मंगलवार, 23 मई 2017

कहानी / सुशीला बहू / रुचि प जैन

संजय सेनगुप्ता की कलाकृति

सुशीला बहू

हमारे पड़ोसी शर्मा जी के घर दो बेटों की शादी थी। हमारे यहाँ भी न्योता आया था। मैं और गुड्डी बहुत ही प्रसन्न थे, दावत उड़ाने जो मिलेगी। पूरे मोहल्ले में खुस फुस हो रही थी। मैं भी पूरा ख़बरी बन गया था।

खेलने जाता वहाँ महिला मंडली अपनी गप्पों का पिटारा खोले बैठी होती। कोई भी ख़बर शर्मा जी के बारे में होती तुरंत माँ को आ कर बताता। गुड्डी भी मेरी सहायक बनी हुयी थी।

दरअसल बात यह थी कि शर्मा जी का छोटा बेटा तो बैंक मैनेजर था। लेकिन बड़ा बेटा आवारा, निकम्मा , बेरोज़गार , कामचोर , आदि अलंकरणों से सम्मानित था। शर्मा जी व मिसेज़ शर्मा सरकारी स्कूल में शिक्षक थे पर पुत्र् प्रेम में अंधे भी थे। उन्हें अपने पुत्र में कोई कमी नहीं दिखती थी। हमेशा कहते दोनों पुत्रों की शादी एक साथ करेंगे ।जब तक बड़े की नहीं होगी ,छोटे की भी शादी नहीं करेंगे ।हमारे मोहल्ले में ही पाण्डेय दरोग़ा जी भी रहते थे। रिटायर्ड थे पर पूरे मोहल्ले के सलाहकार थे। उन्होंने शर्मा जी को कई बार समझाया कि छोटे बेटे की शादी कर दो ,पर वो तो अपनी बात पर अड़े रहे। सब अचम्भित भी थे कि उन्होंने अपनी बात पूरी करके दिखा दी। जैन आँटी तो हर जगह जा कर एक ही बात दोहरा रहीं थी, "अरे कौन मूर्ख मिल गया इनको जो अपनी बेटी को कूएँ में फेंक रहा है"। पाण्डेय जी हर रहस्य से पर्दा उठाने में माहिर थे, मोहल्ले भर की नज़रें उन्हीं पर टिकी थी। मानो कह रही हो ,पाण्डेय जी अब आप ही इस रहस्य की तह तक जा सकते है।

इधर शर्मा जी किसी को भी लड़की का अता-पता तक बताने को तैयार न थे। उन्हें डर था कि कहीं कोई शादी न तुड़वा दे। सबने लड़की की बस तस्वीर देखी थी। जिसमें कन्या सुदंर और सुशील दिख रही थी।

नाम भी सुशीला था। इसी कारण पूरा मोहल्ला ज़्यादा परेशान था। शादी की बात सुन कर सब यह अनुमान लगा रहे थे ,कि शायद कुरूप या मोटी ,भद्दी या.........ऐसा ही कुछ होगी। मिश्राइन यह सोच कर परेशान थी कि उन्हें सुदंर बहू क्यों न मिली। बहू बेटे के डर से यह बात वो खुलकर तो नहीं कहती ,पर जब भी मौक़ा मिलता दबी ज़बान से अपनी बात सरका देती।

दिन बीतते जा रहे थे पर रहस्य खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था । सबको पाण्डेय दरोग़ा जी से उम्मीद थी, अब तो जो कुछ करेंगे वो ही करेंगे सब ऐसा ही कहते। महेश्वरी आन्टी ने तो मिसेज़ पाण्डेय से कह भी दिया" अरे ज़रा पाण्डेय जी को मामला पता लगाने के लिए बोलिए"। मिसेज़ पाण्डेय भी गम्भीरता से सिर हिलाते हुए बोली कोशिश कर रहे है, जल्द ही पता चल जाएगा। इन बातों में मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था, पर माँ अक्सर ड़ाँटती " अभि फ़ालतू की बातों पर नहीं पढ़ाई पर ध्यान दो"।

दरअसल दादी की बीमारी के कारण माँ ज़्यादा बाहर नहीं निकलती थी। अकसर मोहल्ले की महिलाएँ ही हमारे घर आ जाती थी। दादी से भी मिल लेती और मसालेदार ख़बरें भी सुना जाती। उन्हीं से पता चला शर्मा जी अपने बेटों की शादी गंगानगर से न करके मध्यप्रदेश के किसी गाँव से कर रहे है। वहाँ उनके मामा का परिवार रहता था। किसी को गाँव का नाम तक न पता था। पूरे मुहल्ले को गंगानगर में ही दावत देने वाले थे शर्मा जी , किसी को भी साथ चलने का न्योता नहीं था।

शर्मा जी की इस गोपनीयता के कारण सब के मन में उथल-पुथल हो रही थी। हम सब दावत भी खा आये। सारी महिला मंडली ने अपने -अपने तरीक़े से मिसेज़ शर्मा से रहस्य उगलवाने की कोशिश की पर एक ही जवाब मिला

"लड़की बहुत अच्छी है, आएगी तब मिलने ज़रूर आना"। दावत के दो दिन बाद मैंने देखा, पाण्डेय जी और उनके पीछे मोहल्ले के अंकल ,आंटी तेज़ी से हमारे घर की तरफ़ आ रहे हैं। मैं अंदर जा कर माँ को बताता ,इसे पहले सब लोग हमारे दरवाज़े तक आ गए।

घंटी की आवाज़ सुन पिता जी ने दरवाज़ा खोला। दरवाज़ा खुलते ही पाण्डेय जी बोले "भाभी जी सबके लिए चाय नाश्ते का प्रबंध करवा दीजिए सबको एक ख़बर सुनाना है"।माँ भी गोपी हमारा नौकर को चाय -पकोड़े बनाने का निर्देश दे कर वहीं आ कर बैठ गई। अब पाण्डेय जी ने बोलना शुरु किया " अपने शर्मा जी की बड़ी बहू सुशीला उत्तराखंड के सांपला गाँव की है, बी.ए. पास है, सुर की पक्की है ,रेडियों स्टेशन में लोक गीत का प्रोग्राम देती है । माँ सौतेली है इसलिए ऐसे लड़के से शादी कर रही है। पिता की कुछ चलती नहीं है। सुना है लड़की बहुत गुणी है"। उनकी बात समाप्त होते ही पाँच मिनट के लिए शान्ति छा गई। ऐसा लगा जैसे सबको गहरा धक्का लगा हो। चुप्पी तोड़ते हुए माहेश्वरी जी बोले," पाण्डेय जी आपको यह सब कैसे पता चला"। पाण्डेय जी थोड़ा मुस्कुरा कर अपनी मूँछों पर ताव देते हुए बोले "हम पुलिस वाले है भाई"। सबके चेहरे पर मुस्कान की लकीर दौड़ गई ।फिर गला साफ़ करते हुए बोले " शर्मा जी का साला मेरे पुराने सहकर्मी रामदीन के पुश्तैनी मकान के पास रहता है, यह बात मुझे पता थी। पर रामदीन के पुश्तैनी घर का पता नहीं मालूम था। रामदीन भी रिटायर्ड हो गया इसलिए उससे सम्पर्क नहीं हो पा रहा था । मैंने अपनी खोज रामदीन का पता ढूँढने से शुरु की। रामदीन का पता मिलते ही अपने आप एक से एक कड़ी जुड़ती गई । रामदीन ने शर्मा जी के साले से विवाह स्थल ज्ञात किया । इत्तफ़ाक़ से मेरा एक जूनियर उसी गाँव में कार्यरत है, उसी ने सारी जानकारी खोज निकाली"। नाश्ता करने के बाद सब अपने-अपने घरों को चले गए। कुछ दिनों के बाद शर्मा जी अपने दोनों बेटे व बहुओं के साथ वापस आ गए ।

समय बीतने लगा सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। पर पाण्डेय जी ने समाज सेवा का चोला धारण कर लिया। शर्मा जी के बेटे के लिए नौकरी खोजनी शुरु कर दी। एक दो जगह उसे नौकरी पर लगवा भी दिया, पर वह ठहरा नालायक हर नौकरी को कुछ समय बाद ही गुड़ बाय कह देता। पाण्डेय जी ने थक हार कर शर्मा जी को समझाया बहू को बी.ए.ड. करवा कर कहीं टीचर लगवा दे। उनके घर की हालत किसी से छिपी नहीं थी। छोटे बेटे का दूसरे शहर में तबादला हो गया था। वह अपनी बीवी, बच्चों के साथ जा चुका था। बड़ा बेटा दो बेटों का बाप बन गया था पर अब सुबह शाम नशे में धुत्त रहता और सुशीला पर ज़ुल्म ढाता। शर्मा जी और मिसेज़ शर्मा रिटायर्ड हो गए थे। उन्हें जो पेंशन मिलती उसका आधा हिस्सा बेटे की शराब में उड़ जाता, पर वो पुत्र मोह में कुछ न कहते। सुशीला ने बी.ए.ड. कर लिया और वह सरकारी स्कूल में टीचर भी नियुक्त हो गई। लेकिन घर का माहौल नहीं बदला। सुशीला के बच्चे बड़े हो रहे थे, वह उन्हें अच्छे स्कूल में तालीम दिलाना चाहती थी । पर पति की आदत की वजह से घर में हमेशा पैसों की तंगी रहती थी ।वक़्त के साथ सुशीला में भी बदलाव आए वह माँ बन गई थी । उसने घर में ऐलान कर दिया कि वह अपने पति को शराब के लिए पैसे नहीं देंगी । उसकी इस हिमाक़त पर सब ख़फ़ा हो गए । वह अपनी बात से टस से मस न हुई ,अब उसे अपने बच्चों का भविष्य संवारना था। उस पर ज़ुल्म बढ़ते गए । मोहल्ले वालों ने शर्मा जी को बहुत समझाया कि बेटा ग़लत है, उसे रोके और बहू का साथ दे। शर्मा जी तो बेटे के साथ खड़े नज़र आए । सुशीला ने अपने पति से तलाक़ लेने का फ़ैसला कर लिया। इसमें पूरे मोहल्ले ने उसकी मदद की।

अदालत का फ़ैसला सुशीला के पक्ष में ही हुआ। अदालत ने पति को बच्चों की परवरिश के लिए सुशीला को पाँच लाख देने का आदेश दिया। शर्मा जी ने अपना मकान बेच कर बहू को पैसे दिये और ख़ुद बेटे के साथ अपने पुश्तैनी मकान में चले गये । अब सुशीला हमारे ही मोहल्ले में किराये के मकान में रहने लगी। अपने पुत्रों को पढ़ा लिखा कर क़ाबिल बनाना ही उसका लक्ष्य बन गया। स्कूल में पढ़ाने के अलावा घर पर भी बच्चों को पढ़ाती ,रेडियों स्टेशन पर कार्यक्रम देती। मोहल्ले वाले भी सुख -दुख में उसके साथ खड़े रहते। पाण्डेय जी ने तो उसके पिता की भूमिका निभाई वे बच्चों के नाना बन गए। सुशीला की मेहनत रंग लाई दोनों बेटों का दाख़िला मेडिकल में हो गया। पूरे मोहल्ले में जश्न का माहौल था। तभी किसी के पुकारने से मेरा ध्यान भंग हुआ। देखा माँ कमरे में घुसते हुए कह रही है ,"अभि मैंने तेरे लिए लड्डू बनाए है, खा लेना "। "नौकरी के साथ -साथ सेहत का भी ख़याल रखा कर"। मुस्कुरा कर मैंने माँ का पल्लू पकड़ कर कहा ," माँ तू चल मेरे साथ हैदराबाद , फिर तुझे मेरी चिंता नहीं करनी पड़ेगी "। माँ ने प्यार भरी नज़रों से देखते हुए कहा ," बच्चे दूर होते है तो माँ को चिंता लगी रहती है, तू अपना तबादला यहीं करा ले"। बहरहाल नौकरी पर तो मुझे जाना ही था, सो दीपावली पर आने का वायदा कर सबको अलविदा कह अपने सफ़र पर निकल पड़ा।

रुचि प जैन

E mail id- ruchipjain11@yahoo.com

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