रविवार, 14 मई 2017

लघुकथा / माँ / कैलाश चन्द्र

भारती प्रजापति की कलाकृति

अभी दोपहर के 3 बजे का घण्टा बजा है ,राहुल की आंखें आज से पहले कभी घड़ी पर इतनी नहीं जाती थी ।

घटना आज सुबह की ही थी ,उसका चश्मा अपनी जगह पर नहीं था उसे अपनी वाइफ शुषी को आवाज़ देनी ही पड़ी ,राहुल आप ना अपना चश्मा रोज़ाना भूल जाते हो ,यही कहीं होगा ध्यान से देखो ।

चारों तरफ नज़र घुमाते-घुमाते नज़र माँ के ऊपर भी गयी ,माँ तुमने मेरा चश्मा देखा था ? हाँ मेरे ही पास है बेटा तेरा चश्मा पर मुझे इसमें साफ साफ नहीं दिख रहा है ,माँ की गोद में एक पुरानी एल्बम थी । माँ ने चश्मा तुरंत उतार कर राहुल की तरफ बड़ा दिया ,राहुल को अचानक से याद आया कि माँ कई दिनों से कह रही थी , मेरा चश्मा टूट गया है ,माँ आज मैं पक्का आपका चश्मा लेता आऊँगा ,ऑफिस आने से पहले शुषी को उसने शाम को जरूर फोन कर याद दिलाने को कहा ,पर उसे नहीं लगा कि याद दिलाने की आज जरूरत भी है ,आज तो राहुल को 4 बजे का इंतज़ार था । आखिर माँ तो माँ ही है ।

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