मंगलवार, 30 मई 2017

शब्द संधान / वक्त का तोता / डा. सुरेन्द्र वर्मा

वक्त के क्या कहने, यह भी एक अजीब शय है। वक्त आता है,चला जाता है। लौटता नहीं, दोबारा वापस नहीं आता। वक्त मुरव्वत नहीं करता, बख्शता नहीं। वक्त बदलता है, गुज़र जाता है। वक्त अवसर है, मोहलत है: फुरसत है, फरागत है।

समय या काल के लिए ‘वक्त’ अरबी भाषा का एक शब्द है जिसे हिन्दुस्तानी ज़बान में पूरी तरह से अपना लिया गया है। वक्त के बारे में हम सब बखूबी जानते हैं कि यह क्या है। इसका खूब इस्तेमाल भी करते हैं, लेकिन समय या काल की ही तरह इसे परिभाषित का पाना करीब करीब नामुमकिन ही है।

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वक्त ज़माना है। क्या ज़माना आ गया है, क्या वक्त आ गया है – बात एक ही है। बीता हुआ वक्त हमेशा बेहतर रहा है (“गुड ओल्ड डेज़”), लेकिन अब वक्त खराब आ गया है। आज के वक्त को हम कोसते नहीं थकते। इंसान की फितरत है।

वक्त फुर्सत और फरागत है। हम अक्सर दूसरों को दिलासा दिलाते हैं वक्त मिलेगा तो आपका काम ज़रूर कर दूँगा। यह बहानेबाज़ी है। फुरसत का वक्त कभी आता ही नहीं। हम बिना किसी काम के ही व्यस्त रहते हैं (“बिजी विदाउट बिजनेस”)।

जब वक्त ‘आता’ है, सब काम बड़े आसानी से निबट जाते हैं। हमारी चाहतें पूरी हो जाती हैं। लेकिन कभी हज़ार कोशिश करने पर भी वक्त हमारा साथ नहीं देता। ‘वक्त बेमुरव्वत’ हो जाता है। मुंह फेर लेता है; ‘वक्त वक्त की बात’ है। वक्त कभी एक सा नहीं रहा, और न ही यह कभी किसी का हुआ है। यह किसी को भी बख्शता नहीं। किसी शायर ने कहा है,

“बख्शे हम भी न गए बख्शे तुम भी न जाओगे

वक्त जानता है हर चेहरे को बेनकाब करना !”

बड़ा बेरहम है वक्त। किसी न किसी को यह कहते अक्सर सुना गया होगा “वक्त मेरी तबाही पे हंसता रहा”। लेकिन किसी का खराब वक्त यों ही नहीं आ जाता। वक्त मोहलत देता है। वक्त दस्तक देता है। आपको आगाह करता है। आप उसके संकेत समझें, न समझें, बात दूसरी है। यह ज़रूरी है कि हम ‘वक्त की नब्ज़’ पहचाने। बेशक, वक्त बदलता है, बदल देता है। किसी फिल्म के गाने की एक बहुत सारगर्भित पंक्ति है –

“ वक्त ने किया क्या हसीं सितम – हम रहे न हम, तुम रहे न तुम”।

कुछ लोग वक्त काटते हैं, कुछ गुजारते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो वक्त की नब्ज़ पहचान कर उसका सदुपयोग करते हैं। ‘वक्ते इमदाद’ में ज़रूरतमंदों की सहायता करते हैं। ‘वक्ते अहसान’ को जाया नहीं जाने देते; दूसरों के उपकार में अपना ‘वक्त लगाते’ हैं। भले ही उनका वक्त तंग ही क्यों न हो, लेकिन तो भी अपनी उदार मानसिकता से जितना कुछ कर सकते हैं, करते हैं। ‘वक्त आन पडा’ है तो पीछे नहीं हटते। कुछ लोग बेशक इतने उदार नहीं होते लेकिन ‘वक्तन-फवक्तन’ दूसरों के ‘वक्ते बद’ पर सहायता करने से बाज़ वे भी नहीं आते।

रात का वक्त ‘वक्ते ख़्वाब’ होता है। यह सोने का समय है जब हम ख़्वाब देखते हैं। हर वक्त के साथ कोई न कोई शय जुड़ी है। ‘वक्ते मदद’ है, ‘वक्ते मर्दानगी’ भी है। ‘वक्ते रवानगी’ और ‘वक्ते रुख्सत’ है तो ‘वक्ते वापसी’ भी है। ‘वक्ते मुसीबत’ है तो ‘वक्ते हिम्मत’ भी है। ‘वक्ते बद’ है तो ‘वक्ते शिकायत’ भी है। ‘वक्ते ज़रुरत’ है तो ‘वक्ते इमदाद’ भी है। पता नहीं हर काम के साथ वक्त जुड़ा है या हर वक्त के साथ काम नत्थी है। कोई तो बताए !

हमने वक्त को दिनों में, घंटों में, ऋतुओं में, प्रहरों में बाँट रखा है लेकिन वक्त को आप ऐसे पिजड़ों में बंद नहीं कर सकते। उसे कैद नहीं कर सकते। ‘वक्त के तोते’ को उड़ते देर नहीं लगती। ‘वक्त का दरिया’ सतत बहता रहता है। उसे बाँधा नहीं जा सकता।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

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