सोमवार, 15 मई 2017

दिवस की कविता – धर्मेंद्र निर्मल

दिवस की कविता

छोड़कर किसी एक बात की

हद होती है हर बात की।।

साल भर शिक्षक

टेंटुआ फाड़ता है

रजिस्टर चाटता है

आए दिन फरमानों के पीछे

मगजमारी करता है

जाड़ घाम पानी

हर मौसम हर स्थिति में

जुतकर घानी

अशिक्षा की धूल झाड़ता है

देश में बेरोजगारी की

कील गाड़ता है

हम मनाते है शिक्षक दिवस

श्रीफल खाओ शाल ओढ़ो

बढ़ा-बढ़ा नम्बर

प्रशस्ति पत्र पढ़ो

और कागज में विकास गढ़ो।

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फूट पड़ती है बात

समाज उत्थान की

खुल जाते है वोट बैंक जगह-जगह

एकलबत्ती कनेक्शन, राशनकार्ड

स्वरोजगार योजना, पट्टा वगैरह-वगैरह

ये सब बचत खाता खोलने का जरिया है

इनके सहारे जनता की जेबों से

जब चाहे निकाल कर

भर लिए सूटकेस

मिलाते है चेश!

चलो

आँकड़ों में ही सही

तरक्की की ओर

कम से कम

एक कदम और

बढा तो अपना देश।

 

घोषणाएँ

दौड़ती हैं दिन रात

राजमहल के झण्डे लहराती

रथ पर हो सवार

विकास के नाम पर

पीठ पर लाद कर हमाल

हाँफता महँगाई ढोता है

भूखा चरणदास पसीने से सराबोर

ठेला पेलता है

रिक्शे का किराया

मालिक की जेब भरता है

हम मनाते है श्रम दिवस , मजदूर दिवस

फाइल पर हो सवार

घोषणाओं की बमबारी से

उड़ा देते है गरीबी का झण्डा

खड़ा रह जाता है अभाव का डण्डा

यही चिल्लाते कि

जय जवान जय किसान

तुमसे नहीं

मुझसे है भारत महान।

 

सीलन भरे झोपड़ों में कहीं

जमीन पर लेटा

कुपोसित और बीमार बच्चा

भूख से रोता है दर्द से कराहता है

तरसता तड़पता

माँ चूल्हे की उड़ती राख

धुंओं से कसकती आँखों को

फटी हुई साड़ी की एक छोर से पोंछती

और दु,ख और अभावों से फूटकर बहती

अंतस की अश्रुधाराओं को सोखती

उंडेल देती है बच्चों पर अपार ममता  

तब विकास की कहानी शुरू होती है।

अयोध्या सा हो जाता है

रसोई का माहौल

भूखे भारत के इस राज्यभिषेक

और

सत्यराम के वनगमन पर

बीता भर पोची पेट पर

सलवटों की शबरी

सुबक सुबककर

कहती है -राम !

जब तक नहीं लौटोगे तुम

जमा कर चिथड़ों में

चरण पादुका की धूल

चलाती रहूँगी जिंदगी

करती रहूँगी बँदगी

किराए की भीड़ जुटा कर

हम निकालते हैं

सद्भावना रैली

मनाते हैं

सद्भावना दिवस

और किसी महापुरूष की

उक्ति उच्चार

हम बना लेते है

स्वयं को महान।

 

अपचारी बच्चों को

शिक्षा व संस्कार न देकर

हम भेज रहें है बालगृह

जहाँ वे

उपचार तो दूर

उचित बात व्यवहार

बर्ताव को तरस रहे हैं

तो कहीं कदाचार के कोड़े

बरस रहे हैं

और हम मनाते हैं

बाल दिवस

बाँटते हैं कपड़े मिठाइयाँ आदि

कहते हुए गर्व से-

उतार दो तन के चिथड़े

पानी की किल्लत बढ़ गयी है बेटे!

इन्हीं से साफ करना

होटलों में प्लेटें।

 

आजकल नारियाँ

बाँधी जा रही नारों में

दहेज के कगार पर

लूटती है अस्मिता

चौराहों बाजारों में

कहीं रावण बेखौफ विचर रहा है

तो कहीं दुर्योधन

मूँछों पर ताव देता

जाँघें ठोंक रहा है

और लक्ष्मण

परित्राणाय साधूनाम् की

लक्ष्मणरेखा खींच

मुटि्ठयाँ भींचे

निशाचरों द्वारा विज्ञापित

स्वर्णमृग के पदचिन्ह तलाशता

भटक रहा है

वन में दर दर

हम मनाते है महिला दिवस

मुखौटा पहने हवस

टेंटुआ फाड़

देता है भाषण-

नारियों की ही उन्नति में देश का विकास है

हम उनके साथ है

जब चाहे सेंक ले

तंदूर तो अपने हाथ है।

 

महापुरूषों की शहादत और

त्याग के मशाल पर

सुलगाकर युवा पीढ़ी

विलासिता का सिगरेट

देती है संस्कृति को

प्रदूषण की अनुपम भेंट

हम मनाते है युवा दिवस

युवाओं के कंधे पर है

देश का भार

जिधर चाहे ले चलें

ऊँघते रहे हो सवार

बाद  कोसते चिल्लाते रहे

परिवार संस्कार

मतिमार।

 

धर्म के नाम पर

रोटियाँ सेंकी जा रही

अस्मिता बेची जा रही

विकास के नाम पर

बोलियाँ लगा रहा है

स्वार्थ ईमान का

भ्रष्टाचार के बाजार में

हम मनाते है राष्ट्रीय पर्व

बड़े धूमधाम से

कहते है गर्व से -

स्वतंत्रता अक्षुण्ण है।

पाश्चात्य की पट्टी में

देख नहीं पाते हम

कि हमारी मानसिकता का नाव

कितना संकीर्ण और

कहाँ पर छेद है।

 

पशुओं से भी

गए बीते

हो गए हैं हम

भूलवश नहीं

बल्कि

जानबूझ कर कहीं

छोड़ आए हैं

वन में संयम

वनमानुष से बन मानुष

हो गए हैं व्यस्त

जंगल में मंगल मनाने।

 

जनसंख्या

जैसे कोई अनारदाना हो

सरसराती निकलती ही जा रही

लड़ियाँ

और हमारे संस्कार,

धर्म

कर्म

और जीवन की महत्वपूर्ण

कड़ियाँ -माता पिता

छिटक कर

दूर जा रहे

शोभा बढ़ा रहे

वृद्धाश्रम में

एक नए नाम के साथ- वृद्धजन

हम मनाते हैं

मातृ दिवस पितृ दिवस

जैसे बदबूदार दलदल में

कमल के फूल

खिलखिलाते गुलाब के

बीच शूल

जैसे चंदन के जंगल में

इतराता बबूल।

 

हम

पढ़ रहे हैं

इबारतें  रोज

भ्रष्टाचार अनाचार दुराचार की

बढ़ रहे हैं लगातार

अनीति कुरीति दुर्गति की ओर

गढ़ रहें है नित नए

ईर्ष्या अहम अलगाववाद आतंक के

दुर्गम और अभेद्य किले

लड़ रहे है रोज

आपस में ।

 

सच कहूँ साथियों !

आज कल हम बड़े

बेशरम हो गए है।

चेहरे पर मुखौटा पहनें

संदेहों के दास्ताने लगाए

सिर्फ हाथ मिलाने लगे हैं

अपनों से ही क्या

अपने आप से भी

नजरे चुराने लगे हैं

तो कहाँ से कैसे मिलेंगे

दिल भला

आप ही बताइए जनाब।।

 


dharmendra nirmal
9406096346

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