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भाईचारे का प्रतीक पर्व: लोहड़ी / रमेशराज

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‘लोहड़ी’, ‘तिल’ तथा ‘रोड़ी’ शब्दों के मेल से बना है, जो शुरू में ‘तिलोड़ी’ के रूप में प्रचलन में आया और आगे चलकर यह ‘लोहड़ी’ के नाम से रूढ़ हो गया। ‘लोहड़ी’ पंजाबियों का प्रमुख त्योहार है जो पौष माह की विदाई और माघ मास के स्वागत में खुशी और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पंजाब या उससे अलग अनेक क्षेत्रों में इसे ‘लोही’, ‘लोई’, ‘लोढ़ी’ आदि नामों से भी पुकारा जाता है। लोहड़ी आपसी भाईचारे प्रेम-सद्भाव का प्रतीक है। पौष माह की अन्तिम रात को ढ़ोल की थाप और भंगड़ा नत्य के साथ परिवारों एवं आस-पड़ोस के लोगों सहित सामूहिक रूप से मनाये जाने वाले इस त्योहार के सम्बन्ध में एक प्रमुख कथा यह है कि मुगलों के समय में दुल्हा भट्टी नामक एक बहादुर योद्धा था। इस योद्धा ने मुगलों के अत्याचारों का खुलकर विरोध किया। उस समय एक ब्राह्मण जो अत्यंत दरिद्र था। उसकी दो पुत्रियाँ अत्यंत सुन्दर और गुणवान थीं। मुगल बादशाह ब्राह्मण की इन दोनों पुत्रियों ‘सुन्दरी’ और ‘मुन्दरी’ से जबरन शादी करना चाहता था। उन दोनों की सगाई कहीं और हो गयी थी। मुगल बादषाह की दाब-धौंस से तंग आकर एक दिन ब्राह्मण ने अपने मन की व्यथा दुल्हा भट्टी को सुनायी। दुल्हा भट्टी ब्राह्मण की दोनों पुत्रियों को जंगल में ले गया और वहीं उसने लड़कियों के मंगेतरों को बुला लिया और आग जलाकर अग्नि के सम्मुख उनके सात फेरे डलवा दिये। यही नहीं उसने स्वयं उनके कन्यादान की रस्म भी निभायी। उस समय दोनों दूल्हों ने शगुन के रूप में दुल्हा भट्टी को शक्कर भेंट की। लोहड़ी के उत्सव के समय गाये जाने वाला यह गीत घटना की स्पष्ट गवाही देता है- ‘‘सुन्दरिये भट्टी वाला हो/दूल्हे धी ब्याही हो/सेर शक्कर पायी हो।’’

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अत्याचार के विरूद्ध जिस प्रकार वीर योद्धा दूल्हा भट्टी ने अपनी आवाज बुलंद की थी और मानवता की रक्षार्थ समय-समय पर अपने प्राण संकट में डाले थे, पंजाबी लोग आज भी उसे लोहड़ी के समय याद करते हैं। दसअसल लोहड़ी अत्याचार पर करुणा की विजय का त्योहार है। गेंहूँ और सरसों की फसल से भी इसका सम्बन्ध है। इन्ही दिनों खेतों की फसलें अपने पूरे यौवन पर होती हैं। लोहड़ी के दिन गाँव या शहर के स्त्री-पुरुषों के टोल के टोल ‘लोहड़ी’ के लकड़ी के गट्ठर और गोबर के उपले के ढेर का कलावे से पूजन कर उसमें अग्नि प्रज्वलित कर फेरे लेते हैं और आग में तिल डालते हैं। तिल डालने के पीछे मान्यता यह है कि जितने तिल आग की भेंट किये जायेंगे, उतने ही पाप नष्ट होते जायेंगे। आग में तिल डालते हुए लोग कहते हैं - ‘‘ईसर आए, दलिदर जाए।’’

आजकल लोहड़ी का स्वरूप काफी कुछ बदल गया है। इसका सम्बन्ध बेटे के जन्म अथवा बेटी की शादी से भी जुड़ गया है। लोहड़ी के उत्सव के समय बेटे वाले आमंत्रित लोगों को रेबडियाँ, चिड़वे, गजक, फल, मक्का के फूले, मूँगफली आदि प्रसाद स्वरूप भेंट करते हैं। बेटी वाले, बेटी की ससुराल में कपड़े, मिष्ठान और गजक-रेबड़ी आदि भेजते हैं। कई जगह लोहड़ी की रात गन्ने के रस की खीर बनाकर भी प्रसाद के रूप में देते हैं। कुछ स्थानों पर स्टील या पीतल के बर्तनों को गजक आदि से भरकर दिया जाता है।

युग के बदले रूप के अनुसार कुछ परिवारों में लोहड़ी का उत्सव लड़की के जन्म पर भी मनाया जाने लगा है। देखा जाये तो लोहड़ी गरीब, असहाय की सहायता और मन को पवित्र रखने का एक पवित्र प्रतीक पर्व है।

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सम्पर्क- 15/109 ईसानगर, अलीगढ़

मो. - 9634551630

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