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सामयिक आलेख - ललित साहू "जख्मी"

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यही तो है मजदूर
आलेख

         सूरज अपने पूरे आवेश पर था, तपती धूप और तीखी रौशनी में किसी की भी हिम्मत घर से बाहर निकलने की नहीं हो रही थी, जो निकल भी रहे थे वो मुंह ढंक कर या छाता ओढ़ कर निकल रहे थे, लोग पैदल चलते हुए जरा सी भी छांव को जाया नहीं कर रहे थे, भले उन्हें सांप की तरह लहरा के चलना पड़े पहाड़ी इलाके और गर्म हवाओं के बीच मैं भी अपना मुंह लपेटे साइकिल से पहाड़ी के पास ही रहने वाले अपने दोस्त के यहां जा रहा था, मैंने बढ़ी हुई गर्मी को कोसते हुए अपना दस मिनट का सफर बड़ी मुश्किल से पूरा किया और दोस्त के घर के बाहर साइकिल खड़ी करके आवाज लगाई, हीरा.! ओ हीरा..! मैं आया हूं ललित.!

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        अंदर से कोई आवाज नहीं आई शायद भीतर तक आवाज पहुंची ही नहीं मुझे पास से ही आ रही तेज कर्कश आवाज चुभने लगी क्योंकि शायद उसी वजह से मेरा दोस्त मेरी आवाज नहीं सुन पा रहा था, तभी ओ ध्वनि थम गई मानो ईश्वर ने मेरे मन को पढ़ लिया हो। मेरी नजर प्रसन्नचित होकर उस ध्वनि की दिशा में हो चली, शायद ईश्वर के अभिवादन के लिए आप से आप ही मुझसे ऐसा हो गया या फिर ईश्वर मुझे कुछ समझाना चाह रहे थे। तभी तो उसी वक्त मेरी नजर उस ध्वनि के जनक, या ध्वनि कर्ता के ऊपर पड़ी और पहले से पसीने से भीग चुका मेरा बदन शर्म से और तरबतर हो गया। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी का कठोर तप मेरी आंखों के सामने था जिसके आगे हमारे खोखले पन की पोल स्पष्ट उजागर हो रही थी।


        सामने एक वयोवृद्ध हाथ में हथौड़ा लिये खड़ा था, तन खुला था मानो वह पूर्ण आजादी चाहता हो, सर पर एक साफा बांध रखा था, मानो वह कहीं का शहंशाह हो, चिलचिलाती धूप और तपते पहाड़ियों के बीच अंगार जैसे पत्थरों पर नंगे पांव खड़े रहकर उसने माथे का पसीना पोंछा और नजर उठा कर सूरज की ओर देखा, उसके चेहरे के भाव से लगा मानो वह सूरज को ही चुनौती दे रहा हो कि आओ हम एक दूसरे को आजमाते हैं, उसकी नजर उस सूरज पर ही टिकी रही जिसे काला चश्मा पहन कर भी देख पाना हमारे लिए मुश्किल था, और ऐसे ही उसने अपना हाथ जमीन की ओर बढ़ाया और रोटी खाने के बाद पानी से भरे स्टील के एक डिब्बे को उठा कर मुंह से लगाया और पानी की धार को अपने कंठों से पेट तक उतार लिया, निश्चित ही इतनी तेज गर्मी में स्टील के डिब्बे में रखा पानी खौलने की स्थिति में रहा होगा फिर भी उसने उसे अमृत समझ कर ग्रहण किया था, और कुछ ही पलों बाद वह वयोवृद्ध बिस्तर पर आराम करने की उम्र में वजनी हथौड़े से पहाड़ चीरने लगा पत्थरों को कागज फाड़ने जितनी आसानी से तोड़ रहा था, और फिर से वही तेज धरती को कंपकंपा देने वाली ध्वनि मेरे कानों से टकराई ठक ठक ठक हर ठक की आवाज नगाड़े की थाप जैसी लगती थी मानो वह किसी की जीत या किसी के पराक्रम का जयगान कर रहें हो।

 
        और इस ध्वनि ने इस बार मुझे पहले से ज्यादा बेचैन किया पर ये बेचैनी कुछ और थी, इस बार बेचैनी मेरे आत्मा के किसी कोने से उठे सवालों की वजह से थे जो पूछ रहे थे कि ये वयोवृद्ध कौन है? क्या ये अपनी ही जीत के लिये ऐसी थाप दे रहा है? क्योंकि मानवता या इंसानियत की जीत तो ये कदापि नहीं थी। क्या इसे धूप गर्मी लू प्यास जैसे शब्दों का अर्थ पता नहीं? ये सब किसके लिये कर रहा है? क्या ये भी इंसान ही है? क्या इसके पास इस कार्य का कोई दूसरा विकल्प नहीं है? क्या इसे पुरा मेहनताना मिलता होगा? क्या इसे अच्छे कपड़े पहनने का मन नहीं होता होगा? क्या इसे राजनीति या राजनेताओं से कोई मतलब भी है? क्या इसे बड़ी-बड़ी बातों बड़े-बड़े वादों की जरूरत है? मैं सोचता रहा और सिर्फ सोचता रहा जैसे आप सब सोचते हैं कभी मजदूर दिवस पर एक दिन तो कभी चुनाव के वक्त कुछ हफ्ते.! पर इसी सोच में ये गर्म तपता मौसम मुझे भाने लगा, पता नहीं क्यों धूप से जल चुके उस वयोवृद्ध के काले शरीर को देखकर लगा की हमारे समाज की शक्ल कितनी काली है।


        तभी मेरा दोस्त पीछे से आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझसे कहा अरे ललित तू कब से आया है? चल बहुत धूप है अंदर चल कर बैठ.! मैं जैसे मेरा स्वप्न टूटा हो चौंक गया, और मुझे तो अब धूप लग ही नहीं रही थी, मैंने उसे उस वयोवृद्ध की ओर इशारा करके पूछा ये कौन है, मेरे दोस्त ने हंसते हुए कहा ये तो यहां रोज आता है, यही तो है मजदूर। मैं उसके साथ उसके घर पर लगभग घंटा भर रहा उसने बहुत सी बातें की पर मेरा ध्यान तो उसके एक वाक्य पर ही अटका रहा "यही तो है मजदूर" हाँ साहब एक बार फिर सुनिए "यही तो है मजदूर" ।

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स्वप्नलोक की आजादी
आलेख

        दोपहर का समय था, मैं सोफे में बैठ कर अखबार पढ़ रहा था, मैं उस दिन व्यथित-सा था, ऐसा शायद थकान की वजह से था, या कोई और बात थी यह मैं स्पष्ट नहीं कह सकता किन्तु उसी वजह से बैठे-बैठे ही मेरी आंख लग गई। नींद जैसे-जैसे गहराते गई मेरी नजरों के सामने एक धुंध सी छाने लगी फिर उसी धुंध ने आकृति का रूप लेना प्रारंभ किया संभवत: मैं स्वप्न लोक के द्वार पर खड़ा था। क्या कोई अपनी इच्छानुसार स्वप्न देखता है? या फिर उसे वही देखना पड़ता है जो उसे दिखाई देता है? ये सवाल अचानक से ही मैंने इसलिए किया क्योंकि मेरे स्वप्न में जो धुंधली-सी छवि उभरने लगी थी मैं ऐसी ही छवि हकीकत में पाना चाहता था।


       स्वप्न लोक में पहुंच कर मैं खुशनुमा एहसासों के अथाह सागर में खोता चला गया, वहां हवाओं में विश्वास और स्वच्छंदता की महक थी, जो अंत:करण को प्रफुल्लित कर रही थी। वातावरण वात्सल्य प्रेम की आद्रर्ता से भीगा हुआ था, आसमान ऊर्जा पराक्रम शौर्य गर्व उन्नति परिश्रम और नीति के सतरंगी इंद्रधनुषी रंगों से सुशोभित हो रहा था उसे देखकर मेरे मन में भी उमंग और उल्लास पैदा होने लगे, मैं थोड़ा आगे बढ़ा तो देखा कि कुछ और रास्ते भी यहां तक आते हैं पर सभी के दरवाजे बंद थे, उत्सुकता वश मैं उन दरवाजों के समीप जा पहुंचा वहां तीखी गंध थी। मुझे वह विषाक्त गंध जानी पहचानी सी लगी, पर कुछ ही पलों में वहां मेरा दम घुटने लगा, मैंने वहां से हट जाना उचित समझा और आगे बढ़कर उस मनमोहनी छवि का पीछा करने लगा मैं उसके जीतना करीब जाता उतना ही वो दूर हो जाती, पर मैं उसकी सादगी और सुंदरता की वजह से खिंचा जा रहा था, प्रयत्नों के बाद अंतत: मैंने उसे पकड़ ही लिया उसके चेहरे में एक अद्भुत तेज था जो मुझे मंत्र मुग्ध किये जा रहा था मैं उसके आभा मण्डल में जन्मों तक घिरा रहना चाहता था, उसकी निश्छलता, हृदय स्पर्शी मुस्कान, रवि के समान चमकती बिंदिया और प्राचीन संस्कृति का आभास कराते उसके श्रृंगार ने मुझे आकर्षित कर लिया, उससे त्याग तप संस्कृति की भीनी खुशबू आ रही थी। काया में सौम्यता उजला पन और परिधान अनेक रंगों से भरा पड़ा था, और कोई किसी से कम या ज्यादा नहीं लग रहा था। उसके नूपुर की खनक मधुर संगीत पैदा कर रही थी, उसके पैरों पर लाल रंग रचा हुआ था जैसे वह किसी की कुर्बानी के लहू पर चल के आई हो! लेकिन वह लाल रंग महावर जैसा सुशोभित हो रहा था। वाकई उस सुंदरी में सर से लेकर पांव तक सब कुछ वैसा ही था जो मैं कभी पाना या देखना चाहता था। मैंने उससे पूछा तुम कौन हो सुंदरी? उसका जवाब आया मैं तुम्हारे स्वप्न लोक की रानी 'आजादी' हूं। मुझे एक झटका सा लगा और मेरी नींद खुल गई।


        मैं समझ गया कि यह आजादी का ही प्रभाव था कि स्वप्न लोक इतना खुशनुमा लग रहा था, जहां ऐसी आजादी हो वह स्थान इतना प्यारा तो होगा ही। पर क्या मैं सच में आजादी का ही स्वप्न देख रहा था? मैं तो आजाद हूं.! फिर मैं और किसे पाना चाहता था? क्या आजादी सचमुच इतनी सुंदर होती है? ऐसे हजारों सवालों से मेरा सर चकराने लगा फिर मैंने सोचा की यह स्वप्न मैंने दिन में देखा है, संभवतः मैं अपने प्रयासों से अपने स्वप्न लोक की सुंदरी तलाश पाऊं। मैं उत्साहित होकर उसे सभी जगहों पर ढूंढने लगा। मुझे कई बार उसके मिलने का आभास हुआ लेकिन वह महज मेरा भ्रम ही था। उन सबकी ऊपरी सुंदरता तो मेरे स्वप्नलोक की आजादी से भी कहीं ज्यादा होती थी पर उसके अंदर के छल कपट की वजह से उनके संपर्क में मुझे वो सुकून नहीं मिलता था, जिसे मैं पाना चाहता था, हर बार दिखावे की आजादी ही मेरे हाथ आती थी।


        अब मैं हार कर एक जगह बैठ गया तभी एक कुरुप सी स्त्री पास आई और मेरे पास बैठ गई। मैंने उस पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया तब उसने ही मुझे कहा जिसे पागलों की तरह ढूंढ रहे थे जब वो सामने आई तो पहचान ना सके.! मैंने चौंक कर कहा कौन हो तुम? उसका जवाब था मैं वही आजादी हूं जिसे तुमने स्वप्न में देखा था। मैंने फिर कहा- कहां वो और कहां तुम? मेरी आजादी इतनी कुरुप तो बिल्कुल नहीं थी.! फिर उसने कहा तो फिर जाओ ना सुंदर सी दिखने वाली उसी कपटी आजादी के पास, जिसके कारण मेरा (वास्तविक आजादी) ये हाल हुआ है। क्या तुमको पता भी है कि मैं तुम्हारे स्वप्न से भी कहीं ज्यादा सुंदर थी, पर हिंसा भ्रष्टाचार और पाखंड जैसे दीमक ने मेरा ये हाल कर दिया है, मेरे तन पर ये रंग-बिरंगे परिधान सभ्यता और एकता के परिचायक थे, देखो..! अरे देखो ना.! लोगों ने कैसे इसके चिथड़े किये हैं। कहते हुए उसने मुझे झकझोर दिया। मैंने अपनी दुविधा मिटाने हेतु पुनः प्रश्न किया 'तो क्या लोगों को स्वप्न में ही आजादी मिल सकती है'? उसका जवाब था हाँ यही वास्तविकता है.! हर कोई स्वप्न में अपने हिसाब से आजादी चाहता है, पर उसे स्वप्न में भी वैसी ही आजादी मिलेगी जैसा वह चाहता है। जब तुम स्वप्नलोक में थे तब तुम्हें कुछ और दरवाजे नजर आये होंगे वो ईर्ष्या द्वेष अधर्म और आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता की मानसिकता रखने वालों के द्वार हैं। जिसके सामने तुम्हारा दम घुट रहा था। और तुमने जिस द्वार से प्रवेश किया था शांति संस्कृति सभ्यता धर्म के मार्ग से, ये उनके लिए घृणित हैं। आजादी का उनकी आंखों में बसा वर्तमान स्वरूप उन्हें उतना ही सजीला और मनमोहक लगता है, जितना की तुम्हें तुम्हारे विचारों में बसी आजादी लगती है। अब तुम्हीं बताओ मैं किस रूप में रहूं.? मुझे पता है कि मैं एक समय के बाद अपना यह वजूद भी खो दूंगी और लोग सिर्फ मेरा छलावा रूप ही देख पायेंगे, जो आजादी तो बिल्कुल ना होगी सिर्फ आजादी का भ्रम होगा। पर यह तो उनकी ही इच्छा है, और मानव चेष्टाओं के आगे तो ईश्वर भी विवश होता है।
        अपने बिखरते अस्तित्व को समेटे आजादी के पास बैठ कर भी मुझे बहुत सुकून मिला क्योंकि वह वास्तविक थी। और थोड़ी ही देर बाद मेरी दृष्टि पुनः झिलमिलाने लगी, पहले धुंध ने आकृति का रूप लिया था, और अब आकृति ने धुंध का रूप ले लिया। मैंने उसे रोकने की नाकाम कोशिश की, और असहाय खड़ा उसे धुंध बन कर उड़ते देखता रहा। पर आज भी मैं कुछ और लोगों की तरह यही उम्मीद लिये बैठा हूं, कि काश कहीं वास्तविक आजादी एक बार फिर मिल जाये, तो अबकी बार मैं उसे इस तरह जाने नहीं दूंगा।।

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ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला-गरियाबंद (छ.ग.)
9993841525

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