शुक्रवार, 19 मई 2017

सबको मारा जिगर के शेरों ने / आसिफ़ सईद

देविंदर शुक्ला की कलाकृति

सबको मारा जिगर के शेरों ने

जिगर मुरादाबादी का स्थान उर्दू साहित्य में बहुत ऊंचा है। इनका जन्म मुरादाबाद के एक शायर अली 'नज़र' साहब के घर हुआ और इनका वास्तविक नाम अली सिकन्दर था। वह बड़े ही मिलनसार सज्जन पुरूष थे और बड़े ही स्वच्छ दय के स्वामी थे, जिगर राजनैतिक बातों से स्वयं को दूर रखते थे, इस सम्बन्ध में वह कहते हैं -

इनका जो फ़र्ज़ है वह अहले सियासत जाने,

मेरा पैग़ाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुँचे।

[ads-post]

जिगर साहब भारतीय संस्कृति का एक विशिष्ट बिन्दु थे, उन्होंने कोट पतलून कभी नहीं पहना। बालों वाली ऊंची काली टोपी और शेरवानी पहनते थे, गरमियों में बारीक मलमल का कुर्ता और अलीगढ़ फ़ैशन का तंग मुहरी का पायजामा पहनते, काली पंप या सलीमशाही जूता उनके लिबास का अंग था। कभी-कभी चूड़ीदार पायजामा भी पहनते परन्तु उसको पहनने और उतारने में जो परेशानी आती उससे बचना चाहते, हुक्के से बचते सिगरेट पीते। जिगर की शिक्षा बहुत साधारण थी। अंगे्रज़ी भाषा का ज्ञान बस नाम मात्र् को था। तेरह वर्ष की आयु से ही उन्होंने शेर कहने शुरू कर दिये थे। आरम्भ में पिता से संशोधन लेते रहे परन्तु बाद में 'दाग़' देहलवी को अपनी ग़ज़लें दिखाईं। दाग़ के बाद मुंशी अमीर उल्ला तसलीम और रसा रामपुरी को ग़ज़ले दिखाते रहे। शायरी में सूफ़ियाना रंग असग़र गोंडवी की संगत का फल था।

1921ई0 में जिगर का पहला दीवान दाग़े जिगर प्रकाशित हुआ। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने 1923 ई0 में 'शोला-ए-तूर' के नाम से एक संकलन छापा। उर्दू में उन जैसे रोचक गंभीर, मस्त और प्रेममय शायर कम ही हुए हैं। उन्हें अपने जीवनकाल में बड़ी मान्यता प्राप्त हुई। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टर की उपाधि दी गयी और उन्हें अपनी पुस्तक 'आतिशोगुल' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। सचमुच जिगर अपनी शायरी से ज़माने पर छा गये थे। उनका जीवन इस शेर की तस्वीर था -

ज़माने पर क्यामत बन के छा जा,

बना बैठा है तूफां दर नफ़स क्या।

या फिर-

गुलशन परस्त हूँ मैं मुझे गुल ही नहीं अज़ीज़,

कांटों से भी निबाह किये जा रहा हूँ मैं।

जिगर कोई दार्शनिक न थे, लेकिन उनकी शायरी में मनोविज्ञान की गहरी छाप देखी जा सकती है, सुन्दरता और प्रेम उनकी शायरी की बुनियाद है, वह पवित्र् प्रेम के पुजारी थे और प्रेम की महानता को समझते थे, तभी तो वह कहते हैं-

मुहब्बत ही अपना मज़हब है लेकिन,

तरीके मुहब्बत जुदा चाहता हूँ।

- - -

न जाने मुहब्बत है क्या चीज़,

बड़ी ही मुहब्बत से हम देखते हैं।

जिगर जीवन में आयी परेशानियों से घबराते नहीं थे बल्कि उनका डटकर सामना करते थे और कहते थे-

अपना ज़माना आप बनाते हैं अहले दिल,

हम वो नहीं कि जिनको ज़माना बना गया।

जिगर का जीवन प्रेममय था, उन्होंने एक बार नहीं कई बार प्रेम की विचित्र् लीला देखी, कभी एक के इ८क में फंसे कभी दूसरे के, वह अपने इसी इ८क को अपनी शायरी का कारण मानते थे -

मेरा कमाले शेर बस इतना है ए जिगर,

वो मुझ पे छा गये मैं ज़माने पे छा गया।

मुरादाबाद छोड़ने के बाद वे आगरा में बस गये वहाँ उन्हें एक तवायफ़ वहीदन से प्यार हो गया। कहा जाता है कि उससे उन्होंने विवाह भी कर लिया था लेकिन विवाह के दो वर्ष बाद ही वह जिगर को रोता छोड़ इस संसार से चली गयी। जिगर पाग़लों की भांति शहर-शहर घूमने लगे, उनकी इस दशा को देख उसी समय के प्रख्यात शायर असगर गोंडवी ने उनकी सहायता की और अपनी साली का विवाह जिगर से करा दिया। परन्तु जिगर साहब इस बीच शराब में इस कदर डूब गये थे कि कहीं इन्हें मुशायरों में भी जाना होता था तो शाराब के नशे में ही गिरते-पड़ते पहुँचते और शराब के सुरूर में ही शेर पढ़ते और अपनी दशा देख स्वयं कहते -

सबको मारा जिगर के शेरों ने।

और जिगर को शराब ने मारा।।

किन्हीं कारणों से उन्हें दूसरी पत्नी को भी तलाक देना पड़ा और बाद में उन्हें मैनपुरी की एक तवायफ़ शीराज़न से प्रेम हो गया, वह तवायफ़ की गली को तूर कहा करते थे, तूर उस पर्वत का नाम है जहाँ हज़रत मूसा को परमात्मा द्वारा प्रकाश दिखाई दिया था। इन्हीं बातों से जिगर ने अपने काव्य-संग्रह का नाम 'शोला ए-तूर' रखा।

जीवन नैया चलाने के लिए जिगर ने स्टेशनों पर चश्मे भी बेचे, चेहरे की बनावट कुछ ऐसी थी कि अच्छे ख़ासे बदसूरत व्यक्ति गिने जाते थे, मगर बदसूरती अच्छे शेर कहने की क्षमता तले दब गयी थी। उर्दू के हास्य लेखक शौकत थानवी ने शायद बिल्कुल ठीक लिखा है कि शेर पढ़ते समय उनकी शक्ल एकदम बदल जाती थी और उनके चेहरे पर लालित्य आ जाता था। एक सुन्दर मुस्कान एक मनोहर कोमलता तथा सरलता के प्रभाव से जिगर का व्यक्तित्व किरणें भी बिखेरने लगता था, उनके शेरों की कुछ पंक्तियाँ और देखिए -

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क ने जाना है,

हम ख़ाक नशीनों की ठोकर में ज़माना है।

- - -

अब उनका क्या भरोसा वो आयें या ना आयें,

आ ऐ ग़में मुहब्बत तुझको गले लगाऐं।

ऊपर हमने लिखा कि जिगर साहब ने असगर गोंडवी की साली से विवाह किया फिर उसको तलाक दे दी। बाद में असगर साहब ने साली से स्वयं विवाह कर लिया यह एक विचित्र् सी बात है कि असगर साहब की मृत्यु के पश्चात जिगर ने फिर उसी लड़की से दोबारा विवाह कर लिया परन्तु विवाह इस शर्त पर हुआ कि जिगर शराब को छोड़ देंगे पुराने प्रेम ने कुछ ऐसा ज़ोर मारा कि जिगर इस शर्त को मान गये। हृदय पर वहीदन के मरने का जो घाव था वह भी मिट गया और शीराज़न को भी उन्होंने भुला दिया।

जिगर के शेर पढ़ने का ढंग कुछ ऐसा मोहक और तरन्नुम जादूभरा था कि उस समय के उभरते नौजवान शायर उन जैसा शेर कहने और उन्हीं के से ढंग से शेर पढ़ने की न केवल चेष्टा करते बल्कि अपना हुलिया, रूप-रंग जिगर जैसा ही बना लेते। लम्बे उलझे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी, अस्त-व्यस्त कपड़े, उन्हीं की तरह बेतहाशा शराब पीना। जिगर के शेर देख जान पड़ता है कि प्रेम उनके शरीर में शराब की भांति ही दौड़ता था, वह कहते थे-

दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद।

अब मुझको नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद।।

- - -

एक लफ़्ज़े मुहब्बत अदना ये फ़साना है।

सिमटे तो दिले आशिक फैले तो ज़माना है।।

हम इ८क के मारों का बस इतना ही फ़साना है।

रोने को नहीं कोई हंसने को ज़माना है।।

उनका गला इतना मधुर था कि जब वह गाकर पढ़ते थे तो श्रोता मंत्र्मुग्ध हो जाते। उनकी आवाज़ जादू का सा असर करती थी। उनके कुछ करूणादायक शेरों पर भी दृष्टि डालते हैं-

इससे बढ़कर दोस्त कोई दूसरा होता नहीं, सब जुदा हो जायें ग़म जुदा होता नहीं।

- - -

निगाहे लुत्फ़ की इक-इक अदा ने लूट लिया,

वफ़ा के भेस में उस बेवफ़ा ने लूट लिया।

- - -

बताओ क्या तुम्हारे दिल पर गुज़रे,

अगर कोई तुम्हीं सा बेवफ़ा हो।

मुशायरों को अपने विशिष्ट व्यक्तित्व से रंगीन बनाने वाला और जीवन के मर्म को इशारों से समझाने वाला यह शायर अपने विषय में स्वयं ही सत्य कह गया है-

जानकर मिन जुमलाए ख़ासाने मयख़ाना मुझे,

मुद्दतों रोया करेंगे जामों पैमाना मुझे।

अपने अन्तिम समय में यह महान शायर ज़िला गोंडे में ही रहने लगा था और वहीं सन् 1958 में इस प्रतिभाशाली शायर ने शरीर रूपी मिट्टी का चोला उतार कर संसार में नाता तोड़ लिया और जाते-जाते कह गया-

जान दे दी जिगर ने आज पाए यार पर।

उम्र भर की बेकरारी को करार आ ही गया ।।

----

डॉ0 आसिफ़ सईद

जी-4, रिज़वी अपार्टमेन्ट, द्वितीय

मेडिकल रोड, अलीगढ़

उ0प्र0 भारत

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------