल री गुजरिया, डालूँ में रंग या ही ठाँव री!’

होली खेलने वाली हुरियारिन होली खेलते हुए मादक चितवन के वाणों के प्रहार सहते हुए कहती है-‘मति मारै दृगन के तीर, होरी में मेरे लगि जायेगी।’

होली पर इतनी मस्ती क्यों छाती है? इसका सीधा-सीधा सम्बन्ध शीतलहर की ठिठुरन के बाद रोम-रोम को गुनगुनी सिहरन प्रदान करने वाले बदले हुए मौसम से होने के साथ-साथ किसान की पकी हुई फसल से भी है।

इस पर्व का प्राचीन नाम ‘वांसती नव सस्येष्टि है अर्थात् वसंत ऋतु के नये अनाज से किया हुआ यज्ञ। तिनके की अग्नि में भुने हुए [अधपके ] शमोधान्य [ फली वाले अन्न ] को होलक कहते हैं। होली होलक का अपभ्रंश हैं।

पौराणिक मतानुसार होलिका हरिणकश्यपु नामक दैत्य की बहन थी। उसे वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हरिणकश्यपु का एक पुत्र प्रहलाद विष्णु का उपासक था। प्रहलाद कहता था - ‘कथं पाखण्ड माश्रित्य पूजयामि च शंकरम।’ अर्थात् मैं पाखण्ड का सहारा लेकर शंकर की पूजा क्यों करूँ ? मैं तो विष्णु की पूजा करूँगा।’’

हरिणकश्यपु ने प्रहलाद की इस विष्णु-भक्ति से कुपित होकर एक दिन अपनी बहिन होलिका से प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठने को कहा। होलिका ने ऐसा ही किया। विष्णु की कृपा से होलिका तो अग्नि में जलकर भस्म हो गयी किन्तु प्रहलाद बच गया।

उक्त पौराणिक कथा से इतर यदि हम इस त्योहार के प्रचलन पर विचार करें तो किसी भी प्रकार के अन्न की ऊपरी परत को होलिका कहा जाता है और उसी अन्न की भीतरी परत [ गिद्दी ] को प्रहलाद बोलते हैं | होलिका को माता इसलिए माना जाता है क्योंकि वह इसी गिद्दी [ गूदा ] की रक्षा करती है। यदि यह परत न हो तो चना, मटर, जौ आदि का विकास नहीं हो सकता। जब हम गेंहूँ-जौ आदि को भूनते हैं तो उसके ऊपर की परत अर्थात् होलिका जल जाती है और गिद्दी अर्थात् प्रहलाद बचा रहता है। अधजले अन्न को होलिका कहा जाता है। सम्भवतः इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है।

होलिकोत्सव फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। होली वाले दिन घर-घर भैंरोजी और हनुमान की पूजा होती है। पकवान, मिष्ठान, नमकीन सेब, गुजिया, पड़ाके, टिकिया आदि स्वादिष्ट व्यंजन तैयार किये जाते हैं। छोटी होली वाले दिन शाम को घर में तथा सार्वजनिक स्थल पर रखी होली की पूजा सूत पिरोकर और फेरे लगाकर की जाती है। रात्रि बेला में होली में आग लगाकर लोग कच्ची गेंहूँ और जौ की बालियाँ भूनते हैं और भुनी हुई बालियों को एक दूसरे को भेंट कर गले मिलते हैं। ज्यों-ज्यों रात्रि ढलती है और बाद में सूरज अपनी गर्मी बिखेरता है, यह सारा मिलने-मिलाने का कार्यक्रम एक-दूसरे को रंगों से सराबोर करने में तब्दील हो जाता है। पुरुष, नारियों पर पिचकारियों और बाल्टियों से रंग उलीचते हैं, नारियाँ पुरुषों पर डंडों की बौछार करती हैं। होली का पर्व हर हृदय पर प्यार की बौछार करता है। यह त्योहार वर्ण-जाति, ऊंच-नीच के भेद मिटाने वाला ऐसा पर्व है जिसमें हर कोई भाईचारे एवं आपसी प्रेम से आद्र होता है।

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द्रौपदी ने भी रखा था ‘करवा चौथ’ का व्रत


कार्तिक वदी चतुर्थी के दिन रखे जाने वाले व्रत का नाम ‘करवाचौथ’ है। यह भारतीय स्त्रियों का मुख्य त्यौहार है। इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां पति की रक्षार्थ परमपिता परमेश्वर का ध्यान करती हैं, दुआएँ मांगती हैं। दिनभर निराहार और निर्जला व्रत रखते हुए सायंकाल को सोलह शृंगार कर, घर में पूड़ी पकवान बना, अपने नजदीक के मंदिर में जाती है और वहां देव-अर्चना करती हैं। रात्रि में अपने घर एक पटे पर बैठकर जल से भरा हुआ लोटा रखती हैं। मिट्टी या खांड के करवे पर बायना काढ़ा जाता है। करवे में गेंहू, रोली, चीनी और रुपया रख उसे टक्कन से बन्द कर दिया जाता है। इसके बाद गेंहू के तेरह दाने लेकर गणेश पूजन के उपरांत व्रत की कहानी सुनायी जाती है। कहानी सुनने या सुनाने के बाद करवे पर हाथ फेरकर पानी का लोटा अलग रख दिया जाता है। इसके उपरांत सास के चरण स्पर्श कर ‘सदा सुहागन’ का आशीर्वाद लिया जाता है। रात्रि बेला में चन्द्रमा के प्रकट होने पर चन्द्रदर्शन किया जाता है और चन्द्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके उपरांत स्त्रियां अपने-अपने पति के साथ प्रेमपूर्वक भोजन करती हैं।
एक बार पाण्डु पुत्र अर्जुन तपस्या करने के लिए नीलगिरि नामक पर्वत पर चले गये। इधर पांडवों पर अनेक विपत्तियां आने लगीं। द्रौपदी ने शोकाकुल होते हुए भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। श्रीकृष्ण द्रौपदी की पुकार सुन वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने द्रौपदी को इस समस्या के निवारण हेतु करवाचौथ का व्रत रखने को कहा। उन्होंने बतलाया कि विपत्ति के समय ‘करवाचौथ’ के व्रत की महत्ता भगवान शिव ने पार्वती को भी समझायी थी। यह कहकर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को प्राचीनकाल के एक गुणी, धर्मपरायण ब्राह्मण की कथा सुनायी। श्रीकृष्ण बोले-‘‘ हे पांचाली! प्राचीन काल में एक ब्राह्मण के चार पुत्र और एक सुशीला पुत्री थी। पुत्री  के विवाहित होने पर करवा चतुर्थी के दिन उस ब्राह्मण की पुत्री ने व्रत रखा। परन्तु व्रत के दौरान चन्द्रोदय से पूर्व ही वह क्षुधा से इतनी पीडि़त हुई कि उसने अपने दयालु भाइयों द्वारा बनाये गये नकली चाँद के दर्शन कर भोजन कर लिया। भोजन करते ही उसके पति का देहांत हो गया। इससे दुःखी हो उसने अन्न-जल का त्याग कर दिया। उसी रात इन्द्राणी देवी भू विचरण करने आयीं। ब्राह्मण कन्या को रोते-विलखते देख इन्द्राणी ने उसे उपाय बताया कि यदि तू पुनः विधिवत रूप से करवा चौथ का व्रत रखेगी तो तेरा पति जीवित हो जायेगा। ब्राह्मण कन्या ने वर्ष भर प्रत्येक चतुर्थी पर व्रत रखा और उसका पति जीवित हो गया।’’
भगवान श्रीकृष्ण की इस कथा को सुन द्रौपदी ने भी करवाचौथ के दिन विधिविधान से व्रत रखा तो पांडवों पर आयी समस्त विपत्तियां एक-एक कर किनारा कर गयीं। यही नहीं उसी दिन उसके पति अर्जुन भी सकुशल घर लौट आये।
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[ दीपावली ]

लक्ष्मी-पूजन

कार्तिक मास की अमावस्या को पूरी धूमधाम से मनाये जाने वाले त्योहार दीपावली का सम्बन्ध भगवान श्री रामचन्द्र जी के  वनवास के दौरान अत्याचारी रावण को मारकर अयोध्या लौटने से है। जिस समय श्री राम चौदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या पहुँचे तो उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीपमालाएँ जलाकर महोत्सव मनाया।
इस त्योहार का दूसरा सम्बन्ध घरों की साफ-सफाई कर माँ लक्ष्मी को अपने-अपने घर पूजा-अर्चना कर बुलाने से है। माँ लक्ष्मी मनुष्य जाति खासकर हिन्दुओं को धन-वैभव, प्रसन्नता और सुख-शान्ति प्रदान करने वाले देवी हैं। इन्हें प्रसन्न करने के लिए हिन्दूलोग अपने-अपने घर के नियत स्थान तथा अपने प्रतिष्ठान पर माँ सरस्वती, हनुमानजी, अन्य देवों के साथ-साथ श्री गणेश का पूजन दीप जलाकर, जल,रोली, चावल, खील-बताशे, अबीर, गुलाल, फूल, नारियल, धूप आदि से हर परिवारीजन के साथ करते हैं ।    सर्वप्रथम सद्बुद्धि,-ज्ञान के देवता श्री गणेश का पूजन किया जाता है, तत्पश्चात् माँ लक्ष्मी तथा अन्य देवी-देवताओं का। अन्त में पान के पत्ते पर हलवा रख उसमें चाँदी का एक सिक्का डाल, इस सबको माँ लक्ष्मी को भोग प्रदान करते हुए उनके मुख पर चिपका दिया जाता है। साथ ही एक बड़ा सा दीपक में घी डालकर उसे पूरी रात जलाने को रखा दिया जाता है।
    माँ लक्ष्मी पूजन उन प्रतिष्ठानों या दुकानों में भी किया जाता है, जिनके बूते परिवार की रोजी-रोटी चलायी जाती है। इन स्थानों पर सभी व्यवसायी पुराने बहीखातों के स्थान पर नये बहीखाते बनाते हैं, जिस पर शुभ-लाभ, स्वास्तिक के चिन्ह और ‘श्री लक्ष्मी सदा सहाय’ रोली-हल्दी आदि से लिखा जाता है। सभी व्यवसायी अपने इन नये खातों का पूजन करते हैं ।
लक्ष्मी-पूजन का यह समस्त विधान उसी माँ लक्ष्मी से निरन्तर धन-वैभव प्राप्त करने का अनुष्ठान होता है, जिसके बूते जीवन में चमक, शांति और यश बढ़ता है।
    माँ लक्ष्मी को ‘ऋण मुक्ता’, ‘दारिद्रय हारिणी’ भी कहा जाता है। माँ लक्ष्मी उन्ही साधकों को ऋण और दारिद्रय मुक्त बनाती हैं, जो विकारों और आलस्य से विहीन होते हैं। जुआरियों, शराबियों, व्यभिचारियों, फिजूलखर्चियों, आडम्बरियों या कामचोरों की पूजा-अर्चना से माँ लक्ष्मी कभी प्रसन्न नहीं होतीं।
    माँ लक्ष्मी से पूर्व ज्ञान और बुद्धि के देवता श्री गणेश का पूजन भी इसी कारण किया जाता है कि वह ऐसा ज्ञान या बुद्धि प्रदान करें, जिसके आलोक में उपकार की भावना पुष्पित-पल्लवित हो। अहंकार रूपी अंधकार का विनाश हो।
    माँ लक्ष्मी के पूजनोपरांत माँ सरस्वती की आराधना उन्हीं लोगों को फलदायी होती है, जो अपनी सृजनात्मकता के माध्यम से समाज में प्रेम, भाईचारे और मंगल की ज्योति जलाते हैं।
    माँ लक्ष्मी पूजन के समय पुरुषवर्ग हनुमानजी की पूजा इसलिए करता है ताकि वह भी श्रीराम जैसे सतधारी का साथ देकर असुरों के विनाश में सहायक बन सके।
    दीपावली के दिन जुआ खेलने वालों, व्यभिचारियों, कामासुरों, अहंकारियों से माँ लक्ष्म इतनी कुपित होती हैं कि वह ऐसे लोगों को सदा-सदा के लिये पतन, दरिद्रता, असफलता और अपयश के गर्त में धकेल देती हैं। अतः श्री लक्ष्मी पूजन के समय हर किसी को विकारों से मुक्त होने का संकल्प लेना चाहिए। तभी माँ प्रसन्न होकर धन-वैभव और यशवान बनाने का वरदान देंगी। 

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शिव ही बनाते हैं मधुमय जीवन


शिव समस्त देवों के देव माने गये हैं, क्योंकि वे मनुष्य ही नहीं, प्राणी जीवन में जो भी व्यवधान, कष्ट या दुःख आते हैं, उनका निराकरण वे सहज भाव से करते हैं। वे प्रकृति की झोली हरियाली, फूल, फल, जल और सुगन्ध से भरते हैं।
सम्पूर्ण जगत के पालनहार शिव अन्य के हिस्से का हलाहल स्वंय पी जाते हैं। उनकी लटों में पावन गंगा विराजमान है जो सतत् प्रवाहित होकर प्रकृति को स्पंदित करती रहती है। अन्य देवों या प्राणियों से अलग शिव के तीन नेत्र हैं। दो नेत्र तो सिर्फ ऐन्द्रिक-बोध कराते हैं, जबकि तीसरा नेत्र आत्मज्ञान या आत्मबोध में अभिसिक्त होता है। त्रिनेत्रधारी शिव का यही आत्मबोध संसार को मंगलमय बनाकर मधुरता प्रदान करता है। शिव आत्मबोध के रूप में धर्मबोध के भी प्रदाता हैं। धर्म-बोध हमें परम शांति की ओर अग्रसर करता है। शिव द्वारा प्रदत्त पथ शैव धर्म के नाम से जाना जाता है। शिव के हाथ में डमरू है। शिव में नृत्यात्मकता है। शिव राग-रागनियों के उत्पत्तिकर्ता हैं। काल-छंद के रचयिता हैं। शिव सात स्वरों के जन्मदाता हैं। उन्हीं सात स्वरों में समस्त प्रकृति ही नहीं, मनुष्य भी अपने आंतरिक भावों को अनुभावों से गुंजित करता है।
शिव जितने दयावान, निर्मल, भोले-भाले हैं, उतने ही रौद्र। असहायों पर अपनी असीम कृपा लुटाने वाले शिव, दुष्टों असुरों, अहंकारियों, पापियों के प्रति अत्यंत कठोर और आक्रामक रहते हैं। एक पंचाग वर्ष की समस्त बारह शिवरात्रियों में से फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का दिन महाशिव रात्रि के रूप में माना और मनाया जाता है। इसी दिन रात्रि को भगवान शिव का ब्रह्मा से रूद्र के रूप में अवतरण हुआ। प्रलय काल में भगवान शिव ने ताण्डव नृत्य करते हुए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने तीसरे नेत्र की भीषण ज्वाला से भस्म किया था, इसीलिए महाशिव रात्रि को काल रात्रि भी कहा जाता है।
इसी कालरात्रि में ब्रहमांड की सारी जड़ता समाप्त हुई। वायु का संचार हुआ। मेघ बरसे। तत्पश्चात् जड़ पृथ्वी पर पौधे उगे। वे पुष्पित-पल्लवित हुए। मादक सुगन्ध ने वातावरण में अपनी उपस्थित दर्ज करायी।
महाशिव रात्रि को पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की दशा इस तरह की बन जाती है कि मानव शरीर में ऊर्जा ऊपर की प्रस्थान करने लगती है। सुधिजन, मुनिजन, सज्जन इस ऊर्जा का संचयन कर अपने आत्म को और प्रकाशवान बनाने के लिये  तपस्यालीन होते हैं। प्रभु-उपासकों के लिये महाशिवरात्रि अत्यंत महत्वपूर्ण है।
महाशिव रात्रि को ऊर्जा संचयन करने का सीधा अर्थ यह है कि शिव आराधक अपने को शिवमय बनाकर अपने जीवन को जगत कल्याण की ओर उन्मुख करते हैं। ज्ञानी लोग अपने ज्ञान का प्रसार-प्रचार पापाचार को समाप्त करने में करते हैं तो सामान्य जन शिव आराधना कर पारिवारिक और सामाजिक दायित्यों का निर्वाह करने में संकल्पबद्ध होते हैं।
महाशिव रात्रि को कंधों पर रखी जाने वाली काँवर जिसके आगे-पीछे रखी गंगाजल के बड़े-छोटे कांच के दो कलश श्रवण कुमार के अंधे माँ-बाप की तीर्थ यात्रा कराने का प्रतीक रूप हैं। काँवरियों की सेवा में जुटे भक्तजन उन्हें दूध पिलाते, खाना खिलाते हुए ऐसे लगते हैं, जैसे महाशिव रात्रि में हर किसी ने मानव मंगल और परोपकार के लिये साक्षात शिव का रूप धारण कर लिया हो।
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नारी-शक्ति के प्रतीक हैं दुर्गा के नौ रूप


ग्रीष्म ऋतु में चैत्रमास की अमावस्या के दूसरे दिन प्रारंभ होकर नौ दिन तक मनाए जाने वाले व्रत नवरात्र नवदुर्गा अर्थात न्यौरता में नारी-शक्ति की उपवास रखकर पूजा-अर्चना की जाती है। नारी यदि सुन्दरता की अद्भुत मूर्ति मानी गयी है तो इसी नारी ने समय-समय पर रणचंडी का वेश धारण कर असुरों-पापियों-दैत्यों का विनाश भी किया है।
जिस समय देवासुर संग्राम दौरान राक्षसों द्वारा बार-बार युद्ध में पराजित देवता अत्यंत दुखी और भयभीत थे। यहां तक कि दैत्यराज शम्भु-निशम्भु या महिषासुर ने भारी प्रहार कर देवराज इन्द्र तथा अन्य देवताओं को स्वर्ग से बाहर कर दिया तो समस्त देवता अपने प्राणों की रक्षा के लिए भगवान विष्णु, देवताओं के देव शिव और जगत के पालनहार ब्रह्मा से इस विपत्ति से मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना करने लगे। समस्या के हल के लिए देवताओं ने एक प्रकाशपुंज को प्रकट किया। इस प्रकाशपुंज ने नारी शक्ति के रूप में देवी भगवती दुर्गा का स्वरूप धारण किया। दैत्यराज शम्भु-निशम्भु और महिषासुर के विनाश के लिए देवताओं ने इस स्वरूप की स्तुति की और अपने-अपने अमोध अस्त्र-शस्त्र प्रदान कर महारूप योगमाया भगवती से दैत्यराजों के वध के लिए प्रार्थना की।  योगमाया भगवती दुर्गा ने दैत्यों का वध करने के लिए अकेले ही प्रस्थान किया। दैत्यों का मां भगवती दुर्गा से नौ दिन भयंकर युद्ध हुआ। इन नौ दिनों में असुरों के वरद शक्ति के रूप को नष्ट करने के लिए मां भगवती ने अपने ही नौ प्रतिरूप युद्ध क्षेत्रा में खड़े किये। इन प्रतिरूपों में जयंती, मंगलाकाली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री स्वाहा, सुधा ने अपने अस्त्रा-शस्त्रों के प्रहार से दैत्यों में हाहाकार उत्पन्न कर दिया। नौ दिन के इस संग्राम में शम्भु-निशम्भु और महिषासुर का तो वध हुआ ही, इनके साथ-साथ रक्तबीज, धूमकेतु और अनेक दैत्य भी धराशायी हो गये। दैत्यों के वधोपरांत समस्त ब्रह्मलोक में शांति की स्थापना हो गयी। देवताओं को अपना खोया हुआ स्वर्गलोक वापस मिल गया।
नारी शक्ति की इस महिमा के आराधन-पूजन के लिए चैत्रमास में लगातार रखे जाने वाले निराहार व्रत के दिनों में आदि शक्ति देवी दुर्गे, भवानी, जगदम्बा की पूजा द्वितीया के दिन की जाती है। चैत्र शुक्ल तृतीया को सुहागिन स्त्रियां व्रत रख मां पार्वती से अपने सुहाग की रक्षा की कामना करती हैं। चतुर्थी को गणपति की पूजा कर विघ्न विनाशों को समाप्त करने की कामना की जाती है। अष्टमी के दिन अशोक वृक्ष का पूजन होता है। यह माना जाता है कि इसी दिन हनुमानजी ने लंका में अशोक वाटिका पहुंचकर सीताजी को भगवान राम का संदेश व अंगूठी दी थी।
चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को रामनवमी भी कहा जाता है। इसी तिथि को मर्यादा पुरूषोत्तम राम का महारानी कौशल्या की कोख से जन्म हुआ था। इस दिन भगवान श्रीराम, रामायण आदि की पूजा की जाती है।
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इन रावणों को कौन मारेगा?


क्वार सुदी दशमी को बेहद उल्हास के साथ मनाये जाने वाले उत्सव का नाम ‘दशहरा’ है। इसे ‘विजयादशमी’ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने अत्याचारी, कामातुर, भोगविलासी रावण पर चढ़ाई कर उस पर विजय ही प्राप्त नहीं की, बल्कि उसका वध कर सम्पूर्ण भारतवर्ष को उसकी काली छाया से मुक्त कराया। भारतीय संस्कृति में रावण अधर्म और बुराई का प्रतीक है। इस प्रतीक को प्रतीकार्थ में ही हम सब उसके तथा उसके अनीति की राह पर चलने वाले भाई कुम्भकरण, मेघनाद आदि के पुतले बनाकर उनका सार्वजनिक स्थल पर दहन कर अपने पावन कर्त्तव्य की इतिश्री करते हैं।
यह त्रेता नहीं, कलियुग है। इस युग में वह पापी भी राम बनकर रावण-कुम्भकरण के पुतले फूँकता दिखाई देता है, जो स्त्री जाति को पैरों की जूती समझता है। जाने कितनी ‘दामिनियों’ का शीलभंग करता है। राम बनने का नाटक करने वालों में ऐसे कितने ही कथित संत हैं, जो बहिन-बेटियों पर कालाजादू कर अपने सम्मोहन में फँसाते है और अपनी पाप की कुटिया में ले जाकर उनके साथ कुकर्म करते हैं। रावण के कुकर्म का उसी का भाई विभीषण भागीदार नहीं बनता, लेकिन राम का वेश धारण किये आज के कथित रामों का पूरा का पूरा कुनबा इस कुकर्म में साझेदार बनता है।
रावण और उसके कुकर्मी भाइयों-साथियों के पुतलों का दहन करने वालों में आज वे लोग भी शरीक हैं, जो पटरियों पर लेटे हुए गरीब वर्ग के लोगों को मदिरा में धुत्त होकर तेज गति से कार चलाते हुए कुचलते हैं। दबंग और रहीशजादे, अफसरों और नेताओं के ये बेटे राह चलती लड़कियों पर फब्तियाँ कसते हैं, बलात्कार करते है लेकिन कानून के शिकंजे से बिल्कुल नहीं डरते हैं।
रावण-दहन के जश्न में अग्निवाण चलाने को आतुर वे माननीय भी हैं जो सम्वैधानिक सदनों में ब्लूफिल्म देखते हैं, असहाय नारी का शील भंग करते हैं। शहीदों के आयोजनों में देशभक्ति के गीत गाती लड़कियों के संग नृत्य करते हुए उनके गालों पर हाथ फेरते हैं। अपनी दयनीय आयु के बावजूद अश्लील हरकतें करते हैं।
रावण को फूँकने वाले वे कानून के रखवाले या कानून बनाने वाले वे मंत्री और विधायक भी हैं, जो जनता के मिड डे मील, मनरेगा, और समाज कल्याण की अनेक योजनाओं में कमीशन डकार कर धनकुबेर बनते हैं। ये न चारे को छोड़ते हैं न कफन, यूरिया, सीमेंट, तोप को। इन सब के माध्यम से आने वाला कमीशन इनकी तोंद फुलाता है। इन्हें अपार वैभव में डुलाता है।
समाजसेवीजन भले ही इनकी काली करतूतों का पर्दाफाश करें लेकिन ये कालेधन पर साँप की तरह कुण्डली मारे फुंकारते रहते हैं। कॉमनवेल्थ गेम, टूजी स्पेक्ट्रम, कोयला खदानों, अवैध खनन के माध्यम से अकूत कमाई करने वाले ये रावण, सीता का हरण भी करते हैं और सुग्रीव नहीं बाली को बल प्रदान करते हैं। ऐसे ही सैकड़ो कलंकों में इनका दामन यहाँ तक कि मुँह और आत्मा कालिख से पुत गये हों, लेकिन ये राम बनकर, रावण पर अग्निवाण चलाकर ‘रामराज्य’ का सपना जनता के बीच बाँटते हैं।
क्या जनता इन रावणों को पहचानती है। यदि पहचानती है तो दशहरे पर इन्हीं रावणों के हाथों रावणों और उसके कुटुम्ब का  पुतला दहन क्यों कराती है। आज रावण ही रावण के पुतले का दहन कर रहा है। इस राम बने रावण का पुतला दहन कब होगा?
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[ धनतेरस ]

विष का कलश लिये धन्वन्तरि


कार्तिक बदी त्रयोदशी को कृष्ण पक्ष में रात को घर की देहरी पर दीप प्रज्वलित कर अँधियारे पर प्रकाश की जीत का शंखनाद करने वाले त्योहार का नाम धनतेरस है। माना जाता है कि समस्त प्राणी जगत की रुग्ण काया का उपचार करने हेतु इसी दिन समुद्र-मन्थन के समय अमृतकलश लेकर वैद्य धनवन्तरि प्रकट हुए थे।
वैद्य धन्वन्तरि ने विभिन्न सरल और जटिल रोगों-व्याधियों के उपचार हेतु अमृत स्वरूपा अनेक औषधियों की खोज की। उपचार के अचूक विधान प्रस्तुत किये। उन जड़ी-बूटियों की पहचान करायी, जिनसे जीवनीशक्ति का ह्रास होने से रोका जा सके। कैंसर, तपैदिक, दमा, मधुमेह जैसी असाध्य बीमारियों को साध्य बनाया। धनवन्तरि लोभी-लालची नहीं थे। चिकित्सा के क्षेत्र में उनका योगदान मंगलकारी और समाजसेवा से ओत-प्रोत है। इसीलिये चिकित्सा के क्षेत्र में उन्हें वह गौरव और अमरता प्राप्त है, जो उन्हें देवतुल्य बनाती है।
आज भी ऐसे अनेक वैद्य या चिकित्सक हैं, जो मानवीय संवेदना से जुड़े हैं। गरीब, असहाय, निराश्रितों का इलाज सहानुभूतिपूर्वक करते हैं। ऐसे चिकित्सकों के चिकित्सालय से कोई भी निराश नहीं लौटता।
परसेवा को समर्पित ऐसे देवतुल्य धन्वतरियों के विपरीत आज ऐसे धन्वतरियों की भी पूरी की पूरी फौज दिखायी होती है, जिनके पास रोगी के लिये गिद्ध दृष्टि उपलब्ध है। मन में लोभ और लालच कुलाँचें भरता है। समाजसेवा के नाम पर समाज का आर्थिक दोहन करने में लगे ऐसे ज्ञानवान डिग्रीधारी ब्रह्मराक्षसों के लिये हर रोगी उनकी ऐसी प्रयोगशाला बन चुका है, जिसमें अनावश्यक अत्याधिक खर्चीली जाँचें सिर्फ धन ऐंठने को करायी जाती हैं। अपने ही अस्पताल में स्थापित की गयी औषधियों की दूकान से मरीज को महँगी से महँगी दवाएँ दी जाती हैं। मरीज का सही उपचार करना इनका उद्देश्य नहीं। ये मरीज और उसके तीमारदारों को  गिद्ध की तरह नोचते रहना चाहते हैं। भले ही समुद्र-मंथन के समय इनके आदि पिता अमृत कलश लेकर प्रकट हुए हों, किन्तु उसी आदि पिता की आधुनिक सन्तानें आज उस अमृत कलश को त्याग कर अपनी आत्मा को एक ऐसे विष कलश से भरे हुए हैं, जिससे रिसकर बाहर निकलने वाली हर बूँद आदमी को स्वस्थ करने के स्थान पर बीमार अधिक बनाती है। इलाज कराने वाला मरीज भले ही अपनी आर्थिक विवशता का रोना रोये, ये बिलकुल नहीं पसीजते। सरकारी डाक्टर भी चोरी-छुपे अपना एक ऐसा अस्प्ताल चलाते हैं, जिसमें मरीज की जेब  को काटा जाता है।
    वैद्य धनवन्तरि के प्रतीक पुत्रों का आलम यह है कि कोई आपरेशन के दौरान मरीज के पेट में केंची, तौलिया छोड़कर पेट सीं देता है तो कोई फंगसग्रस्त ग्लूकोज की बोतलें चढ़ाकर मरीज को मरणासन्न स्थिति में ला देता है। किसी अस्पताल में मरीज की मृत्यु हो जाने के बाद भी आइसीयू में मृत शरीर का दो-दो दिन तक इलाज चलता है तो किसी अस्पताल में गर्भपात और भ्रूणलिंग परीक्षण की वैधानिक चेतावनी का बोर्ड टँगा होने के बावजूद चेतावनी की अवैध तरीके से धज्जियाँ उड़ायी जाती हैं।
कार्तिक बदी त्रयोदशी के कृष्णपक्ष में ऐसे लोभी-लालची आज के धनवन्तरि क्या अपनी देहरी पर ऐसा दीपक रखेंगे जिसकी रौशनी किसी गरीब, असहाय, निराश्रित मरीज तक जा सके? शायद नहीं। यह कार्य तो वही त्यागी, समाजसेवी, दयावान, मंगल भावना से भरे हुए डॉक्टर करेंगे, जिन्हें परसेवा से परमानन्द की प्राप्ति होती है।
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[ दीपावली ]

लक्ष्मी-पूजन का अर्थ है- विकारों से मुक्ति 


कार्तिक मास की अमावस्या को पूरी धूमधाम से मनाये जाने वाले त्योहार दीपावली का सम्बन्ध भगवान श्री रामचन्द्रजी का वनवास के दौरान अत्याचारी रावण को मारकर अयोध्या लौटने से है। जिस समय श्री राम चैदह वर्ष का वनवास काटकर अयोध्या पहुँचे तो उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीपमालाएँ जलाकर महोत्सव मनाया।
इस त्योहार का दूसरा सम्बन्ध घरों की साफ-सफाई कर माँ लक्ष्मी को अपने-अपने घर पूजा-अर्चना कर बुलाने से है। माँ लक्ष्मी मनुष्य जाति खासकर हिन्दुओं को धन-वैभव, प्रसन्नता और सुख-शान्ति प्रदान करने वाले देवी हैं। इन्हें प्रसन्न करने के लिए हिन्दू लोग अपने-अपने घर के नियत स्थान तथा अपने प्रतिष्ठान पर माँ सरस्वती, हनुमानजी, अन्य देवों के साथ-साथ श्री गणेश का पूजन दीप जलाकर जल, रोली, चावल, खील-बताशे, अबीर, गुलाल, फूल, नारियल, धूप आदि से परिवारीजनों के साथ करते हैं।
सर्वप्रथम सद्बुद्धि-ज्ञान के देवता श्री गणेश का पूजन किया जाता है, तत्पश्चात् माँ लक्ष्मी तथा अन्य देवी-देवताओं का। अन्त में पान के पत्ते पर हलवा रख उसमें चाँदी का एक सिक्का डाल, इस सबको माँ लक्ष्मी को भोग प्रदान करते हुए उनके मुख पर चिपका दिया जाता है। साथ ही एक बड़े-से दीपक में घी डालकर उसे पूरी रात जलाने को रख दिया जाता है।
    माँ लक्ष्मी पूजन उन प्रतिष्ठानों या दुकानों में भी किया जाता है, जिनके बूते परिवार की रोजी-रोटी चलायी जाती है। इन स्थानों पर सभी व्यवसायी पुराने बहीखातों के स्थान पर नये बहीखाते बनाते हैं, जिस पर शुभ-लाभ, स्वास्तिक के चिन्ह और ‘श्री             लक्ष्मी सदा सहाय’ रोली-हल्दी आदि से लिखा जाता है। सभी व्यवसायी अपने इन नये खातों का पूजन करते हैं।
लक्ष्मी-पूजन का यह समस्त विधान उसी माँ लक्ष्मी से निरन्तर धन-वैभव प्राप्त करने का अनुष्ठान होता है, जिसके बूते जीवन में चमक, शांति और यश बढ़ते हैं।
    माँ लक्ष्मी उन्हीं को ‘ऋण मुक्ता’, ‘दारिद्रयहारिणी’ भी कहा जाता है। माँ लक्ष्मी उन्हीं साधकों को ऋण और दारिद्रय से मुक्त बनाती हैं, जो विकारों और आलस्य से विहीन होते हैं। जुआरियों, शराबियों, व्यभिचारियों, फिजूलखर्चियों आडम्बरियों या कामचोरों की पूजा-अर्चना से माँ लक्ष्मी कभी प्रसन्न नहीं होतीं।
    माँ लक्ष्मी से पूर्व ज्ञान और बुद्धि के देवता श्री गणेश का पूजन भी इसी कारण किया जाता है कि वह ऐसा ज्ञान या बुद्धि प्रदान करें, जिसके आलोक में उपकार की भावना पुष्पित-पल्लवित हो। अहंकार रूपी अंधकार का विनाश हो।
    माँ लक्ष्मी के पूजनोपरांत माँ सरस्वती की आराधना उन्हीं लोगों को फलदायी होती है, जो अपनी सृजनात्मकता के माध्यम से समाज में प्रेम, भाईचारे और मंगल की ज्योति जलाते हैं।
    माँ लक्ष्मी पूजन के समय पुरुषवर्ग हनुमानजी की पूजा इसलिए करता है ताकि वह भी श्रीराम जैसे सत्धारी का साथ देकर असुरों के विनाश में सहायक बन सके।
    दीपावली के दिन जुआ खेलने वालों, व्यभिचारियों, कामासुरों, अहंकारियों से माँ लक्ष्मी इतनी कुपित होती हैं कि वह ऐसे लोगों को सदा-सदा के लिये पतन, दरिद्रता, असफलता और अपयश के गर्त में धकेल देती हैं। अतः श्री लक्ष्मी-पूजन के समय हर किसी को विकारों से मुक्त होने का संकल्प लेना चाहिए। 
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बड़ी मादक होती है ब्रज की होली


तरह-तरह के गीले और सूखे रंगों की बौछार के साथ बड़ी ही धूम-धाम से मनाये जाने वाले त्योहार का नाम ‘होली’ है। होली का सम्बन्ध एक ओर गेंहू-जौ की पकी हुई फसल को निहारकर प्राप्त होने वाले आनंद से है तो दूसरी ओर इससे जुड़ी भक्त प्रहलाद की एक कथा भी है। माना जाता है कि एक नास्तिक, अहंकारी, दुराचारी राजा हिरण कश्यप अपने पुत्र प्रहलाद से इसलिये कुपित रहता था क्योंकि वह केवल अपने को ही सर्वशक्तिमान यहां तक कि भगवान मानता ही नहीं, मनवाना भी चाहता था। हिरण कश्यप की प्रजा तो उसके आगे नतमस्तक थी, किन्तु उसका पुत्र प्रहलाद धार्मिक प्रवृत्ति का और ईश्वर में व्यापक आस्था रखने वाला था। अपने पिता के स्थान पर वह ईश्वर को ही सर्वशक्तिमान मानता था। पुत्र की यही बात हिरणकश्यप को बुरी लगती थी। इसी कारण वह पुत्र का विरोधी ही नहीं उसके प्रति आक्रामक और हिंसक भी हो उठा। पुत्रा को मृत्युदण्ड देने के उसने कई उपाय किये, किन्तु सफल न हो सका। हिरण कश्यप की बहिन होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। वह प्रहलाद को लेकर धधकती आग पर बैठ गयी। अपने भक्त पर ईश्वर की कृपा देखिए कि भक्त प्रहलाद तो बच गया किन्तु अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त करने वाली होलिका जल गयी। इस दृश्य को देखकर जन समूह ने अपार खुशी मनायी। लोग वाद्ययंत्रों के साथ नाचे-कूदे-उछले-गाये। तभी से होली का त्योहार हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन अन्त्यंत मादकता और मस्ती के साथ मनाया जाता है।
इस दिन की बरसाने की लठामार होली इतनी रोचक और मस्ती प्रदान करने वाली होती है कि क्या कहने ! पुरुष नारियों पर बाल्टियां और पिचकारी भरकर रंगों की बौछार करते हैं तो नारियां रंग में भीगते हुए पुरुषों पर लाठियों से प्रहार करती हैं। होली खेलते हुए मादक चितवनों के वाणों के प्रहार इस त्योहार के अवसर पर जैसा मधुरस प्रदान करते हैं वह वर्णनातीत है।
ब्रज के लोक-साहित्य में कृष्ण और राधा के माध्यम बनाकर होली के गीतों को भी बड़े ही रोचक, रसमय तरीकों से लोक कवियों ने रचा है। इन रसाद्र गीतों को रसिया भी बोला जाता है। होली के अवसर पर लोग रसिया का लुत्फ, हुरियारे बनकर उठाते हैं । वे रंगों में सराबोर होते हुए, विजया के मद में डूबे, धमाल मचाते हैं और ढोल-ढोलक, हारमोनियम, तसला, चीमटा बजाते हुए इन रसीले गीतों को गाते हैं। शोर-शराबे, हो-हल्ले के साथ निकलने वाली चौपाई और रात्रिबेला में होने वाले फूलडोल अर्थात् रसिया-दंगल में गाये जाने वाले इन रसभरे गीतों से पूरा वातावरण होलीमय हो जाता है।
होली शरारतों, नटखटपन, हंसी-ठठ्ठा, मनोविनोद, व्यंग्य-व्यंजना, मजाक, ठिठोली के साथ खेले जाने वाला ऐसा त्यौहार है, जिसमें पिचकारी रंगों की वर्षा कर, एक दूसरे का तन तो भिगोती ही है, इस अवसर पर नयनों के वाण भी चलते हैं। वाण खाकर होली खेलने वाला मुस्कराता है। ‘होली आयी रे’, होली आयी रे’ चिल्लाता है। वाणों की पीड़ा उसके मन को रसाद्र करती है। उसमें अद्भुत मस्ती भरती है-
मेरे मन में उठती पीर
चलावै गोरी तीर, अचक ही नैनन के।
होली का अवसर हो और होली खेलने में धींगामुश्ती, उठापटक, खींचातानी न हो तो होली कैसी होली। एक हुरियारे ने होली खेलते-खेलते हुरियारिन की कैसी दुर्दशा की है उसी के शब्दों में-
होली के खिलाड़, सारी चूनर दीनी फाड़
मोतिन माल गले की तोरी, लहंगा-फरिया रंग में बोरी
दुलरौ तिलरौ तोड़ौ हार।
होली खेलने वाली नारि जब होली खेलने के लिये मस्ती में आती है तो लोक-लाज की सारी मर्यादाओं को तोड़कर होली खेलती है। अपने से बड़े जेठ या ससुर को भी वह वह देवर के समान प्यार पगे शब्द ‘लाला’ ‘लाला’ कहकर पुकारती है और स्पष्ट करती है-
लोक-लाज खूंटी पै ‘लाला’ घरि दई होरी पै।
होली खेलते हुए रंगों भरी पिचकारियों से निकलती रंगों की बौछार होली खेलने वाली नारि में मधुरस का संचार करती है-
पिचकारी के लगत ही मो मन उठी तरंग
जैसे मिसरी कन्द की मानो पी लई भंग।
होलिका-दहन के उपरांत असल उत्सव शुरू होता है। युवा वर्ग के हुरियारे भारी उमंग के साथ नृत्य करते, ढोल बजाते, होली के गाने गाते गेंहू की भुनी बालें लेकर घर-घर जाते हैं। एक-दूसरे के गले मिलते हैं। अपनों से बड़ों के चरण-स्पर्श करते हैं। बच्चे पिचकारियां और रंग से भरी बाल्टियां लेकर छतों पर चढ़ जाते हैं और टोल बनाकर आते हरियारों पर रंगों की बौछार करते हैं। फटी हुई पेंट-कमीज पहने, तरह-तरह की मूंछ-दाड़ी, जटाजूट और मुखौटे लगाये हुरियारे जब घर में बैठी नारियों को होली खेलने के लिये उकसाते हैं तो उनके मन की इच्छा को भांपते हुए उन पर रंग-भरी बाल्टियां-दर-बाल्टियां उड़ेल देते हैं। प्रतिक्रिया में हुरियारिन डंडा लेकर गली में निकल आती हैं और डंडे का प्रहार हुरियारों पर करती हैं। डंडों की मार अनूठा प्यार उत्पन्न करती है। चोट मिठास देती है। हुरियारिन कभी-कभी किसी हुरियारे को पकड़ लेती हैं और उसे अजीबोगरीब वेशभूषा पहनाकर कैसी दुर्दशा करती हैं, यह भी बड़े आनंददायी क्षण होते हैं- 
सखियन पकरे नन्द के लाला काजर मिस्सा दई लगाय
साड़ी और लहंगा पहनाऔ सीस ओढ़न दयौ उढ़ाय
हाथन मेंहदी, पांयन बिछुआ, पायल, झुमके भी पहनाय
देख-देख लाला की सूरत नर और नारि रहे मुस्काय।
कुल मिलाकर होली का पर्व सौहार्द्र तो पैदा करता ही है, वर्ण-जाति, वैर, द्वेश आदि को भी प्रेम-हास, परिहास और व्यंग्य-विनोद के माध्यम से समाप्त करने में अपनी सद्भाव की भूमिका निभाता है।
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हर घर में नहीं आती लक्ष्मी

 

दरिद्रता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। आदमी यदि दरिद्र हो तो उसे धन-प्राप्ति के लिये दूसरों के समक्ष याचना करनी पड़ती है। भिक्षा का सहारा लेना पड़ता है। धनहीन व्यक्ति को कोई भी सम्मान से नहीं देखता। धन के अभाव में न व्यक्ति अच्छा-सा मकान बनवा पाता है और न अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला पाता है। धन नहीं तो घर में अशांति ही अशांति, कलह ही कलह, समस्याएँ ही समस्याएँ। धन नहीं तो प्रसन्न मन नहीं। धनाभाव आदमी के सिर्फ घाव ही घाव करता है। बीमार पड़ने पर अच्छे क्या, सामान्य चिकित्सालय में भी इलाज कराना दूभर।

इसीलिए धन प्रदान करने वाली देवी लक्ष्मी की पूजा-आराधना-उपासना-साधना करना आवश्यक है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब समुद्रमन्थन से देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं तो भगवान विष्णु के साथ उनका पारिग्रहण हुआ। भगवान विष्णु की प्रिया लक्ष्मी जिस किसी पर भी अपनी कृपा कर देती है, उसका जीवन में धन-वैभव से भर जाता है। जिस किसी पर भी लक्ष्मी की कृपा हो जाये, उसे सेठ-साहूकार, सरकारी अधिकारी, लोकप्रिय नेता या एक बड़ा व्यापार बनने में देर नहीं लगती। आलीशान भवनों, लक्जरी कारों का स्वामी बनाती है लक्ष्मी। सम्मान, शौर्य और यश दिलाती है लक्ष्मी।

पर काँटे का सवाल यह है कि किसके घर आती है लक्ष्मी? किस पर अपनी कृपा बरसाती है लक्ष्मी? कार्तिक मास की अमावस्या जो दीपोत्सव, दीपावली, दिवाली के नाम से जानी जाती है, इस दिन भगवती माँ लक्ष्मी का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। हर कोई बड़ी ही श्रद्धा के साथ रात्रि बेला में देवी लक्ष्मी का सपरिवार पूजन करता है। माँ लक्ष्मी से निवेदन करता है कि वह उसके घर पधारकर सदा के लिए वास करें। श्रद्धापूर्वक पूजन करने के बावजूद अनेक व्यक्ति देवी लक्ष्मी की कृपा को प्राप्त नहीं कर पाते। ऐसा आखिर क्यों होता है? माँ लक्ष्मी का वास हर किसी के घर में क्यों नहीं होता?

इसका उत्तर यह है कि जो लोग मेहनती, सद्बुद्धि से युक्त, फुर्तीले, अच्छी योजनाएं बनाने वाले, दूरदर्शी, सदाचारी और परोपकारी होते हैं, मां लक्ष्मी को वही प्रसन्न करने में सफल हो पाते हैं।

जिन परिवारों में पति-पत्नी के बीच कलह होती रहती है, उन परिवारों से लक्ष्मी कभी प्रसन्न नहीं होती और न उनके घर वास करती है। ऐसे परिवार माँ लक्ष्मी का चाहे जिस विधि-विधान से पूजन कर लें, किन्तु लक्ष्मी की कृपा से वंचित ही रहते हैं।

जुआरी, सट्टेबाज, चोर, देशद्रोही, अहंकारी, व्यभिचारी माँ लक्ष्मी की पूजन कितने भी मनोयोग से कर लें, लेकिन माँ उन पर दया नहीं करती। ऐसे व्यक्तियों के घर वे अपनी बड़ी बहिन ‘दरिद्रा’ को भेज देती हैं, जो उन्हें समय-समय पर धन की हानि ही नहीं दिलाती, उन्हें अपयश का भागीदार भी बना देती है। भारी अपमान करा देती है। कारा में डलवा देती है। अवैध कमायी पर गुलछर्रे उड़ाने वालों की मति पर बैठी देवी लक्ष्मी की बहिन ‘दरिद्रा’ ऐसे व्यक्तियों से किसी न किसी दिन ऐसा कार्य जरूर करवा देती है जिससे उनकी सम्पूर्ण समाज में छवि धूमिल हो जाती है। कलमाणी, ए. राजा, रेड्डी बन्धु जैसे ख्याति प्राप्त और उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों का जो हश्र हुआ है, उसके मूल में माँ लक्ष्मी का कोप और दरिद्रा का वास स्पष्ट देखा जा सकता है। जो लोग सदाचारी, मेहनती, देशभक्त, लोकमंगल की भावना से ओत-प्रोत और अच्छे योजनाकार होते हैं, ऐसे व्यक्त्यिों की पूजा-अर्चना ही माँ लक्ष्मी तक पहुँचती है। माँ ऐसे व्यक्त्यिों से ही प्रसन्न होकर उनके कारोबार में दिन-दूनी और रात चैगुनी वृद्धि करती है। मिलावटखोर, तस्कर और चोर अपनी जीवन का हर भोर अन्ततः अंधेरे में तब्दील कर लेते हैं। जबकि सदाचरण के मार्ग को अपनाने वाले व्यक्ति की आराधना से माँ इतनी प्रसन्न होती हैं कि उसे न कभी धन-हानि होती है न मान-हानि। सदाचारी पर माँ की कृपा का चक्र जीवन-भर चलता है जबकि दुराचारी माँ लक्ष्मी का भले ही अनन्य भक्त हो, उसे अंततः ‘दरिद्रा’ के साथ ही रहना पड़ता है।

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शिव-स्वरूप है मंगलकारी


शास्त्रों की मान्यतानुसार पावन गंगा को अपनी लटों में धारण करने वाले, समस्त देवों के देव, अन्यन्त निर्मल, भोलेभाले महादेव शिव जितने उदार, परोपकारी, सौम्य और दयाभाव से भरे हुए हैं, उतने ही वे रौद्र रूप हैं। अन्य देवताओं के दो नेत्र हैं तो शिव त्रिनेत्रधारी हैं। शिव का तीसरा नेत्र जब भी खुलता है तो उससे निकलने वाली ज्वाला से समस्त अनिष्टकारी वातावरण जलकर राख हो जाता है।
तन पर मृगछाल, भस्मी लपेटे हुए, एक हाथ में त्रिशूल तो दूसरे हाथ में डमरू थामे, आक-धतूरे का सेवन करने वाले शिव स्वयं हलाहल पीकर दूसरों को अमृत पिलाते हैं। ब्रह्मा यदि विकाररहित ज्ञान के पुंज हैं तो महादेव शिव जगत को सत् और असत् में भेद कराकर कल्याण की ओर ले जाने वाले देव हैं।
शिव अर्थात् मंगलकारी विधान के रचयिता। शिव से सम्बन्धित ‘शिवरात्रि’ लौकिक व्यवहार में तत्पुरुष समास है जिसका अर्थ है शिव की रात्रि। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रथम समुल्लास में परमेश्वर के सौ नामों में शंकर या शिव का अर्थ इस प्रकार प्रकट किया गया है-‘ यः शं कल्याण, सुखं करोति स शंकर’ अर्थात् जो कल्याण करने वाला एवं सुख प्रदानकर्ता है, उसी ईश्वर का नाम शंकर है। शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं जिनके सिर पर गंगा और माथे पर अर्धचन्द्रमा है। वृषभ या नादिया उनकी सवारी है। गले में मुण्ड की माला है और सर्प लिपटे रहते हैं।
अमर कोष व्याख्या रामाश्रयी टीका पृ. 35 के अनुसार- ‘क’ पृत्यय से लस श्लेषण क्रीडनयो धातु से कैलाश की सिद्धि होती है- ‘कम इति जलम् ब्रह्म व तस्मिन के जले ब्रह्माणि लासः लसनमस्य इति कैलाशः’ अर्थात् क से अभिप्राय ब्रह्मजल से है क्योंकि क नाम ब्रह्म का है। परमयोगी साधक महादेव शिव परमानंद प्राप्त करने के लिये इसी कैलाश पर वास करते हैं।
शिव के वेश, स्वभाव और परिवेश के प्रति ध्यान दें तो वे तो वे जहाँ वास करते हैं, वह पर्वत है। पर्वत दृढ़ता का प्रतीक है। साधक पर्वत की भाँति ही अपने व्रत, कर्म और साधना में अडिग होता है। शिव का तीसरा नेत्र जो माथे पर स्थिति है वह ज्ञान नेत्रा का प्रतीक है। इसी नेत्र से कामाचार का प्रत्यूह जलकर राख होता है। अर्थ यह कि शिव कामांध होकर कभी अनाचार नहीं करते।
महादेव के माथे पर गंगाजी हैं। मस्तकवर्ती यह गंगा ज्ञानगंगा है | इनके सिर पर अर्धचन्द्रमा है जो आनंद, आशा और सौहार्द्र का प्रतीक है। शिव के चारों ओर विषधर लिपटे हुए हैं जो काम, क्रोध, मोह, मद, ईष्र्या, द्वेष, पक्षपात आदि के प्रतीक हैं। महादेव इन्हें अपने अन्तःकरण से न लिपटाते हुए अनासक्त भाव से विचरण करते हैं। शिव के एक हाथ में त्रिशूल तीन कष्टों दैविक, दैहिक, भौतिक का प्रतीक है। परमयोगी इन तीनों शूल रूपी कष्टों को अपने वश में किये रहते हैं और इसी त्रिशूल से असुरों का विनाश कर जगत के कष्ट को हरते हैं।
शिव के बायें हाथ में डमरू विराजमान है। डमरू शब्द संस्कृत के ‘दमरू’ शब्द का तद्भव शब्द है जो ‘दम’ [ दमन करना ] और ‘रू अर्थात् दमन के समय उत्पन्न होने वाली ध्वनि को प्रकट करता है। अर्थ यह कि शिव महान संयमी है। शिव को नीलकंठ भी कहते हैं। नीलकंठ अर्थात् विष के समान कटुतर बातों को जो कंठ से नीचे नहीं जाने देता अर्थात् महादेव का हृदय अत्यंत निर्मल है। 
शिव अपने शरीर पर इसलिए भस्म लपेटे रहते हैं ताकि इस संसार को बता सकें कि यह शरीर भस्म होने के लिये है अतः इससे मोह रखना व्यर्थ है।
शिव की सवार ‘नादिया’ नाद शब्द की ध्वनि को प्रकट करता है। नादिया को वृषभ की कहते है। जिसका प्रतीकार्थ है सुखों की वर्षा करने वाला।
शिव की पत्नी उमा हैं। इनका नाम उमा इसलिये है क्योंकि ‘ उ ब्रह्मीयते, ज्ञायते, यया, सा, ब्रह्म, विद्या उमा है जो प्रकाशवती होने से हेमवती है। शिव इसी हेमवती उमा अर्थात् हिमालय की पुत्री  पार्वती से पाणिग्रहण कर ब्रह्मविद्या के ज्ञाता होकर ब्रह्म-प्राप्ति में सफल होते हैं।
अर्थ यह है कि शिव सत्य स्वरूप हैं। सुख की वर्षा करने वाले, महाज्ञानी, पूर्ण योगी और सच्चे साधक हैं। शिव के इसी लोक मंगलकारी स्वरूप की पूजा महाशिव रात्रि के दिन भक्तगण करते हैं।
मान्यता है कि सृष्टि के प्रारम्भ हेतु फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन मध्य रात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रुद्र के रूप में अवतार हुआ था। प्रलय काल में भगवान शिव ने ताण्डव करते हुए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने तीसरे नेत्र की भीषण ज्वाला से भस्म कर दिया था। इसी कारण इस दिन को महाशिव रात्रि या कालरात्रि कहा जाता है।
महाशिव रात्रि से पूर्व काँवरिये अपनी-अपनी काँवर लेकर मोक्षदायिनी, पापहरणी गंगा के तट पर जाकर अपनी-अपनी काँवर को रंग-विरंगे वस्त्रों, चमकते दर्पणों, मूँगे-मोतियों, बहुरंगी रूमालों, धार्मिक चित्रों से सजाते हैं। गंगा स्नान करते हैं और गंगाजल के कलश काँवर के दोनों पलड़ों में रख, पैरों में घुँघरू बाँध अपने इष्ट देव शिव पर गंगाजल चढ़ाने हेतु निकल पड़ते हैं।
टोल बनाकर नाचते-गाते, बम-बम भोले के नारे लगाते हुए काँवरिये जब सड़कों, पगडंण्डियों से होकर गुजरते हैं तो पूरा वातावरण शिव-भक्तिमय हो जाता है। जो लोग काँवर नहीं ला पाते, वे सड़कों के किनारे तम्बू तानकर दूध, चाय, मिष्ठानों और फलों से काँवरियों का स्वागत-सत्कार कर पुण्य कमाते हैं।
महाशिवरात्रि के दिन माताएँ-बहिनें निराहार व्रत रखती हैं और काले तिल से स्नान कर रात्रि-बेला में पत्र-पुष्प, वस्त्र आदि से मंडप तैयार कर वेदी पर कलश की स्थापना के उपरान्त गौरी-शंकर और नन्दी की पूजा करती हैं।
अतः कहना उचित होगा कि महाशिव रात्रि पर्व समस्त जगत की भलाई के लिए हर मन में मंगल भाव जगाने और जगत को सुन्दरतम बनाने का एक सत्बोध पर्व है।
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माँ दुर्गा की नारी शक्ति 



क्वार सुदी प्रतिपदा से नवमी तक पवित्र मन के साथ अत्यंत संयम से नवरात्र में रखे जाने वाले व्रत में माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। प्रतिपदा के दिन प्रातः ही स्नानादि के उपरांत ‘दुर्गासप्तशती’ का पाठ नियमित रूप से हर दिन किया जाता है। वैष्णव लोग राम की मूर्ति स्थापित कर 9 दिन तक ‘रामचरित मानस’ का पाठ करते है। नवरात्र के दिनों में अनेक स्थानों पर रामलीला और श्रीकृष्णलीला का भी भव्य आयोजन होता है। माँ दुर्गा के मन्दिरों की भव्य सजावट की जाती है। इन मन्दिरों और लीला स्थलों पर भक्तजनों की भारी भीड़ रहती है।
क्वार सुदी अष्टमी को दुर्गाष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। इन दिन मंदिरों में भगवती दुर्गा को उबले हुए चने, हलुवा, पूड़ी, खीर आदि से भोग लगाकर प्रसाद का वितरण किया जाता है। इस  दिन महाशक्ति को प्रसन्न करने के लिये हवन आदि भी किया जाता है। जहाँ इस शक्ति की अधिक मान्यता है वहाँ यह त्यौहार एक उत्सव का रूप धारण कर लेता है। इस दिन कन्या लाँगुराओं को भोजन कराया जाता है। शक्ति की ज्योति की जय-जयकार की जाती है।
माँ दुर्गा नारी की महाशक्ति की प्रतीक हैं। देवताओं पर जब-जब भी भीषण संकट आया, उनके सिंहासन डाँवाडोल हुए, आसुरी शक्तियों के सामने वे थर-थर काँपे, तब-तब माँ दुर्गा का एक नया शक्ति-रूप प्रकट हुआ। इस नारी-शक्ति रूप ने देवी महाकाली बनकर कैटभ और मधु नामक उन दो दैत्यों का संहार किया जो ब्रह्माजी की हत्या करना चाहते थे। इन दैत्यों ने भगवान विष्णु से 5000 साल युद्ध किया। अत्यंत कुशल रणनीति से माँ महाकाली ने इन दोनों दैत्यों का वध कर स्वर्गलोक में शान्ति स्थापित की। माँ दुर्गा ने देवी महालक्ष्मी का रूप उस समय धारण किया, जब महिषासुर नामक दैत्य समस्त पृथ्वीलोक के राजाओं को हराकर स्वर्गलोक पहुँच गया और उसके समक्ष युद्ध के दौरान देवता हारकर भागने लगे। यह देख माँ दुर्गा ने महालक्ष्मी का रूप धारण किया और महिषासुर को युद्ध में मौत के घाट उतारा। देवी महा सरस्वती का नारी शक्तिरूप तब सामने आया जब शुम्भ-निशुम्भ नामक अत्यंत बलशाली दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण किया और देवता स्वर्ग से भागकर विष्णु की स्तुति करने लगे। उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति उत्पन्न हुई। इस ज्योति ने नारीरूप धारण कर शुम्भ-निशुम्भ, धूम्राक्ष, रक्तबीज, चण्डमुण्ड नामक सभी दैत्यों को मारकर देवताओं को पुनः स्वर्ग में स्थापित किया। देवी योगमाया के रूप में माँ दुर्गा उस समय प्रकट हुईं जब कंस नामक राक्षस पृथ्वी लोक में अत्याचार कर रहा था। देवी योग माया ने योग विद्या और महाविद्या बनकर श्रीकृष्ण का सहयोग करते हुए कंस के साथ-साथ चाणूर जैसी अनेक आसुरी शक्तियों को मौत के घाट उतारा। माँ दुर्गा ने पाँचवा नारीशक्ति रूप तब धारण किया जब वैप्रचिति नामक असुर के कुकर्मों से पूरी पृथ्वी व्याकुल थी। उस समय देवी रक्त दंतिका ने अवतार लिया और अपने दाँत गाड़कर वैप्रचिति और अन्य असुरों का रक्तपान कर उन्हें निर्जीव बना डाला। ठीक इसी प्रकार माँ दुर्गा ने शाकुम्भरी, देवी श्री दुर्गा, देवी भ्रामरी, देवी चण्डिका के रूप में नारी शक्ति का प्रयोग करते हुए सूखा के समय जल की वर्षा, दुर्गम नामक राक्षस का वध, सतीत्व को नष्ट करने वाले कामातुर राक्षस अरुण का वध, किया।
वर्तमान युग में भी माँ दुर्गा की नारी शक्ति चेतना के रूप समय-समय पर प्रकट होते रहे हैं। भारतीय नारियाँ अपने शौर्य, पराक्रम, वीरता और सतीत्व रक्षा के लिए पूरे संसार में प्रसिद्धि के शिखर पर रही हैं। एक नहीं अनेक नारियों ने सतीत्वरक्षा हेतु अग्नि शिखाओं का आलिंगन किया है। देश और जाति अथवा नारी सम्मान के लिये प्राणों को उत्सर्ग किया है। वीरागंना वीरमती, रानी दुर्गावती, महारानी कर्मवती, रानी कर्मवती, राजमाता जीजाब़ाई, येसुबाई, राजकुमारी रत्ना ने जहाँ क्रूर, अत्याचारी मुगलशासकों की तलवारों को धूल चटा दी, वहीं रानी लक्ष्मीबाई, वेलु नाचियार, भीमाबाई, रानी चेन्नम्मा, बेगम हजरत महल, पार्वती देवी, प्रीतिलता ने अंग्रेजी साम्राज्य को ध्वस्त करने के लिये तीर तलवार धारण कर यह सिद्ध कर दिया कि वे भी साक्षात दुर्गा हैं।
खनन माफियाओं पर नकेल कसने वाली दुर्गानागपाल, तालिबानियों को टक्कर देती मलाला युसुफ जई, मेरठ की रजिया सुल्तान और बलत्कृत दामिनी के पक्ष में जंतर-जंतर पर लाठियों के वार झेलती नारी शक्ति इसका ज्वलंत प्रमाण हैं कि समाज पर जब भी संकट के बादल छाये हैं, तब-तब नारीशक्ति का एक ज्योतिरूप अँधेरे को चीरता हुआ प्रकट हुआ है।
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पितरों के सदसंकल्पों की पूर्ति ही श्राद्ध


‘श्राद्ध प्रकाश’ में बृहस्पति कहते हैं कि सच्चे मन और आत्म-पवित्रता के साथ तैयार किये गये शुद्ध पकवान, दूध, दही, घी, तिल, कुश, जल आदि का उचित पात्र को दिया गया दान ही पितर के मन को प्रसन्न करता है। श्राद्ध पक्ष में मनुष्य द्वारा किये गये सुकार्य ही पितरों को लौकिक आवागमन से मुक्ति दिलाकर देवत्व की संज्ञा से विभूषित कराते हैं। पितरों को प्रेतयौनि से छुटकारा दिलाना है और अपने जीवन को शन्तिमय बनाना है तो श्राद्ध पक्ष में मन को पवित्र बनाने के साथ-साथ परोपकार से युक्त करने पर ही यह सम्भव है।
पितर प्रेत-योनि में अनायास नहीं भटकते। उनके अन्दर भटकती अतृत्त इच्छाएँ, मनोकमानाएँ और अधूरे संकल्प उन्हें मोक्ष प्राप्त कराने में बाधा बनते है। जिन लोगों ने मृत्यु से पूर्व तरह-तरह के अपराध किये हों, ऐसे लोग भी मृत्यु के उपरांत प्रेत यौनि में अशांत हुए विचरण करते हैं। प्रेतात्मा बने हुए व्यक्ति का मन पश्चाताप की उस तपन का अनुभव करता है, जिसके कारण-अकारण किसी अन्य व्यक्ति, परिवार या समाज को उसने दुःख पहुँचाया था। पश्चाताप की भट्टी में तपकर प्रेतात्माएँ निर्मल हो जाती हैं। प्रेतात्माओं की यही निर्मलता उनकी सन्तान को सुकार्यों के लिये प्रेरित करती है।
प्रेत-योनि में भटकती कोई भी आत्मा यह नहीं चाहेगी कि कुपथ पर चलने के कारण उसका जो यह अतृप्त या अमोक्ष  स्वरूप बना है, इस स्वरूप को आगे चलकर उनकी संताने भी अपनायें। अतः वही पितर अधिकांशतः कुपित, अशांत, उद्विग्न और अपनी संतान को शाप देने वाले होते हैं, जिनकी संताने मनुष्य  जीवन में अहंकारी, स्वार्थी, कृतघ्न और क्रूर होती हैं।
क्रूरता, स्वार्थ, कृतघ्नता और अहंकारपूर्ण व्यवहार से मुक्त होकर सदाचार, परोपकार की ओर आगे बढ़ने का नाम श्राद्धकर्म है। अतः पितरों में श्रद्धा रखने का अर्थ ही है कि श्राद्ध कर्म के समय यह संकल्प लिया जाये कि हे स्वार्गवासी मात-पिताओं हम ऐसा कोई कार्य नहीं करेंगे, जिससे तुम्हारी आत्मा को ठेस लगे। हम केवल उसी मार्ग पर चलेंगे, जो परोपकार और मानव मंगल की रौशनी से परिपूर्ण हो।
श्राद्ध के दिनों में वचितों, गरीबों को भोजन कराने से, निर्बल का बल बन जाने से, अनीति और अत्याचार का विरोध करने से, असहायों की सहायता करने से परमात्मा प्रसन्न होता है। आपके मन की सच्ची पुकार को सुनता है। आपके सुकार्यों को देखकर वह इतना द्रवीभूत हो उठता है कि वह आपके पितरों की भटकती हुई आत्माओं के लिये तो मोक्ष के द्वार खोलता ही है साथ ही आपके जीवन को वैभव और यश से भर देता है।
अतः श्राद्ध पक्ष में पितृ-आवाहन-पूजन के साथ-साथ ‘देव तर्पणम’ भी करना चाहिए। जल, वायु, अग्नि, यहाँ तक बुद्धि , प्रतिभा, करुणा, दया, प्रसन्नता पवित्रता आदि उसी परमात्मा के अंश हैं, जिनके बल पर हम उन्नति के सोपान चढ़ते हैं। सद्कर्मों में श्रद्धा रखते हुए सुमार्ग की ओर अग्रसर होना ही एक मात्र ऐसा उपाय है, जिससे पितर पक्ष मोक्ष को प्राप्त होता है और उसमें देवांश समाहित हो जाता है। यदि पितर देवतुल्य हो जाते हैं  तो आपके अशांत जीवन में शांति का समावेश हर हाल में हो जायेगा।
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सम्पर्क- 15/109, ईसानगर, निकट थाना सासनीगेट अलीगढ़-202001

मोबा.- 9634551630

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