आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

मुक्ता की उलझन / कहानी / सुशील शर्मा

मुक्ता ने जब से होश संभाला है तबसे ही वह पिता के रौद्र रूप से रूबरू रही है। मुक्ता के पिता अत्यंत विद्वान,समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति,राजनीति में रसूखदार एवं सुघड़ देहयष्टि धारक व्यक्ति थे। किंतु अहंकारी इतने की छोटा से बच्चे ने भी अगर हुक्मउदूली कर दी तो उसकी भी खैर नहीं रहती थी। जरा जरा सी बात में मरने मारने पर उतारू हो जाते थे। एकबार बचपन में मुक्ता किसी खिलौने के लिये अड़ गई थी बहुत चीखपुकार मचा रही थी तो गुस्से में आकर उसके पिता ने उठाकर आँगन में फेंक दिया था। माँ की बड़ी अनुनय विनय के बाद उसे घर में दाखिल होने दिया था। तब से मुक्ता के मन में पिता के लिए एक अनजाना सा डर मन में बैठ गया था।

[ads-post]

उसे याद है छोटी छोटी बातों में माँ को पिताजी बहुत बुरी तरह से डांटते थे। अगर समय पर उनका कोई काम नहीं किया तो उस दिन माँ की खैर नहीं रहती थी। एकबार मुक्ता की नानी के बीमार होने पर माँ बिना बताए ही उन्हें देखने चली गयी थी। मुक्ता के पिताजी इतना गुस्सा हुए थे कि उन्होंने माँ को घर में घुसने नहीं दिया था। बहुत अनुनय विनय और पड़ोसियों के समझाने के बाद ही माँ घर में अंदर आ सकी थीं। उसके पिता जब तक घर में रहते थे पूरे घर में कर्फ्यू सा लगा रहता था। मुक्ता की माँ उतनी ही सीधी,सरल और विनम्र स्वभाव की थीं। पूरे परिवार को एक सूत्र में बांध कर रखने वाली और सभी से हँसमुख व्यवहार करने वाली सहनशीलता की प्रतिमूर्ति।

मुक्ता के मन में पिता की एक अलग धारणा बन चुकी थी। एक क्रूर,जुल्म,और शासन करने वाला व्यक्ति।

समय पंख लगा कर उड़ता गया। मुक्ता बड़ी हो गई उसकी शादी पिता की इच्छा के अनुरूप के सुसंस्कारित परिवार में हो गई।

मुक्ता जब ससुराल में आई तो यहाँ परिस्थितियां बिल्कुल उलट थीं। ससुराल में सास का बोलबाला था। उनकी आज्ञा के बिना पत्ता भी नहीं खड़क सकता था। बहुओं के लिए कठोर अनुशासन था। उसका पति और देवर सभी उसकी सास से कांपते थे। बगैर उनकी अनुमति से न कोई घर में आ सकता था न जा सकता था। मुक्ता के ससुर बहुत शांत और सौम्य प्रकृति के व्यक्ति थे। मुक्ता के मन की बात तुरंत समझ जाते थे और अपनी पत्नी की नजर बचा कर उसे पूरा करने की कोशिश करते थे।

एक बार अविनाश ने खर्चे के लिए अपनी माँ से कुछ पैसे मांगे।

माँ बहुत तमक कर बोली"नाकारा से घर बैठे रहते हो कुछ कमाओ या खेतों में जाकर पसीना बहाओ। पैसा पेड़ों पर तो उगता नहीं है।"

अविनाश मुँह लटका कर बाहर निकल गया। मुक्ता को बहुत बुरा लगा वह सोचने लगी कि कोई माँ अपने बेटे से ऐसा व्यवहार कैसे कर सकती है। उसके ससुर को जब पता चला तो उन्होंने मुक्ता को बुला कर खर्च के लिए पैसे दिए।

अविनाश नौकरी तलाश रहा था। लेकिन आज की परिस्थितियों में सामान्य वर्ग के लोगों को नौकरी कहाँ मिल रही है?

एक बार मुक्ता अविनाश के साथ बाजार खरीददारी के लिए चली गई दोनों बहुत दिनों बाद घूमने निकले थे पार्क में बैठ गए। बातों में पता ही नहीं चला कब रात हो गई। अविनाश ने घड़ी देखी तो घबड़ा गया। जल्दी से दौड़ते भागते घर पहुंचे। दरवाजे पर ही मुक्ता की सास ने अविनाश को खूब खरी खोटी सुनाई। "आ गए महाराज महारानी जी को सैर करा लाये"

"माँ वो खरीददारी में लेट हो गए" हकलाते हुए अविनाश ने उत्तर दिया। "हां क्यों नहीं होंगे लेट महारानी जी के माता पिता ने खूब दहेज दिया है जो बाजार का बाजार उठा ले आते।" मुक्ता की सास लगभग गरजते हुई बोली। मुक्ता के ससुर ने दोनों को चुपचाप कमरे में जाने का इशारा किया। मुक्ता और अविनाश चुपचाप कमरे में चले गए। लगभग आधे घंटे तक मुक्ता की सास के प्रवचन चलते रहे। अविनाश चुपचाप बिस्तर पर सो गया।

मुक्ता बिस्तर पर बैठ कर तुलना कर रही थी। उसको अपनी सास में अपने पिता का स्वभाव नजर आ रहा था। और अपने ससुर में अपनी माँ का अक्स दिखाई दे रहा था। उसके मन में पिता और माता के जो प्रतिमान थे वो सब टूट चुके थे। वो निर्णय नहीं कर पा रही थी कि पिता श्रेष्ठ होता है या माँ।

जब मुक्ता ने गहन विचार किया तो उसके मस्तिष्क ने स्वयं उत्तर दिया। माता और पिता भी व्यक्ति होते हैं भगवान नहीं। उनमें भी व्यक्तिगत और स्वभावगत गुण दोष होते हैं। स्वभावतः भले हो वो कितने गुस्सा करने वाले अहंकारी क्यों न हों। उनकी डांट डपट और अनुशासन में भी अपनी औलादों की भलाई छुपी होती है।

माता पिता अपनी संतानों के लिए वैसे ही हैं जैसे शरीर में दो आंखें दो हाथ और दो पैर। इनमें से एक के न होने से जिंदगी तो चलती है किंतु घिसटती हुई। मुक्ता के मन में अपनी सास और पिता के लिए स्नेह और श्रद्धा के भाव थे और उसके मुंह पर मुस्कान।

---

टिप्पणियाँ

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.