मंगलवार, 30 मई 2017

पुस्तक समीक्षा काव्य संग्रह - कोई रोता है मेरे भीतर


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पुस्तक समीक्षा

काव्य संग्रह - कोई रोता है मेरे भीतर

कवि - आलोक वर्मा

प्रकाशक - बोधि प्रकाशन

मूल्य - 100/

" आलोक की आलोकित रचनायें "

अगर आप अच्छा साहित्य ढूंढ़ ढूंढ कर पढ़ते है, कविताएं आपका शौक है, आप भावुक है, बेहतर की तलाश है तो तलाशिए आलोक की कविताएं, बस एक कविता उनकी आपके हाथ लग गई तो फिर इस कवि को ढूंढ ढूंढ कर पढ़ना ही आपका मिशन हो जायेगा | आलोक बहुत ज़्यादा नहीं लिखते, बेवजह नहीं लिखते, और यह तय है कि " जिनका लेखन कम होता है - उनके लिखने में दम होता है " |

कवि आलोक वर्मा का काव्य संग्रह "कोई रोता है मेरे भीतर "

मेरे हाथ में है, शीर्षक में कितनी पीड़ा है, कितनी संवेदना है, कवि भीतर कितने गहरे तक आहत हुआ है इसका मुकम्मल बयान है शीर्षक |

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संग्रह में  इकसठ रचनायें शामिल है, सभी रचनायें अपने समय की मांग है, संग्रह की सभी रचनायें एक ही समय में नहीं लिखी गई है इसलिये ये सब एक ही मूड की रचनायें नहीं है लेकिन सभी का ग्राफ़ व्यापक है  | बड़ी बड़ी बात कहती छोटी छोटी कविताओं का संग्रह है यह | कही कही तो आलोक इतने कम शब्द इस्तेमाल करते है कि लगता है ये शब्दों की कंजूसी है, लेकिन जब उसी रचना को दूसरी और तीसरी बार पढ़ो तब अहसास होता है कि यह शब्दों की कंजूसी नहीं बल्कि शब्दों की फिजूल खर्ची पर आवश्यक नियंत्रण है - देखिये कम शब्दों की बड़ी कविता -

बाहर थी आधी कविता

झूमते हरे पेड़ के संग

भीतर थी आधी कविता

खून में डूबे

ज़िंदा दिल सी धड़कती /

छीन ली आधी कविता

भूखे गिद्धों ने

साथ रही आधी कविता

बुरे दिनों में /

न जाने

कहां गुम गई

पसीने में धुली

आधी कविता,

मिला

आधी कविता में

अक्सर

एक पूरा अफ़साना /

धंसी है

इन दिनों

आधी कविता में

एक पूरी तलवार -

चीखती है

आधी कविता

मेरी सूनी रातों में |


आप इस कविता को बार बार पढ़िये, कविता को हमेशा दोबारा तिबारा और चौबारा पढ़ना होता है, कबीर, गालिब, मुक्तिबोध को लोग ज़िंदगी भर पढ़ते है क्योंकि कविताएं हर बार नया अर्थ देती है | आप आलोक वर्मा की इस कविता को दूसरी, तीसरी और चौथी बार पढ़ के तो देखिये आप पर कविता का नशा छाने लगेगा, आप, आप नहीं रहेंगे, आपके दिमाग में आलोक की कविता से कविता का आलोक छाने लगेगा, यह नन्ही सी कविता आपको अहसास करा देगी कि " कोई रोता है मेरे भीतर " एक बार तो आप सोचने पर मजबूर हो जाओगे कि यह शख्स कवि है या चित्रकार ? कविता में हालात का चित्र कुछ यूं खींच देते है आलोक कि वह कवि की कविता नहीं बल्कि पाठक की कविता लगने लगती है, यही इनकी सफलता का परिचायक है | आलोक इस समय जो कविता लिख रहे है दरअसल वो " इस समय में कविता नहीं - बल्कि कविता में इस समय को लिख रहे है " |

" हाथ " शीर्षक की इस कविता की बानगी देखिये -

बहुत थोड़े

बस गिनती के थे

छिपे हुए

वे हाथ

जिन्होंने रखे बम

यात्रियों की गाड़ियों में /

बहुत ज़्यादा

अनगिनत थे वे हाथ

सामने आये जो

विस्फोट के बाद

संभालते हुए घायलों को /

बचाने वाले हाथ

हमेशा बहुत ज़्यादा होते है

और ज़्यादा ही रहेंगे

मारने वाले हाथों से |


आलोक उम्मीद के कवि हैं, आशा के कवि हैं, हौसलों के कवि हैं, तर्क के कवि हैं, पेशे से चिकित्सक आलोक बीमार व्यवस्था का शब्दों की दवा से इलाज कर रहे हैं, घायल मानवता की सलीके से मरहम पट्टी करने वाला यह खराब समय का अच्छा कवि है |

जब आप संग्रह की अन्य रचनायें, पढ़ने के नियम के अनुसार पढ़ेंगे तो पायेंगे कि प्रकृति प्रेमी इस कवि की कविताओं में नाराज़गी ज़रूर है पर क्रोध नहीं, आक्रोश इस कदर संयमित और अनुशासित है कि रचनायें पाठक के स्वभाव को भी कवि के स्वभाव में रूपांतरित कर देती है |

अगर आपने इस समीक्षा को यहां तक धैर्य से पढ़ा है तो फिर इस संग्रह को पढ़ना आपके लिये ज़रूरी हो जाता है ताकि साबित हो सके कि समीक्षक ने सच लिखा सच के सिवा कुछ न लिखा |


अखतर अली

आमानाका, कुकुरबेड़ा

कांच गोदाम के पास

रायपुर ( छत्तीसगढ़)

मो. 9826126781

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