बुधवार, 17 मई 2017

दहकते पलाश -मन की ठंडक / हाइकु संग्रह -डॉ सुरेंद्र वर्मा / (पुस्तक समीक्षा ) / सुशील शर्मा

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दहकते पलाश -मन की ठंडक

हाइकु संग्रह -डॉ सुरेंद्र वर्मा

(पुस्तक समीक्षा )

सुशील शर्मा

किसी प्रतिष्ठित साहित्यकार की लेखनी की गहराई को समझने के लिए पारखी बुद्धि और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ सामाजिक समझ अत्यंत आवश्यक है। डॉ सुरेंद्र वर्मा के हाइकु संग्रह की समीक्षा  सन्दर्भ में उक्त बात को मैंने अपनी सीमान्त मेधा में विशेष स्थान दिया है। मैंने कुछ दिनों पहले प्रदीप कुमार दाश "दीपक "के संपादन में प्रकाशित हाइकु संग्रह "झाँकता चाँद " की समीक्षा लिखी थी। उस समीक्षा से डॉ. सुरेंद्र वर्मा बहुत प्रभावित हुए उन्होंने दूरभाष पर आदेशित किया कि  उनके हाइकु संग्रह 'दहकते पलाश' की समीक्षा मैं लिखूं। ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है की ऐसे मूर्धन्य कवि ,व्यंग्यकार और चिंतक व्यक्तित्व के कृतित्व की समीक्षा लिख कर मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ।

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डॉ सुरेंद्र वर्मा जैसे मूर्धन्य साहित्यकार का यह हाइकु संग्रह"दहकते पलाश"जब मेरे हाथ में आया तो प्रथम दृष्टया पढ़ने के उपरांत मुझे इसमें कुछ विशेष नजर नहीं आया। लेकिन जब इसको दूसरी बार पढ़ा तो इसमें संग्रहीत हाइकु कविताओं की गहराइयों ने मुझे आंदोलित किया और उनका अमिट प्रभाव मेरे हृदयस्थल पर अंकित हो गया।


हिन्दी साहित्य का 20 वीं सदी का इतिहास विभिन्न विधाओं के सृजन,विदेशी विधाओं के प्रभाव और उनके विरोध और हिंदी साहित्य में उनकी स्वीकृति एवं उन्हें आत्मसात करने का काल रहा है। ऐसी विधाओं का इसलिए विरोध हुआ कि वो हिंदी साहित्य को नुकसान पहुंचाएंगी और हमारी जो मौलिक और शास्वत विधाएं है वो समय के गर्त में समा जाएंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। और अंत में हिन्दी साहित्य ने उन्हें खुले मन से स्वीकार किया।


इन्ही विधाओं में से हाइकु कविताएं भी हैं। हाइकु 5-7-5 के वर्णक्रम में 17 आक्षरिक त्रिपदकि छंद है। जिसमें अभिव्यक्ति की गहनतम गहराई समावेशित होती है। हम अभिव्यक्ति की बात करते हैं, तो अनुभूतियाँ उसके पार्श्व से स्वयंमेव झाँकने लगती हैं। और मनोहारी बिम्बों का हृदयस्पर्शी सृजन हाइकु कविताओं के रूप में पुष्पित और पल्लवित होने लगता है।


डॉ सुरेंद्र वर्मा की हाइकु कविताओं में जीवन के विभिन्न आयामों के बिम्बों का स्पष्ट परिलक्षण है। आज जीवन में छोटे-छोटे सत्यों, अनुभूतियों तथा संवेदनाओं का व्यापक संसार हमारे चारों ओर घूम रहा है। डॉ सुरेंद्र वर्मा ने  इन जीवन-सत्यों की एक कुशल चित्रकार की भांति अपनी हाइकु कविताओं में उकेरा है।


आज के साहित्यकार की सबसे बड़ी चुनौती जीवन के सुख दुख, लाभ हानि,संघर्ष, जिजीविषा,जीवन यथार्थ के साथ साथ मनोविकार विसंगति, विद्रूपता, सामाजिक और आर्थिक सरोकारों को अपने साहित्य में चित्रित करना है। इसमें बहुत कम साहित्यकार सफल हुए है। जिसमें से एक नाम डॉ सुरेंद्र वर्मा का है।


डॉ सुरेंद्र वर्मा ने  देश, समाज, राजनीति, दर्शन, अध्यात्म, प्रकृति, शिक्षा, साहित्य, कला, श्रृंगार, आदि अनेक विषयों पर हाइकु एवम सेनरियू कविताएं रचीं है जो कालजयी श्रेणी की हैं।
समाज की आंतरिक कुरीतियों एवम राजनीतिक विषमताओं पर आपने अपने हाइकु कविताओं के माध्यम से करारा प्रहार किया है। आपकी सशक्त हाइकु रचनाओं में प्रकृति की अनुगूंज, मानव मन के विषाद और हर्ष के बिम्ब स्पष्ट प्रतिबिम्बित हैं।


डॉ सुरेंद्र वर्मा के इस हाइकु संग्रह के कुछ सर्वश्रेष्ठ हाइकु जिन्होंने मेरे मन को आंदोलित किया है की समीक्षा प्रस्तुत है-


1.कितनी पीर / पी गया है पर्वत / धाराएं फूटी।
मनुष्य के दर्द, दुख, विषमताओं को प्रतिबिंबित करती हाइकु कविता।


2.सारे गांव पे / रखता है नजर / बूढा दरख़्त।
समाज में वृद्ध व्यक्तियों के स्थान और उपयोगिता को इंगित करता हाइकु।


3.धूसर पौधे/वर्षा जल में धुले/नए के नए।
समय के पुनरागमन का सुंदर बिम्ब प्रस्तुत करती हाइकु कविता।


4.गुलमोहर/सहता रहा ताप/हंसता रहा।
गुलमोहर पेड़ के माध्यम से मानवीय जीवन की सहनशीलता को दर्शाता हाइकु।


5.जलाते नहीं/दहकते पलाश/रंग भरते।
जीवन के सकारात्मक पहलू को उजागर करता हाइकु।


6.दृष्टि विहीन/सांसद और नेता/मर्यादा हीन।
भारतीय राजनीति पर सटीक व्यंग करता सेनरियू।


7.कैसी संस्कृति/शिक्षा हुई दुकान/धर्म अधर्म।
शिक्षा की दुर्व्यवस्था को उकेरता सेनरियू।


8.दाम चुकाओ/मूल्य तक बिकते हैं/बाजार विच।
वर्तमान वैश्विक बाज़ारीकरण की विषमताओं को रेखांकित करता सेनरियू।


9.हिमालय के/ उतुंग शिखर सा/ मन हमारा।
मनुष्य के अंदर संकल्पों का दीया जलाता श्रेष्ठ हाइकु।


10.दीप ने कहा /लड़ो अंधकार से /यही संकल्प।
दीपक के द्वारा मानव मन को संकल्पित करता उच्च कोटि का हाइकु।


11.स्वांग रचते /क्षद्म रूप धरते/ स्वप्न निराले।
सपनों की निराली दुनिया को सपनीला बनाता श्रेष्ठ हाइकु।


12.संभावनाएं /मरती नहीं कभी/ चिर जीवित।
मनुष्य के उर अंतर में आशा का संचार करता उच्चकोटि का हाइकु।


13.मौन मुखर/अंतर की आवाज़/सुनो गौर से।
अपने अंतस में स्वयं को खोजती श्रेष्ठ हाइकु कविता।


डॉ वर्मा के इस संग्रह में तांका और सेदोका को भी स्थान दिया गया है। ये दोनों विधाएं हाइकु कविता का ही विस्तृत रूप हैं।


14.वही तारीख /बार बार लौटती /काल का क्रम /बढ़ता आगे नहीं /लाचार है समय।
जीवन मे समय की पुनरावृत्ति को रेखांकित करता तांका।


15.धरती तुम/सतह पर सख्त/अंदर नीर भरी/कितने आंसू/रखे सुरक्षित हो/कोई नहीं जानता।
धरती के माध्यम से नारी जाति की सहनशीलता को प्रतिबिंबित करता श्रेष्ठ सेदोका।


आधुनिक हाइकु के जनक बाशो ने हाइकु लेखन की उत्कृष्टता के बारे में कहा कि अगर कोई कवि अपने जीवन काल में तीन उत्कृष्ट हाइकु लिखता है तो वह कवि की श्रेणी में आ जाता है और अगर उसने पांच उत्कृष्ट हाइकु लिखे तो वह महाकवि कहलाने योग्य है।


इस कथन का भावार्थ यह है कि श्रेष्ठ हाइकु लिखना आसान काम नहीं हैं। श्रेष्ठ हाइकु लिखने के लिए आपको संवेदनाओं और अभिव्यक्ति के गहन समंदर में उतरना होगा तभी उच्चकोटि के हाइकु का सृजन संभव है।


आजकल सोशल मीडिया और अंतरजाल पर जो अधिकांश हाइकु लिखे जा रहे हैं वह सिर्फ हाइकु की भौतिक संरचना की ही पूर्ति है। हाइकु के प्राण गहन अभिव्यक्ति का उनमें नितांत अभाव झलकता है। इसका मुख्य कारण है कि प्रकाशित हाइकु संग्रहों की समीक्षा बहुत कम लिखी जा रही है।

इस हाइकु संग्रह में मुझे एक कमी बहुत खल रही है। इस संग्रह के हाइकु विषयानुसार क्रम में नहीं हैं। दूसरा विषय और भावों का क्रम भी निश्चित नहीं हैं। इस कारण से पाठक की तन्मयता टूटती है। इसके अलावा इस संग्रह में मुझे और कोई कमी नजर नहीं आई।


पुस्तक का आवरण पृष्ठ आकर्षक है। छपाई उच्चकोटि की है। इसके लिए अयन प्रकाशन के आदरणीय भूपाल जी सूद बधाई के पात्र हैं।

हाइकु कविता का सृजन सामान्य प्रक्रिया नहीं है। मनुष्य और इस जीवन से संबंधित समस्त भावों की गहन अभिव्यक्ति का 17 वर्णों में प्रतिबिम्बन आसान नहीं है । हाइकु का सृजन गहन संवेदनाओं का जीना है। अपनी आत्मा ,मन और संवेदनाओं को मानवता और प्रकृति से जोड़कर जो साहित्यकार सृजन करता है वही साहित्य कालजयी होता है।


डॉ सुरेंद्र वर्मा ने अपने जीवनकाल में जिन संवेदनाओं को जिया है उनका निचोड़ इस हाइकु संग्रह की हाइकु तांका और सेदोका कविताओं में प्रतिबिम्बित है।


एक कवि,दार्शनिक,चिंतक,अध्यापक और चित्रकार की सम्पूर्ण संवेदनाओं को आवाज़ देता उनका यह संग्रह"दहकते पलाश" हिंदी साहित्य की धरोहर है।


दहकते पलाश
लेखक-डॉ सुरेंद्र वर्मा
कीमत-220 रुपये
प्रकाशक-अयन प्रकाशन
महरौली नई दिल्ली।

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