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शब्द संधान / हर शाख पे / डा. सुरेन्द्र वर्मा


“बरबाद गुलिस्तां करने को तो एक ही उल्लू काफी था

हर शाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा”

जां निसार अख्तर का यह एक मशहूर शेर है | आज जब हर जगह बेईमान और भष्टाचारी लोग समाज में कब्ज़ा जमाए बैठे हैं, यह शेर आजकल के हालात को बयाँ करने के लिए बड़ा माकूल नज़र आता है और इसे इफरात से इस्तेमाल भी किया गया है | लेकिन फिलहाल मैं इस शेर की उस “शाख” के बारे में आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ जिसपर शायर ने उल्लू को बैठाला है |

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ज़ाहिर है यह शाख किसी न किसी वृक्ष की ही होगी | किसी भी वृक्ष की डाली को उसकी शाख कहते हैं | शाख, शब्द, फारसी का है | हिन्दी में यह बहुत बाद में आया है | हिन्दी में किसी भी शब्द के नीचे अनुस्वार नहीं लगता | अगर किसी शब्द में यह अनुस्वार लगता है तो आप बिना किसी संकोच के उसे फारसी या अरबी का शब्द मान सकते हैं | क़लम, ख़ात्मा, ग़लत, ज़रा आदि, शब्द इसके उदाहरण हैं |

संस्कृत का शब्द ‘शाखा’ है यही उर्दू में आते आते ‘शाख’ बन गया और शाख को भी हिन्दी ने बड़े प्रेम से अपना लिया ठीक जैसे संस्कृत का शाखा अपनाया गया| शाखा पेड़ और पेड़ की डाल को कहते हैं | दरवाज़े की चौखट भी शाखा कहलाती है | शरीर के अनेक अंग होते हैं जैसे बाहें, पैर आदि, ये भी शरीर की शाखाएं हैं | स्टेट बैंक आफ इंडिया की देश भर में अनेक शाखाएं हैं | किसी दुकान, व्यापारिक संस्थान या संस्था की भी अनेक शाखाएं हो सकती हैं | किसी भी प्रधान कार्यालय की अनेक शाखाएं होती हैं | हर शहर में एक प्रधान डाकघर होता है और उसकी अनेक शाखाएं होती हैं | हर नगर में कुछ उप-नगर होते हैं, ये उप-नगर उस नगर की शाखाएं हैं |

शाख या शाखा मूलत: तो पेड़-पौधों की डालियाँ ही हैं, लेकिन एक विस्तृत अर्थ में किसी भी चीज़ का अंग, भाग या भेद भी उसकी शाखा ही मान ली गई है | किसी भी पाठ्य-विषय की अनेक शाखाएं हो सकती हैं | उदाहरण के लिए भारतीय दर्शन की अनेक शाखाएं, भेद या सम्प्रदाय हैं | कोई भी व्यक्ति किस वंश का है, इसका पता भी हम “वंश-वृक्ष” से ही लगाते हैं जो अनेक शाखाओं में बंटा होता है | आर एस एस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) कोई राजनैतिक पार्टी नहीं है लेकिन देश भर में उसकी शाखाएं ‘लगती’ हैं जहां स्वयं सेवकों को अनुशासन और राष्ट्र-हित की शिक्षा प्रदान की जाती है |

किसी भी बड़ी नदी में मिलने वाली छोटी छोटी नदियाँ, धाराएं, नदी की शाखाएं कहलाती हैं | किसी नदी से जब हम कोई नहर निकालते हैं तो वह भी नदी की एक अलग शाखा बन जाती है | कहते हैं नदी बहती है, ठीक वैसे ही समय भी निरंतर बहता है, रुकता नहीं | हम समय को बाँध नहीं सकते | लेकिन अध्ययन हेतु हमने समय को भी घंटों, मिनटों, लम्हों, आदि में विभाजित कर दिया है | एक शायर कहता है “ वक्त की शाख पर लगा एक बहतरीन लम्हा हो तुम !”

शाख है तो विशाख भी है | मूलत: जो शाखाहीन है, वह विशाख है | लेकिन मजेदार बात यह है कि ‘विशाखक’ का अर्थ शाखाओं वाले से है | संस्कृत में विशाख कार्तिकेय को कहा गया है, भगवान शिव भी विशाख हैं | यहाँ तक कि बच्चों के लिए खतरनाक समझा जाने वाला एक दैत्य (अपस्मार रोग) भी विशाख कहा गया है | मुद्रा राक्षस के रचयिता विशाख दत्त हैं | विशाखा एक नक्षत्र है | काली, जो अपराजिता है, भी विशाखा कही गई है |

शेख, शोखी, शोख – शाख से मिलते-जुलते शब्द हैं | लेकिन इनका शाख से कोई लेना-देना नहीं है, सिवा इसके कि ये सबमें श और ख़, शाख के इन दोनों ही अक्षरों का इस्तेमाल हुआ है | शाख कभी शोखी नहीं बघारती | उसपर तो कोई भी बैठ सकता है – कोयल भी और बकौल शायर, उल्लू भी |

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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शाख से विशाख तक का सफर बहुत जानकारी पूर्ण रहा।मज़ा आया।मनीषा।

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