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असंभव कुछ भी नहीं - सफलता की एक सच्ची कहानी / शैलेन्द्र सिंह “सितारे”


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असंभव कुछ भी नहीं

आज 31.12.2016 मेरे रिटायरमेन्ट का दिन है। जिंदगी के ये 60 साल कब, कैसे कितनी तेजी के साथ बीत गये पता ही नहीं चला। आज मेरा मेरे ऑफिस का आखिरी दिन है यह सोचकर विश्वास ही नहीं होता। पिछले 30-32 सालों से मैं जो काम हर रोज, हर सुबह करते आ रहा हूँ अब वो मैं नहीं कर पाऊँगा क्योंकि मैं रिटायर हो जाऊँगा। खैर ये भी जिन्दगी का एक हिस्सा है। मुझे मेरे कार्यालय के लोग मेरे रिटायरमेन्ट के मौके पर एक विदाई पाटी देना चाहते हैं, हालांकि मैं ये सब बिलकुल नहीं चाहता था। ऐसा नहीं है कि मैं अपनी विदाई पार्टी नहीं चाहता, भई अपनी बड़ाई सुनना किसे बुरा लगता है पर सच्चाई ये है कि रिटायर हो रहे व्यक्ति पर कोई कुछ खर्चा-वर्चा नहीं करना चाहता, ये मेरा पिछली 32 सालों की नौकरी का तजुर्बा है। खैर यहाँ का मेरा स्टॉफ बहुत अच्छा है और उन्हीं की जिद के कारण मैं इस पार्टी के लिये तैयार भी हुआ। ऑफिस जाने से पहले-पहले ही मैं सारा सामान पैक करवा चुका हूँ आखिर शाम को मुझे अपने घर गुना के लिए भी निकलना है। अब घर में सिर्फ कुछ ही सामान बचा है, जो घर के चौकीदार बहादुर को हिदायत देकर मैंने ही रखवाया है।

अपने सोच-विचार में डूबा मैं यह भूल ही गया था कि बहुत देर से बहादुर चाय रखकर गया है। अपनी चाय का कप उठाने के साथ ही मैं अपने बचपन की यादों में खो गया, सच कल की ही बात लगती है..........................

मैं मूलतः चित्रकूट मध्य प्रदेश के एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार से ताल्लुक रखता हूँ। मेरे बाबूजी (पिताजी) रामलाल पटेल, मेरे ताऊ और चाचा चित्रकूट में ही खेतीबाड़ी किया करते थे। बाबूजी मेहनती थे इसलिए कम जमीन में भी किसानी की अच्छी उपज होती थी, जबकि घर की प्रगति का सोता, माँ यशोदा देवी का अन्नपूर्णा स्वरूप था। घर में सब कुछ शानदार था, कामतानाथ की नगरी चित्रकूट में प्राथमिक और माध्यमिक परीक्षाएं मैंने रैपुरा के शासकीय विद्यालय से पास की। गांव और परिवार के लोगों के विरोध के बाद भी बाबूजी ने छोटे भाई और मुझे इण्टर (10वीं) करने पौददार इंटर कॉलेज सीतापुर भेजा। आखिर दोनों भाइयों ने इण्टर और इसके बाद इण्टरमीडिएट की परीक्षा सन् 1972 में हिन्दू इन्टर कॉलेज (अतर्रा) बांदा से प्रथम श्रेणी में पास की। हम दोनों आगे भी पढ़ना चाहते थे इसलिए भाई ने इंजीनियरिंग की तैयारी की और मैंने बी.एस.सी. करने का मन बनाया, मैं सन् 1975 में शासकीय विज्ञान महाविद्यालय सतना से बी.एस.सी. में ग्रेजुएट हुआ। खैर उस समय की शिक्षा व्यवस्था के हिसाब से मैं विज्ञान में स्नातक तो था पर मेरी आयु मात्र 18 वर्ष थी। यू.पी.एस.सी. एवं म0प्र0 लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में चयन की आयु उस समय 21 वर्ष हुआ करती थी। यह बहुत बड़ा कारण था कि मैं अगले 3-4 सालों तक प्रशासनिक अधिकारी नहीं बन सकता था। इस मामले में मेरे भाई की किस्मत अच्छी थी, वो सिविल इंजीनियरिंग करके कान्ट्रेक्टर बनना चाहता था और उसका इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करने के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला हो जाने से वो बहुत खुश भी था। मेरे गांव वाले और कुछ रिश्तेदार चाहते थे कि भाई के इंजीनियर बन जाने से मुझे घर आकर खेती-बाड़ी संभालनी चाहिए और माँ-बाबूजी की सेवा करनी चाहिए।

मुझे आज भी याद है फरवरी 1975 की वे सर्दियाँ जब मैं चित्रकूट में माँ और बाबूजी के साथ घर में था और मेरी शादी की तैयारी जोरों पर थी, लगभग रोज ही सतना, रीवा, पन्ना, सागर, कर्बी, बांदा, वगैरह से लड़कियों के पिता मुझे तलाशते हुए घर चले आते थे। मुझे लग रहा था कि शायद अब इस दुनिया में मैं ही एकमात्र कुंवारा लड़का रह गया हूँ। इसी बीच एक दिन खेत में बाबूजी को हल चलाते समय बैल के बिदक जाने से पैरों में बड़ी जोर की चोट लगी। गांव के हकीम ने एक से डेढ़ माह आराम करने को कहा। पिताजी बहुत चिंतित थे, ताऊ और चाचा ने कहा कि वो सब संभाल लेंगे, पर सबको पता था कि ताऊ और चाचा से दस गुना ज्यादा बाबूजी की मेहनत किसानी में रहती थी। मैं गांव में ही था, रात में मैंने, माँ और बाबूजी की बातें चोरी से सुनीं जो इस आपदा पर ही चर्चा कर रहे थे। रात में ही मैंने संकल्प लिया कि बाबूजी की जिम्मेदारी अब मैं खुद उठाऊँगा। सुबह उठकर मैंने बाबूजी को अपने मन की बात बताई और खेतों में निकल गया। अगले 20-30 दिन कटाई सुखाई, छंटाई के बाद आखिर फसल के बिकने तक मैं लगातार खेतों में रहकर अपना काम करता रहा। लगभग एक माह बाद बाबूजी भी खेतों में लौटे और उन्होंने देखा कि सब ठीक ठाक है। मेरे 02 माह तक लगातार खेत में रहने और बाबूजी के पूरी तरह स्वस्थ हो जाने के बाद एक दिन बाबूजी ने बड़े अच्छे मूड में मुझसे कहा कि ’’हम तुम्हारी सेवा से बहुत प्रसन्न है? बताओ तुम हमसे क्या चाहते हो, हम तुम्हारी कोई खुशी पूरा करना चाहते हैं? ’’ मुझे लगा बस यही एक मौका है। मैंने कहा बाबूजी ‘‘हमें आज से सिर्फ 4-5 साल और दे दीजिए, हमें और कुछ नहीं चाहिए बस। कसम खाकर कहते हैं आपको निराश नहीं करेंगे।’’ मुझे लगा कि बाबूजी ये सुनकर नाराज होंगे पर वो मुस्कुराने लगे और उन्होंने इलाहाबाद जाने वाली गाड़ी के टिकिट मुझे दिये और बोले कि ‘‘तुम्हें गांव लाने का हमारा उद्देश्य तुम्हारा मन और काम जानना और तुम्हें, देखने और समझने के लिए ना बुलाये थे। हम खुद चाहते हैं कि तुम पढ़-लिखकर बड़ा आदमी, अधिकारी या डॉक्टर बनो। तुम देखते नहीं हो क्या कि चित्रकूट के कर्बी, बांद्रा, सतना के इतने पास होने के बाद भी यहां कोई असली डॉक्टर ढूंढे नहीं मिलता। बस नीम, हकीम, झोले, झंडे और बंगाली डॉक्टर मिलते हैं। तुममें वो काबिलियत है कि तुम सही वाला डॉक्टर बन सकते हो। मैं और तुम्हारी मां यही चाहते हैं कि तुम डॉक्टर बनो, गांवों, जंगलों में जाओ और गरीबों की सेवा करो। शादी की चिंता छोड़ दो, अगले 5 साल तुम उससे आजाद हो; जाओ।’’ मैं जानता था कि हमारे बाबूजी हमें बहुत चाहते हैं पर वो हमारे दिल की बात भी बिन कहे समझ सकते हैं, यह हमने आज ही जाना। अप्रैल 1975 में हम बाबूजी के दिये टिकिट और घर से कुछ पैसों को लेकर इलाहाबाद चले आये। यहां छात्रावास में रहकर दिनरात मेहनत करने लगे; करते भी क्यों न? हमें बाबूजी को दिये गये वादे को जो पूरा करना था। हर हाल, हर समय, हर मौसम, हर परिस्थिति में हम मन लगाकर पढ़ते रहे। हमने सोच लिया था कि अब बाबूजी को तब ही मुंह दिखायेंगे जब कुछ बन जायेंगे। खैर! हमारी मेहनत 1 साल बाद रंग लाई और हमारा चयन म.प्र. लोक सेवा आयोग के वन विभाग के रेंजर के पद पर और एम.बी.बी.एस. दोनों के लिये एक साथ हुआ। फिर से दुविधा की स्थिति उत्पन्न हुई कि क्या किया जाये। ऐसी हर दुविधा से हमारे जैसे अभिमन्यु को बाहर निकालने वाले हमारे कृष्ण जी के अवतार बाबूजी ही थे। बाबूजी से मिलकर हमने अपनी विपदा सुनाई, गांवभर में हमारी नौकरी लगने की चर्चा थी। सारे गांव का यही मत था कि मन्नू एम.बी.बी.एस. पास कर भी पाता है, या नहीं, इससे बेहतर तो यही होगा कि सामने रखी रेंजर की नौकरी करें। हम ज्यादा परेशान नहीं थे, हमें मालूम था कि अपनी समस्या बाबूजी के समक्ष रखने के बाद हमारे बाबूजी कोई ऐसा रास्ता निकालेंगे जो हमें हर संकट से पार कर देगा। हमारे मन में दोनों बातें थीं, यदि रेंजर बन जाते हैं तो जिन्दगी में एक नौकरी पा जाते हैं, यदि डॉक्टर बने तब भी बढ़िया हैं कि देश के लोगों की सेवा करेंगे। शाम को बाबूजी खेत से लौटे। शाम को हमने हमारी समस्या बाबूजी के सामने रखी। बाबूजी सब देख, सुनकर 5 मिनट तक चुपचाप खड़े रहे। हम और सारे लोग यही सोच रहे थे कि हम कोई गड़बड़ तो किये नहीं, फिर बाबूजी इतना शांत क्यों हैं? बाबूजी ने धीरे से इशारा करके हमें अपने पास बुलाया, फिर बोले ‘‘क्यों मन्नू आज से साल भर पहले तो तुम हमसे पढ़ाई का 5 साल मांग रहे थे और अब बस एक साल में ही पढ़ाई छोड़ नौकरी करना चाहते हो। ऐसा बिलकुल नहीं होगा, 5 साल का मतलब 5 साल, वापस जाओ, मेहनत करो और हमें डॉक्टर बनकर दिखाओ। याद है ना तुम्हें हम क्या बताये थे। तुम्हें एक अच्छा, समझदार, जानकार, सलीके का डॉक्टर बनना है। इन झोलाछाप बंगालियों की तरह नहीं। समझे न, जाओ और अच्छी मेहनत कर डॉक्टर बनकर लौटो।’’ बाबूजी का निर्णय मेरे पक्ष में ही था, मैं डॉक्टर ही बनना चाहता था। पूरा गांव पिताजी के इस निर्णय को गलत करार दे रहा था, और हो भी क्यों न? भविष्य पर आधारित यह निर्णय गांव वालों के दृष्टिकोण से किसी भी प्रकार से उचित नहीं था। खैर, मेरी तो मन मांगी मुराद पूरी हुई थी। अगले ही दिन सुबह मैं रीवा के मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए जा पहुंचा। हमारे गांव में डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाला मैं पहला व्यक्ति था। मैं पूरे मन और मेहनत के साथ एम.बी.बी.एस की पढ़ाई में जुट गया। आखिर मुझे बाबूजी के कहे अनुसार एक अच्छा, बढ़िया और सलीकेदार डॉक्टर जो बनना था।

अपने बचपन और पढ़ाई के दिनों की यादों में मैं ना जाने कब तक खोया रहता, अगर बाहर डोरबेल न बजती। मैं जैसे किसी सपने से जागा, बाहर घंटी लगातार ट्रिन, ट्रिन, ट्रिन, ट्रिन बहुत देर से बजे जा रही थी। ना जाने ये बहादुर कहां मर गया। खैर, मैंने ही उठकर दरवाजा खोला तो देखा सामने कल्लू धोबी हाथ में मेरे कपड़ों की गठरी लिये खड़ा था। मुझे देखकर एकदम रोने लगा और बोला - ‘‘माईबाप आप हमें छोड़कर क्यों जा रहे हैं? आपके बिना हमारा क्या होगा? कैसे रह पायेंगे हम?’’ सच ही तो है, इन सबके बिना मेरे लिये भी तो रहना बहुत मुश्किल होगा। आखिर इन सबके साथ सालों का लगाव जो है। मैंने कल्लू को समझाया ’’देखो कल्लू‘‘ मैं कोई हमेशा के लिए तो जा नहीं रहा। रिटायरमेंट नौकरी का एक पड़ाव है, हमारा तुम सबसे यही संबंध बना रहेगा। जब हमें तुम्हारी याद आएगी तो हम, और जब तुम आना चाहो तब तुम हमारे पास आ सकते हो।’’ शायद मेरे जाने से कल्लू कुछ ज्यादा ही दुखी था। इसलिए जाने मेरी कितनी बातें समझा और कितनी नहीं। मैं कल्लू का हिसाब करके अपने कपड़ों का गट्ठर लेकर अंदर चला आया। मैंने अपनी जिन्दगी की हर छोटी-बड़ी यादों से जुड़े कपड़ों का एक सेट बना रखा है। इसमें मेरी स्कूल के ड्रेसों से लेकर नौकरी के खास मौकों पर पहनी हुई पोशाकें, कोट वगैरह रखे हुए हैं। जैसे इन कपड़ों के गट्ठर में बंधे हुए इस जोरदार सलीकेदार सफेद कोट को मैं कैसे भूल सकता हूँ। जो मुझे 1985 में एम.बी.बी.एस. पास करने पर मिला था। इसके बाद सन् 86 से लगातार मैं डॉक्टरी की प्रैक्टिस शासकीय हास्पिटल में करता रहा। इस कोट से बहुत सी कहानियां जुड़ी हैं। उनमें से एक मुझे बहुत अच्छे से याद है। कोट को निहारते मेरी आंखों के सामने 92 के दिसम्बर महीने के उन दिनों की बात याद आती है जब मैं असिस्टेंट सर्जन दन्तेवाड़ा से असिस्टेंट सर्जन बिलासपुर में डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में ट्रान्सफर हुआ था। सन् 1986 की लोकसेवा आयोग की मेडिकल की परीक्षा पास करने के बाद से ही मैं डॉक्टर बनकर म.प्र. (तत्कालीन म.प्र. एवं छत्तीसगढ़) के जंगलों की खाक छानते हुए अब बिलासपुर जा पहुंचा था। आज जिला चिकित्सालय में मेरा पहला ही दिन था, यहां भी हर जिले के डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल की तरह सन्नाटा पसरा था। दरवाजे पर मरीजों की लम्बी लाइन, परेशानियां, मुश्किलें, मुसीबतें और इनकी देख-रेख करने वाला कोई नहीं। मैं उठा और सारे स्टाफ को हॉस्पिटल में खासकर दोपहर की शिफ्ट वालों को तलाशने लगा, कुछ मेहनत के बाद दो वार्ड बॉय और एक नर्स कमरे में गप्प मारते मिले। सभी को डॉट-फटकार कर उनके उनको कामों में लगाया। वापस आकर अपने जूनियर डॉक्टर को भी डांटा और मरीजों की दो कतारें करवाई। आजकल के डॉक्टर भी बस, डॉक्टरी कम करते और एम.आर. के साथ अपनी चांदी काटने में ज्यादा व्यस्त रहते हैं। मेरा जूनियर भी वही कर रहा था, सो जमकर लताड़ा। सब कुछ ठीकठाक होने के बाद मैंने कुछ 50 के लगभग मरीजों को देखा, शाम तक मैं होटल वापस लौट आया। मैं फिलहाल एक होटल में ही ठहरा था, यह तय था कि मुझे हमेशा की तरह फिर किसी जंगल में भेजा जाएगा, इसलिये मैं कमरा नहीं लेना चाहता था। हॉस्पिटल से लौटकर जब घूम-फिरकर रात को होटल लौटा तो अपने अगले सफर का सोचते-सोचते ना जाने कब मेरी आंख लग गई। दूसरे दिन जब मैं डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल बिलासपुर पहुंचा तो मेरी सोच के हिसाब से ही मेरा ट्रांसफर आर्डर मेरी राह देख रहा था। मेरा ट्रांसफर ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर के रूप में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र डभरा जिला बिलासपुर में हो गया था। मैंने ट्रांसफर आर्डर हाथ में लिया और ठीक उसी दिन 13 दिसम्बर को डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल बिलासपुर से रिलीविंग ली। इन पांच-सात सालों की डॉक्टरी में मैं ये बात समझ गया था कि लोग अब डॉक्टरी को सेवा न मानकर धंधा या व्यवसाय समझने लगे हैं। लोग सिर्फ पैसा कमाने के लिए डॉक्टर बनना चाहते हैं। किसी की बीमारी, दुख या तकलीफ से, उन्हें कोई सरोकार नहीं है। मुझे सबसे ज्यादा नागवार यह बात लगती थी कि डॉक्टर तो डॉक्टर, नर्स, ए.एन.एम., वार्ड बॉय और यहां तक की स्वास्थ्य विभाग की आया भी अपने आपको डॉक्टर छोड़ एम.डी. समझते थे। गरीब की किसी को परवाह नहीं थी। हर कोई बस अपना ज्ञान झाड़ने में मस्त रहता था। ये सब मेरे बर्दाश्त से बाहर की बात थी, जब भी कोई ऐसा लापरवाह स्वास्थ्यकर्मी मुझे मिलता तो मेरा खून खौल उठता था, और मैं अपने आपे से बाहर हो जाता था। जब भी मैं ऐसा करता मुझे लगता कि अब मैं बाबूजी का ’’सलीकेदार डॉक्टर’’ नहीं रहा, पर शायद आज के समय का यही सलीका सही सलीका था। खैर, डभरा पहुंचने पर मैंने देखा कि यह मध्यप्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) का बहुत पिछड़ा हुआ क्षेत्र था। चारों तरफ भूख, गरीबी, दरिद्रता की चादर फैली थी और उसी फटी-टूटी चादर में लिपटे निपट गरीब, निरक्षर, कुपोषित, कमजोर आदिवासी। इनकी दशा देख-देखकर कभी तो बहुत तेज क्रोध आता और कभी आंखों से आंसू निकल पड़ते, शायद इन्हीं की सेवा करने का गुरूतर भार बाबूजी ने मुझे सौंपा था। मैंने 15 दिसम्बर 1992 को अपना पद बतौर ब्लाक मेडिकल ऑफिसर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र डभरा जिला बिलासपुर में संभाला। यहां के हॉस्पिटल की भी वही कहानी थी, लेट-लतीफी, बेरूखी, लापरवाही, रिश्वतखोरी, मैंने यहां जाकर चीजों को धीरे-धीरे सुधारने का अपना अभियान चालू कर दिया।

दिसम्बर के आखिर तक सब कुछ ठीक ठाक होने लगा था। इसी बीच मध्य प्रदेश राज्य लोक सेवा आयोग का राज्य प्रशासनिक सेवा का विज्ञापन और एम.बी.बी.एस. रहते हुए स्वास्थ्य विभाग में शासन स्तर से सर्जरी में एम.एस. करके सर्जन बनने का विज्ञापन दोनों एक साथ निकले। मेरी अब सिविल सेवा में जाने की कोई खास रुचि नहीं बची थी, वैसे भी मैं नौकरी के पांच-सात सालों में ही बी.एम.ओ. बन गया था और आगे डॉक्टरी में मेरा अच्छा कैरियर था। इसके साथ ही साथ शासन स्तर से सर्जन बनने का एक सुनहरा मौका मेरे पास था। मैंने इस अवसर का लाभ उठाने के लिए फार्म भरने और भाई की शादी में 5 जनवरी 1993 को शरीक होने के लिए 25 दिसम्बर 1992 से 15 जनवरी 1993 तक अवकाश लिया और चित्रकूट निकलने लगा। डभरा से आते समय मैंने अपने जूनियर डॉक्टर अजय सिंह और बड़े बाबू दीनानाथ पाण्डेय को चार्ज सौंपा और निकल पड़ा। बिलासपुर पहुंचकर मैंने सर्जन बनने का और राज्य सिविल सेवा, दोनों का फार्म भरा और चित्रकूट निकल गया। घर आने पर ऐसा लगा जैसे सदियों के बाद मैं अपने गांव वापस लौटा हूँ।

शासकीय नौकरी में छुट्टियां बहुत कम मिलती हैं, मैं अपनी छुट्टी के हर दिन का लुत्फ़ उठा रहा था। उस जमाने की शादियां आजकल की शादियों की तरह जल्दबाजी में नहीं हुआ करती थीं, उस जमाने की शादी का मतलब था आठ-दस दिन का आनंद। भाई की शादी की वजह से मैं सभी कामों की जिम्मेदारी लिये हुए था। 3 जनवरी को हम लोग बारात लेकर रीवा गये 4 को वापस चित्रकूट लौटे और 6 तारीख को घर में प्रीतिभोज का कार्यक्रम था। हम सब लोग बहुत खुश थे, 4 जनवरी की शाम सात बजे मैंने आकाशवाणी पर समाचार सुना कि महाराष्ट्र और उसके निकटवर्ती मध्यप्रदेश में हैजा तेजी से फैल रहा है और इसका प्रकोप इतना भंयकर है कि अब तक 67 (सड़सठ)  लोगों की मौत हैजे से हो चुकी है। मुख्य रूप से महाराष्ट्र के गोंदिया, भंडारा, चंद्रपुर, गढ़चिरोली और मध्यप्रदेश के बालोद, कांकेर, नारायणपुर और राजनांदगांव इससे सबसे ज्यादा प्रभावित थे। यह समाचार सुनने के बाद मुझे एक अजीब सी ’घुटन’ महसूस होने लगी, हालांकि बिलासपुर प्रभावित क्षेत्रों से बहुत दूर था, पर मेरा फर्ज मुझे तुरंत वापस लौटने को मजबूर कर रहा था। दो दिन बाद भाई की शादी का प्रीतिभोज का कार्यक्रम था और इन दो दिनों में डभरा में क्या होगा यह मैं नहीं जानता था ’’ भगवान न करे अगर इन दो दिनों में डभरा में हैजे का प्रकोप फैल गया तो उन गरीब आदिवासियों की क्या दशा होगी यह सोचकर ही मेरी रूह कांप उठी’’। हमेशा की तरह मुझे इस संकट की घड़ी में अपने बाबूजी याद आये। उन्होंने मुझे देखते ही कहा ‘‘अरे! मन्नू तू अभी तक बिलासपुर के लिए नहीं निकला, चल जल्दी रवाना हो’’। मैं उन्हें एकटक देख रहा था। बाबूजी ने मुझे समझाया ’’देख बेटा.....! सैनिक हर समय अपने प्रेम, खुशी, आनंद, छुट्टी और यहां तक की अपने प्राण भी त्यागने को तैयार रहता है। हमारी किसानी में और तुम्हारी नौकरी में ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं, जब ऐसा सुअवसर हमें मिले इसलिए कुछ मत सोचो, जल्दी जाओ और अपना फर्ज निभाओ। खुशी के मौके जिन्दगी में बहुत आते हैं। पर त्याग और बलिदान का मौका सारे जीवन में एकाध ही बार मिलता है। अब जाओ! देर ना करो।’’

बाबूजी की बात सुनने के बाद सोचने-विचारने को कुछ भी बाकी नहीं रह गया था। मैं 4 जनवरी 1993 को ही अपने एक दोस्त के साथ साइकिल से शाम ढलते तक सतना रेलवे स्टेशन आ पहुंचा। सतना से पैसिंजर ट्रेन से कटनी और यहां से गाड़ियां बदलते हुए सारी रात सफर करते हुए सुबह 10 बजे मैं बिलासपुर रेलवे स्टेशन जा पहुंचा। बिलासपुर रेलवे स्टेशन में एक घोड़ागाड़ी कर मैं दो घंटे की लंबी और थका देने वाली यात्रा कर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र डभरा पहुंचा।

प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र डभरा का 5 जनवरी 1993 का दोपहर 12 बजे का वह दृश्य अत्यंत भयावह था। हैजे से पीड़ित बीसों लोग हॉस्पिटल परिसर में उल्टियां कर रहे थे। सारे चिकित्सालय में उल्टी, दस्त और पेशाब की गंदी बदबू आ रही थी। हॉस्पिटल में सिर्फ दो आया और स्टॉफ नर्स सोनी मैडम थीं, बाकी सारे स्टॉफ का कहीं अता-पता नहीं था। कितने आश्चर्य की बात थी कि 30 लोगों के हॉस्पिटल के स्टॉफ में से मौके पर सिर्फ 3 लोग ही मौजूद थे। मैंने सोनी मैडम को डांटकर पूछा ’’बाकी सारा स्टॉफ कहां है’’, तब उसने बताया कि ’’आपके जाने के बाद प्रायः यहां चार-पांच लोग ही एक समय में रहते हैं। बाकी लोग कभी आए तो आए, वरना नदारद।’’ मेरा जूनियर डॉक्टर अजय सिंह मेरे छुट्टी लेने के बाद से ही बिलासपुर में था। बाकी स्टॉफ चौकीदार, वार्डबॉय, पाण्डेय जी बड़े बाबू किसी का कुछ पता नहीं था। मैंने एक आया को कहा कि जाओ और स्टॉफ क्वार्टर में जो भी स्टॉफ के लोग हों उन्हें यह कहो कि बी.एम.ओ. साहब ने बुलवाया है। ये सब करके मैं, सोनी मैडम और आया सब मिलकर आये हुए बीमार लोगों की मदद करने लगे। एक-डेढ़ घंटे की मेहनत, दवाइयां, नींबू पानी और ओ.आर.एस. से लोगों को कुछ आराम हुआ।‘‘

ठीक दोपहर दो बजे आया ने वार्डबॉय सतपाल, राजू, कालू और पाण्डेय बाबू को मेरे चेम्बर में भेजा। चारों लोग शराब के नशे में धुत्त थे। वार्डबॉय लोगों से तो ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था। मैं पिछली रात से सोया नहीं था, अपने भाई की शादी और छुट्टियां छोड़कर यहां बीमार लोगों की मदद करने आया था। यहां का रंग-ढंग देखकर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। मैंने सभी को जोर से डांटते हुए पूछा, ’’बदतमीज लोगों क्या यही तुम्हारा ड्यूटी का तरीका है। बीमार लोग, हैजे से त्रस्त हॉस्पिटल के सामने, तड़प रहे हैं और तुम लोग दिन में ही शराब के नशे में धुत्त पड़े हो। तुम सबके खिलाफ कार्यवाही करूंगा, डॉ. अजय सिंह को सस्पेण्ड न कराया तो देखना।’’ इस बीच पाण्डे बाबू आगे बढ़कर मेरे कुछ नजदीक आकर बोला- ’’हिच्च!साहब! तुम तो हिच्च! 15 जनवरी को हिच्च! लौटने वाले थे।‘‘ मेरा दिमाग पहले से ही खराब था, पाण्डे की इस हरकत ने मेरे सब्र का बांध तोड़ दिया। मैंने पाण्डे की कॉलर पकड़कर घसीटते हुए चेम्बर के बाहर खींचकर लाया और चार-पांच करारे तमाचे पाण्डे को लगाये, पाण्डे वहीं होश खो बैठा, तीनों-चारों वार्डबॉय मेरा यह रौद्र रूप देखकर भाग खड़े हुए। किसी तरह लोगों ने पाण्डे को भी मेरे चैम्बर के बाहर से उठाकर उसके घर भेज दिया। खैर, इन सारी घटनाओं के बावजूद, मरीजों की देखभाल करते और हॉस्पिटल की व्यवस्था सुधारते 5 जनवरी की वो रात कटी, देर रात मैं भी अपने हॉस्पिटल कैम्पस के अपने कमरे में जाकर सो गया।

अगली सुबह 06 जनवरी को डभरा में वो तमाशा हुआ जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। डभरा के स्थानीय समाचार पत्र और रायपुर-बिलासपुर के समाचार पत्रों के लोकल पन्नों में मेरी खबर प्रमुख रूप से आई थी। किसी समाचार पत्र ने मुझे वहशी बताया था तो किसी ने जंगली, किसी ने अत्याचारी बताया था तो किसी ने दरिंदा। जाहिर था पाण्डे और मेरे स्टॉफ के लोग डभरा के पुराने स्थानीय लोग थे, साथ में स्थानीय समाचार पत्रों के पत्रकारों से इनके संबंध भी अच्छे थे, इसी वजह से समाचार पत्रों में वही खबर आई थी जो पाण्डे और उनके साथी चाहते थे। उस दिन मुझे मीडिया की ताकत का एहसास हुआ कि यदि मीडिया चाहे तो पल में सच को छूट बना दे और छूट को सच, वाकई समाचार पत्र की खबरों का गहरा असर होता है। समाचार पत्र पढ़ने के बाद जब मैं 10 बजे हॉस्पिटल पहुंचा तो और भी हैरान हुआ। पाण्डे और उसके लगभग बीस साथी हॉस्पिटल के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने टेंट लगाकर धरने पर बैठे नारेबाजी कर रहे थे। ’’अत्याचारी बी.एम.ओ. को बर्खास्त करो।‘‘ ’’कर्मचारी एकता जिन्दाबाद‘‘ ’’ बी.एम.ओ. की तानाशाही नहीं चलेगी, नहीं चलेगी।‘‘ एक पल को ये सोचकर गुस्सा आया कि पाण्डे और उसके साथी इतने बेशर्म हैं कि काम भी नहीं करते और धरना भी देते हैं, इससे ज्यादा हंसी उन मूर्ख पंद्रह-बीस कर्मचारियों पर आई जो सच्चाई सुने, समझे और जाने बिना पाण्डे के साथ हड़ताल पर बैठ गये थे। मेरे सी.एम.ओ. बिलासपुर श्री एल.डी. बौरासी जी थे, मैं उनका बहुत सम्मान करता था, उन्होंने सुबह घर पर ही मुझे फोन करके सचेत कर दिया था कि सावधान रहना, पाण्डे को तमाचा मारकर तुमने काम तो अच्छा किया है, पर ये विषय बिलासपुर के कलेक्टर साहब की भी जानकारी में है, हो सकता है कि इस घटना की मजिस्ट्रियल जांच हो। वैसे भी मैं पाण्डे को मारना नहीं चाहता था और ना ही मैंने इसके पहले कभी किसी पर हाथ उठाया था, पर कल की परिस्थितियां ही कुछ ऐसी बनी थी की मैं खुद पर कंट्रोल नहीं कर पाया। पाण्डे के साथ हुई घटना से मेरे अंदर यह भावना तो थी की मुझ पर कोई छोटी-मोटी कार्यवाही हो सकती है, पर साथ ही यह विश्वास भी था कि मैंने जो किया है सही किया है, उन परिस्थितियों में जो सर्वोत्तम विकल्प था मैंने वहीं चुना है।

मेरे पास 6 जनवरी 93 को सुबह 11.30 बजे हास्पिटल में फिर से सी.एम.ओ. बौरासी साहब का फोन आया। उन्होंने बताया कि मंत्री मिश्रा जी मेरी इस हरकत से खासे नाराज हैं और उन्होंने बिलासपुर कलेक्टर को कहकर सक्ती तहसील के एस.डी.एम. श्री पी.एन. शर्मा को इस पूरे घटनाक्रम की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिये हैं। उन्होंने यह भी बताया कि एस.डी.एम. शर्मा बहुत तेज तर्राट किस्म के अधिकारी हैं, वो आज ही किसी भी समय उप स्वास्थ्य केन्द्र डभरा आकर इस पूरी घटना की जांच करेंगे और सबसे बुरी खबर जो बौरासी जी ने बतायी वो ये थी कि एस.डी.एम. साहब पाण्डे बाबू के दूर के रिश्तेदार भी हैं।

सी.एम.ओ. साहब से बात होने के बाद अब मैंने सोच लिया था कि अब जो भी होगा देखा जायेगा। दोपहर के साढ़े बाहर बजे के लगभग एस.डी.एम. साहब हॉस्पिटल आये, हॉस्पिटल के अंदर आने के बजाय पहले वो बाहर बैठे पाण्डे बाबू और उनके साथ धरने पर बैठे लोगों से मिले। लगभग आधे घंटे तक उन सब से चर्चा करने के बाद वो हॉस्पिटल कैम्पस में आये। मैंने उन्हें आते देखकर अभिवादन किया तो शर्मा जी मुझे देखते हुए बोले-’’अच्छा आप ही हैं डॉक्टर पटेल, बड़ा नाम सुना है आपका।‘‘ इतना कहने के बाद उन्होंने और उनके स्टॉफ मेम्बर्स ने हॉस्पिटल के पांच-सात लोगों का बयान लिखवाया। एस.डी.एम. साहब सबसे बात करने के बाद बी.एम.ओ. के चैम्बर में, मतलब मेरे चैम्बर में जाकर मेरी वाली कुर्सी पर बैठ गये। इसके बाद उन्होंने मुझे चैम्बर में बुलवाया, जब मैं अंदर गया तो मैंने देखा कि एस.डी.एम. साहब मेरी कुर्सी पर अधलेटे से बैठे हुए हैं और टेबल पर एस.डी.एम. साहब ने अपने जूते ठीक मेरे मुंह के सामने रखकर बैठे हैं। मैं अंदर पहुंचा तो उन्होंने मुझे अपने टेबल के सामने खड़े रहने को कहा। उन्होंने घंटी बजायी और पाण्डे बाबू को बुलवाया। चपरासी पाण्डे को लेने चला गया, इस बीच एस.डी.एम. साहब मुझे खड़ा रखकर और जूते टेबल पर मेरे सामने तरफ वैसे ही रखे-रखे सिगरेट निकालकर जलायी और पीने लगे। एस.डी.एम. साहब की ये हरकत मुझे बहुत ही नागवार लग रही थी, शायद जिन्दगी में पहली बार मेरी ऐसी बेइज्जती हुई थी। कुछ भी हो आखिर मैं खुद भी एक बी.एस.सी. ग्रेजुएट, एम.बी.बी.एस. सीनियर डॉक्टर था और एस.डी.एम. साहब का व्यवहार मेरे प्रति ऐसा था जैसे मैं कोई छंटा हुआ लफंगा, बदमाश या उठाईगीरा हूँ।

इस बीच पाण्डे बाबू भी चैम्बर में आ गये, एस.डी.एम. साहब ने उन्हें भी मेरे बगल में खड़ा किया और मुझसे कहा- ’’देखिये मिस्टर पटेल! मैंने सारी घटना की अच्छी तरह तहकीकात कर ली है, और मेरी जांच का निष्कर्ष यह है कि आपका व्यवहार अपने कर्मचारियों के प्रति ठीक नहीं है। आप उनसे ड्यूटी के अतिरिक्त अन्य कार्य करवाते हैं, अभद्रता करते हैं और उनके मना करने पर आप उनके साथ मारपीट करते हैं। आपको अपने व्यवहार में सुधार लाना चाहिये, आपका तौर तरीका और व्यवहार ठीक नहीं है।’’ एस.डी.एम. साहब की तौर तरीका और तहजीब वाली बात सुनकर लगा कि जो खुद बदतमीज़ी से टेबल पर पैर रखकर हमें जूता दिखाकर बेशर्मी से बात कर रहा है वो हमें तहजीब सिखा रहा है, मन में तो आया कि पलटकर करारा जवाब दूं पर कुछ सोचकर मैं चुपचाप सुनता रहा। एस.डी.एम. साहब ने आगे कहा कि ’’जांच में आप पर लगाये गये आरोप मुझे सही प्रतीत होते हैं इसलिये जांच के पश्चात कलेक्टर साहब द्वारा की जाने वाली आगे की कार्यवाही तक आप अवकाश पर रहेंगे और आपका मुख्यालय जिला चिकित्सालय बिलासपुर रहेगा। डभरा के बी.एम.ओ. का प्रभार जूनियर डॉक्टर अजय सिंह देखेंगे। आखिरी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह की आप अभी मेरे साथ चलकर पाण्डे और उनके साथियों से माफी मांगेंगे।’’ एस.डी.एम. साहब की यह बात सुनकर मैंने कहा- ’’देखिये सर मैं पाण्डे या किसी से भी माफी नहीं मांगने वाला हूँ।’’ एस.डी.एम. साहब बोले- ’’देखिये मिस्टर पटेल। मत भूलिये कि मैं मजिस्ट्रेट हूं और मैं बहुत कुछ कर सकता हूं।‘‘ मैंने कहा- ’’यही तो वह बात है सर जो मुझे अब तक रोके रखी है। वरना मैं अभी आपको ..............खैर छोड़िये मैं आपका दूसरा आदेश मानते हुए बिलासपुर डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल के लिये नि.......क........ता....से........र् ‘‘बाकी शब्द मेरी भीगी-पलकों और भारी गले से निकल ही नहीं पाये। अपने आंसू पोंछते हुए मैं चेम्बर से निकला, सीधे अपने क्वार्टर गया और अपना बैग उठाकर बिलासपुर के लिए निकल पड़ा। पूरे रास्ते आज के वाकये और अपमान के बारे में सोचते हुए दुखी मन से मैंने डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल बिलासपुर में सी.एम.एच.ओ. बौरासी सर को सारी बातें बताई। उनसे एस.डी.एम. साहब की लंबी छुट्टी पर रहने की बात बताकर मैं वापस अपने घर चित्रकूट की ओर निकल पड़ा। ये सारी घटनायें इतनी क्रमशः और जल्दी-जल्दी और लगातार हुईं कि मुझे आज भी लगता है जैसे सबकुछ बस कुछ देर पहले ही हुआ हो। वापस लौटते समय ट्रेन में मैंने यह संकल्प लिया, कि अब चाहे कुछ भी हो जाये मैं वर्ष 1993 की राज्य सिविल सेवा परीक्षा हर हाल में पास करके ही दम लूंगा और इस दुनिया को एस.डी.एम. मतलब डिप्टी कलेक्टर बनकर दिखाऊँगा।

घर आकर मैंने सारी बातें बाबूजी को बताई, हमेशा की तरह उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाते हुए कहा ’’ठीक है जाओ! सतना या इलाहाबाद जाकर अच्छी तैयारी करो। पर ध्यान रखना अपने खर्चे कम रखना। हम तुम्हें उतनी ही मदद करेंगे जितनी एक विद्यार्थी को की जाती है, क्योंकि यदि तुम सिविल सर्विस की तैयारी करते हो तो तुम फिर से सिर्फ एक विद्यार्थी हो, कोई बी.एम.ओ. या डॉक्टर नहीं, समझे......।’’ इस तरह बाबूजी का आशीर्वाद लेकर मैं सतना में छात्रावास में रहकर पढ़ाई करने लगा। वैसे तो मैं पढ़ने के लिये इलाहाबाद जाना चाहता था पर मैं जानता था कि इलाहाबाद बड़ा शहर है, बड़ा शहर मतलब बड़े खर्चे बड़ी समस्यायें। ये मेरी तंगी के दिन थे बस यही सोचकर मैंने सतना में रहकर तैयारी करने का निर्णय लिया, वैसे भी उस जमाने में एम.बी.बी.एस. की किताबों के मुकाबले में, बहुत ही कम पैसों में सिविल सर्विस के लिये जरूरी किताबें मिल जाया करती थीं। मैंने अपने कुछ पुराने दोस्तों की मदद से अपनी तैयारी की रणनीति बनाई और सिविल सेवा की पढ़ाई में जी जान से जुट गया। मैं जानता था कि आगे मेरी डगर और मुश्किल, और पेचीदा, और-और ज्यादा कठिन हो जाने वाली है, मंजिल कहीं दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है लेकिन फिर भी अपने अपमान के दर्द को मिटाने और अपने बाबूजी को दिये वचन को पूरा करने के लिए मुझे ये हर हाल में करना ही करना था।

मैं लगातार सतना में रहकर सिविल सर्विस की तैयारी करता रहा। इस बीच कलेक्टर बिलासपुर का ’’कारण बताओ नोटिस‘‘ मुझे मिला जिसमें मेरे एस.डी.एम. से दुर्व्यवहार करने और अपने अभद्र आचरण को सुधारने की हिदायत दी गयी थी। मैंने इस नोटिस का जवाब दिया और अपना पक्ष कलेक्टर साहब को लिखकर भेजा। कलेक्टर साहब ने मेरी दो वेतन वृद्धि रोकने का आदेश देकर मुझे अपना आचरण सुधारने की नसीहत दी। इन सबको भूलकर मैं लगातार सुबह-शाम, दिन-रात एक करके सिविल सेवा की तैयारी में जुटा रहा और प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण हो गया। मैंने मुख्य परीक्षा की तैयारी प्रारंभिक परीक्षा के साथ ही चालू कर दी थी इसलिये परिणाम आने पर मैंने और लगकर अपनी पढ़ाई जारी रखी। इस बीच बिलासपुर सी.एम.ओ. बौरासी जी ने मुझे पत्र लिखकर सूचना दी कि अब मैं अवकाश से वापस लौट सकता हूं और साथ ही मेरा फाइनल चयन वर्ष 1994 के सर्जन बैच में एम.एस. करने के लिये हो गया है। यह खबर सुनकर थोड़ा सुकून हुआ पर फिर लगा कि नहीं अब वापस नहीं लौटना है। अब तो एस.डी.एम. बनने का जो सपना मैंने देख लिया है उसे हर हाल में पूरा करके दिखाना है। यही सोचकर मैंने सिविल सेवा की मुख्य परीक्षा दी और उसका परिणाम भी मेरी आशा के अनुरूप रहा। मुझे साक्षात्कार के लिये इंदौर बुलाया गया, मुझे विश्वास था कि मेरे अंक मुख्य परीक्षा में अच्छे हैं। अच्छी अंग्रेजी होना भी मेरे लिये लाभदायक था, मैंने साक्षात्कार के सभी सवालों के अच्छे जवाब दिये। इसी बीच डभरा एस.डी.एम. साहब की घटना का भी जिक्र हुआ। बोर्ड मैम्बर ने कहा-’’तो आप भी एस.डी.एम. बनकर लोगों को अपना जूता दिखाना चाहते हैं।‘‘ मैंने कहा-’’नहीं सर। मैं एस.डी.एम. बनकर जूता नहीं दिखाना चाहता बल्कि मैंने जिन जूतों को अपने चेहरे के सामने रखा हुआ देखकर अपनी बेइज्जती महसूस की है, उन जूतों को अपने पैरों में पहन कर एस.डी.एम. के जूतों को उनकी औकात बताना चाहता हूँ।‘‘

बोर्ड मैम्बर्स को मेरे जवाब और मेरा आत्मविश्वास अच्छा लगा। बहुत ही सकारात्मक वातावरण में लगभग 30 मिनट में मेरा साक्षात्कार समाप्त हुआ। इसके बाद मैं वापस सतना लौट आया और रिजल्ट की प्रतीक्षा करने लगा। मुझे अपनी मेहनत पर तो भरोसा था पर परीक्षा परिणाम क्या और कैसे होंगे यह मैं नहीं जानता था। तय समय पर नवम्बर 1993 में म.प्र. राज्य सेवा परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। वर्ष 1993 के बैच में सुश्री वंदना वैध का प्रथम स्थान था और उनके बाद मेरी पूरे प्रदेश में द्वितीय स्थान था। मेरा चयन डिप्टी कलेक्टर मतलब एस.डी.एम. के पद पर हो गया था। आखिर मेरा सपना एक बार फिर सच हुआ था और मेरा डॉक्टर का सफेद कोट और सफेद जूता, एस.डी.एम. के काले कोट और काले जूते से बदल गये थे। इसके बाद अपनी ट्रेनिंग पूरी कर सन् 1994 में फिर से पहली पोस्टिंग पर बिलासपुर गया। इस बार मैं बी.एम.ओ. डभरा नहीं बल्कि एस.डी.एम. बिलासपुर था। मेरे पहुंचने पर सबसे पहला शुभकामना का फोन पाण्डे बाबू का आया। जिन्होंने कहा कि ’’आप साहब कुछ बड़ा करेंगे, मुझे पहले से ही पूरा विश्वास था।‘‘ इसी तरह एक बार श्री शर्मा जी जो अभी भी सक्ती के एस.डी.एम. थे, कलेक्ट्रेट बिलासपुर में मुझसे किसी मीटिंग के सिलसिले में मिले तो बहुत ज्यादा लज्जित होते हुए मुझसे कहने लगे ’’माफ कीजियेगा मिस्टर पटेल! उस वक्त मेरा बिहेवियर आपके प्रति सही नहीं था।‘‘ मैंने शर्मा जी से हाथ मिलाते हुए और मुस्कुराते हुए कहा- ’’माफी की कोई बात नहीं है शर्मा जी! आपके उसी बिहेवियर और आपके जूतों ने ही मुझे यहां तक पहुंचाया है, न आपने मुझे जूते दिखाए होते, न मैंने एस.डी.एम. बनने का संकल्प लिया होता, ना मैं कभी सिविल सेवा उत्तीर्ण हो पाता और ना ही कभी आप से मुलाकात होती और ना ही कभी आप इस तरह खेद व्यक्त कर पाते।’’ शर्मा जी मेरी बात सुनकर थोड़ा सा संकोच भाव से भर गये, पर ये अलग बात है कि इसके बाद सन् 1994-97 में बिलासपुर एस.डी.एम. रहने के दौरान और आज भी शर्मा जी ही मेरे सबसे अच्छे दोस्त, साथी और हमदर्द हैं।

उस सन् 1997 से कल आने वाले जनवरी 2017 तक लगभग 20 साल बीत चुके हैं और आज मैं एडिस्नल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (ए.डी.एम.) सीधी हूं। इस व्हाइट कोट से ऐसी ही ना जाने मेरी कितनी यादें जुड़ी हुई हैं। यहीं वह कोट था जो मेरा पहला साथी था और यहां से रिटायर होकर लौटने पर अब यही कोट फिर से मेरा साथी बनेगा।

जब मैं रिटायर हो जाऊंगा तो मेरा इरादा है कि फिर से अपनी डॉक्टरी की प्रैक्टिस शुरू करूं। आखिर करूं भी क्यों ना क्योंकि यही तो मेरा और मेरे बाबूजी का सबसे बड़ा सपना था। यही वह काम है जिसमें रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं है, वैसे भी किसी की प्रेम, स्नेह और सेवा देने की कोई उम्र नहीं होती, ये कभी भी और किसी भी उम्र में किया जा सकता है।

इस कोट को सुरक्षित अपने जाने वाली अटैची में जमाकर मैंने अपना काला कोट निकाला। इस कोट पर म.प्र. शासन का मोनो और राज्य प्रशासनिक सेवा जेब के ऊपर मतलब ठीक सीने पर लिखा हुआ था। यह कोट मेरा सबसे प्रिय कोट था और इसे पहनने के बाद मेरे दिल में म.प्र. शासन का प्रतिनिधि होने की भावना और दिमाग में जनता का सेवक होने का भाव आ जाता है। अपने बाकी कपड़ों को ठीक से जमाने की हिदायत ‘बहादुर’ को देकर और अपने सभी सामानों को गाड़ी में जमवाकर मैं ऑफिस के लिये निकल पड़ा। अपनी पीली बत्ती की गाड़ी और अपने बंगले को मैंने आखिरी बार गौर से देखा, ना जाने दोबारा कभी फिर इसे देख भी पाऊँगा या नहीं.......। गाड़ी में बैठने के पूर्व मेरा सारा सामान मेरे किराये के ट्रक में लदवाने और उसे दोपहर तक ‘गुना’ के लिये रवाना करने का निर्देश मैंने बहादुर को दिया। चौकीदार बहादुर, सिपाही साहू और ड्राइवर जायसवाल सब भीगी आंखों से मुझे देख रहे थे। सबको अपनी विदाई के मौके पर पांच-पांच सौ रूपये हाथों में देकर मैंने सिपाही साहू और ड्राइवर जायसवाल से कहा ‘‘अभी काहे रोते हो। अरे भइया! तुम्हें अभी हमें गुना तक छोड़ना है तब हम अलग होंगे, अब रोना धोना बंद करो और चलो कलेक्टर साहब के बंगला पर, समझे ना।

आज मेरा रिटायरमेन्ट का और सर्विस का और साल का आखिरी दिन मतलब 31 दिसम्बर 2016 का दिन है। कलेक्टर श्री अभय वर्मा चाहते थे कि मैं उनके साथ डिनर करके लौटूं पर दरअसल मेरे घर मतलब गुना में माँ और बाबूजी चित्रकूट से आये हुए थे। मेरी पत्नी, बेटा और दोनों बेटियों ने मिलकर नववर्ष दिनांक 01.01.2017 को सारे परिचितों और रिश्तेदारों के साथ मिलकर एक ग्रैण्ड पार्टी करने की योजना बना रखी थी। यही वह कारण था जिसके लिये मैं सीधी में दो-चार दिन और रूकने की इच्छा को अपने मन में दबाये 31 दिसम्बर को ही वापस गुना लौट जाना चाह रहा था। खैर कलेक्टर साहब के साथ लंच करने के बाद मैं ऑफिस के लिये करीब 02 बजे रवाना हो गया। ऑफिस में मेरा आखिरी दिन बड़ा समस्याओं भरा होता है, बहुत सी चार्ज देने वाली, पुरानी-नयी फाइलों में मुझे हस्ताक्षर करने थे। 31 दिसम्बर 2016 शनिवार का दिन था और अगले दिन 01 जनवरी 2017 को रविवार होना था, जाहिर था कि कलेक्ट्रेट का सारा स्टॉफ और अधिकारी सब भागने की फिराक में थे। मेरा विदाई का कार्यक्रम ठीक 4 बजे कलेक्टर मीटिंग हॉल में होना था, मैंने पौने चार बजे तक अपना सारा काम निबटा लिया और मीटिंग हॉल से बुलावा आने की राह देखने लगा।

मुझे ठीक चार बजे मेरे एस.डी.एम. और तहसीलदार लेने आये। मैं उनके साथ मीटिंग हॉल में पहुँचा, जहाँ सबने अपने स्थान पर खड़े होकर और तालियाँ बजाकर मेरा अभिवादन किया। सारे स्टॉफ ने मालाओं, शॉल, श्रीफल और भगवद गीता देकर मुझे भावभीनी विदाई दी। कलेक्टर साहब और सभी लोगों ने अपने उद्बोधन में मेरी बहुत प्रशंसा की और मेरे अच्छे व्यवहार, चाल-चलन और स्वभाव को अनुकरणीय बताया। इन सभी की सारी बातें सुनते हुए, मैं मन ही मन मुस्कुरा भी रहा था, दरअसल जाने-वाले को जाना होता है और जो उससे दुःखी भी रहा हो, इस मौके पर उसकी थोड़ी बहुत बड़ाई करके उसे आखिरी नमस्कार कर लेता है। मैंने भी बहुतों को विदाई दी है, यह एक औपचारिक कार्यक्रम होता है, पर जैसा मैंने पहले भी कहा था, भई अपनी बड़ाई सुनना किसे बुरा लगता है।

सभी के सारे उद्बोधन हो जाने के बाद मेरा क्रम आया। मैंने कलेक्टर महोदय और सारे स्टॉफ को अपने तरफ से धन्यवाद दिया और इतने सालों तक अपना साथ देने का बहुत-बहुत आभार जताया। सीधी जिले के राजस्व विभाग में कुछ नये अधिकारी प्रशिक्षण के लिये आये हुए थे। वे मुझसे रोज ही कुछ ना कुछ पूछते, सीखते और जानते रहते थे। आज वो लोग थोड़ा सा निराश थे क्योंकि उनकी ‘सामान्य ज्ञान’ की पुस्तक मतलब ‘‘मैं’’ रिटायर होकर अपने घर जा रहा था। इन सभी लोगों ने मुझसे बहुत आग्रह किया था कि मैं उन्हें राजस्व विभाग की नौकरी का अपना तजुर्बा बताकर जाऊँ। इन्हीं लोगों की जिद पर मैंने सबको अपने डॉक्टर से एस.डी.एम. बनने की कहानी सुनाई और सभी का धन्यवाद कर बैठने लगा। इन नये प्रशिक्षु अधिकारियों की बहुत जिद करने, राजस्व विभाग में समय-समय पर आने वाली कानूनी बाध्यताओं का सामना करने की सीख देकर ही जाने पर ये प्रशिक्षु अधिकारी अड़ गये तब कातर सा कलेक्टर महोदय को देखता मैं उनका आदेश पाकर अपनी जिन्दगी की कानून व्यवस्था से जुड़ी एक छोटी सी घटना बताने को बाध्य हुआ जो यह थी...........................

सन् 2002 में मैं विदिशा जिले की बड़ी तहसील सिरोंज का एस.डी.एम. था। यह एक बड़ा सबडिवीजन और हिन्दू-मुस्लिम की बड़ी जनसंख्या का स्थान होने के कारण एक अत्यंत संवेदनशील सब डिवीजन था। यह 15 और 16 मार्च 2002 की दरमियानी रात की घटना है। दरअसल गोधरा कांड और गुजरात में फैली अशांति से आंशिक रूप से ही सही पर सारा देश किसी ना किसी रूप से प्रभावित था। सिरोंज में भी 15 तारीख को दो पक्षों के मध्य कुछ झगड़ा होने की खबरें आई थी। सिरोंज के चौक बाजार क्षेत्र का पार्षद चाँदमल साहू का विवाद अपने पड़ोसी दुकानदारों से था। दरअसल चौक बाजार क्षेत्र में पार्षद चाँदमल साहू की ही एक दुकान लस्सी की थी, बकाया सारी मुर्गे-मटन की दूसरी दुकानें हुआ करती थीं। चाँदमल की जगह कोई दूसरा होता तो कभी का दुकान छोड़ भाग जाता पर चाँदमल पार्षद होने के साथ-साथ दबंग किस्म का व्यक्ति भी था। इसी कारण वह यहाँ पिछले 15 सालों से दुकान चला पा रहा था। इस घटना की सूचना मिलने पर टी.आई. और मैंने मौके पर जाकर समझाइश दी और सारा शुरूआती विवाद शांत करवा दिया। ऐसा लगा कि अब कुछ नहीं होगा। वैसे भी 15 मार्च 2002 की सुबह से टी.आई. सिंरोज और मैं सुबह से ही क्षेत्र में घूम-घूमकर लोगों से शांति और व्यवस्था बनाये रखने का अनुरोध कर रहे थे। हमारे साथ सभी धर्मगुरू, मौलवी साहेबान और अन्य क्षेत्र के गणमान्य लोग दो गाड़ियों में साथ थे। दिन भर तो स्थिति सामान्य रही और शाम 06 बजे मैं अपने सिरोंज के एस.डी.एम. बंगले पर लौट आया। टी.आई. को विदिशा जिले में कुछ घटना घटित होने के कारण एस.पी. साहब के बुलाने पर जाना पड़ा। मैंने अपने तहसीलदारों को रातभर सावधानीवश गश्त करते रहने के निर्देश दिये। सारी जिम्मेदारी सबको बाँटकर रात 10.30 बजे मैं खाना खाकर सोने जा रहा था कि पटवारी रामाधीन मेरे बंगले पर पहुँचा।

चौकीदार के बताने पर मैं बंगले के बाहर बैठक में रामाधीन पटवारी से मिला। रामाधीन बहुत घबराया हुआ था और बार-बार थूक गटक रहा था। मेरे सुकून से सब कुछ बताने को कहने पर रामाधीन ने बताया कि आपके चौक बाजार से वापस लौटकर आने पर रात करीब नौ बजे चौकबाजार क्षेत्र के कुछ दुकानदारों ने पार्षद चाँदमल साहू पर हमला कर दिया है। चाँदमल को बुरी तरह फरसा, तलवार और डंडों से पीटा जाकर, उसकी लस्सी की दुकान को जला दिया गया है। चाँदमल साहू की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है और उसे नजदीकी सिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है। चाँदमल की हालत बहुत खराब है और उसके बचने की उम्मीद बहुत कम है। ये सारी बातें सुनकर मुझे उतनी चिंता नहीं हुई जितनी रामाधीन के यह बताने पर हुई कि सिटी हॉस्पिटल के बाहर विभिन्न संगठनों के चार-पांच हजार लोग लाठी डण्डों के साथ इकट्ठे हैं और उनका कहना है कि यदि चाँदमल को कुछ हुआ तो आज ही की रात उसके साथ मारपीट करने वालों से बदला लिया जायेगा।

ठण्डा मौसम होते हुए भी मुझे कुछ पसीना सा आ गया। ड्राइवर और गार्ड रात को वापस लौट चुके थे, मैंने एक चौकीदार को भेजकर उन्हें सिटी हॉस्पिटल पहुंचने की खबर भिजवाई। मौके की नजाकत को देखते हुए मैंने रामाधीन को बाजू में बिठाया और खुद गाड़ी चलाते हुए सिटी हॉस्पिटल के लिये रवाना हुआ। एहतियात के तौर पर मैंने थाने की जानकारी वायरलेस से ली तो पता चला कि एस.डी.ओ.पी. और टी.आई. सिरोंज दोनों विदिशा में हैं और आज रात उनके लौटने की कोई उम्मीद नहीं है, ये मेरे लिये सबसे बुरी खबर थी। मेरी कलेक्टर वीरा राणा मेडम थीं, मैं उन्हें और एस.पी. साहब को सब बताना चाह रहा था, पर मैंने सोचा, कि पहले सिटी हॉस्पिटल पहुंचा जाये और फिर मौके की नजाकत देखकर अपने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी जाये। यही सोचकर मैंने अपनी गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी, जिससे जल्द से जल्द मौके पर पहुंचा जा सके। रात सवा ग्यारह के आस-पास मैं और रामाधीन सिटी हॉस्पिटल पहुंचे। मैंने देखा चार से पांच हजार की भीड़ इस समय आठ से दस हजार होने वाली थी। लोग हाथों में डंडा और अन्य हथियार लिये नारेबाजी कर रहे थे, साथ में बदले और इंसाफ के नारे लगा रहे थे। मुझे सिरोंज में आये दो-ढाई साल का वक्त बीत चुका था, इसलिए लगभग सारे लोग मुझे पहचानते थे। मेरे हॉस्पिटल पहुंचते ही अग्निहोत्री पंडित जी मेरे पास आये और धीरे से बोले- ‘‘एस.डी.एम. साहब। बिना टी.आई. के आपको यहां नहीं आना चाहिये था। यहां के हालात नाजुक हैं और यदि चाँदमल को कुछ हो गया तो यहां कभी भी दंगे भड़क सकते हैं। ‘‘इस बात का एहसास मुझे भी था, पर मेरे बाबूजी ने मुझे ‘हालात से भागना नहीं’ उनका मुकाबला करना सिखाया था, इसलिये मैं सिटी हॉस्पिटल आया था। मैंने देखा सिरोंज थाने के ए.एस.आई मिश्राजी और चारों कांस्टेबल भी सिटी हॉस्पिटल आ चुके थे। सिरोंज के बी.एम.ओ. राजपूत जी खुद चाँदमल की आई.सी.यू. में देखरेख कर रहे थे। मैं आई.सी.यू. के अंदर पहुंचा जहां बी.एम.ओ. राजपूतजी बेहद उदास थे और चाँदमल को लगी ड्रिप निकाल रहे थे। मैंने देखा - ‘‘ हुड़दंगियों ने चाँदमल को बुरी तरह पीटा था, उसके सारे शरीर पर घाव के निशान थे और जगह-जगह से खून बह रहा था। चाँदमल का शरीर स्थिर सा बैड पर पड़ा था और उसमें कोई हलचल नहीं हो रही थी। अपने डॉक्टर होने की वजह से मैं चाँदमल को देखते ही समझ गया कि चाँदमल की मौत हो चुकी है।’’ मैंने चाँदमल की नब्ज देखकर, उसकी बंद सांसों और स्थिर धड़कन से इसकी पुष्टि भी कर ली। डॉक्टर राजपूत मुझे देखकर बोले - ‘‘सर लगता है आज चांदमल के साथ हमारी भी सिटी हॉस्पिटल सिरोंज में ही समाधि बनाना तय है क्योंकि जब इन दस हजार लोगों को पता चलेगा कि हम पार्षद चाँदमल साहू को बचा नहीं सके तो ये लोग ना जाने क्या कर गुजरें। मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है एस.डी.एम. साहब।’’

मैंने देखा कि दो तीन लोग आई.सी.यू. के गेट को खोलना चाहते हैं। मैंने डॉक्टर राजपूत को चुप रहने का इशारा किया और बाहर जाकर एम्बूलेन्स रेडी करने को कहा। डॉक्टर राजपूत मुझसे कुछ पूछना चाहते थे पर मैंने उन्हें घूरकर देखा और कहा - ‘‘ आप बस अपना मुंह बंद रखिये। जो मैं कह रहा हूँ बस बिना दिमाग लगाये करते जाइये। जाइये एम्बूलेन्स रेडी करवाइये। ‘‘ इतना कहकर मैंने आई.सी.यू. का गेट खोला, सामने दो-तीन राजनैतिक दलों के जिलाध्यक्ष खड़े थे, उन्होंने मुझसे चाँदमल का हाल-चाल पूछा। मैंने आगे आकर कहा - ‘‘ बहुत शेरदिल है चाँदमल। इतनी चोट लगने पर भी ठीक है, पर मुझे लगता है कि यहाँ उसको ठीक होने में समय लग जायेगा और यदि उसे आपरेशन वगैरह या खून की जरूरत रही तो, वो यहाँ उतना अच्छे से उपलब्ध नहीं हो सकता। बेहतर होगा हम उसे भोपाल के किसी बड़े हस्पताल में भर्ती करवा दें। राजपूत जी ने भोपाल में बात कर ली है और नीचे एम्बूलेन्स रेडी करवा रहे हैं। चाँदमल बहुत जल्द अच्छा होकर वापस लौटेगा।

मेरी बातों से उन लोगों को कुछ तसल्ली हुई, बाहर सभी प्रमुख नेताओं एवं संगठन प्रमुखों ने मेरी कही बातों से जनसमुदाय को अवगत कराया। इसी बीच डॉक्टर राजपूत एम्बूलेन्स रेडी करवा चुके थे। वार्ड बॉय और हॉस्पिटल के कर्मचारियों के सहयोग से आक्सीजन लगी और हांथ में डिप लगी पार्षद चाँदमल साहू की डेड बॉडी को भोपाल के लिये रवाना कर दिया गया। इसके बाद मैंने सभी को बताया ‘‘देखिये चाँदमल साहू बहुत बहादुर और हिम्मतवाले व्यक्ति हैं। चाँदमल की हालत ठीक-ठाक है और मुझे और डॉक्टर राजपूत को पूरा भरोसा है कि चाँदमल बहुत जल्दी अच्छा होकर हमलोगों के बीच होगा। हमने सभी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा कायम कर लिया है और ए.एस.आई. मिश्राजी ने बताया है कि सभी की शिनाख्त भी हो गयी है। अब आप सभी लोग घर जाइये किन्हीं अफवाहों पर भरोसा मत कीजिए। मुझे और पुलिस को सुबह तक का वक्त दीजिये, सुबह तक सारे अपराधी पुलिस की हिरासत में होंगे।’’ मेरी बातें सुनकर और क्योंकि भीड़ का मुख्य आकर्षण पार्षद चाँदमल सिटी हास्पिटल से भोपाल रवाना हो गया था इसलिए धीरे-धीरे भीड़ सिटी हॉस्पिटल से वापस लौटने लगी। मैंने राहत की सांस ली, राजपूत और ए.एस.आई. मिश्राजी लगातार मुझे ही देख रहे थे।

रात लगभग साढ़े बारह बजे इक्का-दुक्का लोगों को छोड़कर सारे तमाशबीन वापस लौट चुके थे। ए.एस.आई. मिश्रा जी बहुत देर से सबकुछ चुपचाप देख रहा था, मेरे पास आकर कान में धीरे से बोला- ‘‘ क्या चाँदमल वाकई बच जायेगा सर! मुझे तो गला था कि वो रात 9 बजे हुई मारपीट के वक्त ही दम तोड़ दिया।’’ मैं किसी को कुछ भी बताना नहीं चाहता था, वैसे भी ऐसी खबरें जंगल की आग की तरह फैलती हैं, इसलिए मैंने कहा- ’’किस्मत में होगा तो चाँदमल बचेगा ही मिश्राजी! आप बस ये ध्यान रखिये कि आज की रात बहुत कठिन है। रातभर शहर की गश्त करिये और कोई भी दिक्कत हो तो मुझे वायरलेस करिये, बांकी सब मैं संभाल लूंगा। ’’डॉक्टर राजपूत को चुप रहने और मेरा निर्देश मिलने तक किसी से कुछ ना कहने की हिदायत देकर मैं रात 01 बजे अपने बंगले लौट आया।

रात को 01 बजे मैंने मेडम कलेक्टर और एस.पी. विदिशा को फोन करके सारी घटना की जानकारी दी। मैंने कहा कि ‘‘आज की रात तो किसी तरह कट जायेगी पर सुबह चाँदमल की डेड बॉडी आने तक यदि हमें पर्याप्त बल नहीं मिला तो सिरोंज में दंगा होना तय है। ‘‘दोनों वरिष्ठ अधिकारियों ने मुझे शाबासी दी और सुबह तक फोर्स की व्यवस्था कर लेने का आश्वासन दिया। दोनों अधिकारियों के कहे अनुसार ही ठीक सुबह 07 बजे नजदीकी जिलों सागर, रायसेन, होशंगाबाद और राजधानी भोपाल से लगभग 250 से 300 पुलिस और पैरामिलिट्री के जवान सिरोंज पहुंच गये थे। सुबह 10 बजे करीब मृतक पार्षद चाँदमल की डेडबाड़ी भोपाल से वापस लौटी, पर इस वक्त तक सिरोंज एक छावनी में तब्दील हो चुका था। सुबह ग्यारह बजे के लगभग पार्षद चाँदमल साहू का यथोचित ढ़ंग से कड़ी पुलिस सुरक्षा व्यवस्था में अंतिम संस्कार कर दिया गया। इसी दिन दोपहर तक सभी संदिग्ध अपराधियों को पुलिस द्वारा गिफ्तार कर लिया गया। इस तरह अपने साथी कनिष्ठ अधिकारियों की कर्त्तव्यनिष्ठता, वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग और मार्गदर्शन के साथ चपलता से झूठ बोलकर मैंने एक बहुत बड़े दंगे को नियंत्रित कर लिया था और इस तरह उस समय हम बाल-बाल बच भी गये थे। मुझे नहीं लगता कि शायद उस वक्त इससे बेहतर कोई और रास्ता या तरीका अपनाकर हम अपनी जान और उन दंगों को होने से रोक सकते थे।

मेरी बात पूरी होते ही मीटिंग हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मैंने हाथ जोड़कर सबको धन्यवाद दिया और सभी के प्रति अपना आभार प्रगट किया। शाम को 05.30 का वक्त हो चला था, सबसे विदा लेकर मैं अपनी गाड़ी में आकर बैठ गया। मुझे कलेक्टर साहब और बाकी सभी अधिकारी गाड़ी तक छोड़ने आये। भीगी आंखों और कृतज्ञता से वशीभूत होकर मैंने सभी अधिकारियों और कलेक्ट्रेट भवन को आखिरी बार देखा और विदाई ली। मेरा ड्राइवर जायसवाल गाड़ी को कलेक्ट्रेट से बाहर रोड पर निकालकर गुना की तरफ दौड़ाये जा रहा था और मैं भावुक होकर अपने जीवन के बीते, इन 60 वर्षों को याद करता चले जा रहा था। मुझे जहाँ इस बात का बहुत ज्यादा दुःख था कि आज मैं रिटायर हो गया हूँ वहीं एक ओर इस बात की बहुत ज्यादा तसल्ली भी थी, कि ईश्वर ने इन साठ वर्षों में मेरे मान, सम्मान और मर्यादा को अक्षुण्ण बनाये रखा और इसे लगातार बढ़ाया। मुझे इस पल अपने बाबूजी की कमी सबसे ज्यादा खल रही थी और लग रहा था कि काश इस वक्त वो यहाँ मेरे पास होते तो मुझे यह सोचने की जरूरत नहीं रहती कि मुझे अब आगे क्या करना है। खैर मैं मन में यही सोचकर गुना की ओर तेजी से बढ़ा जा रहा था कि वहाँ तो मुझे बाबूजी मिल ही जायेगें और मुझे आगे क्या करना है ये भी वे बता ही देंगे। यह भी तय है कि मैं उनके बताये रास्ते पर फिर से चलकर सफलता पा ही लूंगा क्योंकि मैं भी यही मानता हूँ और मेरे बाबूजी भी यही कहते हैं कि .............................’’ असंभव कुछ भी नहीं’’ ................।

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लेखक परिचय -

मैं शैलेन्द्र सिंह सन् 2011 बैच का डिप्टी कलेक्टर हूँ। वर्तमान में मैं सीधी एस.डी.एम. के पद पर सीधी जिला में पदस्थ हूँ। मुझे लेखन का शौक है और इसीलिये मैं कभी-कभी कुछ-कुछ लिखता रहता हूँ। इस बार मैंने अपने सीनियर अपर कलेक्टर श्री एम.पी. पटेल जी की जिन्दगी की कहानी उनका बॉयोडाटा लेकर अपने शब्दों में लिखने का प्रयास किया है।

नाम- शैलेन्द्र सिंह ’’सितारे’’

पद- एस.डी.एम. सीधी

पता- एस.डी.एम. निवास सिविल लाइन, सीधी जिला-सीधी (म0प्र0) पिन-486661

मो.- 09754722171, 08305131775

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एडीशनल कलेक्टर एम.पी. पटेल  का संक्षिप्त बॉयोडाटा

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1- नाम -                               श्री एम.पी. पटेल

2- पिता -                       श्री रामलाल पटेल

3- माता -                       श्रीमती यशोदा देवी

4- पिता का व्यवसाय -   कृषि

5- जन्मस्थान       -               चित्रकूट

6- शैक्षणिक योग्यता ः-

क्र.

कक्षा

विवरण

1

प्राथमिक

प्राथमिक शाला रैपुरा (उ0प्र0) बांदा

2

माध्यमिक

माध्यमिक शाला चित्रकूट

3

हाई स्कूल

पौददार इंटरकॉलेज सीतापुर

4

हायर सेकेण्डरी

हिन्दू इन्टर कॉलेज (अतर्रा) बांदा यूनिवर्सिटी यूपीबोर्ड

5

बी.एस.सी

शास. साइंस कॉलेज सतना

6

एम.बी.बी.एस.

मेडिकल कॉलेज रीवा (1984)

7- शासकीय सेवाओं में चयन ः-

· वर्ष 1977 में पी.एम.टी. एवं रेंजर के पद पर चयन।

· वर्ष 1985 में एम.बी.बी.एस. डाक्टर हेतु एम.पी.पी.एस.सी. में चयन।

· 1993 में शासकीय तौर पर सर्जरी से एम.एस. करने के लिये चयन।

· 1993 की राज्य लोक सेवा आयोग की पी.एस.सी. परीक्षा में पूरे प्रदेश में द्वितीय स्थान और डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयन।

8- डिप्टी कलेक्टर के रूप में नियुक्तियाँ ः-

· बिलासपुर      1993-1997

· टीकमगढ़              1997-2000

· विदिशा         2000-2004

· ग्वालियर              2004-2006

· ज्वाइंट डायरेक्टर मंडी बोर्ड ग्वालियर  2006-2007

· 2007 से अपर कलेक्टर पद पर प्रमोशन

· ए.डी.एम. जबलपुर  2007-2010

· ग्वालियर साडा में सी.ई.ओ.    2010-2012

· उज्जैन सी.ई.ओ. जिला पंचायत 2012-2015

· ए.डी.एम. सीधी  2015-2016

· रिटायरमेन्ट - 31 दिसम्बर 2016

9. वर्तमान निवास स्थल- गुना, जिला-गुना (म.प्र.)  मो.- 09425490465, 08770834217
-ः-  -ः-

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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