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माँ पर लघु कथाएं / सुशील शर्मा

माँ –1

मेरे कमरे की खिड़की पर चिड़िया जोर जोर से चिल्ला रही थी। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया किन्तु जब उसकी चिचियाहट बढ़ गई तो मुझे लगा कोई बात जरूर है। वह बार बार मेरे पास कर फिर खिड़की पर बने घोंसले पर जा कर बैठ रही थी। मैंने पास जाकर देखा तो घोंसले में उसका एक बच्चा मरा पड़ा था। मैंने जैसे ही उस बच्चे को उठाने की कोशिश की चिड़िया जोर जोर से चीखने लगी और मेरे हाथ पर अपनी चोंच मारी मैं घबड़ा गया किन्तु जैसे तैसे मैंने उस मरे हुए चूजे को घोंसले से निकला। चिड़िया के लिए मन बहुत दुःख रहा था। मेरी पानी के आँखों में आंसू भरे थे। हमने पीछे बगीचे में ले जाकर उस चूजे का दाह संस्कार किये पीछे बगीचे तक चिड़िया जोर जोर से चीखती हुई हमारे पीछे आई और दाह संस्कार तक बहुत चीखी जैसे अपने बच्चे के लिए माँ बिलखती है। दोपहर को जब में सोकर उठा तो चिड़िया चुपचाप मेरे सिरहाने वाली खिड़की पर बैठी मेरी ओर  एक तक देख रही थी। उसकी उस चुप्पी में कृतज्ञता के भाव थे।

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माँ –2

पिछले  वर्ष मेरी बेटी का कक्षा 12 वीं का परीक्षा परिणाम आया था। अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होकर भोपाल  के सबसे अच्छे कालेज में उसका दाखिला हो गया था। सब बहुत प्रसन्न थे किन्तु मेरी पत्नी और माँ उसी दिन से उदास हो गईं थी। आखिर वह दिन भी आ गया जब बिट्टो को भोपाल जाना था। वह अपना सामान बांध रही थी। बहुत प्रसन्न थी आज जीवन के आकाश में उसकी पहली उड़ान थी। दादाजी उसको निर्देश दे रहे थे। उसकी दादी गुमसुम एक कोने में चुपचाप बैठी थी। मेरी पत्नी किचिन में उसके लिए नाश्ते की तैयारी कर रही थी। मैंने किचिन में जाकर देखा तो उसका पूरा चेहरा आंसुओं से तर था। झर झर आंसू बह रहे थे। मैंने समझने की कोशिश की तो मेरी पत्नी के एक वाक्य ने मुझे निरुत्तर कर दिया। "आप बाप हो माँ नहीं "

 

माँ –3

पड़ोस में रवि का मकान था ,पिता शिक्षा विभाग में क्लर्क थे। रवि १० वर्ष का होगा तब उनका देहावसान हो चुका था। माँ ने गरीबी में पाला पोसा बड़ा किया। बड़े होने पर पिता की जगह अनुकम्पा नौकरी मिल गयी। अच्छे घर  में शादी हुई सुन्दर बहु और बूढ़ी माँ के बीच कलह से रवि परेशान हो गया। रवि को परेशान देख कर माँ ने कहा "बेटा अब तुम बड़े हो गए हो कमाने भी लगे हो अपने अलग घर देखलो। " रवि माँ की मनःस्थिति समझ रहा है बहु मजबूरी में माँ से अलग रहने लगा। माँ अपना पूरा खर्च पेंशन से चलती थी। अचानक रवि की दोनों किडनियां ख़राब हो गईं। इलाज में पूरा पैसा खर्च हो गया। रवि की हालात दिनोदिन बिगड़ने लगी। डॉक्टर ने कहा अब सिर्फ किडनी प्रत्यारोपण ही रवि की जान बचा सकता है इसके लिए कम से कम 15 लाख रुपये और किडनी की आवश्यकता होगी।  आखिर बहु दौड़ती हुई सास के पास पहुंची बोली मांजी मेरे सुहाग को बचा लीजिये। माँ सुनकर अचंभित एवं सकते में आ गई फिर उसने कहा "बहू तुम मत घबराओ मेरे होते हुए तुम्हारे सुहाग को कुछ नहीं होगा। अपना घर बेंच कर रवि की माँ ने रवि को अपनी किडनी दी। आज रवि की किडनी का सफल प्रत्यारोपण हुआ। माँ की किडनी पर बेटा जीवित हो उठा। माँ मृत्यु शैया पर मुस्कुरा रही थी।

 

माँ –4

आज 53 साल के बाद भी मेरी माँ की आंखें मेरे लौटने तक दरवाजे पर टिकी होती हैं। आज भी सुबह से शाम तक कोई एक खाने की चीज माँ मुझे जरूर परोसती है। आज भी ठण्ड के मौसम में चूल्हे पर बनी चने की रोटी मुझे जरूर खिलाती है। आज भी गाड़ी पर बैठने पर पीछे से एक वाक्य जरूर सुनाई पड़ता है 'भैया गाड़ी धीरे चलाइयो " आज भी बीमार पड़ने पर लालमिर्च और राई से माँ मेरी नजर उतरती है। आज भी मेरे खाने के समय मेरी पत्नी को मेरी माँ का यह जुमला जरूर सुनना पड़ता है 'अच्छे से नहीं परसा आज उसने कम खाया है " आज भी बाहर जाने पर मेरी माँ मुझे 50 रुपये खर्च करने को देती है। आज भी मेरी बात मनवाने के लिए पिताजी से बहस करती है। आज भी इतना बड़ा होने के बाद लगता है उनका पांच साल का बच्चा हूँ।

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