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भूतनाथ 'सुरेन्द्र बोथरा' / समय, काम और कम्प्यूटर

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एक सवाल उठा? कम्प्यूटर से क्या लाभ? उत्तर आया : समय बचता है। फिर एक सवाल आया किसका? और उत्तर नहीं आया। सवाल ही गूंजता रहा — किसका? ... किसका? ... किसका? ...

उत्तर नहीं मिला। मिलता भी कैसे? इस प्रश्न के मूल में एक और प्रश्न जो है : समय की कमी किसके पास है? किसे उसे बचाने की जरूरत है? एक अदद यही तो चीज है इस देश में जो इतनी बहुतायत से है कि कितना भी नष्ट करें कभी कमी नहीं आती। प्रति वर्ष उपलब्ध मानव घंटों (मैन-आवर्स) की संख्या में प्रचुर वृद्धि होती ही जाती है।

यह कहें तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इतना अधिक है समय हमारे पास कि हम उसे नष्ट करने में बड़ी लगन से जुटे रहते हैं। मानो समय न हुआ कोई बुराई हो गई जिसे नष्ट करते रहना हमारा धर्म बन गया है। गरीबी हटाने, आबादी कम करने या पर्यावरण सुधारने की ओर जितने प्रत्यन किये जाते हैं उससे कहीं अधिक प्रयत्न हम समय नष्ट करने के लिये करते हैं।

ये प्रयत्न व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं बल्कि जातीय, दलीय, अफसरीय, बाबूईय, चपरासीय, क्षेत्रीय, प्रान्तीय, प्रदेशीय, राष्ट्रीय, दफ्तरीय, विभागीय, परिषदीय, विधानसभाईय, तथा लोकसभाईय आदि सभी स्तरों पर होते हैं। कई सामान्य जन ऐसे होते हैं जो अपना समय नष्ट कर तुष्ट हो जाते हैं और कई विशेषज्ञ ऐसे होते हैं जो अपने साथ-साथ अन्यों का समय भी उसी लगन के साथ नष्ट करते हैं। इस प्रतियोगिता की विशेषता यह है कि प्रत्येक प्रतिस्पर्धी अर्थात् समय नष्ट करने वाला सदा दूसरे को श्रेय देने को तत्पर रहता है कि सर्वाधिक समय उसने नष्ट किया। ऐसी खेल भावना अन्य कहीं देखने को नहीं मिलती।

कई बदमिज़ाज ऐसे भी हैं जो समय-समय पर इस राष्ट्रीय स्तर के मनोरंजन में बाधा उत्पन्न करते दिखाई पड़ते हैं। वे इन बाधाओं को ‘कदम’ कहते हैं जैसे हाजरी के रजिस्टर की नित्य प्रति जांच का कदम, दफ्तरों के मुख्यद्वार को दस बज कर दस पर बंद कर देना (दस मिनट के लिये), पांच बजे एक राउन्ड लेकर देखना कि कौन है कौन नहीं आदि। पर समय नष्टकों की सेहत पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। उनका कहना है कि समय पर बुला कर समय पर भेजने से भी कोई समय बचाया जा सकता है उनमें तो वह कूवत है कि दफ्तर के समय को दफ्तर के बाहर जाकर ही नहीं दफ्तर के भीतर रह कर भी बखूबी नष्ट कर सकते हैं। आप समय पर बुला भेज कर अहं को तुष्ट करते रहिये। काम तो उतना ही होगा जितना वे करेंगे।

जिस गति से सरकारी दफ्तरों में काम होता है उसे देख कर लगता है कि हर व्यक्ति के मन में एक डर बैठा हुआ है। काम पूरा हुआ कि नौकरी गई। इस डर से सहम कर वह काम इतना धीरे से करता है कि न काम खत्म हो न नौकरी ही जावे। जीवन-मरण के इस संघर्ष में समय नष्ट होता है तो हो।

अदालतें तो समय नाश का आदर्श उदाहरण हैं। लगता है सरकार ने उन्हें समय नष्ट करने का उत्तरदायित्व दिया हुआ है। आप मुकदमा कीजिये, मुद्दा वहीं रहेगा, तारीखें पड़ती जायेंगी, दिन-सप्ताह-महीने-वर्ष सब स्वाह होते जाएंगे। अनेक उदाहरण ऐसे मिलेंगे कि उम्र बीत गई, और कुछ ऐसे भी की पीढ़ियां बीत गई। लगता है लोग अदालत में किसी फैसले के लिये नहीं जाते हैं। वे जाते हैं एक प्रतिस्पर्धा के लिये कि कौन अपने प्रतिवादी का सर्वाधिक समय नष्ट कर पाता है।

समय के नाश के साथ इंतजार का चोली-दामन वाला साथ है। एक समय था जब इस तथ्य का अहसास केवल प्रेमियों को ही था। अब यह भेद सरकारी अफसरों पर भी खुल गया लगता है। आप कोई काम लेकर किसी से मिलने जाइये तो इंतजार से पहली मुलाकात होगी पास बनवाने में। उसके बाद उनके कमरे के बाहर फिर इंतजार। सौभाग्यवश इस इंतजार का फल मीठा हुआ तो आपके काम के विषय में स्पष्ट उत्तर मिलने में इंतजार। अब आप फिर वहीं आ पहुंचेगे जहां से यात्रा आरंभ की थी। यह प्रक्रिया इतनी सरल नहीं है जितनी हमने बताई है। जो इससे गुजरता है वही समझ सकता है। और हाँ, अफसर जितना ऊंचा, इंतजार में समय का नाश भी उतना ही अधिक। दफ्तरीय संगठन में समय नाश विशेषज्ञ का नाम है : बाबू। यहाँ उसके विषय में चर्चा यों नहीं कर रहे कि अगर बाबू की महिमा का सूर्य चमकने लगा तो अन्य सभी चांद सितारे ओझल हो जायेंगे।

काम को धीरे करने से ही हम संतुष्ट नहीं हो जाते। उससे कितना ही समय नष्ट करें फिर भी बहुत बच जायेगा। और हम फिर समय के बोझ तले दब जायेंगे। काम करें ही नहीं तो समय के नष्ट होने की गति बढ़ जायेगी। और यों जन्म होता है छुट्टी का। हमारे यहाँ इस समय-नाशक के कई प्रकार हैं। राष्ट्रीय छुट्टियां, गज़ेटेड छुट्टियां, ऐच्छिक छुट्टियां आदि। इनके अलावा कुछ निजी छुट्टियां होती है जैसे प्रिविलेज छुट्टियां, सिक छुट्टियां, केजुअल छुट्टियां आदि। इन सबके बाद जो समय बचा रहता है उसका तिया&पाँचा करने के काम में आती हैं आकस्मिक छुट्टियां जैसे किसी राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय नेता के जीवन काल का समाप्त हो जाना। छुट्टी के इस महान यज्ञ में कभी कभी हड़तालें भी पुण्य कमा लेती हैं।

नगरपालिकाएं हमारे तंत्र का अंग हैं जो समय नष्ट करने की हमारी राष्ट्रीय हाबी की प्रदर्शनियां प्रत्येक शहर में बड़ी मुस्तैदी के साथ आयोजित करती रहती हैं। कूड़े के ढेरों और सड़कों पर बहती गंगा&यमुना इस प्रदर्शनी कला का चरमोत्कर्ष हैं। इन प्रदर्शनियों का आनन्द तो नथुनों के माध्यम से नेत्रहीन भी ले सकते हैं। वे भी यह तत्काल समझ सकते हैं कि नगरपालिकाओं का कर्तव्य कूड़ा&कचरा नाश करना नहीं है अपितु समय नाश करना है।

क्षमा करें। आपका बहुत समय नष्ट किया। हमें पहले ही उस गूंजते सवाल का जवाब आपको बता देना चाहिये था। प्रश्न था, कम्प्यूटर से किसका समय बचता है? तो आप समझें कि कम्प्यूटर एक साधन है। उससे काम लेता है वही आदमी। आप क्या कम्प्यूटर लाकर उसे बदल सकते हैं। जी नहीं। वह समय नष्ट करने के क्षेत्र में ही क्रान्ति ले आएगा। वह कम्प्यूटर से समय नष्ट करेगा। अभी तक एक व्यक्ति, एक स्थान पर एक बार में एक ही व्यक्ति का समय नष्ट करता था। अब वह कम्प्यूटर के माध्यम से एक बार में अनेक स्थानों पर अनेकों व्यक्तियों का समय नष्ट कर सकेगा। अब तो आप नहीं पूछेंगे कि कम्प्यूटर से किसका समय बचेगा\

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Surendra Bothra

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