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बुद्ध-पूर्णिमा / ललित वर्मा"अंतर्जश्न",

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बुद्ध पूर्णिमा 10 मई  विशेष वैशाख-शुक्ल पूर्णिमा को बुद्ध-पूर्णिमा इसलिए कहा जाता है कि लगभग २५०० वर्ष पहले इसी दिन भगवान बुद्ध का जन्म हु...

बुद्ध पूर्णिमा 10 मई  विशेष

भगवान गौतम बुद्ध


वैशाख-शुक्ल पूर्णिमा को बुद्ध-पूर्णिमा इसलिए कहा जाता है कि लगभग २५०० वर्ष पहले इसी दिन भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, और पैंतीस वर्ष की उम्र में इसी दिन उन्हें पीपल वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए सत्य का अनुभव हुआ था, और अस्सी वर्ष की उम्र में इसी दिन उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई थी।

कहा जाता है कि भगवान बुद्ध का जन्म सन् ५६३ ईसा पूर्व कपिलवस्तु राज्य के लुम्बिनी नगर के पास के जंगल में यात्रा के दरम्यान् हुआ था, उनके पिता का नाम शुद्धोधन था, जो कपिलवस्तु के राजा थे, और माता का नाम महामाया था, भगवान बुद्ध के जन्म का नाम सिद्धार्थ था, उनके जन्म के समय एक साधु-महात्मा वहां पधारे थे, उन्होंने राजा शुद्धोधन के समक्ष यह भविष्यवाणी की थी कि सिद्धार्थ बड़ा होकर या तो बहुत बड़ा प्रतापी राजा होगा या बहुत बड़ा साधु-महात्मा । जब सिद्धार्थ छोटा था तभी उनकी माता का बीमारी के कारण देहान्त हो गया था, तब सिद्धार्थ को उसकी मौसी मां गौतमी ने पाला, तब से सिद्धार्थ को गौतम के नाम से भी जाना जाने लगा।

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राजा ने साधु-महात्मा की भविष्यवाणी को ध्यान में रखते हुए गौतम का लालन-पालन सुखों के बीच रखते हुए किया, उन्होंने संसार की नश्वरता का जरा भी भान गौतम को नहीं होने दिया, जब गौतम सोलह वर्ष का हुआ, तब उनका विवाह राजकुमारी यशोधरा के साथ कर दिया, कुछ वर्ष उपरांत राहुल नाम का एक पुत्र भी हुआ। गौतम का गृहस्थ जीवन बड़े सुख के साथ व्यतीत हो रहा था। पर होनी को कौन टाल सकता है, एक दिन गौतम घोड़ा-गाड़ी पर अपने नगर में घूम रहा था, तभी सामने एक आदमी को देखा जो कराह रहा था, उन्होंने अपने सारथी से पूछा, यह आदमी क्यों चिल्ला रहा है, तब सारथी ने कहा- यह आदमी बीमार है और दर्द के कारण तड़प रहा है, तो गौतम ने कहा- क्या मैं भी कभी बीमार होऊंगा, तो सारथी ने कहा- हां! हो सकते हो, तब गौतम सोच में पड़ गया ।

फिर उसके बाद गौतम ने क्रमशः एक बूढ़ा आदमी और एक लाश देखा, उनके बारे में जानकर वह गहरे सोच में पड़ गया, तभी उसने एक पीले वस्त्र धारण किये, माथे पर तिलक लगाये एक आदमी को देखा, उनके बारे में सारथी से जाना कि वे साधु-महात्मा है और जीवन के सत्य का अनुभव करने निकला है। तब से वह और भी गहरी सोच में रहने लगा कि ये जो भी चकाचौंध भरी जिंदगी दिख रही है ये सब झूठ है, तो सच क्या है ? फिर एक दिन उन्होंने ठान लिया कि वह सच को जानकर रहेगा, और रात में अपने राज-पाठ व परिवार को हमेशा के लिए छोड़कर साधु का वस्त्र धारण करके तपस्या करने जंगल को चला गया, तब उनकी उम्र पैंतीस वर्ष की थी। छह वर्ष कठोर तपस्या में बीत गया, तभी एक रात जब वह एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठा था, तभी उनके साथ कुछ ऐसा घटा कि उन्हें सत्य का ज्ञान हो गया। इस घटना को संबोधि कहा गया, और जिस पीपल पेड़ के नीचे वे संबोधि के समय बैठे थे, उस पेड़ को बोधि वृक्ष की संज्ञा मिली। संबोधि के बाद गौतम भगवान गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए।

सत्य का अनुभव होने के बाद भगवान बुद्ध अपनी देशना के प्रचार के लिए पूरे विश्व भर में घूमे। कहा जाता है कि जितने लोग उनके समय में बुद्धत्व को उपलब्ध हुए, उतने किसी और बुद्ध के समय नहीं हुए। उनकी देशना थी कि सत्य का अनुभव करने के लिए संसार की चार सच्चाई को समझना जरूरी है, १- संसार में दुख है, २- दुख का कारण तृष्णा या ईर्ष्या है, ३- दुखों का समुदाय है, ४- दुख को दूर करने का उपाय है। इन चारों सच्चाई पर समझ बनाने के बाद सत्य के अनुभव के लिए उन्होंने अष्टांग-मार्ग सुझाया, जिसका सार है- सदा सम स्थिति में रहना, अर्थात् न अधिक तप करो और न ही अधिक संसार में रत रहो, अर्थात् सम्यक स्थिति में रहते हुए ही सत्य का अनुभव किया जा सकता है।

उन्हें जब भी यह पूछा जाता था कि भगवान है? तो वे मौन हो जाते थे, अतः: उनके मौन रहने से बहुत से लोग यह समझते हैं कि वे भगवान को नहीं मानते थे। जबकि ऐसा नहीं है, उनका सोचना था कि कुछ प्रश्नों का जवाब मौन रहकर देना ही श्रेष्ठतम जवाब है, भई जो इंद्रियातीत है उसे कैसे बताया या समझाया जा सकता है, वह केवल अनुभवगम्य है।

भगवान बुद्ध गुरु प्रथा को नहीं मानते थे, वे खुद को कल्याणमित्र कहते थे, वे कहते थे कि मेरा अंधानुकरण मत करो, मैं तुम्हारे सत्य की खोज में तुम्हारा केवल मित्र हूं, केवल परामर्श दाता मात्र हूं, सत्य का खोज तो तुम्हें करना है, वह बाहर नहीं है, तुम्हारे भीतर है। वे साधक के बुद्धि को- जिसमें उठे तर्क को अपने तर्क से काटते हुए तर्कातीत की स्थिति में पहुंचा देते थे, और तब साधक खुद को सत्य के सामने पाता था। भगवान बुद्ध जीवन भर लोगों के कल्याण के लिए पूरे विश्व में घूमते रहे, वे सन् ४८३ ईसा पूर्व को वैशाख-शुक्ल पूर्णिमा के दिन महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए।

आज का युग तो घोर बुद्धि का युग है, अतः: आज के लोगों को यदि जीवन के यथार्थ सत्य का अनुभव करना है, तो इसके लिये सबसे सुगम रास्ता है बुद्ध की देशना पर चलना।

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ललित वर्मा"अंतर्जश्न",छुरा

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